
(1) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निम्नलिखित अपराधों के विचारण के लिये इतने विशेष न्यायाधीश नियुक्त कर सकेगी, जितने ऐसे क्षेत्र या क्षेत्रों के लिये या ऐसे मामलों या मामलों के समूह के लिये जो आवश्यक हों, अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किये जाएं, अर्थात् :-
(क) इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय कोई अपराध; और
(ख) खण्ड (क) में विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी को करने के लिये षड्यंत्र करने या करने का प्रयत्न या कोई दुष्प्रेरण।
(2) कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन विशेष न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिये तब तक अर्हित नहीं होगा, जब तक कि वह दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) के अधीन सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश या सहायक सेशन न्यायाधीश नहीं है या नहीं रहा है।
(1) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, धारा 3 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अपराध विशेष न्यायाधीश द्वारा ही विचारणीय होंगे।
(2) धारा 3 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अपराध उस क्षेत्र के विशेष न्यायाधीश द्वारा जिसमें वह अपराध किया गया है या जहां ऐसे क्षेत्र के लिये एक से अधिक विशेष न्यायाधीश है वहां उनमें से ऐसे न्यायाधीश द्वारा जो इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाएगा उस मामले के लिए नियुक्त किये गये विशेष न्यायाधीशों द्वारा विचारणीय होगा।
(3) किसी मामले का विचारण करते समय विशेष न्यायाधीश धारा 3 में विनिर्दिष्ट किसी अपराध से भिन्न, किसी ऐसे अन्य अपराध का भी विचारण कर सकती है जिससे अभियुक्त दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023)के अधीन, उसी विचारण में आरोपित किया जा सकता है।
1[(4) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023)में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी अपराध के लिए विचारण, यथासाध्य रूप से दैनिक आधार पर किया जाएगा और यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा कि उक्त विचारण दो वर्ष की अवधि के भीतर पूरा कर दिया जाता है :
परंतु जहां विचारण उक्त अवधि के भीतर पूरा नहीं हो पाता है, वहां विशेष न्यायाधीश ऐसा न होने पाने के कारणों को लेखबद्ध करेगा :
परंतु यह और कि उक्त अवधि को, लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से, एक समय में छह मास से अनधिक आगे और अवधि के लिए विस्तारित किया जा सकेगा; तथापि उक्त अवधि, विस्तारित अवधि सहित सामान्य रूप से कुल मिलाकर चार वर्ष से अधिक नहीं होगी।]
(1. अधिनियम क्रमांक 16 सन् 2018 द्वारा दिनांक 26-7-2018 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व उपधारा (4) निम्नवत थी:-
"(4) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी. विशेष न्यायाधीश, अपराध का विचारण यावतशक्य, दिन प्रतिदिन के आधार पर करेगा )
(1) विशेष न्यायाधीश अभियुक्त के विचारणार्थ सुपुर्द किये गये बिना भी अपराध का संज्ञान कर सकता है, और वह अभियुक्त व्यक्ति के विचारण में दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) में मजिस्ट्रेटों द्वारा वारन्ट के मामलों के लिये विहित प्रक्रिया का अनुसरण करेगा।
(2) विशेष न्यायाधीश किसी ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य प्राप्त करने की दृष्टि से जिसका प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः किसी अपराध से संपृक्त होना या संसर्गी होना अनुमति है, विशेष न्यायाधीश ऐसे व्यक्ति और प्रत्येक अन्य संपृक्त व्यक्ति को, चाहे वह उस अपराध के किये जाने में मुख्य रहा हो या दुष्प्रेरक रहा हो उसके अपराध से संबंधित अपनी जानकारी की सभी परिस्थितियों का पूर्ण और सत्य प्रकटन करने की शर्त पर क्षमा प्रदान कर सकता है और इस प्रकार दी गई क्षमा दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 308 की उपधारा (1) से (5) के(भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) की धारा 345 की उपधारा (1) से (5) प्रयोजनों के लिये दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 307 के अधीन प्रदत्त की गई समझी जाएगी।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में यथा उपबन्धित के सिवाय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध जहां तक वे इस अधिनियम से असंगत नहीं हैं, विशेष न्यायाधीश के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होंगे; और उक्त उपबन्धों के प्रयोजनार्थ, विशेष न्यायाधीश, का न्यायालय सेशन न्यायालय समझा जाएगा और विशेष न्यायाधीश के समक्ष अभियोजन का संचालन करने वाला व्यक्ति लोक अभियोजक समझा जाएगा।
(4) विशिष्टतया, और उपधारा (3) में अन्तर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 359 और धारा 475 के उपपबंध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) की धारा 400 और धारा 490 के उपपबंध, जहां तक हो सके विशेष न्यायाधीश के समक्ष कार्यवाही को लागू होंगे, और उक्त उपबन्धों के प्रयोजनार्थ विशेष न्यायाधीश मजिस्ट्रेट समझा जाएगा।
(5) विशेष न्यायाधीश उसके द्वारा दोषसिद्ध व्यक्ति को कोई भी दण्डादेश दे सकता है जो उस अपराध के लिए जिसके लिए ऐसे व्यक्ति दोषसिद्ध हैं, विधि द्वारा प्राधिकृत है।
(6) इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय अपराधों का विचारण करते समय विशेष न्यायाधीश दण्ड विधि संशोधन अध्यादेश, 1944 (1944 का अध्यादेश संख्यांक 38) के अधीन जिला न्यायाधीश द्वारा प्रयोक्तव्य सभी सिविल शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग करेगा।
(1) जहां कोई विशेष न्यायाधीश धारा 3 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट ऐसे अपराध का विचारण करता है जो आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (1955 का 10) की धारा 12क की उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी विशेष आदेश, या उस धारा की उपधारा (2) के खण्ड (क) में निर्दिष्ट आदेश के उल्लंघन की बाबत किसी लोक सेवक द्वारा किया जाना अभिकथित है, वहां इस अधिनियम की धारा 5 की उपधारा (1) में या दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 260 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 धारा 285) में किसी बात के होते हुए भी, विशेष न्यायाधीश अपराध का संक्षिप्त रूप में विचारण करेगा, और उक्त संहिता की धारा 262 से धारा 265 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 धारा 285 से धारा 288) (जिसमें ये दोनों धाराएं सम्मिलित हैं) के उपबंध, यथाशक्य ऐसे विचारण को लागू होंगे :
परन्तु इस धारा के अधीन किसी संक्षिप्त विचारण में किसी दोषसिद्धि की दशा में विशेष न्यायाधीश के लिए एक वर्ष से अनधिक की अवधि के कारावास का दण्डादेश पारित करना विधिपूर्ण होगा:
परन्तु यह और कि इस धारा के अधीन जब किसी संक्षिप्त विचारण के प्रारम्भ पर या उसके अनुक्रम में, विशेष न्यायाधीश को यह प्रतीत होता है कि मामले की प्रकृति ऐसी है कि एक वर्ष से अधिक के कारावास का दण्डादेश पारित करना पड़ सकता है या, किसी अन्य कारण से, मामले का संक्षिप्त रूप से विचारण करना अवांछनीय है तब विशेष न्यायाधीश, पक्षकारों की सुनवाई के पश्चात्, उस आशय का एक आदेश लेखबद्ध करेगा और उसके पश्चात् किसी साक्षी को जिसकी परीक्षा हो चुकी हो पुनः बुलाएगा और मजिस्ट्रेट द्वारा वारन्ट के मामले के विचारण के लिए उक्त संहिता द्वारा विहित प्रक्रिया के अनुसार मामले की सुनवाई या पुनः सुनवाई की कार्यवाही करेगा।
(2) इस अधिनियम या दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण किए गए किसी मामले में, जिसमें विशेष न्यायाधीश एक मास से अनधिक के कारावास का और दो हजार रुपये से अनधिक के जुर्माने का दण्डादेश पारित करता है, चाहे उक्त संहिता की धारा 452 के अधीन ऐसे दण्डादेश के अतिरिक्त कोई आदेश पारित किया जाता हो, या नहीं, किसी दोषसिद्ध व्यक्ति द्वारा कोई अपील नहीं की जाएगी, जहां विशेष न्यायाधीश द्वारा उपरोक्त परिसीमाओं से अधिक कोई दण्डादेश पारित किया जाता है, वहां अपील होगी।