धारा 1 से 4 अध्याय 1 (प्रारम्भिक) हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956

1956 का अधिनियम संख्यांक 78 

21 दिसम्बर, 1956 

हिन्दुओं में दत्तक तथा भरण-पोषण से सम्बन्धित विधि को संशोधित और संहिताबद्ध करने के लिए अधिनियम

'भारत गणराज्य के सातवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम और विस्तार -

( 1 ) यह अधिनियम हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956 1. कहा जा सकेगा।

(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है।

2. अधिनियम का लागू होना -

(1) यह अधिनियम लागू है-

(क) ऐसे किसी भी व्यक्ति को जो हिन्दू धर्म के किसी भी रूप में या विकास के अनुसार, जिसके अन्तर्गत वीरशैव लिंगायत, अथवा ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज या आर्य समाज के अनुयायी भी आते हैं, धर्मतः हिन्दू हो;

(ख) ऐसे किसी भी व्यक्ति को जो धर्मतः बौद्ध, जैन या सिक्ख हो; तथा

(ग) ऐसे किसी भी अन्य व्यक्ति को जो धर्मतः मुस्लिम, क्रिश्चियन, पारसी या यहूदी न हो, जब तब कि यह साबित न कर दिया जाए कि यदि यह अधिनियम पारित न किया गया होता तो कोई भी ऐसा व्यक्ति एतस्मिन् उपबन्धित किसी भी बात के बारे में हिन्दू विधि या उस विधि के भागरूप किसी रूढ़ि या प्रथा द्वारा शासित न होता।

स्पष्टीकरण -

निम्नलिखित व्यक्ति धर्मतः यथास्थिति, हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिक्ख हैं :-

(क) कोई भी अपत्य, धर्मज या अधर्मज, जिसके माता-पिता दोनों ही धर्मतः हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिक्ख हों;

(ख) कोई भी अपत्य, धर्मज या अधर्मज, जिसके माता-पिता में से कोई एक धर्मतः हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिक्ख हो और जो उस जन-जाति, समुदाय, समूह या कुटुम्ब के सदस्य के रूप में पला हो जिसका वह माता या पिता सदस्य है या था;

(खख) कोई भी अपत्य, धर्मज या अधर्मज, जो अपने पिता और माता दोनों द्वारा परित्यक्त कर दिया गया हो अथवा जिसकी जनकता ज्ञात न हो, और जो दोनों में से किसी भी दशा में हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिक्ख के रूप में पला हों; तथा

(ग) ऐसा कोई भी व्यक्ति जो हिन्दू, जैन या सिक्ख धर्म में संपरिवर्तित या प्रतिसंपरिवर्तित हो गया हो ।

(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई भी बात किसी ऐसी जनजाति के सदस्यों को, जो संविधान के अनुसार अनुच्छेद 366 के खंड (25) के अर्थ के अन्तर्गत अनुसूचित जनजाति हो, लागू न होगी जब तक कि केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अन्यथा निदिष्ट न कर दे।

1 [ (2क) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम में अंतर्विष्ट कोई बात पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र के रनोंसों को लागू नहीं होगी। ]

(3) इस अधिनियम के किसी भी प्रभाग में आए हुए "हिन्दू" पद का अर्थ ऐसा लगाया जाएगा मानो उसके अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति आता हो जो यद्यपि धर्मतः हिन्दू नहीं है तथापि ऐसा व्यक्ति है जिसे यह अधिनियम इस धारा में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के आधार पर लागू होता है।

3. परिभाषाएँ -

इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) "रूढ़ि" और "प्रथा" पद ऐसे किसी भी नियम का संज्ञान कराते हैं जिसने दीर्घकाल तक निरन्तर और एकरूपता से अनुपालित किए जाने के कारण किसी स्थानीय क्षेत्र, आदिम-जन- जाति समुदाय, समूह या कुटुम्ब के हिन्दुओं में विधि का बल अभिप्राप्त कर लिया हो :

परन्तु यह तब जब कि वह नियम निश्चित हो, और अयुक्तियुक्त या लोकनीति के विरुद्ध न हो : तथा

परन्तु यह और भी कि ऐसे नियम की दशा में जो एक कुटुम्ब को ही लागू हो, उसकी निरन्तरता उस कुटुम्ब द्वारा बन्द न कर दी गई हो;

(ख) 'भरण-पोषण' के अन्तर्गत-

(i) सब दशाओं में भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और चिकित्सीय परिचर्या और इलाज के लिए उपबन्ध आता है;

(ii) अविवाहिता पुत्री की दशा में उसके विवाह के युक्तियुक्त और प्रासंगिक व्यय भी आते हैं;

( ग ) " अप्राप्तवय" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जिसने अपनी अठारह वर्ष की आयु पूरी न की हो।

4. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव -

इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबन्धित के सिवाय -

(क) हिन्दू विधि का कोई ऐसा शास्त्र वाक्य, नियम या निर्वचन या उस विधि की भाग-रूप कोई भी रूढ़ि या प्रथा, जो कि इस अधिनियम के प्रारम्भ होने से अव्यवहित पूर्व प्रवृत्त रही हो, ऐसे किसी भी विषय के बारे में जिसके लिए कि इस अधिनियम में उपबन्ध किया गया है, प्रभावहीन हो जाएगी;

(ख) इस अधिनियम के प्रारम्भ से अव्यवहित पूर्व प्रवृत्त किसी भी अन्य विधि का हिन्दुओं को लागू होना वहां तक बन्द हो जाएगा जहां तक कि वह इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट उपबन्धों में से किसी से भी असंगत हो ।

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