
(1) इस धारा के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि हिन्दू पत्नी, चाहे वह इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् विवाहित हो, अपने जीवनकाल में अपने पति से भरण-पोषण पाने का हकदार होगी ।
(2) हिन्दू पत्नी अपने भरण-पोषण के दावे को समपहृत किए बिना अपने पति से पृथक् रहने के लिए निम्नलिखित किसी भी दशा में हकदार होगी-
(क) यदि उसका पति अभित्यजन, अर्थात् युक्तियुक्त कारण के बिना और उसकी सम्मति के बिना या उसकी इच्छा के विरुद्ध उसका परित्याग करने का या जानबूझकर उसकी उपेक्षा करने का दोषी है;
(ख) यदि उसका पति उसके साथ ऐसी क्रूरता का व्यवहार करे जिससे उसके अपने मन में इस बात की युक्तियुक्त आशंका पैदा हो कि उसके पति के साथ रहना अपहानिकर या क्षतिकारक होगा;
(ग) यदि उसका पति उग्र कुष्ठ से पीड़ित है;
(घ) यदि उसके पति की कोई अन्य पत्नी जीवित है;
(ङ) यदि उसका पति उसी गृह में जिसमें उसकी पत्नी निवास करती है कोई उपपत्नी रखता है या किसी उपपत्नी के साथ अन्य किसी स्थान में अभ्यासतः निवास करता है;
(च) यदि उसका पति कोई अन्य धर्म में संपरिवर्तित होने के कारण हिन्दू नहीं रह गया है; और
(छ) यदि उसके पृथक् होकर रहने का कोई अन्य न्यायोचित कारण है।
(3) यदि कोई हिन्दू पत्नी असती है या किसी अन्य धर्म में संपरिवर्तित होने के कारण हिन्दू नहीं रह गई है तो वह अपने पति से पृथक् निवास करने और भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार नहीं होगी;
(1) कोई हिन्दू पत्नी, चाहे वह इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व या पश्चात् विवाहित हो, अपने पति की मृत्यु के पश्चात् अपने श्वसुर से भरण- पोषण प्राप्त करने की हकदार होगी:
परन्तु यह तब जब कि और उस विस्तार तक जहां तक कि वह स्वयं अपने अर्जन से या अन्य सम्पत्ति से अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो या उस दशा में जहां उसके पास अपनी स्वयं की कोई भी सम्पत्ति नहीं है वह निम्नलिखित में किसी से अपना भरण-पोषण अभिप्राप्त करने में असमर्थ हो-
(क) अपने पति या अपने पिता या माता की सम्पदा से, था
(ख) अपने पुत्र या पुत्री से, यदि कोई हो, या उसकी सम्पदा से ।
(2) यदि श्वसुर के अपने कब्जे में कि ऐसी सहदायिकी सम्पत्ति से, जिसमें से पुत्रवधू को कोई अंश अभिप्राप्त नहीं हुआ है, श्वसुर के लिए ऐसा करना साध्य नहीं है, तो धारा (1) के अधीन किसी बाध्यता क प्रवर्तन नहीं कराया जा सकेगा और ऐसी बाध्यता का पुत्रवधू के पुनर्विवाह पर अन्त हो जायेगा ।
(1) इस धारा के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि कोई हिन्दू अपने जीवनकाल के दौरान अपने धर्मज या अधर्मज अपत्यों और वृद्ध या शिथिलांग जनकों का भरण-पोषण करने के लिए आबद्ध है।
(2) जब तक कि कोई धर्मज या अधर्मज अप्राप्तवय रहे वह अपने पिता या माता से भरण-पोषण पाने के लिए दावा कर सकेगा।
(3) किसी व्यक्ति को अपने वृद्ध या शिथिलांग जनकों का या किसी पुत्री का, जो अविवाहिता हो, भरण-पोषण करने की बाध्यता का विस्तार वहां तक होगा जहां तक कि जनक या अविवाहिता पुत्री, यथास्थिति, स्वयं अपने उपार्जनों या अन्य सम्पत्ति से अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो ।
इस धारा में "जनक" के अन्तर्गत निःसंतान सौतेली माता भी आती है।
21. आश्रितों की परिभाषा - इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए "आश्रितों" से मृतक के निम्नलिखित नातेदार अभिप्रेत हैं-
(i) उसका पिता;
(ii) उसकी माता;
(iii) उसकी विधवा, जब तक कि वह पुनर्विवाह न कर ले;
(iv) उसका पुत्र या उसके पूर्वमृत पुत्र का पुत्र या उसके पूर्वमृत पुत्र का पुत्र जब तक कि वह अप्राप्तवय रहे; परन्तु यह तब जब कि और उस विस्तार तक जहां तक कि वह पौत्र की दशा में अपनी माता या पिता की सम्पदा से और प्रपौत्र की दशा में अपने पिता या माता की या पिता के पिता या पिता की माता की सम्पदा से, भरण-पोषण अभिप्राप्त करने में असमर्थ हो;
(v) उसकी अविवाहिता पुत्री या उसके पूर्वमृत पुत्र की अविवाहिता पुत्री या उसके पूर्वमृत पुत्र के पूर्वमृत पुत्र की अविवाहिता पुत्री जब तक कि वह अविवाहिता रहती है;
परन्तु यह तब जब कि और उस विस्तार तक जहां तक कि वह पौत्री की दशा में अपने पिता या माता की सम्पदा से और प्रपौत्री की दशा में अपने पिता या माता की या पिता के पिता या पिता की माता की सम्पदा से, भरण-पोषण अभिप्राप्त करने में असमर्थ हो;
(vi) उसकी विधवा पुत्री;
परन्तु यह तब जब कि और उस विस्तार तक जहां तक कि वह निम्नलिखित में किसी से अपना भरण-पोषण अभिप्राप्त करने में असमर्थ हो—
(क) अपने पति की सम्पदा से; या
(ख) अपने पुत्र या पुत्री से, यदि कोई हो, या उसकी सम्पदा से; या
(ग) अपने श्वसुर या उसके पिता से, या उन दोनों में से किसी की सम्पदा से;
(vii) अपने पुत्र की या पूर्वमृत पुत्र के पुत्र की कोई विधवा, जब तक कि वह पुनर्विवाह न कर ले; परन्तु यह तब जब कि और उस विस्तार तक जहां तक कि वह अपने पति की सम्पदा से, या अपने पुत्र या पुत्री से, यदि कोई हो, या उसकी सम्पदा से या पौत्र की विधवा की दशा में अपने श्वसुर की सम्पदा से भी भरण-पोषण अभिप्राप्त करने में असमर्थ हो;
(viii) उसका अप्राप्तवय अधर्मज पुत्र, जब तक कि वह अप्राप्तवय रहे;
(ix) उसकी अधर्मज पुत्री, जब तक कि वह अविवाहिता रहे।
(1) उपधारा (2) के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि मृत हिन्दू के वारिस मृतक से विरासत में प्राप्त सम्पदा से मृतक के आश्रितों का भरण-पोषण करने के लिए आबद्ध हैं।
(2) जहां कि किसी आश्रित ने इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् मृत हिन्दू की सम्पदा में कोई अंश वसीयती या निर्वसीयती उत्तराधिकार द्वारा अभिप्राप्त नहीं किया है वहां इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि वह आश्रित उन व्यक्तियों से भरण-पोषण प्राप्त करने का हकदार होगा जो उस सम्पदा को लेते हैं।
(3) जो व्यक्ति सम्पदा लेते हैं उनमें से हर एक का दायित्व अपने द्वारा ली गई सम्पदा के अंश या भाग के मूल्य के अनुपात में होगा ।
(4) उपधारा (2) या उपधारा (3) में किसी बात के अन्तर्विष्ट होते हुए भी, किसी भी व्यक्ति, जो स्वयं एक आश्रित है, अन्यों के भरण-पोषण के लिए अभिदाय करने का दायी न होगा, यदि जो अंश या भाग उसे अभिप्राप्त हुआ हो उसका मूल्य उससे जो उसे भरण-पोषण के रूप में उस अधिनियम के अधीन अधिनिर्णीत हो, कम हो या कम हो जायेगा यदि अभिदाय करने के दायित्व का प्रवर्तन किया जाय।
(1) इस बात को अवधारित करना न्यायालय के विवेकाधिकार में होगा कि क्या कोई भरण-पोषण इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन दिलवाया जाए और यदि दिलवाया जाये तो, कितना और ऐसा करने में न्यायालय यथास्थिति, उपधारा (2) या उपधारा (3) में उपवर्णित बातों को, जहां तक कि वे लागू हैं, सम्यक् रूप से ध्यान में रखेगा।
(2) पत्नी, अपत्यों, वृद्धों या शिथिलांग जनकों को यदि कोई भरण-पोषण की रकम इस अधिनियम के. अधीन दी जानी हो तो उसका अवधारण करने में निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाएगा-
(क) पक्षकारों की स्थिति और प्रास्थिति को
(ख) दावेदार की युक्तियुक्त आवश्यकताओं को;
(ग) यदि दावेदार पृथकतः निवास कर रहा है तो इस बात को कि क्या दावेदार का ऐसा करना न्यायोचित है;
(घ) दावेदार की सम्पत्ति के मूल्य को, और ऐसी सम्पत्ति से या दावेदार के निजी उपार्जनों से या किसी अन्य स्रोत से व्युत्पन्न किसी आय को;
(ङ) इस अधिनियम के अधीन भरण-पोषण के हकदार व्यक्तियों की संख्या को ।
( 3 ) इस अधिनियम के अधीन किसी आश्रित को यदि कोई भरण-पोषण की रकम दी जानी है, तो उस रकम के अवधारण में निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाएगा-
(क) मृतक के ऋणों के संदाय का उपबन्ध करने के पश्चात् उसकी सम्पदा के शुद्ध मूल्य को;
(ख) मृतक की विल के अधीन उस आश्रित के बारे में किए गए उपबन्ध को, यदि कोई हो;
(ग) दोनों के बीच की नातेदारी की डिग्रियों को;
(घ) उस आश्रित की युक्तियुक्त आवश्यकताओं कों;
(ङ) उस आश्रित और मृतक के बीच के भूतपूर्व सम्बन्धों को;
(च) उस आश्रित की सम्पत्ति के मूल्य को और ऐसी सम्पत्ति से, या उस आश्रित के निजी उपाजंन से या किसी अन्य स्रोत से व्युत्पन्न किसी आय को;
(छ) इस अधिनियम के अधीन भरण-पोषण के हकदार आश्रितों की संख्या को ।
कोई भी व्यक्ति यदि वह किसी अन्य धर्म में संपरिवर्तित होने के कारण हिन्दू न रह गया हो तो वह इस अध्याय के अधीन भरण-पोषण का दावा करने का हकदार न होगा।
यदि परिस्थितियों में कोई ऐसी तात्त्विक तब्दीली हो जाए जिससे भरण-पोषण की रकम में परिवर्तन करना न्यायोचित हो तो भरण-पोषण की रकम चाहे वह इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् न्यायालय की डिक्री द्वारा या करार द्वारा निश्चित की गई हो, तत्पश्चात् परिवर्तित की जा सकेगी।
धारा 27 में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि मृतक द्वारा हर प्रकार के संविदाकृत या संदेय ऋणों को उसके अपने आश्रितों के इस अधिनियम के अधीन भरण- पोषण के दावों पर पूर्विकता दी जाएंगी।
इस अधिनियम के अधीन किसी आश्रित का भरण-पोषण का दावा, मृतक की सम्पदा या उसके किसी प्रभाग पर तब के सिवाय भार नहीं होगा जब कि मृतक की विल .. द्वारा, न्यायालय की डिक्री द्वारा, आश्रित और सम्पदा या उसके प्रभाग के स्वामी के बीच के करार द्वारा या अन्यथा ऐसा कोई भार सृष्ट न किया गया हो।
जहां कि आश्रित को किसी सम्पदा में से भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार है और ऐसी सम्पदा या उसका कोई भाग अन्तरित किया जाता है तो यदि अन्तरिती को उस अधिकार की सूचना है या यदि वह अन्तरण आनुग्रहिक है तो भरण-पोषण प्राप्त करने के अधिकार का प्रवर्तन अन्तरिती के विरुद्ध कराया जा सकेगा किन्तु ऐसे अन्तरिती के विरुद्ध नहीं जो सप्रतिफल अन्तरिती है और जिसे उस अधिकार की सूचना नहीं है।