धारा 122 से 129 अध्याय 7 संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 7

दान के विषय में

122. 'दान' की परिभाषा-

'दान' किसी वर्तमान जंगम या स्थावर सम्पत्ति का यह अन्तरण है, जो एक व्यक्ति द्वारा, जो दाता कहलाता है, दूसरे व्यक्ति को, जो आदाता कहलाता है स्वेच्छया और प्रतिफल के बिना किया गया हो और आदाता द्वारा या की ओर से प्रतिगृहीत किया गया हो।

प्रतिग्रहण कब करना होगा- ऐसा प्रतिग्रहण दाता के जीवन काल में और जब तक वह देने के लिए समर्थ हो, करना होगा।

यदि प्रतिग्रहण करने से पहले आदाता की मृत्यु हो जाती है तो दान शून्य हो जाता है।

123. अन्तरण कैसे किया जाता है-

स्थावर सम्पत्ति के दान के प्रयोजन के लिए वह अन्तरणदाता द्वारा या उसकी ओर से हस्ताक्षरित और कम से कम दो साक्षियों द्वारा अनुप्रमाणित रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा करना होगा।

जंगम सम्पत्ति के दान के प्रयोजन के लिए अन्तरण या तो यथा पूर्वोक्त प्रकार से हस्ताक्षरित रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा या परिदान द्वारा किया जा सकेगा।

ऐसा परिदान उसी प्रकार से किया जा सकेगा जैसा कि बेचा हुआ माल परिदत्त किया जा सकता हो।

124. वर्तमान और भावी सम्पत्ति का दान -

जिस दान में वर्तमान और भावी सम्पत्ति दोनों समाविष्ट हों वह भावी सम्पत्ति के विषय में शून्य है।

125. ऐसे कई व्यक्तियों को दान, जिनमें से एक प्रतिगृहीत नहीं करता है-

ऐसे दो या अधिक आदाताओं को किसी चीज का दान, जिनमें से एक उसे प्रतिगृहीत नहीं करता है, उस हित के संबंध में शून्य है जिसे यदि वह प्रतिगृहीत करता तो वह लेता।

126. दान निलम्बित या प्रतिसंहत कब किया जा सकेगा -

दाता और आदाता करार कर सकेंगे कि किसी ऐसी विनिर्दिष्ट घटना के घटित होने पर, जो दाता की इच्छा पर निर्भर नहीं करती दानः निलम्बित या प्रतिसंहत हो जाएगा, किन्तु वह दान, जिसके बारे में पक्षकार करार करते हैं कि वह दाता की इच्छामात्र से पूर्णतः या भागतः प्रतिसंहरणीय होगा, यथास्थिति, पूर्णतः या भागतः शून्य है।

दान उन दशाओं में से (प्रतिफल के अभाव या असफलता की दशा को छोड़कर), किसी भी दशा में प्रतिसंहत किया जा सकेगा जिनमें कि यदि वह संविदा होता तो विखण्डित किया जा सकता।

यथा पूर्वोक्त को छोड़कर दान प्रतिसंहत नहीं किया जा सकता है।

इस धारा में अन्तर्विष्ट कोई भी बात बिना सूचना सप्रतिफल अन्तरितियों के अधिकारों पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी।

दृष्टान्त

(क) ख को क एक खेत ख की अनुमति से अपना यह अधिकार आरक्षित करके देता है कि ख और उसके वंशजों के क के पहले मर जाने की सूरत में वह उसे वापस ले सकेगा। क के जीवन-काल में ख अपने वंशज छोड़े बिना मर जाता है। क खेत वापस ले सकेगा।

(ख) ख को क एक लाख रुपया, ख की अनुमति से अपना यह अधिकार आरक्षित करते हुए देता है कि वह उन लाख रुपयों में से 10,000 रुपए जब जी चाहे वापस ले सकेगा। 90,000 रुपयों के बारे में दान वैध है, किन्तु 10,000 रुपयों के बारे में , जो क के ही बने रहते हैं, शून्य है।

127. दुर्भर दान-

जहाँ कि दान, एक ही व्यक्ति को ऐसी कई चीजों के एकल अन्तरण के रूप में है जिनमें से एक पर बाध्यता का बोझ है और अन्यों पर नहीं है, वहाँ आदाता उस दान द्वारा कुछ नहीं पा सकता जब तक कि वह उसे पूर्णतः प्रतिगृहीत नहीं करता।

जहाँ कि कोई दान कई चीजों के एक ही व्यक्ति को दो या अधिक पृथक् और स्वतन्त्र अन्तरणों के रूप में है, वहाँ आदाता उनमें से एक को प्रतिगृहीत करने के लिए और अन्यों को लेने से इंकार करने के लिए स्वतन्त्र है, चाहे पूर्व कथित फायदाप्रद हो और पश्चात्‌कथित दुर्भर हो।

निराश्रित व्यक्ति को दुर्भर दान- जो आदाता संविदा करने के लिए अक्षम है और किसी ऐसी सम्पत्ति को, जिस पर बाध्यता का बोझ है, प्रतिगृहीत कर लेता है वह अपने प्रतिग्रहण से आबद्ध नहीं है। किन्तु यदि संविदा करने के लिए सक्षम होने के पश्चात् और बाध्यता की जानकारी रखते हुए वह दी हुई सम्पत्ति को प्रतिधृत कर लेता है, तो वह ऐसे आबद्ध हो जाता है।

दृष्टान्त

(क) क के एक समृद्ध संयुक्त स्टाक कम्पनी भ में अंश हैं और कठिनाइयों में ग्रस्त एक संयुक्त स्टाक कम्पनी म में भी उसके अंश हैं। म में के अंशों मद्धे भारी मांगों की प्रत्याशा है। क संयुक्त स्टाक कम्पनियों में के अपने सब अंश ख को दे देता है, म में अंशों को प्रतिगृहीत करने से ख इन्कार करता है। वह भ में के अंशों को नहीं ले सकता।

(ख) क ऐसे गृह का प‌ट्टा ख को देता है जो कुछ वर्षों की अवधि के लिए प‌ट्टे पर उस द्वारा ऐसे भाटक पर लिया हुआ है, जिस भाटक को अवधि भर तक देने के लिए वह और उसके प्रतिनिधि आबद्ध हैं, और जो उतने से अधिक हैं जितने पर कि गृह पट्टे पर चढ़ाया जा सकता है, और एक पृथक् और स्वतन्त्र संव्यवहार के रूप में उसे एक धनराशि भी देता है। ख पट्टे को प्रतिगृहीत करने से इन्कार करता है। इस इन्कार के कारण उसे धन का समपहरण नहीं हो जाता।

128. सर्वस्व आदाता-

धारा 127 के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि जहाँ कि दाता की पूरी सम्पत्ति का दान है, वहाँ आदाता दान के समय के दाता के सब शोध्य ऋणों और दायित्वों के लिए वैयक्तिक रूप से उसमें समाविष्ट सम्पत्ति के विस्तार तक दायी है।

129. आसन्न मरण दान और मोहमेडन विधि (मुस्लिम विधि) की व्यावृत्ति-

इस अध्याय की किसी भी बात का संबंध जंगम सम्पत्ति के उन दानों से नहीं है जो मृत्यु को आसन्न मान कर किए गए हैं और न वह मोहमेडन विधि (मुस्लिम विधि) के किसी नियम पर ही प्रभाव डालने वाली समझी जाएगी।

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