धारा 5 से 17 अध्याय 2 (दत्तक) हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 2

दत्तक

5. दत्तक इस अध्याय द्वारा विनियमित होंगे -

( 1 ) किसी हिन्दू के द्वारा या निमित्त कोई भी दत्तक इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् इस अध्याय में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अनुसार किए जाने के सिवाय नहीं किया जायगा और उक्त उपबन्धों के उल्लंघन में किया गया कोई भी दत्तक शून्य होगा।

(2) किसी ऐसे दत्तक से, जो शून्य है, न तो दत्तक कुटुम्ब में किसी भी व्यक्ति के पक्ष में किसी ऐसे अधिकार का सृजन होगा जिसे वह दत्तक के कारण अर्जित करने के सिवाय अर्जित नहीं कर सकता था और न किसी भी व्यक्ति के वे अधिकार ही नष्ट होंगे जो उसे अपने जन्म के कुटुम्ब में प्राप्त हैं।

6. विधिमान्य दत्तक सम्बन्धी अपेक्षाएं -

कोई भी दत्तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कि -

(i) दत्तक लेने वाला व्यक्ति दत्तक लेने की सामर्थ्य और अधिकार न रखता हो;

(ii) दत्तक देने वाला व्यक्ति ऐसा करने की सामर्थ्य न रखता हो;

(iii) दत्तक व्यक्ति दत्तक में लिए जाने योग्य न हो; और

(iv) दत्तक इस अध्याय में वर्णित अन्य शर्तों के अनुवर्तन में न किया गया हो।

7. हिन्दू पुरुष की दत्तक लेने की सामर्थ्य –

किसी भी हिन्दू पुरुष को जो स्वस्थचित्त हो और अप्राप्तवय न हो यह सामर्थ्य होगी कि वह पुत्र या पुत्री दत्तक ले

परन्तु यदि उसकी पत्नी जीवित हो तो जब तक कि पत्नी पूर्ण और अन्तिम रूप से संसार का त्याग न कर चुकी हो या वह हिन्दू न रह गई हो या सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय ने उसके बारे में यह घोषित न कर दिया हो कि वह विकृत चित्त की है तब तक वह अपनी पत्नी की सम्मति के बिना दत्तक नहीं लेगा।

स्पष्टीकरण -

यदि किसी व्यक्ति की एक से अधिक पत्नियाँ दत्तक के समय जीवित हों तो जब तक कि पूर्ववर्ती परन्तुक में विनिर्दिष्ट कारणों में से किसी के लिए उनमें से किसी की सम्मति अनावश्यक न हो, सब पत्नियों की सम्मति आवश्यक होगी।

8. हिन्दू नारी की दत्तक लेने की सामर्थ्य -

किसी भी हिन्दू नारी को जो स्वस्थचित्त हो और अप्राप्तवय न हो यह सामर्थ्य होगी कि वह पुत्र या पुत्री दत्तक ले:

परन्तु यदि उसका पति जीवित हो तो जब तक कि पति पूर्ण और अन्तिम रूप से संसार त्याग न कर चुका हो या वह हिन्दू न रह गया हो या सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय ने उसके बारे में यह घोषित न कर दिया हो कि वह विकृत चित्त का है तब तक वह अपने पति की सम्मति के बिना दत्तक नहीं लेंगी।]

9. दत्तक देने के लिए सक्षम व्यक्ति –

( 1 ) अपत्य के पिता या माता या संरक्षक के सिवाय कोई व्यक्ति अपत्य को दत्तक देने की सामर्थ्य नहीं रखेगा।

2 [(2) उपधारा (4) के उपबन्धों के अध्यधीन, पिता या माता को, यदि जीवित है, दत्तक में पुत्र या पुत्री को देने का समान अधिकार होगा।.

परन्तु जब तक कि उनमें से एक पूर्ण और अन्तिम रूप से संसार त्याग न कर चुका हो या वह हिन्दू न रह गया हो या सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय ने उसके बारे में यह घोषित न कर दिया हो कि वह विकृत चित्त का है, ऐसा अधिकार उनमें से किसी के द्वारा दूसरे की सम्मति के बिना प्रयोग में नहीं लाया जाएगा।]

( 3 ) 1 [ ***]

(4) जहां माता और पिता दोनों मर चुके हों या पूर्ण और अन्तिम रूप से संसार का त्याग कर चुके हों या अपत्य को त्याग चुके हों या सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय ने उनके बारे में यह घोषित कर दिया हो कि ये विकृत चित्त हैं या जहां कि अपत्य की जनकता ज्ञात न हो, तो उस अपत्य का संरक्षक न्यायालय की पूर्व अनुज्ञा से उस अपत्य को किसी भी व्यक्ति को जिसके अन्तर्गत स्वयं वह संरक्षक भी आता है, दत्तक दे सकेगा।

(5) न्यायालय किसी संरक्षक को उपधारा (4) के अधीन अनुज्ञा देने के पूर्व इस बात को ध्यान में रखकर कि अपत्य की आयु और समझने की शक्ति कितनी है दत्तक दिए जाने के संबंध में अपत्य की इच्छा पर सम्यक् विचार करके अपना इस बारे में समाधान कर लेगा कि दत्तक दिया जाना अपत्य के लिए कल्याणकर होगा या नहीं और यह कि दत्तक देने के प्रतिफलस्वरूप कोई संदाय या इनाम ऐसे किसी संदाय या इनाम के सिवाय, जैसा कि न्यायालय मंजूर करे, अनुज्ञा के लिए आवेदन करने वाले ने न तो प्राप्त किया है और न प्राप्त करने का करार किया है और न किसी भी व्यक्ति के आवेदन करने वाले को किया या दिया है और न ही करने या देने के लिए करार उससे किया है।

स्पष्टीकरण -

इस धारा के प्रयोजनों के लिए-

(i) 'माता" और "पिता" पदों के अन्तर्गत दत्तक माता और दत्तक पिता नहीं आते हैं;

(i-क) " संरक्षक" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जिसकी देखरेख में किसी अपत्य का शरीर या उसका शरीर और सम्पत्ति दोनों हों और इसके अन्तर्गत आते हैं-.

(क) अपत्य के पिता या माता की विल द्वारा नियुक्त संरक्षक; तथा

(ख) किसी न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित संरक्षक; तथा

(ii) "न्यायालय से ऐसा नगर सिविल न्यायालय या जिला न्यायालय अभिप्रेत है जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर दत्तक लिया जाने वाला अपत्य मामूली तौर पर निवास करता है।

10. व्यक्ति जो दत्तक लिए जा सकते हैं—

कोई भी व्यक्ति दत्तक लिए जाने के योग्य न होगा जब तक कि निम्नलिखित शर्तें पूरी न हों, अर्थात्-

(i) वह हिन्दू है;

(ii) वह पहले ही से दत्तक नहीं लिया जा चुका है, या ली जा चुकी है;

(iii) उसका विवाह नहीं हुआ है, तब के सिवाय जब कि पक्षकारों को लागू होने वाली कोई ऐसी रूढ़ि या प्रथा हो जो विवाहित व्यक्तियों का दत्तक लिया जाना अनुज्ञात करती हो;

(iv) उसने पन्द्रह वर्ष की आयु पूरी नहीं की है तब के सिवाय जब कि पक्षकारों को लागू होने वाली कोई ऐसी रूढ़ि या प्रथा हो जो ऐसे व्यक्तियों का, जिन्होंने पन्द्रह वर्ष की आयु पूरी कर ली हो, दत्तक लिया जाना अनुज्ञात करती हो ।

अटलूरी ब्रह्मानन्दम बनाम अन्ने साई बापूजी, ए० आई० आर० 2011 सु० को ० 545 - एक ऐसे व्यक्ति ने जो कि ऐसी रूढ़ि के अन्तर्गत दत्तक में लिया गया था, जिसके अन्तर्गत 15 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति का दत्तक ग्रहण मान्य है, अपने पिता की सम्पत्ति का दावा इस आधार पर किया कि चूँकि उसका पिता निर्वसीयत मर गया था, अतः वह दत्तक संतान होने के कारण उसकी सम्पत्ति का हकदार है। यह भी उल्लिखित था कि दत्तकग्रहण आन्ध्र प्रदेश के कम्मा समुदाय में प्रचलित प्रथा के अनुरूप किया गया था । न्यायालय ने विपरीत प्रभाव की प्रथा के पक्ष में किये गये अधिनियमित अपवाद को दृष्टिगत रखते हुये दत्तक ग्रहण को विधिमान्य घोषित किया।

11. विधिमान्य दत्तक की अन्य शर्तें -

हर दत्तक में निम्नलिखित शर्तें पूरी की जानी होंगी-

(i) यदि पुत्र का दत्तक है तो दत्तक लेने वाले पिता या पाता का, जिनके द्वारा दत्तक लिया जाए, कोई हिन्दू पुत्र, पुत्र का पुत्र या पुत्र के पुत्र का पुत्र (चाहे धर्मज रक्त नातेदारी से हो या दत्तक से ) दत्तक के समय जीवित न हो;

(ii) यदि पुत्री का दत्तक है तो दत्तक लेने वाले पिता या माता की, जिनके द्वारा दत्तक लिया जाए, कोई हिन्दू पुत्री या पुत्र की पुत्री ( चाहे धर्मज रक्त नातेदारी से हो या दत्तक से ) दत्तक के समय जीवित न हो;

(iii) यदि दत्तक किसी पुरुष द्वारा लिया जाना है और दत्तक में लिया जाने वाला व्यक्ति नारी है तो दत्तक पिता दत्तक लिए जाने वाले व्यक्ति से आयु में कम से कम इक्कीस वर्ष बड़ा हो;

(iv) यदि दत्तक किसी नारी द्वारा लिया जाना है और दत्तक लिया जाने वाला व्यक्ति पुरुष है तो दत्तक माता दत्तक लिए जाने वाले व्यक्ति से आयु में कम से कम इक्कीस वर्ष बड़ी हो;

(v) वही अपत्य एक साथ दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा दत्तक नहीं लिया जा सकेगा;

(vi) दत्तक लिया जाने वाला अपत्य सम्पृक्त जनकों या संरक्षक द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन उस अपत्य के कुटुम्ब से जहां वह जन्मा हो अथवा परित्यक्त अपत्य की दशा में या ऐसे अपत्य की दशा में जिसकी जनकता ज्ञात न हो, उस स्थान या कुटुम्ब से जहां वह पला हो, उसका दत्तक लेने वाले कुटुम्ब में उसे अन्तरित करने के आशय से वस्तुतः दिया और लिया जायगा ; परन्तु दत्त होमम् का किया जाना किसी दत्तक की विधिमान्यता के लिए आवश्यक नहीं होगा।

दीन दयाल बनाम संजीव कुमार (ए० आई० आर० 2009 राजस्थान 122 ) के मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा ऐसे दत्तक ग्रहण को अवैध ठहराया गया, जिसमें दत्तक देने वाले अर्थात् प्राकृतिक पिता द्वारा अपने एक मात्र पुत्र को अकारण ही दत्तक में दिया गया, माता दत्तक ग्रहण में पक्षकार नहीं थी तथा दत्तक ग्रहण में लेन-देन के संव्यवहार को साबित नहीं किया जा सका था। विधिमान्य दत्तकग्रहण के लिए एक औपचारिक समारोह में बालक को दत्तक में दिया जाना एवं लिया | जाना आवश्यक है। (जोगिन्दर माझी बनाम जहाजा बलियारसिंह, ए० आई० आर० 2007 उड़ीसा 142 )

12. दत्तक के परिणाम-

दत्तक अपत्य दत्तक की तारीख से अपने दत्तक पिता या माता का अपत्य समस्त प्रयोजनों के लिए समझा जायगा और ऐसी तारीख से यह समझा जाएगा कि उस अपत्य के अपने जन्म के कुटुम्ब के साथ समस्त बन्धन टूट गए हैं और उनका स्थान उन बन्धनों ने ले लिया है जो दत्तक कुटुम्ब में दत्तक के कारण सृजित हुए हों;

परन्तु —

(क) वह अपत्य किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह नहीं कर सकेगा जिससे कि यदि वह अपने जन्म के

कुटुम्ब में ही बना रहा होता तो वह विवाह न कर सकता था;

(ख) कोई भी सम्पत्ति जो दत्तक अपत्य में दत्तक के पूर्व निहित थी, ऐसी सम्पत्ति के स्वामित्व से संलग्न बाध्यताओं के, यदि कोई हों, अध्यधीन, जिनके अन्तर्गत उसके जन्म के कुटुम्ब में के, नातेदारों का भरण-पोषण करने की बाध्यता भी आती है, ऐसे व्यक्ति में निहित बनी रहेगी;

(ग) दत्तक अपत्य किसी व्यक्ति को उस सम्पदा से निर्निहित नहीं करेगा जो उस व्यक्ति में दत्तक के पूर्व निहित हो गई हो।

13. दत्तक जनकों का अपनी सम्पत्तियों के व्ययन का अधिकार -

तत्प्रतिकूल करार के अध्यधीन यह है कि कोई दत्तक किसी दत्तक पिता या माता को अपनी सम्पत्ति जीवाभ्यन्तर अन्तरण द्वारा या विल द्वारा व्ययनित करने की शक्ति से वंचित नहीं करता ।

14. कुछ दशाओं में दत्तक माता का अवधारण -

( 1 ) जहां कोई हिन्दू, जिसकी पत्नी जीवित है, किसी अपत्य को दत्तक लेता है वहां वह दत्तक माता समझी जाएगी।

(2) जहां दत्तक एक से अधिक पत्नियों की सम्मति से किया गया है वहां उनमें से सबसे पूर्व विवाहिता दत्तक माता समझी जाएगी और अन्य सौतेली माताएं समझी जाएंगी।

(3) जहां कोई विधुर या कुंवारा किसी अपत्य को दत्तक लेता है वहां ऐसी कोई पत्नी, जिससे वह तत्पश्चात् विवाह करे, दत्तक अपत्य की सौतेली माता समझी जाएगी।

(4) जहां कोई विधवा या अविवाहिता नारी किसी अपत्य को दत्तक लेती है वहां कोई पति, जिससे वह तत्पश्चात् विवाह करे, दत्तक अपत्य का सौतेला पिता समझा जाएगा।

15. विधिमान्य दत्तक रद्द किया जाएगा -

कोई भी दत्तक जो विधिमान्यतः किया गया है, दत्तक पिता या माता द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा रद्द न किया जा सकेगा और न दत्तक अपत्य अपनी ऐसी हैसियत का त्याग कर सकेगा और न वह अपने कुटुम्ब में वापस जा सकेगा।

16. दत्तक से सम्बन्धित रजिस्ट्रीकृत दस्तावेजों के बारे में उपधारणा -

जब कभी भी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई ऐसी दस्तावेज जिसमें किसी किए गए दत्तक का अभिलिखित होना तात्पर्यित हो और जो अपत्य को दत्तक देने और लेने वाले व्यक्तियों द्वारा हस्ताक्षरित हो, किसी न्यायालय के समक्ष पेश किया जाए तब जब तक कि और यदि उसे नासाबित न कर दिया जाए वह न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि वह दत्तक इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुपालन में किया गया है।

17. कुछ संदायों का प्रतिषेध -

( 1 ) किसी व्यक्ति के दत्तक के प्रतिफलस्वरूप कोई भी संदाय या अन्य इनाम न तो प्राप्त करेगा और न प्राप्त करने के लिए, करार करेगा और न ही कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को कोई ऐसा संदाय करेगा या इनाम देगा या करने या देने के लिए करार करेगा जिसका प्राप्त करना इस धारा द्वारा प्रतिषिद्ध है।

(2) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा तो वह ऐसे कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, या दोनों से दंडनीय होगा।

(3) इस धारा के अधीन कोई भी अभियोजन राज्य सरकार की या राज्य सरकार द्वारा तन्निमित्त प्राधिकृत किसी आफिसर की पूर्व मंजूरी के बिना संस्थित नहीं किया जाएगा।

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