धारा 1 से 2 अध्याय 1 प्रारम्भिक

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति

(अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989

क्रमांक 33 सन् 1989

[11 सितम्बर, 1989]

 

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर अत्याचार का अपराध करने का निवारण करने के लिए, ऐसे अपराधों के विचारण के लिए 1[विशेष न्यायालयों और अनन्य विशेष न्यायालयों] का तथा ऐसे अपराधों से पीड़ित व्यक्तियों को राहत देने का और उनके पुनर्वास का तथा उससे संबंधित या उससे आनुषंगिक विषयों का उपबंध करने के लिए अधिनियम । (1. अधिनियम क्रमांक 1 सन् 2016 की धारा 2 द्वारा दिनांक 26-1-2016 से "विशेष न्यायालयों" शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।)

भारत गणराज्य के चालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ. -

(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 है।

(2) इसका विस्तार 2[* *] सम्पूर्ण भारत पर है। (2. अधिनियम क्रमांक 34 सन् 2019, अनुसूची 5. द्वारा दिनांक 31-10-2019 से "जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय" शब्दों का लोप किया गया।)

(3) यह उस तारीख3 को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे। (3. अधिनियम दिनांक 30-1-90 से प्रवृत्त हुआ। देखिये अधिसूचना क्र. का. आ. 106 (अ), दिनांक 29-1-90 भारत का राजपत्र (असाधारण) भाग 2 खण्ड 3(ii), दिनांक 29-1-90 पृष्ठ 1 पर प्रकाशित।)

2. परिभाषाएं. -

इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) "अत्याचार" से धारा 3 के अधीन दंडनीय अपराध अभिप्रेत है;

(ख) "संहिता" से दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (2023 का 46) अभिप्रेत है;

4 [(खख) "आश्रित" से पीड़ित का ऐसा पति या पत्नी, बालक, माता-पिता, भाई और बहिन जो ऐसे पीड़ित पर अपनी सहायता और भरण-पोषण के लिए पूर्णतः या मुख्यतः आश्रित हैं; 

(खग) "आर्थिक बहिष्कार" से निम्नलिखित अभिप्रेत है, -

(i) अन्य व्यक्ति से भाड़े पर कार्य से संबंधित संव्यवहार करने या कारबार करने से इंकार करना; या

(ii) अवसरों का प्रत्याख्यान करना जिनमें सेवाओं तक पहुंच या प्रतिफल के लिए सेवा प्रदान करने हेतु संविदाजन्य अवसर सम्मिलित हैं; या

(iii) ऐसे निबंधनों पर कोई बात करने से इंकार करना जिन पर कोई बात, कारबार के सामान्य अनुक्रम में सामान्यतया की जाएगी; या

(iv) ऐसे वृत्तिक या कारबार संबंधों से प्रतिविरत रहना, जो किसी अन्य व्यक्ति से रखे जाएं;

(खघ) "अनन्य विशेष न्यायालय" से इस अधिनियम के अधीन अपराधों का अनन्य रूप से विचारण करने के लिए धारा 14 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित अनन्य विशेष न्यायालय अभिप्रेत हैं;

(खङ) "वन अधिकार" का वह अर्थ होगा, जो अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (2007 का 2) की धारा 3 की उपधारा (1) में है;

(खच) "हाथ से मैला उठाने वाले कर्मी" का वह अर्थ होगा, जो हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 (2013 का 25) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (छ) में उसका है;

(खछ) "लोक सेवक" से भारतीय दंड संहिता, 1860 (1860 का 45) की धारा 21/ भारतीय न्याय संहिता 2023(2023 का 45) धारा 2(28) के अधीन यथापरिभाषित लोक सेवक और साथ ही तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन लोक सेवक समझा गया कोई अन्य व्यक्ति अभिप्रेत है और जिनमें, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार के अधीन उसकी पदीय हैसियत में कार्यरत कोई व्यक्ति सम्मिलित है;] (4.अधिनियम क्रमांक 1 सन् 2016 की धारा 3(1) द्वारा दिनांक 26-1-2016 से अंतःस्थापित।)

(ग) "अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों" के वही अर्थ हैं जो संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और खंड (25) में हैं;

(घ) "विशेष न्यायालय" से धारा 14 में विशेष न्यायालय के रूप में विनिर्दिष्ट कोई सेशन न्यायालय अभिप्रेत है;

(ङ) "विशेष लोक अभियोजक" से विशेष लोक अभियोजक के रूप में विनिर्दिष्ट लोक अभियोजक या धारा 15 में निर्दिष्ट अधिवक्ता अभिप्रेत है;

1[(ङक) "अनुसूची" से इस अधिनियम से उपबाद्ध अनुसूची अभिप्रेत है; 

(ङख) "सामाजिक बहिष्कार" से कोई रूढिगत सेवा अन्य व्यक्ति को देने के लिये या उससे प्राप्त करने के लिए या ऐसे सामाजिक संबंधों से प्रतिविरत रहने के लिए, जो अन्य व्यक्ति से बनाए रखे जाएं या अन्य व्यक्तियों से उसको अलग करने के लिए किसी व्यक्ति को अनुज्ञात करने के इंकार करना अभिप्रेत है;

(ङग) "पीड़ित" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन 'अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति' की परिभाषा के भीतर आता है तथा जो इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के होने के परिणामस्वरूप शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक, भावानात्मक या धनीय हानि या उसकी संपत्ति को हानि वहन या अनुभव करता है और जिसके अंतर्गत उसके नातेदार विधिक संरक्षक और विधिक वारिस भी हैं;

(ङघ) "साक्षी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो इस अधिनियम के अधीन अपराध से अंतर्विलित किसी अपराध के अन्वेषण, जांच या विचारण के प्रयोजन के लिए तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित है या कोई जानकारी रखता है या आवश्यक ज्ञान रखता है और जो ऐसे मामले के अन्वेषण, जांच या विचारण के दौरान जानकारी देने या कथन करने या कोई दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए अपेक्षित है या अपेक्षित हो सकेगा और जिसमें ऐसे अपराध का पीड़ित सम्मिलित है;] (1. अधिनियम क्रमांक 1 सन् 2016 की धारा 3 (ii) द्वारा दिनांक 26-1-2016 से अंतःस्थापित।)

1[(च) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किंतु परिभाषित नहीं हैं और, यथास्थिति, भारतीय दंड संहिता, 1860 (1860 का 45) / भारतीय न्याय संहिता 2023(2023 का 45), भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) / भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (2023 का 47)या दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (2023 का 46) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होना समझा जाएगा जो उन अधिनियमितियों में है।]

(1. अधिनियम क्रमांक 1 सन् 2016 की धारा 3(iii) द्वारा दिनांक 26-1-2016 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व खंड () निम्नवत था :-

"() उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं और संहिता या भारतीय दंड संहिता में परिभाषित हैं, वही अर्थ हैं जो, यथास्थिति, संहिता में या भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) में हैं।"

(2) इस अधिनियम में किसी अधिनियमिति या उसके किसी उपबंध के प्रति किसी निर्देश का अर्थ किसी ऐसे क्षेत्र के सम्बन्ध में जिसमें ऐसी अधिनियमिति या ऐसा उपबन्ध प्रवृत्त नहीं हैं यह लगाया जाएगा कि वह उस क्षेत्र में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि, यदि कोई हो, के प्रति निर्देश है।

 

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