धारा 5 से 53 अध्याय 2 संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882

धारा 5 से 53 अध्याय 2 संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882

 अध्याय 2

पक्षकारों के कार्य द्वारा संपत्ति-अंतरण के विषय में

(क) जंगम या स्थावर संपत्ति का अंतरण

5. संपत्ति के अंतरण की परिभाषा –

आगामी धाराओं में, "संपत्ति के अंतरण" से ऐसा कार्य अभिप्रेत है, जिसके द्वारा कोई जीवित व्यक्ति एक या अधिक अन्य जीवित व्यक्तियों को या स्वयं को अथवा स्वयं और एक या अधिक अन्य जीवित व्यक्तियों को वर्तमान में या भविष्य में सम्पत्ति हस्तान्तरित करता है और "संपत्ति का अंतरण करना" ऐसा कार्य करना है।

इस धारा में "जीवित व्यक्ति” के अन्तर्गत कम्पनी या संगम या व्यक्तियों का निकाय, चाहे वह निगमित हो या न हो, आता है, किन्तु एतस्मिन् अन्तर्विष्ट कोई भी बात कम्पनियों,संगमों या व्यक्तियों के निकायों को या के द्वारा किए जाने वाले संपत्ति-अंतरण से सम्बन्धित किसी भी तत्समय प्रवृत्त-विधि पर प्रभाव न डालेगी।

6. क्या अंतरित किया जा सकेगा -

किसी भी किस्म की संपत्ति, इस अधिनियम या किसी भी अन्य तत्समय प्रवृत्त-विधि द्वारा अन्यथा उपबंधित के सिवाय, अन्तरित की जा सकेगी

(क) किसी प्रत्यक्ष वारिस की संपदा का उत्तराधिकारी होने की संभावना,कुल्य की मृत्यु पर किसी नातेदार की वसीयत-संपदा अभिप्राप्त करने की संभावना या इसी प्रकृति की कोई अन्य संभावना मात्र अन्तरित नहीं की जा सकती

(ख) किसी उत्तरभाव्य शर्त के भंग के कारण पुनः प्रवेश का अधिकार मात्र उस सम्पत्ति का, जिस पर तद्द्वारा प्रभाव पड़ा है, स्वामी के सिवाय किसी अन्य को अन्तरित नहीं किया जा सकता;

(ग) कोई सुखाचार अधिष्ठायी स्थल से पृथक्तः अन्तरित नहीं किया जा सकता;

(घ) सम्पत्ति में का ऐसा हित, जो उपभोग में स्वयं स्वामी तक ही निर्बंधित है, उसके द्वारा अन्तरित नहीं किया जा सकता;

(घघ) भावी भरणपोषण का अधिकार, चाहे वह किसी भी रीति से उद्भूत प्रतिभूत या अवधारित हो, अन्तरित नहीं किया जा सकता

(ङ) वाद लाने का अधिकार मात्र अन्तरित नहीं किया जा सकता;

(च) लोक पद अन्तरित नहीं किया जा सकता, और न लोक आफिसर का संबलम् उसके देय होने से, चाहे पूर्व या पश्चात्, अन्तरित किया जा सकता;

(छ) वृत्तिकाएं, जो सरकार के सैनिक, नौसैनिक, वायुसैनिक और सिविल पेन्शन भोगियों को अनुज्ञात हों, और राजनैतिक पेंशनें अन्तरित नहीं की जा सकतीं;

(ज) कोई भी अन्तरण (1) जहां तक वह तद्द्वारा उस हित की, जिस पर प्रभाव पड़ा है, प्रकृति के प्रतिकूल हो, या (2) जो भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 का 9) की धारा 23 के अर्थ के अन्तर्गत किसी विधिविरुद्ध उद्देश्य या प्रतिफल के लिए हो, या (3) जो ऐसे व्यक्ति को, जो अन्तरिती होने से विधितः निरर्हित हो, नहीं किया जा सकता ;

(झ) इस धारा की कोई भी बात अधिभोग का अनन्तरणीय अधिकार रखने वाले किसी अभिधारी को, उस सम्पदा के फार्मर (कृषक )को, जिस सम्पदा के लिए राजस्व देने में व्यतिक्रम हुआ है, या किसी प्रतिपाल्य अधिकरण के प्रबंध के अधीन किसी सम्पदा के पट्टेदार को, ऐसे अभिधारी, फार्मर ( कृषक ) या पट्टेदार के नाते अपने हित का समनुदेशन करने के बारे में प्राधिकृत करने वाली नहीं समझी जाएगी।

7. अन्तरण करने के लिए सक्षम व्यक्ति -

हर व्यक्ति, जो संविदा करने के लिए सक्षम हो और अन्तरणीय सम्पत्ति का हकदार हो या अन्तरणीय सम्पत्ति के जो उसकी अपनी नहीं है, व्ययन के लिए प्राधिकृत हो, ऐसी सम्पत्ति का अन्तरण, पूर्णत: या भागतः तथा आत्यन्तिक रूप से या सशर्त, उन परिस्थितियों में उतने विस्तार तक और उस प्रकार से, जो किसी भी तत्समय प्रवृत्त-विधि द्वारा अनुज्ञात और विहित हो, करने के लिए सक्षम है।

8. अन्तरण का प्रभाव -

जब तक कि कोई भिन्न आशय अभिव्यक्त न हो या आवश्यक रूप से विवक्षित न हो, सम्पत्ति का अन्तरण अन्तरिती को तत्काल ही सम्पत्ति में के और उसकी विधिक प्रसंगतियों में के उस समस्त हित का संक्रामण कर देता है जिसका संक्रामण करने के लिए अन्तरक तब समर्थ हो-

ऐसी प्रसंगतियों के अन्तर्गत आते हैं, जहाँ  कि सम्पत्ति भूमि हो, वहां उससे उपाबद्ध सुखाचार, अन्तरण के पश्चात् प्रोद्भवमान उसके भाटक और लाभ तथा भूबद्ध सब चीजें, और जहां कि संपत्ति भूबद्ध मशीनरी हो, वहां उसके जंगम भाग और जहां कि संपत्ति कोई गृह हो वहां उसके उपाबद्ध सुखाचार, अन्तरण के पश्चात् प्रोद्भवमान उसका भाटक और उसके साथ स्थायी उपयोग के लिए उपबन्धित उसके ताले, चाबियाँ, छड़ें, द्वार, खिड़कियां और अन्य सब चीजें,

और जहां कि संपत्ति कोई ऋण या अन्य अनुयोज्य दावा हो वहां उसके लिए प्रतिभूतियां (उस दशा के सिवाय जिसमें वे ऐसे अन्य ऋणों या दावों के लिए भी हैं, जिन्हें अन्तरिती को अन्तरित नहीं किया गया है), किन्तु अन्तरण के पूर्व प्रोद्भूत व्याज की बकाया नहीं;

और जहां कि संपत्ति धन या आय देने वाली अन्य सम्पत्ति हो, वहां अंतरण के प्रभावशील होने के पश्चात् प्रोद्भवमान उसका ब्याज या आय।

9. मौखिक अंतरण -

हर उस दशा में, जिसमें विधि द्वारा कोई लेख अभिव्यक्तत; अपेक्षित नहीं है, सम्पत्ति का अन्तरण लिखे बिना किया जा सकेगा।

10. अन्य-संक्रामण अवरुद्ध करने वाली शर्त -

.जहां कि सम्पत्ति ऐसी शर्त या मर्यादा के अध्यधीन अन्तरित की जाती है, जो अन्तरिती या उसके अधीन दावा करने वाले व्यक्ति को सम्पत्ति में अपने हित को अलग करने या व्ययनित करने से आत्यन्तिक्तः अवरुद्ध करती है, वहां ऐसी शर्त या मर्यादा शून्य है, सिवाय ऐसे पट्टे की दशा के जिसमें कि वह शर्त पट्टाकर्ता या उसके अधीन दावेदारों के फायदे के लिए हो, परन्तु सम्पत्ति किसी स्त्री को (जो हिन्दू, मुसलमान या बौद्ध न हो) या उसके फायदे के लिए इस प्रकार अन्तरित की जा सकेगी कि उसे अपनी विवाहित स्थिति के दौरान उस सम्पत्ति को या उसमें के अपने फायदाप्रद हित को अन्तरित या भारित करने की शक्ति न होगी।

11. स्रष्ट हित के विरुद्ध निर्बन्धन -

जहां कि सम्पत्ति के अन्तरण पर उस सम्पत्ति में किसी व्यक्ति के पक्ष में हित आत्यन्तिक्तः सृष्ट किया जाता हो, किन्तु अन्तरण के निर्बन्धन निदेश करते हों कि वह ऐसे हित का किसी विशिष्ट रीति से उपयोजन या उपभोग करे, वहां वह ऐसे हित को ऐसे प्राप्त और व्ययनित करने का हकदार होगा मानो ऐसा कोई निदेश वा ही नहीं।

जहां कि ऐसा कोई निदेश स्थावर सम्पत्ति के एक टुकड़े के बारे में उस सम्पत्ति के दूसरे टुकड़े के फायदाप्रद उपभोग को सुनिश्चित करने के प्रयोजन से किया गया हो, वहां इस धारा की कोई भी बात किसी ऐसे अधिकार पर, जो अन्तरक ऐसे निदेश का प्रवर्तन कराने के लिए रखता हो, या किसी ऐसे उपचार पर, जो वह उसके भंग के बारे में रखता हो, प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी।

12. दिवाले या प्रयतित अन्य-संक्रामण पर हित को पर्यवसेय बनाने वाली शर्त -

जहां कि इस शर्त या मर्यादा के अध्यधीन सम्पत्ति अन्तरित की जाती है कि किसी व्यक्ति को या उसके फायदे के लिए आरक्षित या दिया हुआ उस सम्पत्ति में का कोई भी हित उस व्यक्ति के दिवालिया होने पर या उसके अन्तरण या व्ययन करने का प्रयास करने पर समाप्त हो जाएगा, वहां ऐसी शर्त या मर्यादा शून्य है।

इस धारा की कोई भी बात पट्टे में की किसी ऐसी शर्त को लागू न होगी जो पट्टाकर्ता या उससे व्युत्पन्न अधिकाराधीन दावा करने वालों के फायदे के लिए हो।

13. अजात व्यक्ति के फायदे के लिए अंतरण -

जहां कि सम्पत्ति के अन्तरण पर उस संपत्ति में कोई हित उसी अंतरण द्वारा सृष्ट किसी पूर्विक हित के अध्यधीन ऐसे व्यक्ति के फायदे के लिए, जो अंतरण की तारीख को अस्तित्व में हो, सृष्ट किया जाता है; वहां ऐसे व्यक्ति के फायदे के लिए सृष्ट हित प्रभावी होगा जब कि उसका विस्तार सम्पत्ति में अन्तरक के सम्पूर्ण अवशिष्ट हित पर हो।

दृष्टांत

क उस सम्पत्ति को, जिसका वह स्वामी है, ख को अनुक्रमशः अपने और अपनी आशयित पत्नी के जीवनपर्यन्त के लिए और उत्तरजीवी की मृत्यु के पश्चात् आशयित विवाह से ज्येष्ठ पुत्र के जीवनपर्यन्त के लिए और उसकी मृत्यु के पश्चात् क के दूसरे पुत्र के लिए न्यास के रूप में अन्तरित करता है। ज्येष्ठ पुत्र के फायदे के लिए इस प्रकार सृष्ट हित प्रभावशील नहीं होता है क्योकि उसका विस्तार उस सम्पत्ति में क के सम्पूर्ण अवशिष्ट हित पर नहीं है।

14. शाश्वतता के विरुद्ध नियम -

कोई भी सम्पत्ति अन्तरण ऐसा हित सृष्ट करने के लिए प्रवृत्त नहीं हो सकता जो ऐसे अन्तरण की तारीख को जीवित एक या अधिक व्यक्तियों के जीवन काल के, और किसी व्यक्ति की, जो उस कालावधि के अवसान के समय अस्तित्व में हो, जिसे यदि वह पूर्ण वय प्राप्त करे तो वह सृष्ट हित मिलना हो, अप्राप्तवयता के पश्चात् प्रभावी होना है।

15. उस वर्ग को अंतरण, जिसमें के कुछ व्यक्ति द्वारा 13 और 14 के अन्दर जाते हैं -

यदि सम्पत्ति-अन्तरण से उस सम्पत्ति में किसी हित का सृजन ऐसे व्यक्तियों के किसी वर्ग के फायदे के लिए किया जाता है जिनमें से कुछ के सम्बन्ध में ऐसा हित धारा 13 और 14 में अन्तर्विष्ट नियमों में से किसी के कारण निष्फल हो जाता है तो ऐसा हित केवल उन्हीं व्यक्तियों के सम्बन्ध में, न कि सम्पूर्ण वर्ग के सम्बन्ध में निष्फल हो जाता है।

16. अन्तरण का किसी पूर्विक हित की निष्फलता पर प्रभावी होना -

जहां कि व्यक्ति या व्यक्तियों के किसी वर्ग के फायदे के लिए सृष्ट हित धाराओं 13 और 14 में अन्तर्विष्ट नियमों में से किसी के कारण ऐसे व्यक्ति या ऐसे संपूर्ण वर्ग के सम्बन्ध में निष्फल हो जाता है, वहां उसी संव्यवहार में सृष्ट और ऐसे पूर्विक हित की निष्फलता के पश्चात् या पर प्रभावी होने के लिए आशयित कोई हित भी निष्फल हो जाता है।

17. संचयन के लिए निवेश -

(1) जहां कि सम्पत्ति के किसी अन्तरण के निबन्धन निर्दिष्ट करते हैं कि उस सम्पत्ति से उद्भूत आय-

(क) अन्तरक के जीवन से, या

(ख) अन्तरण की तारीख से अठारह वर्ष की कालावधि से, अधिक कालावधि तक पूर्णतः या भागतः संचित की जाएगी, वहां एतस्मिन्पश्चात् यथा उपबंधित के सिवाय ऐसा निदेश वहां तक शून्य होगा, जहां तक कि वह कालावधि, जिसके दौरान संचय करना निदिष्ट है, पूर्वोक्त कालावधियों में से दीर्घतर कालावधि से अधिक हो और ऐसी अन्तिम वर्णित कालावधि का अन्त होने पर वह सम्पत्ति और उसकी आय इस प्रकार व्ययनित की जाएगी मानो वह कालावधि, जिसके दौरान संचय करना निर्दिष्ट किया गया है, बीत गई है।

(2) यह धारा ऐसे किसी निदेश पर प्रभाव न डालेगी जो

(i) अन्तरक के ऋणों का या अन्तरण के अधीन कोई हित पाने वाले किसी अन्य व्यक्ति के ऋणों का संदाय करने के, अथवा

(ii) अन्तक के या अन्तरण के अधीन कोई हित पाने वाले किसी अन्य व्यक्ति के पुत्र-पुत्रियों या दूरतर सन्तति के लिए भागों का उपबन्ध करने के, अथवा

(iii) अन्तरित सम्पत्ति के परिरक्षण या अनुरक्षण के, प्रयोजन से संचय करने के लिए हो, और ऐसा निदेश तदनुकूल किया जा सकेगा ।

18. लोक के फायदे के लिए शाश्वतिक अंतरण -

धारा 14, 16 और 17 में के निर्बन्धन ऐसे सम्पत्ति अंतरण की दशा में लागू नहीं होंगे, जो लोक के फायदे के लिए धर्म, ज्ञान, वाणिज्य, स्वास्थ्य, क्षेम को या मानव जाति के लिए फायदाप्रद किसी अन्य उद्देश्य को अग्रसर करने के लिए किया गया हो।

19. निहित हित -

जहां कि किसी सम्पत्ति अन्तरण से किसी व्यक्ति के पक्ष में उस सम्पत्ति में कोई हित, वह समय विनिर्दिष्ट किए बिना, जब से वह प्रभावी होगा, या शब्दों में यह विनिर्दिष्ट करते हुए कि वह तत्काल या किसी ऐसी घटना होने पर, जो अवश्यंभावी है, प्रभावी होगा, सृष्ट किया जाता है, वहां जब तक कि अन्तरण के निर्बन्धनो से प्रतिकूल आशय प्रतीत न होता हो, ऐसा हित निहित हित है।

निहित हित कब्जा अभिप्राप्त करने से पहले अन्तरिती की मृत्यु हो जाने से विफल नहीं हो जाता।

स्पष्टीकरण -

केवल ऐसे उपबन्ध से, जिसके द्वारा हित का उपभोग मुल्तवी किया जाता है, या उसी सम्पत्ति में कोई पूर्विक हित किसी अन्य व्यक्ति के लिए दिया जाता या आरक्षित किया जाता है, या उस सम्पत्ति से उद्भूत आय को उस समय तक संचित किए जाने का निदेश किया जाता है, जब तक उपभोग का समय नहीं आ जाता, या केवल ऐसे किसी उपबन्ध से कि यदि कोई विशेष घटना घटित हो जाए तो वह हित किसी अन्य व्यक्ति को संक्रान्त हो जाएगा; यह आशय कि हित निहित नहीं होगा अनुमित न किया जाएगा।

20. अजात व्यक्ति अपने फायदे के लिए किए गए अन्तरण पर कब निहित हित अर्जित करता है -

जहां कि संपत्ति- अंतरण से उस संपत्ति में कोई हित ऐसे व्यक्ति के फायदे के लिए सृष्ट किया जाता है जो उस समय अजात है वहाँ, जब तक कि अन्तरण के निर्बन्धनों से कोई तत्प्रतिकूल आशय प्रतीत न होता हो, वह अपना जन्म होने पर निहित हित अर्जित कर लेता है, यद्यपि उसे यह हक न हो कि वह अपने जन्म से ही उसका उपभोग करने लगे।

21. समाश्रित  हित -

जहां कि संपत्ति अंतरण से उस संपत्ति में किसी व्यक्ति के पक्ष में हित विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित न होने पर ही अथवा किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित न होने पर ही प्रभावी होने के लिए सृष्ट किया गया हो, वहां ऐसा व्यक्ति तद्द्द्वारा उस संपत्ति में समावित हित अर्जित करता है। ऐसा हित पूर्व कथित दशा में उस घटना के घटित होने पर और पश्चात् कथित दशा में उस घटना का घटित होना असम्भव हो जाने पर निहित हित हो जाता है।

अपवाद –

जहां कि संपत्ति अंतरण के अधीन कोई व्यक्ति उस संपत्ति में किसी हित का हकदार कोई विशिष्ट आयु प्राप्त करने पर हो जाता है, और अन्तरक उसको वह आय भी आत्यन्तिकतः देता है जो उसके वह आयु प्राप्त करने से पहले ऐसे हित से उद्भूत हो यह निदेश देता है कि वह आय या उसमें से उतनी जितनी आवश्यक हो, उसके फायदे के लिए उपयोजित की जाए, वहां ऐसा हित समाश्रित हित नहीं है।

22. किसी वर्ग के ऐसे सदस्यों को अन्तरण जो किसी विशिष्ट आयु को प्राप्त करें -

जहां कि सम्पत्ति अन्तरण से उस सम्पत्ति में कोई हित किसी वर्ग के केवल ऐसे सदस्यों के पक्ष में सृष्ट किया गया हो, जो कोई विशिष्ट आयु प्राप्त करे, वहां ऐसा हित वर्ग के ऐसे किसी सदस्य में निहित नहीं होता जिसने वह आयु प्राप्त नहीं कर ली है।

23. अंतरण जो, विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित होने पर समाश्रित है -

जहां कि सम्पत्ति अन्तरण से उस सम्पत्ति में कोई हित किसी विनिर्दिष्ट व्यक्ति को किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित होने पर ही प्रोद्भूत होना हो, और उस घटना के घटित होने के लिए कोई समय वर्णित न हो, वहां वह हित निष्फल हो जाता है जब तक ऐसी घटना मध्यवर्ती या पूर्ववर्ती हित के अस्तित्वहीन होने के पहले ही या साथ ही घटित नहीं हो जाती ।

24. निश्चित व्यक्तियों में से ऐसे व्यक्तियों को अन्तरण जो अविनिर्दिष्ट कालावधि पर उत्तरजीवी हों -

जहां कि सम्पत्ति- अन्तरण से उस सम्पत्ति में हित निश्चित व्यक्तियों में से ऐसे व्यक्तियों को प्रोद्भूत होना हो, जो किसी कालावधि पर उत्तरजीवी रहे किन्तु निश्चित कालावधि विनिर्दिष्ट न हो, वहां वह हित उन व्यक्तियों में से ऐसों को जो मध्यवर्ती या पूर्ववर्ती हित के अस्तित्व का अन्त होने के समय जीवित हों, चला जाएगा, जब तक कि अन्तरण के निबन्धनों से कोई तत्प्रतिकूल आशय प्रतीत न होता हो।

दृष्टांत

सम्पत्ति को के जीवनपर्यन्त के लिए को और उसकी मृत्यु के पश्चात् और को उनमें समविभाजित किए जाने के लिए या उनमें से उत्तरजीवी को अन्तरित करता है के जीवनकाल में की मृत्यु हो जाती है का उत्तरजीवी है की मृत्यु पर वह संपत्ति को संक्रमित हो जाती है

25. सशर्त अन्तरण -

 सम्पत्ति अन्तरण से सृष्ट और किसी शर्त पर निर्भर हित निष्फल हो जाता है, यदि उस शर्त की पूर्ति संभव हो, या विधि द्वारा निषिद्ध हो या ऐसी प्रकृति की हो कि यदि वह अनुज्ञात की जाए तो वह किसी विधि के उपबन्धों को विफल कर देगी या कपटपूर्ण हो, या ऐसी हो जिनमें किसी दूसरे के शरीर या सम्पत्ति को क्षति अन्तर्वलित या अन्तर्हित हो, या जिसे न्यायालय अनैतिक या लोकनीति के विरुद्ध समझता हो।

दृष्टांत

(क )  को कोई खेत पट्टे पर इस शर्त पर देता है कि वह एक घंटे में 100 मील पैदल चले। पट्टा शून्य है।

() को 500 रुपए इस शर्त पर देता है कि वह की पुत्री से विवाह करे। अन्तरण की तारीख पर की मृत्यु हो चुकी थी। अन्तरण शून्य है।

(ग) को 500 रुपए इस शर्त पर अन्तरित करता है कि वह की हत्या करे। अन्तरण शून्य है।

(घ) अपनी भतीजी को 500 रुपए इस शर्त पर अन्तरित करता है कि वह अपने पति का अभित्याग कर दे । अन्तरण शून्य है ।

26. पुरोभावय शर्त की पूर्ति -

जहां कि सम्पत्ति अन्तरण के निबंधन कोई ऐसी शर्त अधिरोपित करते हैं जो इससे पहले कि कोई व्यक्ति उस सम्पत्ति में हित प्राप्त कर सके, पूरी की जानी हो, वहां यदि उस शर्त का सारतः अनुपालन कर दिया गया है, तो यह समझा जाएगा कि उसकी पूर्ति कर दी गई है।

दृष्टांत

(क).   क 5,000 रुपए ख को इस शर्त पर अन्तरित करता है कि वह ग,घ और ड़ की सम्मति से विवाह करेगा। ड़ की मृत्यु हो जाती है। ग और घ की सम्मति से ख विवाह करता है। यह समझा जाएगा की ख ने शर्त पूरी कर दी है

(ख).   क 5,000 रुपए ख को इस शर्त पर अन्तरित करता है कि वह ग,घ और ड़ की सम्मति से विवाह करेगा। ग,घ और ड़ की सम्मति के बिना ख विवाह करता है, किन्तु विवाह के पश्चात् उनकी सम्मति अभिप्राप्त कर लेता है। ख ने शर्त पूरी नहीं की है।

27. एक व्यक्ति को सशर्त अन्तरण ऐसे अन्तरण के साथ जो पूर्विक व्ययन के निष्फल होने पर दूसरे व्यक्ति के पक्ष में हो जाएगा -

जहां कि सम्पत्ति-अन्तरण से उस सम्पत्ति में कोई हित एक व्यक्ति के पक्ष में सृष्ट किया जाता है और उसी संव्यवहार द्वारा उसी हित का कोई परतर व्ययन उस अन्तरण के अधीन पूर्विक व्ययन के निष्फल होने की दशा में किसी दूसरे के पक्ष में किया जाता है, वहां पूर्विक व्ययन की निष्फलता पर परतर व्ययन प्रभावी हो जाएगा; यद्यपि वह निष्फलता अन्तरक अनुध्यात प्रकार से न हुई हो ।

किन्तु जहां कि संव्यवहार के पक्षकारों का आशय यह हो कि पूर्विक व्ययन के किसी विशेष प्रकार से निष्फल हो जाने की दशा में ही परतर व्ययन प्रभावी होगा, वहां जब तक कि पूर्विक व्ययन उस प्रकार से निष्फल नहीं हो जाता, परतर व्वयन प्रभावी न होगा।

दृष्टांत

(क).   क इस शर्त पर कि क की मृत्यु के पश्चात् तीन मास के भीतर अमुक पट्टा निष्पादित कर देगा, ख को और यदि वह ऐसा करने में उपेक्षा करे तो ग को 500 रुपए अन्तरित करता है। क के जीवनकाल में ख की मृत्यु हो जाती है ग के पक्ष में व्ययन प्रभावी हो जाता है।

(ख).   क अपनी पत्नी को सम्पत्ति अन्तरित करता है किन्तु उसके जीवनकाल में ही उसकी पत्नी की मृत्यु हो जाने की दशा में वह सम्पत्ति, जिसे उसने अपनी पत्नी को अन्तरित किया था, ख को अन्तरित करता है क और उसकी पत्नी ऐसी परिस्थितियों में एक साथ विनष्ट हो जाते हैं, जिनसे यह साबित करना असम्भव हो जाता है कि वह उसके पहले मर गई। ख के पक्ष में व्ययन प्रभावी नहीं होता।

28. परवर अन्तरण का विनिर्दिष्ट घटना के घटित होने या होने की शर्त पर आश्रित होना -

सम्पत्ति अन्तरण से उस सम्पत्ति में कोई हित किसी व्यक्ति के लिए इस अधियोजित शर्त के साथ प्रोद्भूत होने के लिए सृष्ट किया जा सकेगा कि विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित होने की दशा में ऐसा हित किसी अन्य व्यक्ति को संक्रान्त हो जाएगा या विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित न होने की दशा में ऐसा हित किसी अन्य व्यक्ति को संक्रांत हो जाएगा। हर एक दशा में के व्ययन धारा 10, 12, 21, 22, 23, 24, 25 और 27 में अन्तर्विष्ट नियमों के अध्यधीन है।

29. उत्तरभाव्य शर्त की पूर्ति -

पूर्वगामी अंतिम धारा द्वारा अनुध्यात किस्म का परतर व्ययन प्रभावी नहीं हो सकता, जब तक कि शर्त की पूर्ति यथावत् नहीं हो जाती।

दृष्टांत

क 500 रुपए ख को उसके प्राप्तवय होने या विवाह करने पर उसे दिए जाने के लिए इस उपबन्ध के साथ अन्तरित करता है। कि यदि ख अप्राप्तवय ही मर जाए या ग की सम्मति के बिना विवाह कर ले, तो वे 500 रुपए घ को मिलेंगे। ख केवल 17 वर्ष की आयु में और ग की सम्मति के बिना विवाह करता है। घ को अन्तरण प्रभावी हो जाता है।

30. पूर्विक व्ययन का परतर व्ययन की अविधिमान्यता द्वारा प्रभावित होना -

यदि परतर व्ययन विधिमान्य न हो, तो पूर्विक व्ययन पर उसका प्रभाव नहीं पड़ेगा।

दृष्टांत

क एक फार्म को उसके जीवनपर्यन्त के लिए तथा यदि वह अपने पति का अभित्यजन न करे, तो ग को अन्तरित करता है। ख अपने जीवन पर्यन्त फार्म की ऐसे हकदार है मानो शर्त अन्तःस्थापित थी ही नहीं।

31. यह शर्त की अन्तरण विनिर्दिष्ट निश्चित घटना के घटित होने या होने की दशा में प्रभावी रहेगा -

धारा 12 के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि सम्पत्ति के अन्तरण पर उस सम्पत्ति में कोई हित इस अधियोजित शर्त के साथ सृष्ट किया जा सकेगा कि किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित होने की दशा में या किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित न होने की दशा में उसके अस्तित्व का अन्त हो जाएगा।

दृष्टांत

(क).   क कोई फार्म ख को उसके, जीवनपर्यन्त के लिए इस उपबंध के साथ अन्तरित करता है कि यदि ख ने अमुक जंगल को काटा तो अन्तरण के प्रभाव का अन्त हो जाएगा। ख जंगल काट डालता है। यह फार्म में अपना आजीवन हित खो देता है।

(ख).   क कोई फार्म ख को इस उपबंध के साथ अन्तरित करता है कि यदि अन्तरण की तारीख के पश्चात् तीन वर्ष के भीतर ख इंग्लैंड न जाएगा तो फार्म में उसके हित का अन्त हो जाएगा। ख विहित अवधि के भीतर इंग्लैंड नहीं जाता। फार्म में उस हित का अन्त हो जाता है।

32. ऐसी शर्त अविधिमान्य नहीं होनी चाहिए -

इसके लिए कि यह शर्त विधिमान्य हो कि हित के अस्तित्व का अंत हो जाएगा, यह आवश्यक है कि वह घटना, जिससे वह सम्बन्धित है, ऐसी हो जो हित के सृजन की शर्त विधितः हो सकती है।

33. कार्य करने की शर्त पर अन्तरण जबकि उस कार्य के करने के लिए कोई समय विनिर्दिष्ट नहीं है -

जहां कि संपत्ति-अंतरण से उस संपत्ति में कोई हित इस शर्त के अध्यधीन सृष्ट किया जाता है कि उसे लेने वाला व्यक्ति अमुक कार्य करेगा, किन्तु उस कार्य के करने के लिए कोई समय विनिर्दिष्ट नहीं है, वहां वह शर्त भंग हो जाती है, जब वह ऐसे कार्य का करना सर्वदा के लिए या किसी अनिश्चित कालावधि के लिए असम्भव कर देता है।

34. कार्य करने की शर्त पर आश्रित अन्तरण जबकि समय विनिर्दिष्ट है -

जहां कि या तो संपत्ति के अंतरण से सृष्ट किसी हित का किसी व्यक्ति द्वारा उपभोग किए जाने से पहले पूर्ति की जानी वाली शर्त के तौर पर या ऐसी शर्त के तौर पर, जिसकी अपूर्ति की दशा में वह हित उससे किसी दूसरे व्यक्ति को संक्रान्त हो जाना है, कोई कार्य उस व्यक्ति द्वारा किया जाना है और उस कार्य के करने के लिए कोई समय विनिर्दिष्ट किया गया है, वहां यदि विनिर्दिष्ट समय के भीतर ऐसे कार्य का किया जाना किसी ऐसे व्यक्ति के कपट द्वारा निवारित कर दिया जाए, जिसे शर्त की अपूर्ति से सीधे फायदा होता हो, तो उस कार्य को करने के लिए उसके विरुद्ध इतना अतिरिक्त समय अनुज्ञात किया जाएगा जितना ऐसे कपट द्वारा किए गए विलम्ब की प्रतिपूर्ति के लिए अपेक्षित हो। किन्तु यदि उस कार्य को करने के लिए कोई समय विनिर्दिष्ट न हो तो यदि उसका किया जाना शर्त की अपूर्ति में हितबद्ध व्यक्ति के कपट द्वारा असम्भव बना दिया जाए, या अनिश्चित समय के लिए मुल्तवी हो जाए, तो वह शर्त, जहां तक उस व्यक्ति का सम्बन्ध है, पूरी कर दी गई समझी जाएगी।

निर्वाचन

35. निर्वाचन कब आवश्यक है

 जहां कि कोई व्यक्ति ऐसी सम्पत्ति अन्तरित करने की प्रव्यंजना करता है, जिसे अन्तरित करने का उसे कोई अधिकार नहीं है और उसी संव्यवहार के भागरूप कोई फायदा उस सम्पत्ति के स्वामी को प्रदत्त करता है वहां ऐसे स्वामी को निर्वाचन करना होगा कि वह या तो ऐसे अन्तरण को पुष्ट करे या उससे विसम्मत हो और पश्चात्कथित दशा में वह ऐसे प्रदत्त फायदे का त्याग करेगा और इस प्रकार त्यस्त फायदा अन्तरक या उसके प्रतिनिधि को ऐसे प्रतिवर्तित हो जाएगा, मानो वह व्ययनित ही नहीं हुआ था, तथापि-

जहाँ कि अन्तरण आनुग्रहिक है और जहां अन्तरक निर्वाचन किए जाने से पहले मर गया है या नवीन अन्तरण करने के लिए अन्यथा असमर्थ हो गया है,

और उन सब दशाओं में, जिनमें अन्तरण प्रतिफलार्थ है, निराश अन्तरिती को प्रतिफल की रकम या उस सम्पत्ति के, जिसे उसको अन्तरित किए जाने का प्रयत्न किया गया था, मूल्य को चुका देने के भार के अध्यधीन ही वह फायदा प्रतिवर्तित होगा।

दृष्टांत

सुल्तानपुर का खेत ग की सम्पत्ति है और उसका मूल्य 800 रुपए है क उसे दान की लिखत द्वारा ख को अंतरित करने की प्रव्यंजना करता है और उसी लिखत द्वारा ग को 1,000 रुपए देता है। ग खेत को अपने पास रखना निर्वाचित करता है। 1,000 रुपए का दान उससे समपहृत हो जाता है।

उसी मामले में क निर्वाचन के पहले मर जाता है। उसका प्रतिनिधि 1,000 रुपए में से 800 रुपए ख को देगा।

इस धारा के प्रथम पैरा का नियम लागू होता है चाहे अन्तरक यह विश्वास करता हो या न करता हो कि जिसका अन्तरण करने की वह प्रव्यंजना करता है, वह स्वयं उसकी अपनी है

जो व्यक्ति किसी संव्यवहार के अधीन कोई फायदा सीधा नहीं लेता किन्तु उसके अधीन फायदा उसे परतः व्युत्पन्न होता है। उसे निर्वाचन करने की आवश्यकता नहीं है।

जो व्यक्ति अपनी किसी एक हैसियत में कोई फायदा उस संव्यवहार के अधीन लेता है, वह किसी अन्य हैसियत में उससे विसम्मत हो सकेगा।

अंतिम पूर्ववर्ती चारों नियमों का अपवाद -

जहां कि उस सम्पत्ति के स्वामी को, जिसका अन्तरण करने की अन्तरक प्रव्यंजना करता है, कोई विशिष्ट फायदा प्रदत्त किया जाना अभिव्यक्त किया गया है और ऐसा फायदा उस सम्पत्ति के बदले में किया जाना अभिव्यक्त है, वहां यदि ऐसा स्वामी सम्पत्ति का दावा करे तो उसे विशिष्ट फायदे का त्याग करना होगा किन्तु वह उसी संव्यहार द्वारा उसे प्रदत्त किसी अन्य फायदे को त्यागने के लिए आबद्ध नहीं है।

जिस व्यक्ति को फायदा प्रदत्त किया गया है उस व्यक्ति द्वारा प्रतिग्रहण ही अन्तरण की पुष्टि के लिए उस द्वारा किया गया निर्वाचन गठित करता है, यदि वह निर्वाचन करने के अपने कर्तव्य को जानता हो और उन परिस्थितियों को जानता हो जो निर्वाचन करने में किसी युक्तिमान मनुष्य के निर्णय पर प्रभाव डालती है, अथवा यदि वह उन परिस्थितियों की जांच करने का अधित्यजन कर देता है।

यदि वह व्यक्ति, जिसे वह फायदा प्रदत्त किया गया है, विसम्मति अभिव्यक्त करने के लिए कोई कार्य किए बिना उसका उपभोग दो वर्ष तक कर लेता है तो ऐसा ज्ञान या अधित्यजन तत्प्रतिकूल साक्ष्य के अभाव में उपधारित कर लिया जाएगा।

ऐसा ज्ञान या अधित्वजन उसके किसी ऐसे कार्य से अनुमित किया जा सकेगा जिसने उस सम्पत्ति में, जिसके अन्तरित करने की प्रव्यंजना की गई है हितबद्ध व्यक्तियों को उसी दशा में रखना असम्भव बना दिया है जिसमें वे होते यदि वह कार्य न किया गया होता।

दृष्टांत

ख को क एक सम्पदा अन्तरित करता है, जिसका ग हकदार है, और उस संव्यहार के भागरूप ग को कोयले की एक खान देता है। ग खान को कब्जे में लेता है और उसे निःशेष कर देता है। तद्द्वारा उसने सम्पदा के ख को अन्तरण की पुष्टि कर दी है।

यदि वह अन्तरण की तारीख से एक वर्ष के भीतर अन्तरण की पुष्टि करने का या उससे विसम्मति का अपना आशय अन्तरक या उसके प्रतिनिधि को जता नहीं देता, तो अन्तरक या उसका प्रतिनिधि उस कालावधि के अवसान पर उससे यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह निर्वाचन करे और यदि वह ऐसी अपेक्षा की प्राप्ति के पश्चात् युक्तियुक्त समय के भीतर उसका पालन नहीं करता तो यह समझा जाएगा कि उसने उस अन्तरण की पुष्टि करने का निर्वाचन कर लिया है।

निर्योग्यता की दशा में निर्वाचन उस समय तक मुल्तवी रहेगा, जब तक उस निर्योग्यता का अन्त नहीं हो जाता, या जब तक निर्वाचन किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा नहीं किया जाता।

प्रभावन

36. हकदार व्यक्ति के हित के पर्यवसान पर कालिक संदायों का प्रभाजन-

तत्प्रतिकूल संविदा या स्थानीय प्रथा के अभाव में सब भाटक, वार्षिकियां, पेशन, लाभांश और अन्य कालिक संदाय, जो आय की प्रकृति के हैं, ऐसे संदायों को पाने के लिए हकदार व्यक्ति के हित के अन्तरण पर, जहां तक अन्तरक और अन्तरिती के बीच का संबंध है, दिन प्रतिदिन प्रोद्भवमान और तद्नुकूल प्रभाजनीय, किन्तु वे उनके संदाय के लिए नियत दिनों को संदेय, समझे जाएंगे।

37. विभाजन पर बाध्यता के फायदे का प्रभाजन —

जबकि अंतरण के परिणामस्वरूप सम्पत्ति विभाजित और कई अंशों में धारित है और तदुपरि पूरी सम्पत्ति से सम्बन्धित किसी बाध्यता का फायदा उस सम्पत्ति के एक स्वामी से कई स्वामियों को संक्रान्त हो जाता है, तब तत्संबंधी कर्तव्य का पालन, स्वामियों के बीच कोई तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो, ऐसे स्वामियों में से हर एक के पक्ष में उस अनुपात में किया जाएगा जो सम्पत्ति में उसके अंश मूल्य का है, परन्तु यह तब जब कि कर्तव्य का विभाजन किया जा सकता हो और उस विभाजन से बाध्यता का बोझ सारवान् रूप में बढ़ नहीं जाता, किन्तु यदि कर्तव्य का विभाजन नहीं किया जा सकता अथवा विभाजन बाध्यता के बोझ को सारवान् रूप में बढ़ाता है, तो कर्तव्य पालन कई स्वामियों में ऐसे एक के फायदे के लिए किया जाएगा जिसे वे संयुक्त तौर पर उस प्रयोजन के लिए अभिहित कर दें :

परन्तु कोई भी व्यक्ति, जिस पर बाध्यता का बोझ हो, उसका इस धारा द्वारा उपबन्धित प्रकार से निर्वहन करने में असफलता के लिए उत्तरदायी नहीं होगा। यदि और जब तक उसे विभाजन की युक्तियुक्त सूचना न मिल गई हो ।

इस धारा की कोई भी बात ऐसे पट्टों को, जो कृषि प्रयोजनों के लिए हों, लागू नहीं होगी यदि और जब तक राज्य सरकार उसे उन पट्टों को लागू करने का निदेश शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा न दे दे।

(क).   क किसी गाँव में स्थित ऐसा गृह, जो ड़ को 30 रुपए और एक मोटी भेड़ के परिदान के वार्षिक भाटक पर पट्टे पर दिया हुआ है, ख ग और घ को बेचता है। क्रय मूल्य का ख ने आधा रुपया और ग और घ में से हर एक ने एक चौथाई दिया है। ड़ को उसकी सूचना है अत: वह पन्द्रह रुपए ख को, साढ़े सात रुपए ग को, साढ़े सात रुपए घ को देगा और भेड़ का परिदान ख, ग और घ के संयुक्त निदेश के अनुसार करेगा।

(ख).   उसी दृष्टांत में गाँव का हर एक गृह बाढ़ रोकने के लिए तटबंध में प्रति वर्ष 10 दिन के श्रम का प्रदाय करने के लिए आबद्ध है और ड़ ने अपने पट्टे के निबंधन के तौर पर क के लिए यह काम करने का करार किया था। ख ग और घ में से हर एक अपने गृह की ओर से अलग-अलग 10 दिन तक काम करने की अपेक्षा ड़ से करते हैं। ड़ ऐसे निदेशों के अनुसार जैसा सम्मिलित होकर ख, ग और घ दें, कुल 10 दिन से अधिक काम करने के लिए आबद्ध नहीं हैं।

(ख) स्थावर सम्पत्ति का अन्तरण

38. कुछ परिस्थितियों में ही अन्तरण करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा अन्तरण-

जहाँ कि कोई व्यक्ति जो ऐसी परिस्थितियों में ही, जिनमें प्रकृत्या फेरफार होता रहता है, स्थावर सम्पत्ति का व्ययन करने के लिए प्राधिकृत है, ऐसी परिस्थितियों के वर्तमान होने का अभिकथन करके ऐसी सम्पत्ति को प्रतिफल के लिए अन्तरित करता है वहाँ यदि अन्तरिती ने ऐसी परिस्थितियों में होने का अभिनिश्चय करने के लिए युक्तियुक्त सावधानी बरतने के पश्चात् सद्भावपूर्वक कार्य किया है, तो जहाँ तक एक ओर अन्तरिती का और दूसरी ओर अन्तरक और ऐसे अन्य व्यक्तियों के (यदि कोई हो), जिन पर प्रभाव पड़ा है, बीच का संबंध है, यह समझा जाएगा कि वे परिस्थितियाँ वर्तमान थीं।

दृष्टान्त

हिन्दू विधवा क जिसका पति संपार्शिवक वारिस छोड़ गया है, यह अभिकथित करते हुए कि ऐसे रूप में उसके द्वारा धारित सम्पत्ति उसके भरण-पोषण के लिए अपर्याप्त है, एक खेत को, जो उस सम्पत्ति का भाग है ख को ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो न तो धार्मिक है और न खैराती है, बेचने का करार करती है, ख युक्तियुक्त जाँच के बाद अपना यह समाधान कर लेता है कि क के भरण-पोषण के लिए सम्पत्ति की आय अपर्याप्त है और खेत का विक्रय आवश्यक है, और सद्भावपूर्वक कार्य करते हुए क से खेत खरीद लेता है। जहाँ तक कि एक ओर ख और दूसरी ओर क और संपार्शिवक वारिसों के बीच का संबंध है, यह समझा जाएगा कि उक्त विक्रय की आवश्यकता वर्तमान थी।

39. अन्तरण, जहाँ कि अन्य व्यक्ति भरण-पोषण का हकदार है -

जहाँ कि अन्य व्यक्ति स्थावर सम्पत्ति के लाभों में से भरण-पोषण या अपने अभिवर्धन या विवाह के लिए उपबन्ध पाने का अधिकार रखता है और ऐसी सम्पत्ति अन्तरित की जाती है, वहाँ उस अधिकार को अन्तरिती के विरुद्ध प्रवृत्त कराया जा सकेगा, यदि अन्तरिती को उस अधिकार की सूचना या अन्तरण आनुग्रहिक है, किन्तु उस अन्तरिती के विरुद्ध नहीं जो सप्रतिफल है और जिसे उस अधिकार की सूचना नहीं है, और न उसके हाथ में की वैसी सम्पत्ति के विरुद्ध।

40. भूमि के उपयोग पर निर्बन्धन लगाने वाली बाध्यता का या स्वामित्व से उपाबद्ध-

जहाँ कि अपनी निजी स्थावर सम्पत्ति के अधिक फायदाप्रद उपभोग के लिए किसी अन्य व्यक्ति का किसी दूसरे व्यक्ति की स्थावर सम्पत्ति में के किसी हित या सुखाचार पर अनाश्रित यह अधिकार हो कि वह पश्चात्‌कथित सम्पत्ति का किसी विशिष्ट रीति से उपभोग किए जाने पर अवरोध लगा दे; अथवा

किन्तु हित या सुखाचार की कोटि में आने वाली बाध्यता का बोझ -

जहाँ कि अन्य व्यक्ति ऐसी बाध्यता से फायदा उठाने का हकदार हो, जो संविदा से उद्भूत होता है और स्थावर सम्पत्ति के स्वामित्व से उपाबद्ध है किन्तु जो उसमें हित या सुखाचार की कोटि में नहीं आता;

वहाँ ऐसा अधिकार या बाध्यता ऐसे अन्तरिती के विरुद्ध तो प्रवर्तित की जा सकेगी, जिसको उसकी सूचना है या जो उस सम्पत्ति का, जिस पर तद्द्वारा प्रभाव पड़ा है आनुग्रहिक अन्तरिती है किन्तु उस अन्तरिती के विरुद्ध नहीं जो सप्रतिफल है और जिसे अधिकार या बाध्यता की सूचना नहीं है और न उसके हाथ में की वैसी सम्पत्ति के विरुद्ध।

दृष्टान्त

ख को सुल्तानपुर बेचने की संविदा क करता है। संविदा के प्रवर्तन में होते हुए भी वह सुल्तानपुर को ग को, जिसे संविदा की सूचना है, बेच देता है। ख संविदा को ग के विरुद्ध उसी विस्तार तक प्रवर्तित करा सकेगा जिस तक वह क के विरुद्ध प्रवर्तित करा सकता है।

41. दृश्यमान स्वामी द्वारा अन्तरण -

जहाँ कि स्थावर सम्पत्ति में हितबद्ध व्यक्तियों की अभिव्यक्त या विवक्षित सम्मति से कोई व्यक्ति ऐसी सम्पत्ति का दृश्यमान स्वामी है और उसे प्रतिफलार्थ अन्तरित करता है, वहाँ अन्तरण इस आधार पर शून्यकरणीय नहीं होगा कि अन्तरक वैसा करने के लिए प्राधिकृत नहीं थाः

परन्तु यह तब जब कि अन्तरिती' ने यह अभिनिश्चित करने के लिए कि अन्तरक अन्तरण करने की शक्ति रखता था युक्तियुक्त सावधानी बरतने के पश्चात् सद्भावपूर्वक कार्य किया हो।

42. पूर्वत्तर अन्तरण का प्रतिसंहरण करने का प्राधिकार रखने वाले व्यक्ति द्वारा अन्तरण-

जहाँ कि कोई व्यक्ति किसी स्थावर सम्पत्ति को यह शक्ति आरक्षित रखते हुए अन्तरित करता है कि वह उस अन्तरण का प्रतिसंहरण कर सकेगा और तत्पश्चात् उस सम्पत्ति को किसी अन्य अन्तरिती को प्रतिफलार्थ अन्तरित कर देता है, वहां ऐसा अन्तरण (ऐसी किसी शर्त के अध्यधीन जो उस शक्ति के प्रयोग से बद्ध है) उस पूर्वत्तर अन्तरण के प्रतिसंहरण के रूप में ऐसे अन्तरिती के पक्ष में उस शक्ति के विस्तार तक प्रवृत्त होता है।

दृष्टान्त

ख को क एक गृह पट्टे पर देता है, और यह शक्ति आरक्षित रखता है कि यदि ख उसका ऐसा उपयोग करेगा जिससे उस गृह का मूल्य विनिर्दिष्ट सर्वेक्षक की राय में गिर जाएगा, तो वह पट्टे को प्रतिसंहृत कर देगा। इसके पश्चात् क यह सोचकर कि ऐसा प्रयोग किया गया है, वह उस गृह को पट्टे पर ग को देता है। इसके अध्यधीन कि ख द्वारा किए गए उस गृह के उपयोग के बारे में सर्वेक्षक को यह राय हो कि उस गृह का मूल्य गिर गया है, यह अन्तरण ख के प‌ट्टे के प्रतिसंहरण के रूप में क्रियाशील होता है।

43. अप्राधिकृत व्यक्ति द्वारा अन्तरण, जो अन्तरित सम्पत्ति में पीछे हित अर्जित कर लेता है-

जहाँ कि कोई व्यक्ति कपटपूर्वक या भूलवश यह व्यपदेश करता है कि वह अमुक स्थावर सम्पत्ति को अन्तरित करने के लिए प्राधिकृत है और ऐसी सम्पत्ति को प्रतिफलार्थ अन्तरित करने की प्रव्यंजना करता है, वहाँ ऐसा अन्तरण, अन्तरिती के विकल्प पर किसी भी उस हित पर प्रवृत्त होगा, जिसे अन्तरक ऐसी सम्पत्ति में उतने समय के दौरान कभी भी अर्जित करे जितने समय तक उस अन्तरण की संविदा अस्तित्व में रहती है।

इस धारा की कोई भी बात उक्त विकल्प के अस्तित्व की सूचना न रखने वाले सद्भावपूर्ण सप्रतिफल अन्तरितियों के आधार का ह्रास न करेगी।

दृष्टान्त

क, जो हिन्दू है और अपने पिता ख से पृथक् हो गया है, तीन खेत, क्ष, त्र और ज्ञ यह व्यपदेशन करते हुए ग को बेच देता है, कि क उन्हें अन्तरित करने के लिए प्राधिकृत है। इन खेतों में से ज्ञ खेत क का नहीं है, क्योंकि विभाजन के समय ख ने इसे अपने लिए प्रतिधृत कर लिया था; किन्तु ख के मरने पर वारिस के रूप में ज्ञ को क प्राप्त कर लेता है। ग ने विक्रय संविदा को विखंडित नहीं किया है, इसलिए वह क से अपेक्षा कर सकेगा कि क उसे ज्ञ को परिदत्त करे।

44. एक सह-स्वामी द्वारा अन्तरण -

जहाँ कि स्थावर सम्पत्ति के दो या अधिक सह-स्वामियों में से एक जो ऐसा करने के लिए वैध रूप से सक्षम है, ऐसी सम्पत्ति में का अपना अंश या कोई हित अन्तरित करता है, वहाँ अन्तरिती ऐसे अंश या हित के बारे में और वहाँ तक, जहाँ तक उस अन्तरण को प्रभावशील करने के लिए आवश्यक हो, सम्पत्ति पर संयुक्त कब्जा रखने का, या सम्पत्ति का अन्य सामान्य या भागिक उपभोग करने का और उस सम्पत्ति का विभाजन कराने का अन्तरक का अधिकार अर्जित करता है जो ऐसे अन्तरित अंश या हित पर अन्तरण की तारीख को प्रभाव डालने वाली शर्तों और दायित्वों के अध्यधीन है।

जहाँ कि किसी अविभक्त कुटुम्ब के निवास गृह के किसी अंश का अन्तरिती उस कुटुम्ब का सदस्य नहीं है. वहाँ इस धारा की कोई भी बात, उसे उस गृह पर संयुक्त कब्जा रखने का या कोई दूसरा सामान्य या भागिक उपभोग करने का हकदार करने वाली नहीं समझी जाएगी।

45. प्रतिफलार्थ संयुक्त अन्तरण -

जहाँ कि स्थावर सम्पत्ति दो या अधिक व्यक्तियों को प्रतिफलार्थ अन्तरित की जाती है और ऐसा प्रतिफल किसी ऐसी निधि में से दिया जाता है जो उनकी साझे की है, वहाँ तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में वे ऐसी सम्पत्ति में उन हितों के क्रमशः हकदार होंगे जो उन हितों के यथाशक्य समान होंगे जिनके वे उस निधि में क्रमशः हकदार थे और जहाँ कि ऐसा प्रतिफल उसकी अपनी-अपनी पृथक् निधियों में से दिया जाता है वहाँ कोई तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो वे ऐसी सम्पत्ति में हित के हकदार क्रमशः उसी अनुपात में होंगे जो प्रतिफल के उन अंशों का है जिन्हें उन्होंने क्रमशः दिया था।

इस बात के बारे में साक्ष्य के अभाव में कि उस निधि में वे किसी हित के क्रमशः हकदार थे या उन्होंने क्रमशः कितना अंश दिया था यह उपधारणा की जाएगी कि वे व्यक्ति उस सम्पत्ति में बराबर का हित रखते हैं।

46. सुभिन्न हित रखने वाले व्यक्तियों द्वारा प्रतिफलार्थ अन्तरण-

जहाँ कि स्थावर सम्पत्ति उसमें सुभिन्न हित रखने वाले व्यक्तियों द्वारा प्रतिफलार्थ अन्तरित की जाती है, वहाँ कोई तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो वे अन्तरक, जहाँ कि उस सम्पत्ति में उनके हित बराबर मूल्य के हों, वहाँ प्रतिफल में से बराबर-बराबर अंश और, जहाँ कि ऐसे हित असमान मूल्य के हों, वहाँ अपने-अपने हितों के मूल्य के अनुपात में अंश पाने के हकदार हैं।

 दृष्टान्त

(क) सुल्तानपुर मौजे में क का अंश आधा और ख और ग में से हर एक का एक-चौथाई है। वे इस मौजे के आठवें अंश का लालपुर मौजे में एक चौथाई अंश से विनिमय कर लेते हैं। कोई तत्प्रतिकूल करार नहीं है इसलिए क लालपुर में आठवें अंश का और ख और ग हर एक उस मौजे में सोलहवें अंश का हकदार हैं।

(ख) अतरौली मौजे में क, जो आजीवन हित का, और ख और ग, जो उस मौजे के शेष भाग के हकदार हैं, उस मौजे को 1000 रुपए में बेच देते हैं। क के आजीवन हित का मूल्य 600 रुपए और शेष भाग का मूल्य 400 रुपए अभिनिश्चित किया जाता है। क क्रयधन में से 600 रुपए और ख और ग 400 रुपए पाने के हकदार हैं।

47. सामान्य सम्पत्ति में के अंश का सह-स्वामियों द्वारा अन्तरण -

जहाँ कि स्थावर सम्पत्ति के कई सह-स्वामी उसमें के किसी अंश को यह विनिर्दिष्ट किए बिना अन्तरित करते हैं कि वह अन्तरण उन अन्तरकों के किसी विशिष्ट अंश या अंशों पर प्रभावी होना है वहाँ ऐसा अन्तरण जहाँ तक कि ऐसे अन्तरकों के बीच का संबंध है ऐसे अंशों पर, जहाँ कि वे अंश बराबर थे, वहाँ बरांबर-बराबर और, जहाँ कि वे अंश बराबर नहीं थे वहाँ ऐसे अंशों के विस्तार के अनुपात में प्रभावी होता है।

दृष्टान्त

सुल्तानपुर मौजे में क, जो आठ आने के अंश का स्वामी है, और ख और ग जो, हर एक चार-चार आने के स्वामी हैं, उस मौजे का दो आना अंश यह विनिर्दिष्ट किए बिना घ को अन्तरित कर देते हैं कि उनके विभिन्न अंशों में जिसमें से यह अन्तरण किया गया है। उस अन्तरण को प्रभावी करने के लिए क के अंश में से एक आना अंश, ख और ग के अंशों में से आधा-आधा आना अंश लिया जाएगा।

48. अन्तरण द्वारा सृष्ट अधिकारों की पूर्विकता-

जहाँ कि किसी व्यक्ति द्वारा भिन्न समयों पर अन्तरण द्वारा एक ही स्थावर सम्पत्ति में या पर अधिकार सृष्ट किया जाना तात्पर्थित है और ऐसे अधिकार सब अपने पूरे विस्तार तक एक साथ अस्तित्वयुक्त या प्रयुक्त नहीं हो सकते वहाँ पश्चात् सृष्ट हर एक अधिकार पूर्वतर अन्तरितियों को बाध्य करने वाली कोई विशेष संविदा या आरक्षण न हो तो पूर्व सृष्ट अधिकारों के अध्यधीन रहेगा।

49. बीमा पालिसी के अधीन अन्तरिती का अधिकार-

जहाँ कि स्थावर सम्पत्ति प्रतिफलार्थ अन्तरित की जाती है और अन्तरण की तारीख को ऐसी सम्पत्ति या उसका कोई भाग हानि या नुकसान के लिए, जो अग्नि से हो, बीमाकृत है, वहाँ तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो अन्तरिती ऐसी हानि या नुकसान की दशा में यह अपेक्षा कर सकेगा कि कोई भी धन, जो अन्तरक को उस पालिसी के अधीन वास्तव में प्राप्त होता है या उसका उतना भाग, जितना आवश्यक हो, उस सम्पत्ति के यथापूर्वकरण में लगाया जाए।

50. त्रुटियुक्त हक के अधीन धारक को सद्भावपूर्वक दिया गया भाटक-

किसी भी व्यक्ति पर किसी स्थावर सम्पत्ति के ऐसे भाटकों या लाभों का प्रभार न डाला जा सकेगा जो उसने सद्भावपूर्वक किसी ऐसे व्यक्ति को दे दिए हैं या परिदत्त कर दिए हैं, जिससे उसने ऐसी सम्पत्ति को असद्भावपूर्वक धारित कर रखा था, यद्यपि पीछे यह प्रतीत हो कि वह व्यक्ति, जिसे ऐसा संदाय या परिदान किया गया था, ऐसे भाटकों या लाभों को प्राप्त करने का अधिकार नहीं रखता था।

दृष्टान्त

ख को क एक खेत 50 रुपए भाटक पर देता है और फिर खेत ग को अन्तरित करता है। ख अन्तरण की काई सूचना न रखते हुए सद्भावपूर्वक क को भाटक देता है। ख इस प्रकार दिए गए भाटक से प्रभार्य नहीं है।

51. त्रुटियुक्त हकों के अधीन सद्भावपूर्वक धारकों द्वारा की गयी अभिवृद्धियाँ -

जबकि स्थावर सम्पत्ति का अन्तरिती सद्भावपूर्वक यह विश्वास करते हुए कि उस पर उसका आत्यन्तिक हक है, सम्पत्ति में अभिवृद्धि करता है, किन्तु पीछे बेहत्तर

हक रखने वाले किसी व्यक्ति द्वारा वह उससे बेदखल कर दिया जाता है तब बेदखल करने वाले व्यक्ति से यह अपेक्षा करने का अन्तरिती को अधिकार है कि वह या तो अभिवृद्धि के मूल्य को प्राक्कलित कराए और उसे अन्तरिती को दिलाए या प्रतिभूत कराए अथवा अपने उस हित को, जो उस सम्पत्ति में उसे हो ऐसी अभिवृद्धि के मूल्य को दृष्टि में लाए बिना अन्तरिती को तत्कालीन बाजार भाव पर बेच दे।

जो रकम ऐसी अभिवृद्धि के लिए दी जानी या प्रतिभूत की जानी है वह बेदखली के समय का उसका प्राक्कलित मूल्य होगी।

जबकि अन्तरिती ने उस सम्पत्ति में पूर्वोक्त परिस्थितियों के अधीन ऐसी फसल लगाई या बोई हो, जो उसके वहाँ से बेदखल होने के समय से उगी हुई है, तब वह ऐसी फसलों का और उन्हें एकत्रित करने और ले जाने के लिए सम्पत्ति पर अबाध रूप से आने-जाने का हकदार है।

52. सम्पत्ति-संबंधी वाद के लम्बित रहते हुए सम्पत्ति का अन्तरण -

जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़कर भारत की सीमाओं के अन्दर प्राधिकारवान् या केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी सीमाओं के परे स्थापित किसी न्यायालय में ऐसे वाद या कार्यवाही के लम्बित रहते हुए जो दुस्सधिपूर्ण न हो और जिसमें स्थावर सम्पत्ति का कोई अधिकार प्रत्यक्षतः और विनिर्दिष्टतः प्रश्नगत हो, वह सम्पत्ति उस वाद या कार्यवाही के किसी भी पक्षकार द्वारा उस न्यायालय के प्राधिकार के अधीन और ऐसे निबन्धनों के साथ, जैसे वह अधिरोपित करे, अन्तरित या व्ययनित की जाने के सिवाय ऐसे अन्तरित या अन्यथा व्ययनित नहीं की जा सकती कि उसके किसी अन्य पक्षकार के किसी डिक्री या आदेश के अधीन, जो उसमें दिया जाए, अधिकारों पर प्रभाव पड़े।

स्पष्टीकरण-

किसी वाद या कार्यवाही का लम्बन इस धारा के प्रयोजनों के लिए उस तारीख से प्रारम्भ हुआ समझा जाएगा जिस तारीख को सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय में वह वादपत्र प्रस्तुत किया गया,

या वह कार्यवाही संस्थित की गई और तब तक चलता हुआ समझा जाएगा जब तक उस वाद या कार्यवाही का निपटारा अन्तिम डिक्री या आदेश द्वारा न हो गया हो और ऐसी डिक्री या आदेश को पूरी तुष्टि या उन्मोचन अभिप्राप्त न कर लिया गया हो या तत्समय प्रवृत्त-विधि द्वारा उसके निष्पादन के लिए विहित किसी अवधि के अवसान के कारण वह अनभिप्राप्य न हो गया हो।]

53. कपटपूर्ण अन्तरण -

(1) स्थावर सम्पत्ति का हर एक ऐसा अन्तरण, जो अन्तरक के लेनदारों को विफल करने या उन्हें देरी कराने के आशय से किया गया है, ऐसे किसी भी लेनदार के विकल्प पर शून्यकरणीय होगा जिसे इस प्रकार विफल या देरी कराई गई है।

इस उपधारा की कोई भी बात किसी सद्भावपूर्ण सप्रतिफल अन्तरिती के अधिकारों का हास न करेगी।

इस उपधारा की कोई भी बात दिवाला संबंधी किसी तत्समय प्रवृत्त-विधि पर प्रभाव नहीं डालेगी। वह वाद, जो किसी लेनदार ने (जिस शब्द के अन्तर्गत डिक्रीदार आता है, चाहे उसने अपनी डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन किया हो या नहीं) किसी अन्तरण को इस आधार पर शून्य कराने के लिए संस्थित किया है कि वह अन्तरण, अन्तरक के लेनदारों को विफल करने या उन्हें देरी कराने के आशय से किया गया है, उन सब लेनदारों की ओर से या के फायदे के लिए संस्थित किया जाएगा।

(2) स्थावर सम्पत्ति का हर एक ऐसा अन्तरण, जो पाश्चिक अन्तरिती को कपटवंचित करने के आशय से प्रतिफल के बिना किया गया है, ऐसे अन्तरिती के विकल्प पर शून्यकरणीय होगा।

प्रतिफल के बिना किया गया कोई अन्तरण इस धारा के प्रयोजनों के लिए केवल इस कारण से ही कपटवंचित करने के आशय से किया गया समझा जाएगा कि कोई पाश्चिक अन्तरण प्रतिफलार्थ किया गया था।

53. भागिक पालन-

जहाँ कि कोई व्यक्ति किसी स्थावर सम्पत्ति को प्रतिफलार्थ अन्तरित करने के लिए अपने द्वारा या अपनी ओर से हस्ताक्षरित लेखबद्ध ऐसी संविदा करता है जिससे उस अन्तरण को गठित करने के लिए आवश्यक निबन्धन युक्तियुक्त निश्चय के साथ अभिनिश्चित किए जा सकते हैं;

और अन्तरिती ने संविदा के भागिक पालन में उस सम्पत्ति या उसके किसी भाग का कब्जा ले लिया है या अन्तरिती, जिसका कब्जा पहले से ही है, संविदा के भागिक पालन में अपना कब्जा चालू रखता है और उस संविदा को अग्रसर करने के लिए कार्य कर चुका है;

और अन्तरिती संविदा के अपने भाग का पालन कर चुका है, या पालन करने के लिए रजामन्द है;

वहाँ इस बात के होते हुए भी कि जहाँ कि अन्तरण की कोई लिखत है, वहाँ वह अन्तरण किसी तत्समय-प्रवृत्त-विधि द्वारा उसके लिए विहित रीति से पूरा नहीं किया गया है, अन्तरक या उससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करने वाला कोई व्यक्ति अन्तरिती या उससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध उस सम्पत्ति के विषय में, जिस पर अन्तरिती ने कब्जा ले लिया है या चालू रखा है, कोई भी ऐसा अधिकार, जो उस संविदा के निबन्धनों द्वारा अभिव्यक्त रूप से उपबन्धित अधिकार से भिन्न है, प्रवर्तित कराने से विवर्जित होगाः

परन्तु इस धारा की कोई भी बात ऐसे सप्रतिफल अन्तरिती के अधिकारों पर प्रभाव नहीं डालेगी जिसे उस संविदा या उसके भागिक पालन की कोई सूचना न हो।

 

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