धारा 69 से 83 अध्याय 6 प्रकीर्ण

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 6

प्रकीर्ण

69. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण.-

इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या निकाले गए किसी आदेश के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के किसी अधिकारी या इस अधिनियम के अधीन किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने वाले या किन्हीं कृत्यों का निर्वहन करने वाले या कर्तव्यों का अनुपालन करने वाले किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी।

70. केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों द्वारा नियम बनाते समय अन्तर्राष्ट्रीय कन्वेंशनों का ध्यान रखा जाना.-

इस अधिनियम में जहां कहीं केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार को नियम बनाने के लिए सशक्त किया गया है वहां, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार, इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, नियम बनाते समय स्वापक ओषधि एकल कन्वेंशन, 1961, उक्त कन्वेंशन का संशोधन करने वाले 1972 के प्रोटोकाल और मनःप्रभावी पदार्थ कन्वेंशन, 1971 के उपबंधों का जिसका भारत एक पक्षकार है, और स्वापक ओषधि या मनः प्रभावी पदार्थ से संबंधित किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन के उपबंधों का ध्यान रख सकेगी।

71. व्यसनियों की पहचान, उपचार, आदि के लिए तथा स्वापक ओषधियों और मनः प्रभावी पदार्थों के प्रदाय के लिए केन्द्र स्थापित करने की सरकार की शक्ति. -

2[ (1) सरकार, व्यसनियों की पहचान, उपचार, प्रबंधन, शिक्षा, पश्चात्वर्ती देखरेख, पुनर्वास, सामाजिक पुनः एकीकरण के लिए तथा सरकार के पास रजिस्ट्रीकृत व्यसनियों को और अन्य व्यक्तियों को संबंधित सरकार द्वारा किन्हीं स्वापक ओषधियों या मनःप्रभावी पदार्थों का प्रदाय किए जाने के लिए, जहां ऐसा प्रदाय चिकित्सीय आवश्यकता है, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, उतने केंद्रों को स्थापित कर सकेगी, मान्यता दे सकेगी या अनुमोदित कर सकेगी, जितने वह ठीक समझे।]

(2) सरकार, उपधारा (1) में निर्दिष्ट केन्द्रों की स्थापना, नियुक्ति, अनुरक्षण, रक्षण, प्रबंध और अधीक्षण तथा वहां से स्वापक ओषधियों और मनः प्रभावी पदार्थों के प्रदाय के लिए और ऐसे केन्द्रों में नियोजित व्यक्तियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण, शक्तियों, कर्तव्यों का उपबंध करने के लिए इस अधिनियम से संगत नियम बना सकेगी।

72. सरकार को शोध्य राशियों की वसूली.-

(1) इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या निकाले गए किसी आदेश के किसी उपबंध के अधीन केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार को संदेय कोई अनुज्ञप्ति फीस या किसी प्रकार की कोई अन्य धनराशि की बाबत, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार का ऐसा अधिकारी, जो ऐसी धनराशि के संदाय की अपेक्षा करने के लिए सशक्त है, ऐसे व्यक्ति को, जिससे ऐसी धनराशि वसूलीय या शोध्य है, देय किसी धन में से ऐसी धनराशि की रकम की कटौती कर सकेगा अथवा ऐसी रकम या राशि की वसूली ऐसे व्यक्तियों के माल की कुर्की और विक्रय करके कर सकेगा और यदि उसकी रकम इस प्रकार वसूल नहीं की जाती है तो उसे उस व्यक्ति या उसके प्रतिभू से (यदि कोई हो) इस प्रकार वसूल की जा सकेगी मानो वह भू-राजस्व की बकाया हो।

(2) जब कोई व्यक्ति, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी नियम के अनुपालन में, किसी कार्य के पालन के लिए या किसी कार्य से अपने प्रविरत रहने के लिए (धारा 34 और धारा 39 के अधीन किसी बंधपत्र से भिन्न) कोई बंधपत्र देता है तब ऐसे पालन या प्रविरति के बारे में यह समझा जाएगा कि वह भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 का 9) की धारा 74 के अर्थ में लोक कर्तव्य है; और उसके द्वारा ऐसे बंधपत्र की शर्तों के भंग किए जाने पर, उसमें ऐसे भंग की दशा में संदाय की जाने वाली रकम के रूप में नामित संपूर्ण धनराशि उससे या उसके प्रतिभू से (यदि कोई हो) इस प्रकार वसूल की जा सकेगी मानो वह भू-राजस्व की बकाया हो।

73. अधिकारिता का वर्जन.-

कोई सिविल न्यायालय इस अधिनियम के अधीन या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम के अधीन किसी अधिकारी या प्राधिकारण द्वारा निम्नलिखित किसी विषय पर किए गए किसी विनिश्चय या पारित किसी आदेश के विरुद्ध कोई वाद या कार्यवाही ग्रहण नहीं करेगा, अर्थात् :-

(क) अफीम पोस्त की खेती के लिए किसी अनुज्ञप्ति का विधारण, इंकार या रद्दकरण;

(ख) अफीम की क्वालिटी और उसके गाढ़ेपन के अनुसार तौल, परीक्षा और वर्गीकरण तथा ऐसी परीक्षा के अनुसार मानक कीमत से की गई कोई कटौती या उसमें परिवर्धन :

(ग) ऐसी अफीम का अधिहरण जो किसी भी विजातीय पदार्थ से अपमिश्रित पाई जाए।

74. संक्रमणकालीन उपबंध. -

इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पहले किसी ऐसे विषय के संबंध में, जिसके लिए इस अधिनियम में उपबंध नहीं किया गया है, किन्हीं शक्तियों का प्रयोग या कर्तव्यों का पालन करने वाला सरकार का प्रत्येक अधिकारी या अन्य कर्मचारी, ऐसे प्रारंभ पर, इस अधिनियम के सुसंगत उपबंधों के अधीन, उसी पद पर और उसी पदाभिधान से, जो वह ऐसे प्रारंभ के ठीक पूर्व धारण कर रहा था, नियुक्त किया गया समझा जाएगा।

1[74-क. केन्द्रीय सरकार की निर्देश देने की शक्ति.-

केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों का निष्पादन करने के सम्बन्ध में राज्य सरकार को ऐसे निर्देश दे सकेगी जो वह आवश्यक समझे, और राज्य सरकार ऐसे निर्देशों का पालन करेगी।] (1. अधिनियम क्र० 2 सन् 1989 द्वारा दिनांक 29-5-89 से अंत: स्थापित।)

75. प्रत्यायोजन की शक्ति.-

(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, इस अधिनियम के अधीन अपनी ऐसी शक्तियों और कृत्यों को (नियम बनाने की शक्ति के सिवाय), जो वह आवश्यक और समीचीन समझे, बोर्ड या किसी अन्य प्राधिकारी या स्वापक आयुक्त को प्रत्यायोजित कर सकेगी।

(2) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, इस अधिनियम के अधीन अपनी ऐसी शक्तियों और कृत्यों को (नियम बनाने की शक्ति के सिवाय), जो वह आवश्यक या समीचीन समझे, उस सरकार के किसी प्राधिकारी या किसी अधिकारी को प्रत्यायोजित कर सकेगी।

76. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति.-  

(1) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी।

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :-

(क) वह पद्धति, जिसके द्वारा धारा 2 के खंड (v), खंड (vi), खंड (xiv) और खंड (xv) के प्रयोजनों के लिए द्रव निर्मितियों की दशा में प्रतिशतताओं का परिकलन किया जाएगा:

(ख) उस बंधपत्र का प्ररूप, जो परिशान्ति बनाए रखने के लिए धारा 34 के अधीन निष्पादित किया जाएगा;

(ग) उस बंधपत्र का प्ररूप, जो धारा 39 की उपधारा (1) के अधीन चिकित्सीय उपचार के लिए सिद्धदोष किसी व्यसनी व्यक्ति की निर्मुक्ति के लिए निष्पादित किया जाएगा और वह बंधपत्र, जो उस धारा की उपधारा (2) के अधीन सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् ऐसे सिद्धदोष व्यक्ति द्वारा अपनी निर्मुक्ति के पूर्व निष्पादित किया जाएगा:

1[(गक) वह रीति, जिसमें धारा 50क के अधीन "नियंत्रित परिदान" का जिम्मा लिया जाएगा;] (1. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से अंतःस्थापित।)

(घ) वह प्राधिकारी या व्यक्ति जिसके द्वारा और वह रीति जिससे भारत से बाहर किसी स्थान से प्राप्त दस्तावेज धारा 66 के खंड (ii) के अधीन अधिप्रमाणित किए जाऐंगे;

2[ (घक) वह रीति जिससे और वे शर्तें जिनके अधीन धारा 68छ की उपधारा (2) के अधीन प्रशासक द्वारा संपत्तियों का प्रबंध किया जाएगा; (2. अधिनियम क्र० 2 सन् 1989 द्वारा दिनांक 29-5-89 से अंत: स्थापित।)

(घख) 3[***] ( 3. अधिनियम क्र० 28 सन् 2016 द्वारा दिनांक 1-6-2016 से विलुप्त। पूर्व में खंड (बख) निम्नवत था:-

"(घख) धारा 68ढ की उपधारा (3) के अधीन अपील अधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें "।)

(घग) वे फीसें जिनका संदाय धारा 68ण की उपधारा (6) के अधीन अपील अधिकरण के अभिलेखों और रजिस्ट्ररों के निरीक्षण के लिए या उनके किसी भाग की प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त करने के लिए किया जाएगा;

(घघ) सिविल न्यायालय की शक्तियां जिनका प्रयोग धारा 68द के खंड (च) के अधीन सक्षम प्राधिकारी और अपील अधिकरण द्वारा किया जा सकेगा;

(घङ) इस अधिनियम के अधीन अधिहत सभी वस्तुओं या चीजों का निपटारा ;

(घच) नमूने लेना और ऐसे नमूनों का परीक्षण और विश्लेषण करना;

(घछ) अधिकारियों, भेदियों और अन्य व्यक्तियों को संदत्त किए जाने वाले पुरस्कार;

(ङ) वे शर्तें जिनमें और वह रीति जिससे धारा 73 की उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार के पास रजिस्ट्रीकृत व्यसनियों और अन्य व्यक्तियों को चिकित्सीय आवश्यकता के लिए स्वापक ओषधियों और मनः प्रभावी पदार्थों का प्रदाय किया जा सकेगा।

(च) धारा 71 की उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित केन्द्रों की स्थापना, नियुक्ति, अनुरक्षण, प्रबंध और अधीक्षण तथा ऐसे केन्द्रों में नियोजित व्यक्तियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण, शक्तियां और कर्तव्य;

(छ) धारा 6 की उपधारा (5) के अधीन स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ सलाहकार समिति के अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि, आकस्मिक रिक्तियों को भरने की रीति और उनको संदेय भत्ते तथा वे शर्ते और निर्बंधन, जिनके अधीन रहते हुए कोई गैर सदस्य किसी उपसमिति में नियुक्त किया जा सकेगा;

(ज) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाता है या विहित किया जाए।

77. नियमों और अधिसूचनाओं को संसद् के समक्ष रखा जाना.-

1[ केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और धारा 2 के खंड (viiक), खंड (xi), खंड (xxiiiक), धारा 3, धारा 7क, धारा 9क और धारा 27 के खंड (क) के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना या निकाला गया प्रत्येक आदेश बनाए या निकाले जाने के पश्चात्,] यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगी। यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगी। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए या वह अधिसूचना नहीं निकाली जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगी किन्तु उस नियम या अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। (1. अधिनियम क्र० 9. सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित। )

78. नियम बनाने की राज्य सरकार की शक्ति.-

(1) राज्य सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी।

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :-

(क) वे शर्तें जिनमें और वह रीति जिससे धारा 71 की उपधारा (1) के अधीन राज्य सरकार के पास रजिस्ट्रीकृत व्यसनियों और अन्य व्यक्तियों को चिकित्सीय आवश्यकता के लिए स्वापक ओषधियों और मनः प्रभावी पदार्थों का प्रदाय किया जा सकेगा ;

(ख) धारा 71 की उपधारा (1) के अधीन राज्य सरकार द्वारा स्थापित केन्द्रों की स्थापना, नियुक्ति, अनुरक्षण, प्रबंध और अधीक्षण तथा ऐसे केन्द्रों में नियोजित व्यक्तियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण, शक्तियां और कर्तव्य;

(ग) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए।

(3) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्न उस राज्य के विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा।

79. सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 का लागू होना.-  

स्वापक ओषधियो और मनः प्रभावी पदार्थों के भारत में आयात, भारत से निर्यात और यानातंरणों पर इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन अधिरोपित सभी प्रतिषेध और निर्बंधन सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) द्वारा या उसके अधीन अधिरोपित प्रतिषेध और निर्बंधन समझे जाएंगे और उस अधिनियम के उपबंध तद्नुसार लागू होंगे :

परन्तु जहां किसी बात का किया जाना उस अधिनियम के अधीन और इस अधिनियम के अधीन दंडनीय अपराध है वहाँ उस अधिनियम में या इस धारा में की कोई बात अपराधी को इस अधिनियम के अधीन दंडित किए जाने से निवारित नहीं करेगी।

80. ओषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के लागू होने का वर्जित न होना. -

इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए, गए नियमों के उपबंध ओषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (1940 का 23) या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अतिरिक्त होंगे न कि उसके अल्पीकरण में।

81. राज्य और विशेष विधियों की व्यावृति.-

इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों की कोई बात तत्समय प्रवृत्त किसी ऐसे प्रांतीय अधिनियम की या किसी राज्य विधान-मंडल के ऐसे अधिनियम की अथवा उसके अधीन बनाए गए किसी ऐसे नियम की विधिमान्यता पर प्रभाव नहीं डालेगी जो भारत के भीतर कैनेबिस के पौधे की खेती के लिए अथवा किसी स्वापक ओषधि या मनःप्रभावी पदार्थ के उपयोग या व्यापार पर कोई ऐसा निर्बंधन अधिरोपित करता है या ऐसे किसी दंड का उपबंध करता है जो इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अधिरोपित या उपबंधित नहीं किया गया है अथवा ऐसी निबंधन अधिरोपित करता है या ऐसे दंड के लिए उपबंध करता है जो इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अधिरोपित तत्स्थानी निबंधन या उपबंधित तत्स्थानी दंड से बड़ी कोटि का है।

82. निरसन और व्यावृत्ति.-

(1) अफीम अधिनियम, 1857 (1857 का 13), अफीम अधिनियम, 1878 (1878 का 1) का और अनिष्टकर मादक द्रव्य अधिनियम, 1930 (1930 का 2) इसके द्वारा निरसित किए जाते हैं।

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी यह है कि उपधारा (1) द्वारा निरसित किसी अधिनियमिति के अधीन की गई या किए जाने के तात्पर्यित कोई बात या कार्रवाई, जहां तक वह इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं है, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी।

83. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति. -

(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेशं द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं है और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों :

परन्तु ऐसा कोई आदेश ऐसी तारीख से, जिसको इस अधिनियम को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं निकाला जाएगा।

(2) इस धारा के अधीन निकाला गया प्रत्येक आदेश, निकाले जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाएगा।

 

 

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