धारा 6 से 19 अध्याय 3 न्यायालय फीस अधिनियम, 1870

धारा 6 से 19 अध्याय 3 न्यायालय फीस अधिनियम, 1870

अध्याय 3

अन्य न्यायालयों में और लोक कार्यालयों में फीसें 

6. मुफस्सिल न्यायालयों में या लोक कार्यालयों में फाइल आदि की गई दस्तावेजों पर फीसें. -

इस अधिनियम से उपाबद्ध प्रथम या द्वितीय अनुसूची में प्रभार्य के रूप में विनिर्दिष्ट किस्मों में से किसी किस्म की कोई भी दस्तावेज इसमें इसके पहले वर्णित न्यायालयों से भिन्न किसी न्यायालय में फाइल, प्रदर्शित या अभिलिखित या किसी लोक अधिकारी द्वारा प्राप्त की या दी न जाएगी जब तक कि उस दस्तावेज के बारे में उक्त अनुसूचियों में से किसी में भी ऐसी दस्तावेज के लिए उचित फीस के रूप में उपदर्शित फीस से अन्यून फीस संदत्त है कर दी गई हो।

7. कतिपय वादों में संदेय फीसों की संगणना.-

इसमें इसके ठीक पश्चात् वर्णित वादों में इस अधिनियम के अधीन संदेय फीस की संगणना नीचे लिखे अनुसार की जाएगी :-

(i) धन के वादों में-

धन के वादों में (जिनके अन्तर्गत नुकसानी या प्रतिकर के अथवा भरणपोषण, वार्षिकियों या कालावधिक रूप से संदेय अन्य धनराशियों की बकाया के वाद आते हैं)- दावाकृत रकम के अनुसार,

(ii) भरणपोषण और वार्षिकियों के वादों में. -

भरणपोषण या वार्षिकियों या कालावधिक रूप से संदेय अन्य धनराशियों के वादों में- वाद की विषयवस्तु के मूल्य के अनुसार और यह समझा जायेगा कि ऐसा मूल्य एक वर्ष के लिये संदेय दावाकृत रकम का दस गुना है,

(iii) बाजार मूल्य वाली अन्य जंगम सम्पत्ति के वादों में-

धन से भिन्न जंगम सम्पत्ति के वादों में, जहाँ विषयवस्तु का बाजार-मूल्य है- वादपत्र के पेश होने की तारीख पर ऐसे मूल्य के अनुसार,

(iv) (क) बिना बाजार-मूल्य की जंगम सम्पत्ति के वादों में-

जंगम सम्पत्ति के वादों में, जहाँ विषयवस्तु का कोई बाजार मूल्य नहीं है, उदाहरणार्थ, हक सम्बन्धी दस्तावेजों के मामले में,

(ख) * *

(ग) घोषणात्मक डिक्री और पारिणामिक अनुतोष के वादों में-

घोषणात्मक डिक्री या आदेश अभिप्राप्त करने के वादों में जहां पारिणामिक अनुतोष प्रार्थित है,

(घ) व्यादेश के वादों में-

व्यादेश अभिप्राप्त करने के वादों में :

(ङ) सुखाचार के लिए वादों में.-

भूमि से उद्भूत होने वाले किसी फायदे के अधिकार के (जिसके लिए जहां अन्य उपबन्ध नहीं है) वादों में; और

(च) लेखाओं के वादों में.-

लेखाओं के वादों में- वादपत्र या अपील के ज्ञापन में लिए गए ईप्सित अनुतोष के मूल्यांकन की रकम के अनुसार चालीस रुपये की न्यूनतम फीस सहित;

इन सभी वादों में वादी ईप्सित अनुतोष की मूल्यांकन की रकम का कथन करेगा।

(v) भूमि, गृहों और उद्यानों के कब्जे के वादों में.-

भूमि, गृहों और उद्यानों के कब्जे के वादों में-विषयवस्तु के मूल्य के अनुसार, और यह समझा जायगा कि ऐसा मूल्य-

जहां विषयवस्तु भूमि है, और

(क) ऐसी भूमि पर भू-राजस्व निर्धारित है या ऐसी भूमि के संबंध में भू-राजस्व संदेय है-ऐसे निर्धारित या ऐसे संदेय भू-राजस्व का बीस गुना है;

(ख) ऐसी भूमि उस भूमि का भाग है जिस पर भू-राजस्व निर्धारित है या जिसके सम्बन्ध में भू-राजस्व संदेय है-ऐसे भू-राजस्व का बीस गुना है जो ऐसे भूमि के भाग हेतु आनुपातिक रूप से हिसाब करके निकाला गया है;

(ग) ऐसी भूमि पर भू-राजस्व निर्धारित नहीं है-पांच रुपये प्रति एकड़ की दर के हिसाब से आये भू-राजस्व का बीस गुना।

(vi) शुफाधिकार प्रवर्तित कराने के वादों में -

शुफाधिकार प्रवर्तित कराने के वादों में-ऐसे अधिकार हेतु वाद हेतुक प्रदान करने वाले दस्तावेज में विनिर्दिष्ट विषयवस्तु के मूल्य के अनुसार और जहां ऐसा दस्तावेज न हो या जहां वादी एक उचित प्रतिफल हेतु शुफा का दावा करता है, वादपत्र में कथित विषयवस्तु के मूल्य पर :

परन्तु जहां न्यायालय द्वारा अवधारित विषयवस्तु का मूल्य वादपत्र में कथित मूल्य से अधिक हो, डिक्री को निष्पादित नहीं किया जायेगा, जब तक कि वास्तव में संदत्त फीस और न्यायालय द्वारा अवधारित विषयवस्तु पर देय फीस के बीच का अन्तर संदत्त नहीं कर दिया जाता।

(vi-क) विभाजन हेतु वादों में.-

(क) वादी के सम्पत्ति में हिस्से के आधे मूल्य के अनुसार; और

(ख) यदि वादपत्र प्रस्तुत करने के दिनांक को वादी का उस सम्पत्ति पर कब्जा न हो जिसका वह सहदायिक या सहस्वामी होने का दावा करता है और ऐसे दिनांक को उसके सहदायिक या सहस्वामी होने के दावे से इन्कार किया जाता है, ऐसे हिस्से के पूरे मूल्य के अनुसार।

(vii) भू-राजस्व के समनुदेशिती के हित के वादों में.-

भू-राजस्व के समनुदेशिती के हित के लिए वादों में- वादपत्र के पेश किए जाने की तारीख के ठीक पहले के वर्ष के उसके इस प्रकार के शुद्ध लाभों का पन्द्रह गुना;

(viii) कुर्की अपास्त कराने के वादों में-

भूमि की अथवा भूमि या राजस्व में के हित कुर्की अपास्त कराने के वादों में-उस रकम के अनुसार जिसके लिए वह भूमि या हित कुर्क किया गया था :

परन्तु जहां ऐसी रकम उस भूमि या हित के मूल्य से अधिक है वहां फीस की रकम की संगणना ऐसे की जाएगी मानो वह दावा उस भूमि या हित के कब्जे के लिये हो;

(ix) (क) बंधकदार के विरुद्ध बन्धक सम्पत्ति के प्रत्युद्धरण के लिए वादों में. -

बन्धकपत्र द्वारा अभिव्यक्त प्रतिभूत मूलधन के अनुसार;

(ख) बन्धकदार द्वारा बन्धक के पुरोबन्ध के वादों में, जहां बन्धक सशर्त विक्रय द्वारा किया गया है वहां विक्रय को अत्यान्तिक घोषित कराने के वादों में.-

वाद-पत्र प्रस्तुत करने के दिनांक को दावाकृत शोध्य राशि के अनुसार।

(x) विनिर्दिष्ट पालन के वादों में -

निम्नलिखित के विनिर्दिष्ट पालन के वादों में-

(क) विक्रय की संविदा के वादों में- प्रतिफल की रकम के अनुसार;

(ख) बन्धक की संविदा के वादों में- करार में प्रतिभूत रकम के अनुसार;

(ग) पट्टे की संविदा के वादों में- जुर्माना या प्रीमियम (यदि कोई हो) और अवधि के पहले वर्ष के दौरान संदाय के लिए करार किये गये भाटक के योग की रकम के अनुसार;

(घ) पंचाट के वादों में- विवादग्रस्त रकम या सम्पत्ति के मूल्य के अनुसार;

(xi) भू-स्वामी और अभिधारी के बीच के वादों में-

भू-स्वामी और अभिधारी के बीच के निम्नलिखित वादों में :-

(क) अभिधारी से पट्टे का प्रतिलेख परिदत्त कराने के लिए;

(ख) अधिभोगाधिकार रखने वाले अभिधारी के भाटक की वृद्धि के लिए,

(ग) भू-स्वामी से पट्टा परिदत्त कराने के लिए,

(गग) अभिधारी से, जिसके अंतर्गत अभिधृति के पर्यवसान के पश्चात् अतिधारण करने वाला अभिधारी आता है, स्थावर सम्पत्ति के प्रत्युद्धरण के लिए,

(घ) बेदखली की सूचना का प्रतिवाद करने के लिए,

(ङ) उस स्थावर सम्पत्ति के अधिभोग के प्रत्युद्धरण के लिए जिसमें भू-स्वामी ने किसी अभिधारी को अवैध रूप से बेदखल कर दिया है, और;

(च) भाटक के उपशमन के लिए-वाद के पेश किये जाने की तारीख के ठीक पूर्ववर्ती वर्ष के लिये संदाय उस स्थावर सम्पत्ति के जिसके प्रति वाद में निर्देश है, भाटक की रकम के अनुसार।

8. प्रतिकर सम्बन्धी आदेश के विरुद्ध अपील के ज्ञापन पर फीस.-

भूमि का लोक प्रयोजनार्थ अर्जन करने के लिए तत्समय प्रवृत्त किसी अधिनियम के अधीन प्रतिकर सम्बन्धी आदेश के विरुद्ध अपील के ज्ञापन पर इस अधिनियम के अधीन संदेय फीस की संगणना अधिनिर्णीत रकम और अपीलार्थी द्वारा दावाकृत रकम के बीच अन्तर के अनुसार की जायगी।

9. शुद्ध लाभ या बाजार मूल्य के विनिश्चयन की शक्ति.-

यदि न्यायालय यह विचार करने का कारण देखे कि धारा 7 के पैरा (5) और (6) में यधावर्णित किसी ऐसी भूमि, गृह या या उद्यान के वार्षिक शुद्ध लाभों का या बाजार-मूल्य का प्राक्कलन गलत तौर पर किया गया है तो उनमें वर्णित किसी वाद में संदेय फीस की संगणना के प्रयोजनार्थ न्यायालय किसी उचित व्यक्ति को यह निदेश देने वाला कमीशन निकाल सकेगा कि वह आवश्यक स्थानीय या अन्य अन्वेषण करे और उस पर न्यायालय को रिपोर्ट दे।

10. प्रक्रिया जहां शुद्ध लाभ या बाजार-मूल्य गलत तौर पर प्राक्कलित हुआ है.-

(i) यदि ऐसे किसी अन्वेषण के परिणामस्वरूप न्यायालय यह पाता है कि शुद्ध लाभों का या बाजार-मूल्य का प्राक्कलन गलत तौर पर किया गया है तो जितना प्राक्कलन होना चाहिये था यदि उससे अधिक हुआ है तो न्यायालय ऐसी फीस के रूप में अधिक दी गई रकम को स्वविवेकानुसार वापस कर सकेगा, किन्तु यदि प्राक्कलन अपर्याप्त हुआ है तो न्यायालय वादी से अपेक्षा करेगा कि वह उतनी अतिरिक्त फीस दे जितनी उक्त बाजार मूल्य या शुद्ध लाभों का प्राक्कलन सही तौर पर किये जाने पर संदेय होती।

(ii) ऐसी दशा में वाद अतिरिक्त फीस संदत्त किये जाने तक रोक दिया जायगा; यदि अतिरिक्त फीस उस समय के अन्दर, जो न्यायालय नियत करेगा संदत्त नहीं की जाती है तो वाद खारिज कर दिया जायगा।

11. अंतःकालीन लाभों के लिये वादों में प्रक्रिया जब डिक्रीत रकम दावाकृत रकम से अधिक है.-

अन्तःकालीन लाभ के या स्थावर सम्पत्ति और अंतःकालीन लाभ के, या लेखा के लिये वादों में, यदि डिक्रीत लाभ या रकम दावाकृत लाभ से या उस रकम से, जिस पर वादी ने ईप्सित अनुतोष का मूल्यांकन किया है, अधिक है, तो डिक्री का निष्पादन तब तक नहीं किया जायगा जब तक उचित आफिसर को वह अन्तर संदत्त न कर दिया जाये जो वस्तुतः संदत्त फीस और उस फीस में है जो इस प्रकार डिक्रीत सम्पूर्ण लाभों या रकम या समावेश वाद में होने पर संदेथ होती।

जहां अंतःकालीन लाभ की रकम का अभिनिश्चय डिक्री के निष्पादन के दौरान के लिये छोड़ दिया जाता है वहां यदि इस प्रकार अभिनिश्चित लाभ दावाकृत लाभों से अधिक है तो डिक्री का आगे निष्पादन तब तक के लिए रोक दिया जायगा जब कि वह अन्तर संदत्त नहीं कर दिया जाये जो वस्तुतः संदत्त फीस और उस फीस में है जो ऐसे अभिनिश्चित सम्पूर्ण लाभ का समावेश वाद में होने पर संदेय होती। यदि अतिरिक्त फीस उस समय के अन्दर जो न्यायालय नियत करेगा संदत्त नहीं की जाती है तो वाद खारिज कर दिया जाएगा।

12. मूल्यांकन संबंधी प्रश्नों का विनिश्चय. -

(i) किसी वादपत्र या अपील के ज्ञापन पर इस अध्याय के अधीन प्रभार्य फीस की रकम के अवधारण के प्रयोजनार्थ मूल्यांकन सम्बन्धी हर प्रश्न का विनिश्चय उस न्यायालय द्वारा किया जाएगा जिसमें, यथास्थिति, ऐसा वादपत्र या ज्ञापन फाइल किया जाता है और जहाँ तक वाद के पक्षकारों का सम्बन्ध है, ऐसा विनिश्चय अन्तिम होगा।

(ii) किन्तु जब कभी ऐसा कोई वाद किसी अपील, निर्देश या पुनरीक्षण न्यायालय के समक्ष आता है तब, यदि उस न्यायालय का यह विचार है कि उक्त प्रश्न का विनिश्चय गलत तौर पर किया गया है जिससे राजस्व का अपाय हुआ है तो, वह उस पक्षकार से, जिसने ऐसी फीस संदत्त की है, अपेक्षा करेगा कि वह उतनी अतिरिक्त फीस संदत्त करे जो उस प्रश्न का विनिश्चय सही तौर पर किए जाने पर संदेय होती, और धारा 10 के पैरा (ii) के उपबन्ध लागू होंगे।

13. अपील के ज्ञापन पर संदत्त फीस की वापसी.-

यदि ऐसी किसी अपील या वादपत्र को जो सिविल प्रक्रिया संहिता में वर्णित आधारों में से किसी आधार पर निचले न्यायालय द्वारा नामंजूर कर दिया गया है ग्रहण कर लिए जाने का आदेश दिया जाता है या यदि अपील में कोई वाद निचले न्यायालय द्वारा दोबारा विनिश्चिय के लिए उसी संहिता की धारा 351 में वर्णित आधारों में से किसी आधार पर प्रतिप्रेषित किया जाता है तो, अपील न्यायालय अपीलार्थी को एक प्रमाण-पत्र अनुदत्त करेगा जो अपील के ज्ञापन पर संदत्त फीस की पूरी रकम कलक्टर से या यथा विहित रोति में इलेक्ट्रॉनिक अंतरण के माध्यम से, वापस पाने के लिए उसे प्राधिकृत करेगा:

परन्तु यदि अपील में प्रतिप्रेषण की दशा में प्रतिप्रेषण का आदेश वाद की सम्पूर्ण विषयवस्तु के लिए नहीं है तो इस प्रकार अनुदत्त प्रमाणपत्र अपीलार्थी की विषयवस्तु के उस भाग या उन भागों पर, जिनके बारे में वाद प्रतिप्रेषित किया गया है मूलतः संदेय फीस से अधिक फीस वापस पाने के लिए प्राधिकृत न करेगा।

14. निर्णय के पुनर्विलोकन के लिए आवेदन की फीस की वापसी.-

जहाँ निर्णय के पुनर्विलोकन के लिए कोई आवेदन डिक्री की तारीख से तीसवें दिन या उसके पश्चात् उपस्थापित किया जाता है, वहाँ न्यायालय, उस दशा में जबकि विलम्ब आवेदक की गफलत से कारित न हुआ हो, स्वविवेकानुसार, आवेदक को ऐसा प्रमाण-पत्र अनुदत्त कर सकेगा जो उसे इस बात के लिए प्राधिकृत करता हो कि वह उस आवेदन बाबत संदत्त की गई फीस का उतना भाग, जितना की उस फीस की, जो कि उस दशा में देय होती जबकि वह आवेदन ऐसे दिन के पूर्व उपस्थापित किया जाता, मात्रा से आगे बढ़ा हुआ है, कलेक्टर से या यथा विहित रीति में इलेक्ट्रॉनिक अंतरण के माध्यम से, वापिस प्राप्त कर ले।

15. जहां न्यायालय अपना पूर्व विनिश्चय भूल के आधार पर उलट देता है या उपांतरित कर देता है वहाँ फीस की वापसी-

जहाँ निर्णय के पुनर्विलोकन के लिए आवेदन ग्रहण कर लिया जाता है और जहाँ पुनः सुनवाई पर न्यायालय अपना पूर्व विनिश्चय को विधि या तथ्य की भूल के आधार पर उलट देता है या उपांतरित कर देता है वहाँ आवेदक न्यायालय से एक प्रमाणपत्र पाने का हकदार होगा जो उसे आवेदन पर संदत्त फीस में से उतनी फीस कलक्टर से या यथा विहित रोति में इलेक्ट्रॉनिक अंतरण के माध्यम से, वापस पाने के लिए प्राधिकृत करेगा जितनी उस फीस से अधिक है जो ऐसे न्यायालय में दिये गये किसी अन्य आवेदन पर इस अधिनियम के द्वितीय अनुसूची के संख्यांक 1 के खण्ड (ख) या खण्ड (ङ) या खण्ड (च) के अधीन संदेय होती।

किन्तु इस धारा के पूर्ववर्ती भाग की कोई भी बात आवेदक को ऐसे प्रमाणपत्र का हकदार नहीं बनाएगी यदि वह उलटना या उपांतरण पूर्णतः या भागतः ऐसे नए साक्ष्य के कारण होता है जो आरंभिक सुनवाई में पेश किया जा सकता था।

16. फीस का प्रतिदाय.-

जहां न्यायालय वाद के पक्षकारों को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 89 में निर्दिष्ट विवाद के निपटारे के ढंगों में से कोई ढंग निर्देशित करता है, वहां वादी न्यायालय से ऐसा प्रमाणपत्र प्राप्त करने का हकदार होगा जिसमें कलक्टर से या यथा विहित रीति में इलेक्ट्रॉनिक अंतरण के माध्यम से, ऐसे वाद के संबंध में संदत्त फीस की पूरी रकम वापस प्राप्त करने के लिए प्राधिकृत किया गया हो।

17. बाहुल्य पूर्ण वाद.-

(1) किसी वाद में जिसमें दो या अधिक पृथक् और सुभिन्न वाद हेतुक संयोजित किये गये हैं और प्रत्येक के बारे में पृथक् और सुभिन्न अनुतोष चाहे गये है, वहाँ वादपत्र पर फीसों के उस योग की रकम प्रभार्य होगी जो ऐसे प्रत्येक वाद हेतुक के बारे में यदि पृथक् वाद संस्थित किये जाते तब, वादपत्रों पर इस अधिनियम के अधीन प्रभार्य होती:

परन्तु इस उपधारा की कोई भी बात, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा या तद्धीन प्रदत्त प्रथम विचारण के आदेश की शक्ति पर प्रभाव डालने वाली न समझी जोयगी।

(2) जहाँ एक ही वाद हेतुक पर आधारित एक से अधिक अनुतोष संयुक्त रूप से किसी वाद में चाहे गये हैं वहाँ वादपत्र पर फीसों के उस योग की रकम प्रभार्य होगी जो यदि ऐसे प्रत्येक अनुतोष के बारे में पृथक् वाद संस्थित किए जाते, इस अधिनियम के अधीन प्रभार्य होती:

परन्तु यदि कोई अनुतोष मुख्य अनुतोष के आनुषंगी रूप में चाहा गया है तो वादपत्र केवल मुख्य अनुतोष की बाबत ही प्रभार्य होगा।

(3) जहाँ एक ही वाद हेतुक पर आधारित एक से अधिक अनुतोष किसी वाद में आनुकल्पिक रूप से चाहे गये हैं, हैं, वादपत्र उन फीसों में सबसे बड़ी फीस से प्रभार्य होगा जिससे, यदि ऐसे प्रत्येक अनुतोष के बारे में पृथक वाद प्रस्तुत किए जाते, इस अधिनियम के अधीन वादपत्र पर प्रभार्य होते।

(4) इस धारा के उपबन्ध यथावश्यक परिवर्तनों सहित अपीलों और प्रत्याक्षेपों पर लागू होंगे।

18. परिवादियों की लिखित परीक्षा.-

जब ऐसे व्यक्ति की, जो सदोष परिरोध या सदोष अवरोध के अपराध का, या ऐसे अवरोध के अपराध का, या ऐसे अपराध से, जिसके लिए पुलिस अधिकारी वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकते हैं, भिन्न किसी अपराध का परिवाद करता है और जिसने पहले ही कोई ऐसी अर्जी पेश नहीं की है जिस पर इस अधिनियम के अधीन फीस उद्‌गृहीत की गई है, प्रथम या एकमात्र परीक्षा दण्ड प्रक्रिया संहिता के उपबन्धों के अधीन लेखबद्ध की जाय तब परिवादी दो रुपये की फीस का संदाय करेगा उस दशा के सिवाय जब न्यायालय ऐसे संदाय का परिहार करना ठीक समझे।

19. कतिपय दस्तावेजों को छूट.-

इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई भी बात निम्नलिखित दस्तावेजों को किसी फीस से प्रभार्य नहीं बनाएगी-

(i) संघ के सशस्त्र बलों में से किसी के ऐसे सदस्य द्वारा जो सिविल नियोजन में नहीं है, वाद संस्थित करने के लिये या उसमें प्रतिरक्षा करने के लिए निष्पादित मुख्तारनामा।

(ii)***

(iii) वाद की प्रथम सुनवाई के पश्चात् न्यायालय द्वारा मांगे गए लिखित कथन।

(iv)***

(v) फोर्ट सेन्ट जार्ज की प्रेसिडेंसी में ग्राम मुंसिफों द्वारा विचारित वादों में के वादपत्र।

(vi) उसी प्रेसिडेंसी की जिला पंचायतों के समक्ष वादों के वादपत्र और आदेशिकाएं।

(vii) 1816 के मद्रास रेगुलेशन 12 के अधीन कलक्टर के समक्ष वादों के वादपत्र।

(viii) जहाँ वह रकम या उस सम्पत्ति का मूल्य, जिसके बारे में प्रोबेट या प्रशासनपत्र या प्रमाणपत्र अनुदत्त किया जायगा, एक हजार रुपये से अनधिक है वहां विल का प्रोबेट, प्रशासनपत्र और ऋणों तथा प्रतिभूतियों के सिवाय 1827 के बाम्बे रेगुलेशन 8 के अधीन प्रमाण-पत्र।

(ix) कलक्टर या भू-राजस्व का व्यवस्थापन करने वाले अन्य अधिकारी, या राजस्व बोर्ड या राजस्व आयुक्त को भूमि के निर्धारण, या उस पर अधिकार या उसमें के हित के अभिनिश्चित किए जाने से संसक्त बातों के सम्बन्ध में दिया गया आवेदन या अर्जी, यदि वह आवेदन या अर्जी ऐसे व्यवस्थापन के अन्तिम पुष्टिकरण के पहले पेश की गई है।

(x) सिंचाई के लिए सरकारी जल के प्रदाय के संबंध में आवेदन।

(xi) खेती का विस्तार करने या भूमि का त्याग करने की इजाजत के लिए भू-राजस्व के किसी अधिकारी के समक्ष ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो सीधे सरकार से किये गए बचनबन्ध के अधीन ऐसी भूमि का धारक है जिसका राजस्व परिनिर्धारित तो है किन्तु स्थायी रूप से नहीं, पेश किया गया आवेदन।

(xii) भूमि के त्याग के लिए या भाटक की वृद्धि के लिये दी गई सूचना की तामिल के लिए आवेदन।

(xiii) अभिकर्ता को करस्थम् करने का लिखित प्राधिकार।

(xiv) साक्ष्य देने या दस्तावेज पेश करने के लिए हाजिर होने के लिए किसी साक्षी या अन्य व्यक्ति को समन करने के लिए, या ऐसे प्रदर्श की, जी ऐसा शपथपत्र नहीं है जो न्यायालय में पेश किये जाने के आसत्र प्रयोजन के लिये तैयार किया गया है, पेश या फाइल करने के बारे में प्रथम आवेदन (जो उस अर्जी से भिन्न है जिस में आपराधिक आरोप या इत्तिला अन्तर्विष्ट है)

(xv) दाण्डिक मामलों में जमानतनामे, अभियोजन करने या साक्ष्य देने के लिए मुचलके और स्वीय उपसंजाति के लिए या अन्य बातों के लिए मुचलके।

(xvi) किसी अपराध के बारे में पुलिस अधिकारी को या उसके समक्ष या क्रमशः मद्रास तथा मुंबई के सपरिषद् गवर्नरों के अधीन के राज्य-क्षेत्रों के ग्रामों, ग्रामणियों या ग्राम पुलिस का या के समक्ष पेश किये जाने वाले या रखे जाने वाले अर्जी, आवेदन, आरोप या इत्तिला।

(xvii) कैदी या अन्य व्यक्ति द्वारा जो विबाध्यता के या किसी न्यायालय या उसके अधिकारियों के अवरोध के अधीन है आवेदन।

(xviii) लोक सेवक भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) में यथापरिभाषित, नगरपालिका अधिकारी, या किसी रेल कम्पनी के अधिकारी या सेवक का परिवाद।

(xix) सरकारी वनों में काष्ठ काटने की अनुज्ञा के लिए या ऐसे वनों से अन्यथा सम्बद्ध आवेदन।

(xx) सरकार द्वारा आवेदक की शोध्य धन के संदाय के लिए आवेदन।

(xxi) 1856 के अधिनियम संख्यांक 20 के अधीन किए गए चौकीदारी निर्धारण के विरुद्ध या किसी नगरपालिका कर के विरुद्ध अपील की अर्जी।

(xxii) लोक प्रयोजनों के लिए संपत्ति के अर्जन से सम्बन्धित तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन प्रतिकर के लिए आवेदन।

(xxiii) 1869 के बंगाल अधिनियम संख्यांक 2 (छोटा नागपुर की कतिपय भू-धृतियों को अभिनिश्चित, विनियमित और अभिलिखित करने के लिये) के अधीन नियुक्त विशेष आयुक्त को पेश की गई अर्जियां।

(xxiv) इण्डियन क्रिश्चियन मैरिज ऐक्ट, 1872 (1872 का 15) की धारा 45 और 48 के अधीन अर्जियां।

 

 

 

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