
(क) बन्धक विनिर्दिष्ट स्थावर सम्पत्ति में के किसी हित का वह अन्तरण है जो उधार के तौर पर दिए गए या दिए जाने वाले धन के संदाय को या वर्तमान या भावी ऋण के संदाय को या ऐसे वचनबन्ध का पालन, जिससे धन संबंधी दायित्व पैदा हो सकता है, प्रतिभूत करने के प्रयोजन से किया जाता है।
अन्तरक बन्धककर्त्ता और अन्तरिती बन्धकदार कहलाता है, मूलधन और ब्याज, जिनका संदाय तत्समय प्रतिभूत है, बन्धक धन कहलाते हैं, और वह लिखत (यदि कोई हो), जिसके द्वारा अन्तरण किया जाता है बन्धक विलेख कहलाती है।
(ख) सादा बन्धक - जहाँ कि बन्धककर्ता बन्धक सम्पत्ति का कब्जा परिदत्त किए बिना बन्धक धन चुकाने के लिए अपने को व्यक्तितः आबद्ध करता है और अभिव्यक्त या विवक्षित तौर पर करार करता है कि उस संविदा के अनुसार संदाय करने में उसके असफल रहने की दशा में बंधकदार को बंधक सम्पत्ति का विक्रय कराने का और विक्रय के आगामों को, जहाँ तक वह आवश्यक हो, बन्धक धन के संदाय में उपयोजित कराने का अधिकार होगा, वहाँ वह संव्यवहार सादा बंधक और बंधकदार सादा बंधकदार कहलाता है।
(ग) सशर्त विक्रय द्वारा बन्धक - जहाँ कि कोई बन्धककर्ता बन्धक सम्पत्ति को दृश्यतः बेच देता है-
इस शर्त पर कि किसी निश्चित तारीख को बन्धक धन के संदाय में व्यतिक्रम होते ही विक्रय आत्यन्तिक हो जाएगा, अथवा
इस शर्त पर कि ऐसा संदाय किए जाने पर विक्रय शून्य हो जाएगा, अथवा
इस शर्त पर कि ऐसा संदाय किए जाने पर क्रेता वह सम्पत्ति विक्रेता को अन्तरित कर देगा,
वहाँ ऐसा संव्यवहार सशर्त विक्रय द्वारा बन्धक और बन्धकदार सशर्त विक्रय द्वारा बन्धकदार कहलाता है:
परन्तु ऐसा कोई भी संव्यवहार बन्धक नहीं समझा जाएगा जब तक कि वह शर्त उस दस्तावेज में सन्निविष्ट न हो जिससे विक्रय किया गया है या किया जाना तात्पर्थित है।]
(घ) भोग बन्धक - जहाँ कि बन्धककर्ता बन्धक सम्पत्ति का कब्जा बन्धकदार को परिदत्त कर देता है या परिदत्त करने के लिए अपने को अभिव्यक्त या विवक्षित तौर पर आबद्ध कर लेता है और उसे प्राधिकृत करता है कि बंधक धन का संदाय किए जाने तक वह ऐसा कब्जा प्रतिधृत करे और उस सम्पत्ति से प्रोद्भूत भाटकों और लाभों को या ऐसे भाटकों और लाभों के किसी भाग को प्राप्त करे और उन्हें ब्याज मद्धे या बन्धक धन के संदाय में या भागतः ब्याज मद्धे या भागतः बंधक धन के संदाय में, विनियोजित कर ले, वहाँ वह संव्यवहार भोग-बन्धक और वह बन्धकदार भोग-बन्धकदार कहलाता है।
(ङ) अंग्रेजी बंधक- जहाँ कि बन्धककर्ता बन्धक धन का प्रतिसंदाय निश्चित तारीख को करने के लिए अपने को आबद्ध करता है और बन्धक सम्पत्ति को बन्धकदार को आत्यन्तिक रूप से किन्तु इस परन्तुक के अध्यधीन अन्तरित करता है कि करार के अनुसार बन्धक धन के संदाय पर बंधकदार उसे बंधककर्त्ता को प्रति अन्तरित कर देगा, वहाँ वह संव्यवहार अंग्रेजी बंधक कहलाता है।
(च) हक-विलेखों के निक्षेप द्वारा बन्धक - जहाँ कि कोई व्यक्ति निम्नलिखित नगरों, अर्थात् कलकत्ता, मद्रास और मुम्बई नगरों में से किसी में और किसी भी अन्य नगर में, जिसे संपृक्त राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, किसी लेनदार को या उसके अभिकर्ता को स्थावर सम्पत्ति की हक की दस्तावेजों को, उस सम्पत्ति पर प्रतिभूति सृष्ट करने के आशय से परिदत्त करता है, वहाँ वह संव्यवहार हक-विलेखों के निक्षेप द्वारा बंधक कहलाता है।
(छ) विलक्षण बन्धक - जो बन्धक इस धारा के अर्थ में सादा बन्धक सशर्त विक्रय द्वारा बन्धक, भोग-बन्धक, अंग्रेजी बन्धक या हक विलेखों के निक्षेप द्वारा बन्धक नहीं है वह विलक्षण बन्धक कहलाता है।
जहाँ कि प्रतिभूत मूलधन सौ रुपए या उससे अधिक है, वहाँ वह बंधक, जो हक विलेखों के निक्षेपों द्वारा बंधक से भिन्न है, बंधककर्ता द्वारा हस्ताक्षरित और कम से कम दो साक्षियों द्वारा अनुप्रमाणित रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा ही किया जा सकेगा।
जहाँ कि प्रतिभूत मूलधन सौ रुपए से कम है, वहाँ बन्धक या तो उपर्युक्त जैसे हस्ताक्षरित और अनुप्रमाणित रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा या (सिवाय सादा बंधक की दशा में के) सम्पत्ति के परिदान द्वारा किया जा सकेगा।
जब तक कि अभिव्यक्त तौर पर अन्यथा उपबन्धित न हो, इस अध्याय में बंधककर्ताओं और बंधकदारों के प्रति निर्देशों के अन्तर्गत क्रमशः उन व्यक्तियों के प्रति भी निर्देश समझे जाएंगे जिन्हें उनसे हक व्युत्पन्न हुआ है।
मूलधन के शोध्य हो जाने के पश्चात् किसी भी समय बंधककर्ता का बंधक-धन को उपर्युक्त समय और स्थान में देने या निविदत्त करने पर यह अधिकार होता है कि वह बन्धकदार से अपेक्षा करे कि वह (क) बन्धककर्ता को बन्धक विलेख और बन्धक सम्पत्ति से संबंधित ऐसी सब दस्तावेजों का परिदान करे जो बंधकदार के कब्जे में या शक्ति में हों, (ख) जहाँ कि बन्धकदार बन्धक सम्पत्ति पर कब्जा रखता है वहाँ बन्धककर्ता को उस पर कब्जा परिदत्त करे और (ग) बन्धककर्ता के खर्च पर या तो बन्धक सम्पत्ति उसको या ऐसे अन्य व्यक्ति को जिसे वह निर्देशित करे, प्रति अन्तरित करे या यह लेखवद्ध अभिस्वीकृति कि ऐसा कोई अधिकार, जो बन्धककर्ता के उस हित का अल्पीकरण करता है जो बन्धकदार को अन्तरित किया गया है, निर्वापित हो गया है, निष्पादित करे और (जहाँ कि बन्धक रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा किया गया है) रजिस्ट्रीकृत कराएः
परन्तु यह तब जब कि इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकार पक्षकारों के कार्य द्वारा या न्यायालय की डिक्री द्वारा निर्वाचित न हो चुका हो।
इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकार मोचन अधिकार कहलाता है और उसे प्रवर्तित कराने का वाद मोचन वाद कहलाता है।
इस धारा को कोई भी बात ऐसे किसी उपबन्ध को अविधिमान्य कर देने वाली न समझी जाएगी जिसका यह प्रभाव है कि यदि वह समय निकल जाने दिया गया हो जो मूलधन के संदाय के लिए नियत है या यदि ऐसा कोई समय नियत नहीं किया गया है तो बन्धकदार ऐसे धन के संदाय या निविदा से पहले युक्तियुक्त सूचना पाने का हकदार होगा।
बन्धक सम्पत्ति के भाग का मोचन - इस धारा की कोई भी बात बन्धक सम्पत्ति के अंश में हो हितबद्ध किसी व्यक्ति को बन्धक मद्धे अवशिष्ट शोध्य रकम के आनुपातिक भाग के संदाय पर अपने ही अंश का मोचन कराने का हकदार नहीं बनाएगी, केवल वहाँ के सिवाय जहाँ कि बंधकदार ने या यदि एक से अधिक बंधकदार हैं तो ऐसे सब बन्धकदारों ने बन्धककर्ता के उस अंश को पूर्णतः या भागतः अर्जित कर लिया है
(1) जहाँ कि बन्धककर्त्ता मोचन के लिए हकदार है, वहाँ उन किन्हीं शतों की पूर्ति पर, जिनकी पूर्ति पर वह प्रति-अन्तरण कराने की अपेक्षा करने का हकदार हो जाता है, वह बन्धकदार से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह उस सम्पत्ति को प्रति अन्तरित करने के बजाय, ऐसे अन्य व्यक्ति को जिसे बन्धककर्ता निर्दिष्ट करे, बन्धक ऋण समनुदेशित करे और बन्धक सम्पत्ति अन्तरित करे, तथा बन्धकदार तद्नुसार समनुदेशन और अन्तरण करने के लिए आबद्ध होगा।
(2) इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकार बन्धककर्ता और विल्लंगमदार के होंगे और किसी मध्यवर्ती विल्लंगम के होते हुए भी बन्धककर्ता द्वारा या किसी भी विल्लंगम द्वारा प्रवर्तित कराए जा सकेंगे, किन्तु किसी विल्लंगमदार द्वारा की गई अपेक्षा बन्धककर्त्ता द्वारा की गई अपेक्षा पर अभिभावी होगी और जहाँ तक विल्लंगमदारों के बीच का संबंध है पूर्विक विल्लंगमदारों की अपेक्षा पाश्चिक विल्लंगमदारों की अपेक्षा पर अभिभावी होगी।
(3) इस धारा के उपबन्ध उस बन्धकदार के बारे में लागू नहीं होते जिसका कब्जा है या रहा है।
बन्धककर्त्ता का उस समय तक, जब तक उसका मोचन अधिकार बना रहता है, यह हक होगा कि बन्धक सम्पत्ति संबंधी जो हक की दस्तावेजें बन्धकदार की अभिरक्षा या शक्ति में हैं, उनका निरीक्षण और उनकी प्रतियाँ या संक्षिप्तियाँ या उनमें से उद्धरण सब युक्तियुक्त समयों पर अपनी प्रार्थना और अपने खर्च पर और बन्धकदार के तन्निमित्त खर्चा और व्ययों को देकर कर ले।
वह बन्धककर्त्ता, जिसने दो या अधिक बन्धक एक ही बन्धकदार के पक्ष में निष्पादित कर दिए हैं, तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो उस समय, जब उन बन्धकों में से दो या अधिक बन्धकों का मूलधन शोध्य हो गया हो, ऐसे किसी एक बन्धक का पृथक्तः या ऐसे बन्धकों में से एक साथ ही दो या अधिक बन्धकों का मोचन कराने का हकदार होगा।
62. कब्जा प्रत्युद्धरण का भोग-बन्धककर्त्ता का अधिकार-
भोग बन्धक की दशा में बन्धककर्ता को यह अधिकार है कि वह बन्धक विलेख और बन्धक सम्पत्ति संबंधी सब दस्तावेजों के सति, जो बन्धकदार के कब्जे या शक्ति में हों, उस सम्पत्ति के कब्जे का प्रत्युद्धरण कर ले-
(क) जहाँ कि बन्धकदार सम्पत्ति के भाटकों और लाभों से बंधक धन का भुगतान स्वयं कर लेने के लिए प्राधिकृत है वहाँ तब जब ऐसे धन का भुगतान हो गया हो,
(ख) जहाँ कि बन्धकदार ऐसे भाटकों और लाभों से या उनके किसी भाग से बन्धक धन के केवल किसी भाग का भुगतान स्वयं कर लेने के लिए प्राधिकृत है, वहाँ तब जब बन्धक धन के संदाय के लिए विहित कालावधि का (यदि कोई हो) अवसान हो गया हो और बन्धककर्ता बन्धक धन या उसका कोई अतिशेष बन्धकदारों को दे दे या निविदत्त कर दे या जैसा कि एतस्मिन्पश्चात् उपबन्धित है, न्यायालय में निक्षिप्त कर दे।
जहाँ कि बन्धकदार के कब्जे में की बन्धक सम्पत्ति में अनुवृद्धि बन्धक चालू रहने के दौरान होती है, वहाँ तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो मोचन किए जाने पर बन्धकदार के विरुद्ध बन्धककर्ता ऐसी अनुवृद्धि का हकदार होगा।
अन्तरित स्वामित्व के आधार पर अर्जित अनुवृद्धि- जहाँ कि ऐसी अनुवृद्धि बन्धकदार के व्यय से अर्जित की गई है, और मूल सम्पत्ति का अपाय हुए बिना पृथक् कब्जे या उपभोग के योग्य है, वहाँ उस अनुवृद्धि को लेने की वांछा करने वाला बन्धककर्त्ता उसे अर्जित करने का व्यय बन्धकदार को देगा। यदि ऐसा पृथक् कब्जा या उपभोग। संभव न हो तो वह अनुवृद्धि, सम्पत्ति के साथ, परिदत्त करनी होगी और बन्धककर्ता दायी होगा कि ऐसी दशा में, जब उस सम्पत्ति का नाश, समपहरण या विक्रय से परिरक्षित रखने के लिए अर्जन आवश्यक हो, या ऐसी दशा में, जब अर्जन बन्धककर्त्ता की अनुमति से किया गया हो, उस अर्जन में लगे उचित खर्चो को उन पर उसी दर से, जो मूलधन पर देय है, या जहाँ कि ऐसी कोई दर नियत नहीं की गई है, वहाँ नौ प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज सहित मूलधन में जोड़कर दे।
अन्तिम वर्णित दशा में अनुवृद्धि से उत्पन्न होने वाले लाभ, यदि कोई हों, बन्धककर्त्ता के नाम जमा किए जाएंगे।
जहाँ कि बन्धक भोग-बंधक है और अनुवृद्धि बन्धकदार के व्यय से अर्जित की गई है, वहाँ अनुवृद्धि से उद्भुत लाभ, यदि कोई हो, तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो ऐसे व्यय किए गए धन पर देय ब्याज मद्धे यदि कोई हो, मुजरा कर दिए जाएंगे।
(1) जहाँ कि बन्धकदार के कब्जे में की बन्धक सम्पत्ति में अभिवृद्धि बन्धक के चालू रहने के दौरान की गई है, वहाँ मोचन पर बन्धककर्त्ता, तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो अभिवृद्धि का हकदार होगा और बन्धककर्त्ता केवल उपधारा (2) में उपबन्धित मामलों को छोड़कर उसका खर्चा देने का दायी न होगा।
(2) जहाँ कि कोई ऐसी अभिवृद्धि बन्धकदार के खर्चे पर की गई थी और सम्पत्ति को नाश या क्षय से परिरक्षित करने के लिए आवश्यक थी या प्रतिभूति को अपर्याप्त होने से रोकने के लिए आवश्यक थी, या किसी लोक सेवक या लोक प्राधिकारी के विधिपूर्ण आदेश के अनुपालन में की गई थी, वहाँ तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो बन्धककर्त्ता दायी होगा कि अभिवृद्धि के उचित खर्चा की उसी दर से ब्याज सहित, जो मूलधन पर देय है या जहां कि कोई ऐसी दर नियत नहीं है, वहां प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज सहित मूलधन में जोड़कर दे तथा उस अभिवृद्धि के कारण प्रोद्भवमान लाभ, यदि कोई हो, बन्धककर्त्ता के नाम जमा किए जाएंगे।]
जहाँ कि बन्धक सम्पत्ति पट्टा है और बन्धकदार उस पट्टे का नवीकरण अभिप्राप्त करता है; वहाँ बन्धककर्त्ता द्वारा तत्प्रतिकूल संविदा न की गयी हो तो मोचन पर नवीन पट्टे का फायदा उसे मिलेगा।
तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो यह समझा जाएगा कि बन्धककर्ता ने बन्धकदार से संविदा की है कि-
(क) वह हित, जिसे बन्धककर्ता बन्धकदार को अन्तरित करने की प्रव्यंजना करता है, अस्तित्वयुक्त है, और उसे अन्तरित करने की शक्ति बन्धककर्ता को है;
(ख) बन्धककर्ता बन्धक सम्पत्ति पर बन्धककर्ता के हक की प्रतिरक्षा करेगा या यदि बन्धकदार का उस पर कब्जा है तो बन्धककर्त्ता उसे उस हक की प्रतिरक्षा करने के योग्य बनाएगा;
(ग) जब तक बन्धक सम्पत्ति पर बन्धकदार का कब्जा नहीं है, तब तक सम्पत्ति की बाबत प्रोद्भवमान शोध्य सब लोक प्रभारों को बन्धककर्ता देगा;
(घ) और जहाँ कि बन्धक सम्पत्ति पट्टे हैं, वहाँ उस पट्टे के अधीन देय भाटकों का संदाय, उसमें अन्तर्विष्ट शर्तों का पालन और पट्टेदार को आबद्ध करने वाली संविदाओं का अनुपालन बन्धक के प्रारम्भ होने तक का किया जा चुका है, तथा बन्धककर्त्ता उस समय तक, जब तक प्रतिभूति वर्तमान रहती है, और बन्धकदार का कब्जा बन्धक सम्पत्ति पर नहीं है, पट्टे द्वारा या यदि पट्टे का नवीकरण कराया जाए तो नवीकृत पट्टे द्वारा आरक्षित भाटक देगा, उसमें अन्तर्विष्ट शर्तों का पालन करेगा और पट्टेदार को आबद्ध करने वाली संविदाओं का अनुपालन करेगा और उक्त भाटक के असंदाय के या उक्त शर्तों और संविदाओं के अपालन या अननुपालन के कारण जो दावे बन्धकदार को भुगतने पड़ें, उन सबके लिए बन्धकदार की क्षतिपूर्ति करेगा;
(ङ) और जहाँ कि वह बन्धक उस सम्पत्ति पर द्वितीय या पाश्चिक विल्लंगम है, वहाँ बन्धककर्ता हर एक पूर्विक विल्लंगम मद्धे प्रोद्भवमान शोध्य ब्याज, जैसे और जब वह शोध्य हो जाए, समय-समय पर देगा और ऐसे पूर्विक विल्लंगम मद्धे शोध्य मूलधन का भुगतान उचित समय पर करेगा।
इस धारा में वर्णित संविदाओं का फायदा बन्धकंदार के अपनी उस हैसियत के हित के साथ उपाबद्ध होगा और जाएगा और ऐसे हर व्यक्ति द्वारा प्रवृत्त कराया जा सकेगा जिसमें वह हित पूर्णतः या भागतः समय-समय पर निहित हो।
(1) उपधारा (2) के उपबन्धों के अध्यधीन जब बन्धककर्ता का बन्धक सम्पत्ति पर विधिपूर्ण रूप से कब्जा हो, तब उसकी यह शक्ति होगी कि उसे पट्टों पर दे दे, जो पट्टे बन्धकदार पर आबद्धकर होंगे।
(2) (क) हर ऐसा पट्टा ऐसा होगा जो सम्पृक्त सपत्ति के प्रबन्ध के मामूली अनुक्रम में और किसी स्थानीय विधि, रूढ़ि या प्रथा के अनुसार किया जाता;
(ख) हर ऐसे पट्टे में वह सर्वोत्तम भाटक आरक्षित होगा जो युक्तियुक्ततः अभिप्राप्त किया जा सकता हो और कोई भी प्रीमियम न तो दिया जाएगा और न उसके लिए वचन दिया जाएगा तथा कोई भी भाटक अग्रिम देय नहीं होगा;
(ग) किसी भी ऐसे पट्टे में नवीकरण के लिए प्रसंविदा अन्तर्विष्ट नहीं होगी;
(घ) हर ऐसा पट्टा ऐसी तारीख से प्रभावी होगा जो उसके लिए किए जाने की तारीख से छः मास से अधिक पश्चात् की न हो;
(ङ) निर्माणों के पट्टे की दशा में, चाहे वे उस भूमि के, जिस पर वे स्थित हैं, सहित या बिना पट्टे पर दिए गए हों, पट्टे की अस्तित्वावधि किसी दशा में भी तीन वर्ष से अधिक की न होगी और पट्टे में भाटक देने के लिए प्रसंविदा और उसमें विनिर्दिष्ट समय के भीतर भाटक न चुकाए जाने पर पुनः प्रवेश करने की शर्त अन्तर्विष्ट होगी।
(3) उपधारा (1) के उपबन्ध केवल तभी और वहीं तक लागू होते हैं जब और जहाँ तक कि बन्धक-विलेख में कोई तत्प्रतिकूल आशय अभिव्यक्त न किया गया हो और उपधारा (2) के उपबन्धों में फेरफार या उनका विस्तारण बन्धक विलेख द्वारा किया जा सकेगा और इस प्रकार फेरफार किए गए या विस्तारित उपबन्ध यावत्रशक्य वैसे ही प्रकार से और वैसी ही प्रसंगतियों, प्रभावों और परिणामों के सहित प्रवर्तित हों, मानो ऐसे फेरफार या विस्तारण उस उपधारा में अन्तर्विष्ट हों।
बन्धक सम्पत्ति पर कब्जा रखने वाला बन्धककर्त्ता सम्पत्ति का क्षय होने देने के लिए बन्धकदार के प्रति दायी नहीं होगा किन्तु वह ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा जो सम्पत्ति के लिए विनाशक या स्थायी रूप से क्षतिपूर्ण हो यदि प्रतिभूति अपर्याप्त हों या ऐसे कार्य द्वारा अपर्याप्त कर दी जाएगी।
स्पष्टीकरण- प्रतिभूति इस धारा के अर्थ में अपर्याप्त है जब तक बन्धक सम्पत्ति का मूल्य बन्धक पर उस समय शोध्य रकम से एक-तिहाई है, या यदि वह सम्पत्ति निर्माण है तो आधे से अधिक न हो।
तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो बन्धकदार को यह अधिकार है कि बन्धक धन के अपने को शोध्य हो जाने के पश्चात् और बन्धक सम्पत्ति के मोचन के लिए डिक्री दी जाने से, या बन्धक-धन चुकाए जाने से या यथा एतस्मिन्पश्चात् उपबन्धित तौर पर निक्षिप्त किए जाने से पहले किसी भी समय वह न्यायालय से यह डिक्री कि बन्धककर्त्ता उस सम्पत्ति का मोचन कराने के अपने अधिकार से आत्यन्तिक रूप से विवर्जित होगा या यह डिक्री कि वह सम्पत्ति बेच दी जाए, अभिप्राप्त कर ले।
यह डिक्री अभिप्राप्त करने के लिए वाद कि बन्धककर्त्ता बन्धक सम्पत्ति का मोचन कराने के अपने अधिकार से आत्यन्तिक रूप से विवर्जित होगा, पुरोबन्ध वाद कहलाता है।
इस धारा की किसी भी बात से यह न समझा जाएगा कि वह-
(क) सशर्त विक्रय वाले बन्धकदार से भिन्न या ऐसे विलक्षण बन्धक वाले बन्धकदार से भिन्न, जिसके निबन्धन द्वारा वह पुरोबन्ध कराने का हकदार है, किसी बन्धकदार को पुरोबन्ध वाद सस्थित करने या किसी भोग- बन्धकदार को अपनी वैसी हैसियत में या सशर्त विक्रय वाले किसी बन्धकदार को अपनी जैसी हैसियत में विक्रय के लिए वाद संस्थित करने को प्राधिकृत करती है; अथवा
(ख) उस बन्धककर्ता को, जो बन्धकदार के अधिकार उसके न्यासधारी या विधिक प्रतिनिधि की हैसियत से धारित करता है और जो सम्पत्ति के विक्रय के लिए वाद ला सकता है, पुरोबन्ध वाद संस्थित करने को प्राधिकृत करती है; अथवा
(ग) रेल, नहर या अन्य ऐसे संकर्म के, जिसके कायम रखने में जनता हितबद्ध है, बन्धकदार को पुरोबन्ध या विक्रय के लिए वाद संस्थित करने को प्राधिकृत करतो है; अथवा
(घ) बन्धक-धन के भाग-मात्र में हितबद्ध व्यक्ति को बन्धक सम्पत्ति के तत्सम भाग के संबंध में ही वाद संस्थित करने को प्राधिकृत करती है, जब तक कि बन्धकदारों ने बन्धककर्ता की सम्पत्ति से बन्धक के अधीन के अपने हितों को विभक्त न कर लिया हो।
जो बन्धकदार एक ही बन्धककर्त्ता द्वारा निष्पादित ऐसे दो या अधिक बन्धक धारण करता है, जिनमें से हर एक के विषय में उसे धारा 67 के अधीन एक ही किस्म की डिक्री अभिप्राप्त करने का अधिकार है, और जो उन बन्धकों में से किसी एक के लिए ऐसी डिक्री अभिप्राप्त करने के लिए वाद लाता है, वह तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो उन सब बन्धकों के आधार पर, जिनके बारे में बन्धक-धन शोध्य हो गया है; वाद लाने के लिए आबद्ध होगा।
(1) बन्धक-धन के लिए वाद लाने का अधिकार बन्धकदार को निम्नलिखित दशाओं में ही है, अन्य दशाओं में नहीं, अर्थात्-
(क) जहाँ कि बंधककर्ता बंधक-धन के प्रति संदाय के लिए अपने आपको आबद्ध करता है,
(ख) जहाँ कि बंधककर्ता या बंधकदार के सदोष कार्य या व्यतिक्रम से भिन्न किसी हेतुक से बंधक-सम्पत्ति पूर्णतः या भागतः नष्ट हो जाती है या प्रतिभूति धारा 66 के अर्थ के अन्दर अपर्याप्त हो जाती है और बंधकदार ने बंधककर्ता को इतनी अतिरिक्त प्रतिभूति देने के लिए, जितनी से कुल प्रतिभूति पर्याप्त हो जाए, युक्तियुक्त अवसर दिया है, और बंधककर्ता ऐसा करने में असफल रहा है;
(ग) जहाँ कि बंधकदार अपनी पूर्ण प्रतिभूति से या उसके किसी भाग से बंधककर्त्ता के सदोष कार्य या व्यतिक्रम के द्वारा या परिणामस्वरूप वंचित कर दिया गया है;
(घ) जहाँ कि बंधकदार बंधक सम्पत्ति पर कब्जे का हकदार है वहाँ यदि बन्धककर्त्ता उसे उसका परिदान करने में अथवा बधककर्त्ता या बंधककर्ता के हक से वरिष्ठ हक के अधीन दावा करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा किए गये विघ्न के बिना उस पर कब्जा सुनिश्चित कराने में असफल रहता है:
परन्तु खंड (क) में निर्देशित दशा में बंधककर्ता का या उसके विधिक प्रतिनिधि का कोई अन्तरिती इस दायित्व के अधीन न होगा कि बंधक-धन के लिए उस पर वाद चलाया जाए।
(2) जहाँ कि वाद उपधारा (1) के खंड (क) या खण्ड (ख) के अधीन लाया जाता है, वहाँ यदि बंधकदार अपनी प्रतिभूति का परित्याग नहीं कर देता और यदि आवश्यकता हो तो बंधक-सम्पत्ति का प्रति-अन्तरण नहीं कर देता वाद और उसमें की सब कार्यवाहियों को, किसी तत्प्रतिकूल संविदा के होते हुए भी, न्यायालय स्वविवेक से तब तक के लिए रोक सकेगा जब तक बंधकदार बंधक सम्पत्ति या उसमें से शेष जो बची हो, उसके विरुद्ध अपने सब उपलभ्य उपचारों को निःशेष नहीं कर देता है।
(1) बंधकदार को, या उसकी ओर से कार्य करने वाले किसी व्यक्ति को, इस धारा के उपबंधों के अध्यधीन निम्नलिखित दशाओं में ही, न कि किन्हीं भी अन्य दशाओं में, यह शक्ति होगी कि बंधक-
धन के संदाय में व्यतिक्रम होने पर न्यायालय के मध्यक्षेप के बिना वह बंधक सम्पत्ति या उसका कोई भाग बेच दे या बेचे जाने में सहमत हो जाए, अर्थात्-
(क) जहाँ कि बंधक अंग्रेजी-बंधक है और न तो बंधककर्ता और न बंधकदार हिन्दू, मुसलमान या बौद्ध या राज्य सरकार द्वारा शासकीय राजपत्र में इस निमित्त समय-समय पर विनिर्दिष्ट किसी अन्य मूलवंश, पंथ, जनजाति या वर्ग का सदस्य है;
(ख) जहाँ कि बंधकदार को बंधक विलेख द्वारा अभिव्यक्त रूप से यह शक्ति प्रदत्त है कि वह न्यायालय के मध्यक्षेप के बिना विक्रय करा सके और बंधकदार सरकार है,
(ग) जहाँ कि बंधकदार को बंधक विलेख द्वारा अभिव्यक्त रूप से यह शक्ति प्रदत्त है कि वह न्यायालय के मध्यक्षेप के बिना विक्रय करा सके और बंधक सम्पत्ति या उसका कोई भाग बंधक विलेख के निष्पादन की तारीख को कलकत्ता, मद्रास मुम्बई के नगरों के भीतर स्थित था या किसी अन्य नगर या क्षेत्र में स्थित था, जिसे राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस बारे में विनिर्दिष्ट करे।
(2) ऐसी कोई भी शक्ति प्रयोग में न लाई जाएगी यदि और जब तक-
(क) मूलधन के संदाय की अपेक्षा करने वाली लिखित सूचना की तामील बंधककर्त्ता या कई बंधककर्ताओं में से किसी एक पर न कर दी गयी हो और मूलधन या उसके किसी भाग का संदाय करने में ऐसी तामील के पश्चात् तीन मास तक व्यतिक्रम न किया गया हो, अथवा
(ख) बंधक के अधीन कुछ ब्याज, जिसकी रकम कम से कम पाँच सौ रुपए हो, बकाया न हो और शोध्य होने के पश्चात् तीन मास तक अदत्त न रहा हो।
(3) जबकि विक्रय ऐसी शक्ति के परव्यंजित प्रयोग में कर दिया गया है तब क्रेत्ता का हक इस आधार पर अधिक्षेपणीय न होगा कि उस विक्रय को प्राधिकृत करने के लिए कोई भी दशा पैदा न हुई थी जिसमें वह विक्रय प्राधिकृत होता या कि सम्यक् सूचना नहीं दी गयी थी या कि शक्ति अन्यथा अनुचित या अनियमित रूप से प्रयुक्त की गई थी; किन्तु इस शक्ति के किसी अप्राधिकृत या अनुचित या अनियमित प्रयोग से क्षतिग्रस्त व्यक्ति को उस शक्ति का प्रयोग करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध नुकसानी प्राप्ति का उपचार उपलब्ध होगा।
(4) बंधकदार को विक्रय द्वारा जो धन प्राप्त हुआ है, वह उन पूर्विक विल्लंगमों के, यदि कोई हों उन्मोचन के पश्चात् जिनके अध्यधीन वह विक्रय नहीं किया गया है, या न्यायालय में धारा 57 के अधीन वह राशि जमा किए जाने के पश्चात्, जो किसी पूर्विक विल्लंगम को चुकाने के लिए पर्याप्त है तत्प्रतिकूल संविदा न हो, तो प्रथमतः विक्रय या किसी प्रयतित विक्रय के प्रसंगत अपने द्वारा उचित रूप से उपगत सब खर्चो, प्रभारों और व्ययों का संदाय करने में और द्वितीयतः बंधक धन और खर्च और बंधक के अधीन शोध्य अन्य धन के यदि कोई हो, भुगतान में अपने द्वारा उपयोजित किए जाने के लिए बंधकदार न्यासतः धारित रखेगा, और इस प्रकार प्राप्त धन की अवशिष्टि बंधक-सम्पत्ति के हकदार, या उसके विक्रय के आगमों की रसीद देने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति को दे दी जाएगी।
(5) इस धारा या धारा 69क की कोई भी बात 1882 की जुलाई के पहले दिन से पूर्व प्रदत्त शक्तियों को लागू नहीं है।
(1) धारा 69 के अधीन विक्रय की शक्ति के प्रयोग का अधिकार रखने वाले बन्धकदार को, उपधारा (2) के उपबन्धों के अध्यधीन यह हक होगा कि वह बन्धक सम्पत्ति या उसके किसी भाग की आय का रिसीवर अपने द्वारा या अपनी ओर से हस्ताक्षरित लेख द्वारा नियुक्त करे।
(2) जो व्यक्ति रिसीवर के रूप में कार्य करने के लिए बन्धक विलेख में नामित है और उस रूप में कार्य करने के लिए रजामन्द और योग्य है, वह बन्धकदार द्वारा नियुक्त किया जा सकेगा।
यदि कोई भी व्यक्ति ऐसे नामित न किया गया हो या यदि सब नामित व्यक्ति कार्य करने के लिए अयोग्य हों या रजामन्द न हों या मर चुके हों, तो बन्धकदार ऐसे किसी व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगा जिसकी नियुक्ति के लिए बन्धककर्त्ता भी सहमत हो, ऐसी सहमति न होने पर बन्धकदार न्यायालय से रिसीवर की नियुक्ति करने के लिए आवेदन करने का हकदार होगा और न्यायालय द्वारा नियुक्त कोई भी व्यक्ति बन्धकदार द्वारा सम्यक् रूप से नियुक्त किया गया समझा जाएगा।
रिसीवर किसी समय भी ऐसे लेख द्वारा, जो बन्धककर्त्ता और बन्धकदार द्वारा या उनकी ओर से हस्ताक्षरित हो, अथवा दोनों में से किसी पक्षकार द्वारा आवेदन पर और सम्यक् हेतुक दर्शित किए जाने पर न्यायालय द्वारा हटाया जा सकेगा।
रिसीवर का पद खाली होने पर उसकी पूर्ति इस उपधारा के उपबन्धों के अनुकूल की जा सकेगी।
(3) इस धारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अधीन नियुक्त रिसीवर बन्धककर्ता का अभिकर्ता समझा जाएगा तथा रिसीवर के कार्यों या व्यत्तिक्रमों के लिए बन्धककर्त्ता अकेले ही उत्तरदायी होगा जब तक कि बन्धक-विलेख में अन्यथा उपबन्धित न हो या जब तक कि ऐसे कार्य या व्यत्तिक्रम बन्धकदार के अनुचित मध्यक्षेप के कारण न हुए हों।
(4) रिसीवर का यह शक्ति होगी कि वह उस समस्त आय की जिसके लिए वह रिसीवर नियुक्त किया गया है उस हित के जिसका व्ययन बन्धककर्त्ता कर सकता था, पूरे विस्तार तक माँग और वसूली या तो बन्धककर्ता के या बन्धकदार के नाम में वाद लाकर या निष्पादन करा के या अन्यथा करे और उसके लिए तनुकूल विधिमान्य रसीदें दे और ऐसी किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करे जो उसको बन्धकदार द्वारा इस धारा के उपबन्धों के अनुकूल प्रत्यायोजित हों।
(5) रिसीवर को धन देने वाले व्यक्ति की यह जाँच करने की आवश्यकता नहीं है कि रिसीवर की नियुक्ति विधिमान्य थी या नहीं।
(6) रिसीवर का यह हक होगा कि वह उसे प्राप्त समस्त धन की रकम पर कमीशन पाँच प्रतिशत से अनधिक ऐसी दर से जैसी उसकी नियुक्ति-पत्र में विनिर्दिष्ट है और यदि कोई दर ऐसे विनिर्दिष्ट न हो तो उस कुल रकम पर पाँच प्रतिशत की दर से या ऐसी अन्य दर से, जैसी न्यायालय रिसीवर द्वारा उस प्रयोजन के लिए किए गए आवेदन पर अनुज्ञात करना ठीक समझे, उस किसी रकम में से; जो उसे प्राप्त हुई है अपने पारिश्रमिक के लिए और रिसीवर के तौर पर स्वयं द्वारा उपगत सब खर्चो, प्रभारों और व्ययों की तुष्टि के लिए रख ले।
(7) यदि रिसीवर को बन्धकदार द्वारा ऐसा करने के लिए लिखित निदेश दिया जाए, तो रिसीवर बन्धक सम्पत्ति या उसके किसी भाग का, जो प्रकृत्या बीमा कराने योग्य है, हानि या नुकसान के लिए, जो अग्नि से हो, उस मात्रा तक, यदि कोई हो, जिस तक बन्धकदार ने उसका बीमा कराया होता, उस धन में से, जो उसे प्राप्त हुआ है, बीमा कराएगा और उसे बीमाकृत रखेगा।
(8) बीमा-धन के उपयोजन के बारे में इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रिसीवर अपने द्वारा प्राप्त सब धन को निम्न प्रकार से उपयोजित करेगा; अर्थात्-
(i) बंधक-सम्पत्ति पर पड़ने वाले सब भाटकों, करों, भू-राजस्व, रेटों, निर्गमों के, चाहे वे कैसे हो क्यों न हों, भुगतान में;
(ii) जिस बंधक के अधिकार के बारे में वह रिसीवर है उस बन्धक से पूर्विकता रखने वाली सब वार्षिक राशियों या अन्य संदायों की और सब मूल राशियों पर ब्याज को नीचा रखने में;
(iii) अपने कमीशन के और अग्नि, जीवन या अन्य प्रकार के बीमाओं के, यदि कोई हों, प्रीमियमों के, जो बंधक-विलेख के अधीन या इस अधिनियम के अधीन उचित तौर पर देय है, और बन्धकदार द्वारा लिखित रूप में निर्दिष्ट आवश्यक या उचित मरम्मत 10में हुए खर्चे के संदाय में;
(iv) बंधक के अधीन शोध्य होने वाले ब्याज के संदाय में;
(v) मूलधन के भुगतान में या उस मद्धे यदि बंधकदार द्वारा वह ऐसा करने के लिए लिखित रूप में निर्दिष्ट हो; और जो धन उसे प्राप्त हुआ है, उसकी अवशिष्टि, यदि कोई हो, उस व्यक्ति को देगा, जो यदि रिसीवर का कब्जा न होता, तो उस आय को प्राप्त करने का हकदार होता जिसका वह रिसीवर नियुक्त किया गया है या जो बंधक सम्पत्ति का अन्यथा हकदार है।
(9) उपधारा (1) के उपबन्ध केवल तब और वहीं तक लागू होते हैं, जब और जहाँ तक कि बन्धक- विलेख में कोई तत्प्रतिकूल आशय अभिव्यक्त नहीं किया गया है, और उपधारा (3) से (8) तक के, जिनके अन्तर्गत दोनों उपधाराएँ हैं, उपबन्धों में फेरफार या विस्तारण, बंधक-विलेख द्वारा किए जा सकेंगे और वे उपबन्ध इस प्रकार फेरफार या विस्तारण किए गए रूप में यावत्रशक्य उसी प्रकार से और वैसी ही सब प्रसंगतियों, प्रभावों और परिणामों के सहित प्रवर्तित होंगे मानो ऐसे फेरफार या विस्तारण उक्त उपधाराओं में अन्तर्विष्ट थे।
(10) बंधक-सम्पत्ति के प्रबन्ध या प्रशासन विषयक किसी वर्तमान प्रश्न पर, जो ऐसे कठिनाइपूर्ण या महत्वपूर्ण प्रश्नों से भिन्न हो, जिनके बारे में न्यायालय की राय हो कि वे संक्षिप्त निपटारे के लिए उचित नहीं हैं, न्यायालय की राय सलाह या निदेश के लिए न्यायालय से आवेदन वाद संस्थित किए बिना किया जा सकेगा। आवेदन में हितबद्ध व्यक्तियों में से उन पर, जिन्हें न्यायालय इस संबंध में ठीक समझे, आवेदन की प्रति की तामील कराई जाएगी और वे उसकी सुनवाई में हाजिर हो सकेंगे।
इस उपधारा के अधीन किए गए हर एक आवेदन के खर्चों का अधिनिर्णयन न्यायालय के विवेकाधीन होगा।
(11) इस धारा में 'न्यायालय' से वह न्यायालय अभिप्रेत है जिसे उस बंधक को प्रवर्तित कराने के बाद में अधिकारिता हो।
यदि बंधक की तारीख के पश्चात् बन्धक सम्पत्ति में कोई अनुवृद्धि होती है, तो बंधकदार तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो, प्रतिभूति के प्रयोजनों के लिए ऐसी अनुवृद्धि का हकदार होगा।
(क) क, नदी के किनारे वाला कोई खेत ख के पास बन्धक रखता है, वह खेत जलोढ़ से बढ़ जाता है। अपनी प्रतिभूति के प्रयोजनों के लिए ख इस वृद्धि का हकदार है।
(ख) क निर्माण भूमि का कोई टुकड़ा ख के पास बंधक रखता है, और तत्पश्चात् उस टुकड़े पर गृह खड़ा करता है। अपनी प्रतिभूति के प्रयोजनों के लिए ख गृह का तथा उस भूमि के टुकड़े का हकदार है।
जबकि बंधक सम्पत्ति पट्टा है और बंधककर्ता उस पट्टे का नवीकरण अभिप्राप्त कर लेता है तब बंधकदार तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो नए पट्टे का प्रतिभूति के प्रयोजनों के लिए हकदार होगा।
बंधकदार इतना धन व्यय कर सकेगा जितना-
(ख) नाश, समपहरण या विक्रय से बंधक सम्पत्ति का परिरक्षण करने के लिए;
(ग) उस सम्पत्ति पर बंधककर्ता के हक के समर्थन के लिए;
(घ) उसमें स्वयं अपने हक को बंधककर्त्ता के विरुद्ध पक्का करने के लिए; तथा
(ङ) जबकि बंधक-सम्पत्ति नवीकरणीय पट्टाधृति है तब पट्टे के नवीकरण के लिए, आवश्यक है, और तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो ऐसे धन को मूलधन में जोड़ सकेगा; उस धन पर ऐसी दर से जो मूलधन पर देय है, और जहाँ कि ऐसी कोई दर नियत न हो, वहाँ नौ प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज लगेगाः
परन्तु बंधकदार द्वारा खण्ड (ख) या खण्ड (ग) के अधीन किया गया धन का व्यय आवश्यक न समझा जाएगा, जब तक कि बंधककर्ता सम्पत्ति को परिरक्षित करने के लिए या हक का समर्थन करने के लिए अपेक्षित न किया गया हो और वह तदर्थ उचित और यथासमय पग उठाने में असफल न हो गया हो।
जहाँ कि सम्पत्ति अपनी प्रकृति से बीमा योग्य है, वहाँ तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो बंधकदार ऐसी सब सम्पत्ति या उसके किसी भाग को हानि या नुकसान के लिए, जो अग्नि से हो, बीमाकृत भी कर और रख सकेगा और किसी ऐसे बीमे के लिए दिए गए प्रीमियम उसी दर से, जो मूलधन पर देय है, या जहाँ कि ऐसी दर नियत नहीं है वहाँ नौ प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज सहित मूलधन में जोड़े जाएंगे। किन्तु ऐसे बीमे की रकम उस रकम से अधिक न होगी जो बंधक विलेख में इस निमित्त विनिर्दिष्ट है या (यदि ऐसी कोई रकम उसमें विनिर्दिष्ट न हो तो) उस रकम के दो-तिहाई से अधिक न होगी जो पूर्ण नाश की दशा में बीमाकृत सम्पत्ति के पुनःस्थापित करने के लिए अपेक्षित होती।
इस धारा की कोई भी बात बंधकदार को बीमा कराने के लिए प्राधिकृत करने वाली न समझी जाएगी, जब कि सम्पत्ति का बीमा बन्धककर्त्ता द्वारा या बंधककर्ता की ओर से उतनी रकम का किया हुआ रखा जाता है जितने के लिए बंधकदार बीमा कराने के लिए एतद्वारा प्राधिकृत है।
(1) जहाँ कि बंधक सम्पत्ति या उसका कोई भाग या उसमें का कोई हित ऐसी सम्पत्ति के बारे में राजस्व की बकाया या लोक-प्रकृति के अन्य प्रभार या शोध्य भाटक देने में असफलता के कारण बेचा जाता है, और ऐसी असफलता बंधकदार के किसी व्यतिक्रम से उत्पन्न नहीं हुई है, वहाँ बंधकदार उस बकाया के और विधि द्वारा निर्दिष्ट सब प्रभारों और कटौतियों के संदाय के पश्चात् विक्रय आगमों में जो कुछ अधिशेष रहे उसमें से बंधक-धन के पूर्णतः या भागतः दिए जाने का दावा करने का हकदार होगा।
(2) जहाँ कि बंधक सम्पत्ति या उसका कोई भाग या उसमें का कोई हित भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का।) या स्थावर सम्पत्ति के आवश्यक अर्जन करने के लिए उपबंध करने वाली किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त अधिनियमिति के अधीन अर्जित किया जाता है, वहाँ बंधकदार बंधककर्त्ता को प्रतिकर के रूप में शोध्य रकम में से बंधक-धन के पूर्णतः या भागतः संदाय का दावा करने का हकदार होगा।
(3) ऐसे दावे पूर्विक विल्लंगमदारों के दावों के सिवाय अन्य सब दावों के विरुद्ध अभिभावी होंगे और इस बात के होते हुए भी कि बंधक पर मूलधन शोध्य नहीं हुआ है, प्रवर्तित किए जा सकेंगे।
जबकि बन्धक चालू रहने के दौरान बधकदार बंधक सम्पत्ति का कब्जा ले लेता है, तब-
(क) उसको उस 'सम्पत्ति' का प्रबन्ध उस प्रकार करना होगा जैसा मामूली प्रज्ञा वाला व्यक्ति उसका प्रबंध करता, यदि वह उसकी अपनी होती;
(ख) उसको उस सम्पत्ति के भाटकों और लाभों को वसूल करने में अपने सर्वोत्तम प्रयास करने होंगे;
(ग) तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो उसे सरकारी राजस्व, लोक-प्रकृति के सब अन्य प्रभार और ऐसे कब्जे के दौरान तत्सम्बन्धी प्रोद्भवमान शोध्य सब भाटक और भाटक की ऐसी कोई बकाया, जिसका संदाय करने में व्यत्तिक्रम होने पर वह सम्पत्ति संक्षेपतः बेची जा सके, उस सम्पत्ति की आय में से देनी होगी;
(घ) तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो, उसे उस सम्पत्ति की ऐसी आवश्यक मरम्मत करानी होगी जिसके लिए वह उस सम्पत्ति के भाटकों और लाभों में से खण्ड (ग) में वर्णित संदायों की और मूलधन पर ब्याज की कटौती करने के पश्चात् उन भाटकों और लाभों में से, संदाय कर सकता हो;
(ङ) वह ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा जो सम्पत्ति के लिए विनाशक या स्थायी रूप से क्षतिकर हों;
(च) जहाँ कि उसने सम्पूर्ण सम्पत्ति या उसके किसी भाग का हानि या नुकसान के लिए जो अग्नि से हो, बीमा कराया है, वहाँ ऐसी हानि या नुकसान होने पर, उसे ऐसा कोई धन, जिसे वह पालिसी के अधीन वस्तुतः प्राप्त करता है या उसमें से इतना, जितना आवश्यक हो, सम्पत्ति के यथापूर्वकरण में, अथवा यदि बंधककर्ता ऐसा निदेश दे तो बन्धक धन के घटाने या भुगतान में उपयोजित करना होगा;
(छ) बंधकदार की हैसियत में उस द्वारा प्राप्त और खर्च की गयी सब राशियों का स्पष्ट, पूरा और शुद्ध लेखा उसे रखना होगा और बन्धक के चालू रहने के दौरान में किसी भी समय बंधककर्ता को उसके निवेदन और खर्च पर ऐसे लेखाओं की और ऐसे वाउचरों की, जिनसे वे समर्थित हों, सही प्रतियाँ देनी होंगी;
(ज) बंधक सम्पत्ति से उसे हुई प्राप्तियाँ, या जहाँ कि ऐसी सम्पत्ति उसके वैयक्तिक अधिभोग में है, वहाँ उस सम्पत्ति के बारे में उचित अधिभोग-भाटक, उस सम्पत्ति के प्रबन्ध के लिए और भाटकों और लाभों के संग्रहण के लिए समुचित रूप से उपगत व्ययों को और अन्य व्ययों को, जो खण्ड (ग) और (घ) में वर्णित हैं। तथा उन पर के ब्याज को काट लेने के पश्चात् उस रकम को (यदि कोई हो), जो समय-समय पर ब्याज मद्धे शोध्य हो, कम करने में और ऐसी प्राप्तियाँ, जितनी शोध्य ब्याज से अधिक हो, बंधक-धन के घटाने या भुगतान में उसके प्रति विकलित की जाएगी और अधिशेष, यदि कोई हो, बंधककर्ता को दे दिया जाएगा;
(झ) जबकि बंधककर्ता बंधक पर तत्समय शोध्य रकम निविदत्त करता है या एतस्मिनपश्चात् उपबन्धित प्रकार से निक्षिप्त करता है, तब बंधकदार बंधक सम्पत्ति से, यथास्थिति, निविदा की तारीख से या उस पूर्वतम समय से, जब वह न्यायालय से ऐसी रकम निकाल सकता था, अपने को हुई प्राप्तियों का लेखा इस धारा के अन्य खंडों में के उपबंधों के होते हुए भी देगा और वह ऐसी तारीख या समय के पश्चात् किए गए बंधक-सम्पत्ति संबंधी किन्हीं भी व्ययों मद्दे, कोई रकम उनमें से काटने का हकदार नहीं होगा।
उसके व्यत्तिक्रम के कारण हुई हानि- यदि बंधकदार इस धारा द्वारा अपने पर अधिरोपित कर्तव्यों में से किसी का पालन करने में असफल रहे, तो ऐसी असफलता के कारण हुई हानि, यदि कोई हो, उस समय, जब इस अध्याय के अधीन की गयी किसी डिक्री के अनुसरण में लेखा लिया जाए, उसके प्रति विकलित की जा सकेगी।
धारा 76 के खण्ड (ख), (घ), (छ) और (ज) में की कोई भी बात उन दशाओं में लागू नहीं होती जिनमें बंधकदार और बंधककर्ता के बीच यह संविदा है कि जितने समय संपत्ति बंधकदार के कब्जे में रहेगी, बंधक सम्पत्ति से प्राप्तियाँ मूलधन पर ब्याज के बदले में या ऐसे ब्याज और मूलधन के सुनिश्चित भागों के बदले में ली जाएगी।
पूर्विकता
जहाँ कि किसी पूर्विक बंधकदार के कपट, मिथ्या व्यपदेशन या घोर उपेक्षा से कोई अन्य व्यक्ति बंधक सम्पत्ति की प्रतिभूति पर धन उधार देने के लिए उत्प्रेरित हुआ है, वहाँ वह पूर्विक बंधकदार उस पाश्चिक बंधकदार के मुकाबले में मुल्तवी हो जाएगा।
यदि भविष्यवर्ती उधारों को, वचनबंध के पालन को, या किसी चालू खाते की बाकी को प्रतिभूत करने के लिए किए गए किसी बन्धक में वह अधिकतम रकम अभिव्यक्त है, जो तद्धारा प्रतिभूत की जानी है, तो उसकी सम्पत्ति का कोई पाश्चिक बंधक, यदि वह किसी पूर्विक बंधक की सूचना होते हुए किया गया है उस अधिकतम से अनधिक उन सब उधारों या विकलनों की बाबत, यद्यपि वे पाश्चिक बंधक की सूचना होते हुए दिए गए या अनुज्ञात किए गए हों, उसी सम्पत्ति का पाश्चिक बन्धक पूर्विक बंधक के मुकाबले में मुल्तवी रहेगा।
क सुल्तानपुर का बंधक अपने महाजन ख एवं कम्पनी के पास 10,000 रुपए तक उनके साथ अपने लेखाओं की बाकी को प्रतिभूत करने के लिए करता है। क फिर ग के पास, जिसे ख एवं कम्पनी के पक्ष किए गए बंधक की सूचना है, सुल्तानपुर का बंधक 10,000 रुपए के प्रतिभूत करने के लिए करता है और ख एवं कम्पनी को ग उस दूसरे बंधक की सूचना देता है। दूसरे बंधक की तारीख को ख एवं कम्पनी को शोध्य बाकी 5,000 रुपए से अधिक नहीं है। ख एवं कम्पनी उसके पश्चात् क को ऐसी राशि देते हैं जिससे क के खाते में विकलन बाकी 10,000 रुपए की राशि से अधिक हो जाती है। ख एवं कम्पनी ग के मुकाबले में 10,000 रुपए तक पूर्विकता के हकदार हैं।
यदि दो या अधिक सम्पत्तियों का स्वामी उन्हें एक व्यक्ति के पास बन्धक रखता है और फिर उन सम्पत्तियों में से एक या अधिक को किसी अन्य व्यक्ति के पास बंधक रखता है, तो तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में पाश्चिक बंधकदार इस बात का हकदार है कि वह पूर्विक बंधक ऋण को, उसे बंधक न की गई सम्पत्ति या सम्पत्तियों में से वहाँ तक तुष्ट करवाये जहाँ तक उससे या उनसे उसकी तुष्टि हो सकती है, किन्तु ऐसे नहीं कि पूर्विक बंधकदार के या किसी ऐसे अन्य व्यक्ति के, जिसने उन संपत्तियों में से किसी भी सम्पत्ति में कोई हित प्रतिफलेन अर्जित किया है अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
जहाँ कि बन्धक के अध्यधीन सम्पत्ति ऐसे दो या अधिक व्यक्तियों की है, जिनके उसमें सुभिन्न और पृथक् स्वामित्वाधिकार है, तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो ऐसी सम्पत्ति में के विभिन्न अंश या भाग, जो ऐसे व्यक्तियों के स्वामित्व में हैं उस बन्धक द्वारा प्रतिभूत ऋण के लिए अनुपात में अभिदाय करने के दायी है, और ऐसा हर अंश या भाग जिस अनुपात में अभिदाय करेगा, उसके अवधारण के प्रयोजन के लिए उसका मूल्य ऐसे किसी अन्य बंधक या भार की रकम को, जिसके अध्यधीन वह बन्धक की तारीख पर रहा हो, काटकर वह मूल्य समझा जाएगा जो उस तारीख पर उसका था।
जहाँ कि एक ही स्वामी की दो सम्पत्तियों में से एक सम्पत्ति एक ऋण की प्रतिभूति के लिए बंधक रखी गयी है और फिर दोनों एक अन्य ऋण की प्रतिभूति के लिए बंधक रखी गयी हैं और पूर्वभावी ऋण पूर्वोक्त सम्पत्ति में से चुकाया गया है, वहाँ तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो जिस सम्पत्ति में से वह पूर्वभावी ऋण चुकाया गया है, उसके मूल्य में से उस पूर्वभावी ऋण की रकम काटकर हर एक सम्पत्ति उत्तरभावी ऋण में अनुपाती अभिदाय करने की दायी है।
पाश्चिक बंधकदार के दावे के लिए जो सम्पत्ति धारा 81 के अधीन दायी है उसे इस धारा की कोई भी बात लागू नहीं होती।
किसी बंधक के बारे में देय मूलधन के शोध्य हो जाने के पश्चात् और बन्धक सम्पत्ति के मोचन के लिए वाद वर्जित हो जाने से पहले किसी भी समय बन्धककर्ता या ऐसा वाद संस्थित करने के लिए हकदार कोई भी अन्य व्यक्ति ऐसे किसी भी न्यायालय में, जिसमें वह ऐसा वाद संस्थित कर सकता था, उस बंधक के बारे में शोध्य अवशिष्ट राशि का बंधकदार के नाम निक्षेप कर सकेगा।
बंधककर्त्ता द्वारा निक्षिप्त धन पर अधिकार-
तदुपरि न्यायालय निक्षेप की लिखित सूचना की तामील बन्धकदार पर कराएगा और बन्धकदार (वाद-पत्रों के सत्यापन के लिए विधि विहित प्रकार से सत्यापित) ऐसी अर्जी पेश करने पर, जिसमें बंधक मद्दे तब शोध्य रकम और इस तरह निक्षिप्त धन को ऐसी रकम के पूर्णतः भुगतान में प्रतिगृहीत करने के लिए उसकी अपनी रजामन्दी कथित हो और उसी न्यायालय में बंधक-विलेख और बंधक सम्पत्ति संबंधी सब दस्तावेजों को जो उसके अपने कब्जे या शक्ति में हों, निक्षिप्त करने पर उस धन के लिए आवेदन कर सकेगा और उसे प्राप्त कर सकेगा तथा ऐसे निक्षिप्त बन्धक-विलेख और अन्य सब ऐसी दस्तावेजें बंधककर्ता या यथापूर्वोक्त अन्य व्यक्ति को परिदत्त कर दी जाएगी।
जहाँ कि बंधक-सम्पत्ति बन्धकदार के कब्जे में है, वहाँ न्यायालय ऐसी निक्षिप्त रकम का उसे सदाय करने से पहले उसे यह निदेश देगा कि वह बंधककर्त्ता को उसका कब्जा परिदत्त करे और बन्धककर्ता के खर्च पर या तो बंधक सम्पत्ति बंधककर्त्ता को या ऐसे अन्य व्यक्ति को जिसे बंधककर्ता निर्देशित करे, प्रति अन्तरित करे या यह लेखवद्ध अभिस्वीकृति कि ऐसा कोई अधिकार, जो बधककत्र्ता के उस हित का अल्पीकरण करता है जो बंधकदार को अन्तरित किया गया है, निर्वापित हो गया है, निष्पादित करे और (जहाँ कि बंधक रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा किया गया है) रजिस्ट्रीकृत कराए।
जबकि बंधककर्ता ने या यथापूर्वोक्त अन्य व्यक्ति ने बंधक पर शोध्य अवशिष्ट रकम निविदत्त कर दी है या न्यायालय में धारा 83 के अधीन निक्षिप्त कर दी है, तब निविदा की तारीख से या निक्षेप की दशा में, जहाँ कि पहले ऐसी रकम की कोई निविदा नहीं की गयी है, ज्यों ही बंधककर्त्ता या पूर्वोक्त अन्य व्यक्ति वे सब बातें कर देता है जो उसे बंधकदार को न्यायालय से ऐसी रकम निकालने के योग्य करने के लिए करनी है और बंधकदार पर धारा 83 द्वारा अपेक्षित सूचना की तामील हो जाती है, त्यों ही मूलधन पर ब्याज चलना बन्द हो जाएगाः
परन्तु जहाँ कि बंधककर्ता ने ऐसी रकम को उसकी पूर्व निविदा किए बिना निक्षिप्त कर दिया है और तत्पश्चात् उसका या उसके किसी भाग का प्रत्याहरण कर लिया है, वहाँ मूलधन पर ब्याज ऐसे प्रत्याहरण की तारीख से देय होगा।
जब कि यह संविदा वर्तमान हो कि बंधकदार इस बात का हकदार होगा कि बंधक-धन के संदाय या निविदा से पूर्व उसे युक्तियुक्त सूचना दी जाए और उसे ऐसी सूचना, यथास्थिति निविदा या निक्षेप करने से पहले नहीं दी गई हो, तो इस धारा की या धारा 83 की कोई भी बात बंधकदार को ब्याज के लिए अपने अधिकार से वंचित करने वाली न समझी जाएगी।
मोचन
बंधककर्ता के अतिरिक्त निम्नलिखित व्यक्तियों में से कोई भी बंधक सम्पत्ति का मोचन करा सकेगा या उसके मोचन के लिए वाद ला सकेगा, अर्थात् -
(क) कोई व्यक्ति (उस हित के बंधकदार से भिन्न जिसका मोचन करना ईप्सित है) जिसका उस बंधक-सम्पत्ति या उसके मोचन अधिकार में कोई हित या पर कोई भार है,
(ख) बन्धक ऋण या उसके किसी भाग का संदाय करने के लिए कोई भी प्रतिभू, अथवा
(ग) बन्धककर्ता का कोई लेनदार, जिसने उसकी सम्पदा के प्रशासन के लिए वाद में उस बंधक सम्पत्ति के विक्रय के लिए डिक्री अभिप्राप्त की हो।
धारा 91 में निर्दिष्ट व्यक्तियों में से (बंधककर्त्ता से भिन्न) कोई भी, और कोई भी सह-बंधककर्ता, उस सम्पत्ति का, जो बंधक के अध्यधीन है, मोचन कराने पर वहाँ तक, जहाँ तक कि ऐसी सम्पत्ति के मोचन पुरोबंध या विक्रय का संबंध है, वे ही अधिकार रखेगा, जिन्हें बंधककर्ता के या किसी अन्य बंधकदार के विरुद्ध वह बंधकदार रखता हो जिसके बंधक का वह मोचन कराता।
इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकार प्रत्यासन अधिकार कहलाता है तथा जो व्यक्ति उसे अर्जित करता है, वह उस बंधकदार के अधिकारों में प्रत्यासीन हुआ कहलाता है जिसके बंधक का वह मोचन कराता है।
वह व्यक्ति, जिसने बंधककर्त्ता को वह धन उधार दिया है, जिससे बंधक का मोचन हुआ है, उस बंधकदार के अधिकारों में प्रत्यासीन हो जाएगा जिसके बंधक का मोचन कराया गया है यदि बंधककर्ता ने रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा यह करार किया हो कि ऐसा व्यक्ति ऐसे प्रत्यासीन हो जाएगा।
इस धारा की कोई भी बात किसी भी व्यक्ति को प्रत्यासन का अधिकार प्रदान करने वाली न समझी जाएगी जब तक कि उस बंधक का, जिसके बारे में इस अधिकार का दावा किया जाता है मोचन पूर्णतः न करा लिया गया हो।
कोई भी बन्धकदार, जो पूर्विक बन्धक को मध्यवर्ती बन्धक की सूचना होते हुए या न होते हुए चुका देता है अपनी मूल प्रतिभूति के विषय में कोई पूर्विकता तद्द्वारा अर्जित नहीं करेगा, और धारा 79 द्वारा उपबन्धित दशा के सिवाय कोई भी बन्धकदार जो मध्यवर्ती बन्धक की सूचना होते हुए या न होते हुए बन्धककर्ता को पाश्चिक उधार दे ऐसे पाश्चिक उधार के लिए अपनी प्रतिभूति के बारे में तद्द्वारा कोई पूर्विकता अर्जित नहीं करेगा।
जहाँ कि सम्पत्ति आनुक्रमिक ऋणों के लिए आनुक्रमिक बन्धकदारों के पास बन्धक रखी जाती है वहाँ मध्यवर्ती बन्धकदार के अपने से पीछे वाले बन्धकदारों के विरुद्ध वे ही अधिकार होंगे जो उसे बन्धककर्ता के विरुद्ध हैं।
जहाँ कि कई बन्धककर्ताओं में से एक बन्धककर्ता बन्धक सम्पत्ति का मोचन करा लेता है, वहाँ अपने सह-बन्धककर्ताओं के विरुद्ध धारा 92 के अधीन प्रत्यासन का अपना अधिकार प्रवृत्त कराने में वह ऐसे मोचन में उचित तौर पर किए गए व्ययों का ऐसा आनुपातिक भाग उनसे वसूलीय बन्धक धन में जोड़ने का हकदार होगा, जैसा उस सम्पत्ति में उनके अपने-अपने अंश मद्दे हुआ माना जा सकता है।
एतस्मिनपूर्व अन्तर्विष्ट जो उपवन्ध सादा बन्धक को लागू होते हैं, वे हक विलेखों के निक्षेप द्वारा बन्धक को यावत्रशक्य लागू होंगे।
विलक्षण बन्धक की दशा में पक्षकारों के अधिकार और दायित्व बंधक विलेख में यथासाक्षित उनकी संविदा द्वारा, तथा एसी संविदा के विस्तार के बाहर स्थानीय प्रथा द्वारा अवधारित होंगे।
भार
100. भार-
जहाँ कि एक व्यक्ति की स्थावर सम्पत्ति पक्षकारों के कार्य द्वारा या विधि की क्रिया द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति को धन के संदाय के लिए प्रतिभूति बन जाती है और वह संव्यवहार बन्धक की कोटि में नहीं आता, वहाँ यह कहा जाता है कि पश्चात्कथित व्यक्ति का उस सम्पत्ति पर भार है और एतस्मिनपूर्व अन्तर्विष्ट वे सब उपबन्ध, जो सादा बन्धक को लागू होते हैं, ऐसे भार को यावत्रशक्य लागू होंगे।
न्यास के निष्पादन में उचित रूप से किए गए व्ययों के लिए जो भार न्यासधारी का न्यस्त सम्पत्ति पर होता है, उसे इस धारा की कोई भी बात लागू नहीं है और किसी तत्समय-प्रवृत्त-विधि द्वारा अन्यथा अभिव्यक्तः उपबन्धित को छोड़कर कोई भी भार उस सम्पत्ति के विरुद्ध प्रवर्तित न किया जाएगा, जो ऐसे व्यक्ति के हस्तगत हो जिसे ऐसी सम्पत्ति प्रतिफलार्थ और उस भार की सूचना के बिना अन्तरित की गयी है।
स्थावर सम्पत्ति का कोई भी बंधकदार या वैसी सम्पत्ति पर भार रखने वाला कोई भी व्यक्ति या ऐसे बंधकदार या भारक का कोई अन्तरिती यथास्थिति, बंधककर्त्ता या स्वामी के उस सम्पत्ति में के अधिकारों का क्रय या अन्यथा अर्जन, जहाँ तक कि उसके, अपने और उसी सम्पत्ति के किसी पाश्चिक बंधकदार या किसी पाश्चिक भारक के बीच का संबंध है, बन्धक या भार का तद्द्वारा विलयन कारित किए बिना कर सकेगा और ऐसा कोई भी पाश्चिक बन्धकदार या भारक पूर्विक बंधक या भार का मोचन कराए बिना या बन्धक या भार के अध्यधीन बने रहने से अन्यथा पुरोबन्ध कराने या ऐसी सम्पत्ति का विक्रय कराने का हकदार न होगा।
जहाँ कि वह व्यक्ति, जिस पर या जिसको इस अध्याय के अधीन किसी सूचना की तामील या निविदा की जानी है, उस जिले में निवास नहीं करता, जिसमें बन्धक सम्पत्ति या उसका कुछ भाग स्थित है, वहाँ ऐसे व्यक्ति से आम-मुख्तारनामा-प्राप्त या ऐसी तामील या निविदा को प्रतिगृहीत करने के लिए सम्यक् रूप से प्राधिकृत अभिकर्ता पर तामील या उसको निविदा पर्याप्त समझी जाएगी।
जहाँ कि ऐसा कोई व्यक्ति या अभिकर्ता जिस पर ऐसी सूचना की तामील होनी चाहिए, नहीं मिल सकता या सूचना की तामील करने के लिए अपेक्षित व्यक्ति को ज्ञात नहीं है, वहाँ पश्चात्कधित व्यक्ति ऐसे किसी भी न्यायालय से जिसमें उस बन्धक सम्पत्ति के मोचन के लिए वाद लाया जा सकता है आवेदन कर सकेगा और ऐसा न्यायालय निर्दिष्ट करेगा कि किस प्रकार से ऐसी सूचना की तामील होगी और ऐसे निदेश के अनुवर्त्तन में तामील की गई सूचना पर्याप्त समझी जाएगी:
परन्तु यदि वह सूचना ऐसी सूचना है जो किसी निक्षेप की दशा में धारा 83 द्वारा अपेक्षित है तो उसके बारे में आवेदन उस न्यायालय में किया जाएगा जिसमें वह निक्षेप किया गया है। जहाँ कि कोई भी व्यक्ति या अभिकर्ता, जिसे ऐसी निविदा की जानी चाहिए, नहीं मिल सकता या निविदा करने के लिए इच्छुक व्यक्ति को ज्ञात नहीं है, वहाँ पश्चात्कथित व्यक्ति किसी भी ऐसे न्यायालय में जिसमें उस बन्धक सम्पत्ति के मोचन के लिए वाद लाया जा सकता है, वह रकम, जिसकी निविदा की जानी ईप्सित थी, निक्षिप्त कर सकेगा, और ऐसा निक्षेप ऐसी रकम की निविदा का प्रभाव रखेगा।
इस अध्याय के उपबन्धों के अधीन जहाँ कि संविदा करने के लिए अक्षम किसी व्यक्ति पर या द्वारा किसी सूचना की तामील होनी या कराई जानी है, या ऐसे व्यक्ति द्वारा कोई निविदा या निक्षेप किया जाना या प्रतिगृहीत किया जाना या न्यायालय से निकाला जाना है वहाँ ऐसे व्यक्ति का सम्पत्ति के वैध रक्षक पर या के द्वारा ऐसी सूचना की तामील हो सकेगी या कराई जा सकेगी या के द्वारा निविदा या निक्षेप किया जा सकेगा या प्रतिगृहीत हो सकेगा या निकाला जा सकेगा, किन्तु जहाँ कि ऐसा कोई रक्षक नहीं है और ऐसे व्यक्ति के हितों में यह अपेक्षित या वांछनीय है कि इस अध्याय के उपबन्धों के अधीन सूचना की तामील होनी चाहिए या निविदा या निक्षेप किया जाना चाहिए, वहाँ किसी भी न्यायालय से, जिसमें बन्धक-मोचन के लिए वाद लाया जा सकता हो ऐसी सूचना की तामील करने या प्राप्त करने, या ऐसी निविदा करने या प्रतिगृहीत करने या ऐसे निक्षेप को न्यायालय में करने या से निकालने के प्रयोजन से और उन सब पारिणामिक कार्यों को करने के लिए, जो यदि ऐसा व्यक्ति संविदा करने के लिए सक्षम होता तो उसके द्वारा किए जा सकते या किए जाने चाहिए थे, वादार्थ संरक्षक नियुक्त करने के लिए आवेदन किया जा सकेगा, और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की प्रथम अनुसूची के आदेश 32 के उपबन्ध यावत्रशक्य ऐसे आवेदनों और उसके पक्षकारों और उसके अधीन नियुक्त संरक्षक को लागू होंगे।
उच्च न्यायालय स्वयं अपने यहाँ और अपने अधीक्षणाधीन न्यायालयों में इस अध्याय में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के कार्यान्वयन के लिए समय-समय पर ऐसे नियम बना सकेगा जो इस अधिनियम से संगत हो।