धारा 19 से 31 अध्याय 5 अभियोजन के लिए मंजूरी और अन्य प्रकीर्ण उपबन्ध

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अध्याय 5

अभियोजन के लिए मंजूरी और अन्य प्रकीर्ण उपबन्ध

19. अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी का आवश्यक होना. -

(1) कोई न्यायालय 2[ धारा 7, धारा 11, धारा 13 और धारा 15] के अधीन दण्डनीय किसी ऐसे अपराध का संज्ञान, जिसकी बाबत यह अभिकथित है कि वह लोक सेवक द्वारा किया गया है, निम्नलिखित की 3[ लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (क्रमांक 1 सन् 2014) में यथा अन्यथा उपबंधित के सिवाय पूर्व मंजूरी के बिना नहीं करेगा-

(2. अधिनियम क्रमांक 16 सन् 2018 द्वारा दिनांक 26-7-2018 से "धारा 7, धारा 10, धारा 11, धारा 13 और धारा 15" शब्दों और अंकों के स्थान पर प्रतिस्थापित।

3. अधिनियम क्रमांक 1 सन् 2014 द्वारा दिनांक 16-1-2014 से अंतःस्थापित। )

() ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो संघ के मामलों के संबंध में, 4[यथास्थिति, नियोजित है या अभिकथित अपराध के किए जाने के समय नियोजित था ] और जो अपने पद से केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसकी मंजूरी से हटाये जाने के सिवाय नहीं हटाया जा सकता है, केन्द्र सरकार ;

() ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो राज्य के मामलों के सम्बन्ध में 4[यथास्थिति, नियोजित है या अभिकथित अपराध के किए जाने के समय नियोजित था ] और जो अपने पद से राज्य सरकार द्वारा या उसकी मंजूरी से हटाये जाने के सिवाय नहीं हटाया जा सकता है, केन्द्र सरकार; ( 4.अधिनियम क्रमांक 16 सन् 2018 द्वारा दिनांक 26-7-2018 से "नियोजित है," शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।)

() किसी अन्य व्यक्ति की दशा में, उसे उसके पद से हटाने के लिये, सक्षम प्राधिकारीः

1[ परन्तु किसी पुलिस अधिकारी या किसी अन्वेषक अभिकरण के किसी अधिकारी या अन्य विधि प्रवर्तन प्राधिकारी से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा इस उपधारा में विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी अपराध का न्यायालय द्वारा संज्ञान लिए जाने के लिए ऐसी सरकार या ऐसे प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी के लिए, यथास्थिति, समुचित सरकार या सक्षम प्राधिकारी को कोई अनुरोध तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि, -

(1. अधिनियम क्रमांक 16 सन् 2018 द्वारा दिनांक 26-7-2018 से अंतः स्थापित ।)

(i) ऐसे व्यक्ति ने ऐसे अभिकथित अपराधों के बारे में, जिनके लिए लोक सेवक को अभियोजित किए जाने की ईप्सा की गई है, किसी सक्षम न्यायालय में कोई परिवाद फाइल किया हो; और

(ii) न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 203 के अधीन (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 226)  परिवाद खारिज कर दिया हो और परिवादी को लोक सेवक के विरुद्ध अभियोजन के लिए आगे कार्रवाई करने के लिए मंजूरी अभिप्राप्त करने का निदेश दे दिया हो :

परंतु यह और कि किसी पुलिस अधिकारी या किसी अन्वेषक अभिकरण के किसी अधिकारी या अन्य विधि प्रवर्तन प्राधिकारी से भिन्न व्यक्ति से अनुरोध प्राप्त होने की दशा में, समुचित सरकार या सक्षम प्राधिकारी, संबद्ध लोक सेवक को सुने जाने का अवसर प्रदान किए बिना किसी लोक सेवक को अभियोजित करने के लिए मंजूरी नहीं देगा:

परंतु समुचित सरकार या कोई सक्षम प्राधिकारी, इस उपधारा के अधीन किसी लोक सेवक के अभियोजन के लिए मंजूरी मंजूरी की की अपेक्षा करने वाले प्रस्ताव की प्राप्ति के पश्चात् उसकी प्राप्ति की तारीख से तीन मास की अवधि के भीतर उस प्रस्ताव पर अपना विनिश्चय देने का प्रयास करेगा:

परंतु यह और कि उस दशा में जहां अभियोजन हेतु मंजूरी प्रदान करने के प्रयोजन के लिए कोई विधिक परामर्श अपेक्षित है, वहां ऐसी अवधि को लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से एक मास की और अवधि के लिए विस्तारित किया जा सकेगा :

परंतु यह भी कि केन्द्रीय सरकार किसी लोक सेवक के अभियोजन हेतु मंजूरी देने के प्रयोजन के लिए ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांत विहित कर सकेगी, जो वह आवश्यक समझे।

स्पष्टीकरण.-  

उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, "लोकसेवक" पद में निम्नलिखित व्यक्ति सम्मिलित हैं-

() ऐसा व्यक्ति, जिसने उस अवधि के दौरान, जिसमें अभिकथित रूप से अपराध किया गया है, पदधारण करना बंद कर दिया था; या

() ऐसा व्यक्ति, जिसने उस अवधि के दौरान, जिसमें अभिकथित रूप से अपराध किया गया है, पदधारणा करना बंद कर दिया था और वह उस पद से भिन्न कोई अन्य पद धारण कर रहा था, जब अभिकथित रूप से अपराध किया गया है।]

(2) जहां किसी भी कारणवश इस बाबत् शंका उत्पन्न हो जाए कि उपधारा (1) के अधीन अपेक्षित पूर्व मंजूरी केन्द्रीय या राज्य या किसी अन्य प्राधिकारी में से किसके द्वारा दी जानी चाहिये वहां ऐसी मंजूरी उस सरकार या प्राधिकारी द्वारा दी जाएगी जो लोक सेवक को उसके पद से उस समय हटाने के लिए सक्षम था जिस समय अपराध का किया जाना अभिकथित है।

(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023)में किसी बात के होते हुये भी, -

() विशेष न्यायाधीश द्वारा पारित कोई निष्कर्ष, दण्डादेश या आदेश किसी न्यायालय द्वारा अपील, पुष्टिकरण या पुनरीक्षण में, अभियोजन के लिए उपधारा (1) के अधीन अपेक्षित मंजूरी के होने या उसमें कोई त्रुटि, लोप या अनियमितता होने के आधार पर तब तक नहीं उलटा या परिवर्तित किया जाएगा जब तक कि न्यायालय की राय में उसके कारण वास्तव में कोई अन्याय हुआ है;

() कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों को किसी प्राधिकारी द्वारा दी गई मंजूरी में किसी त्रुटि, लोप या अनियमितता के आधार पर तब तक नहीं रोकेगा जब तक उसका यह समाधान नहीं हो जाता कि ऐसी त्रुटि, लोप या अनियमितता के परिणामस्वरूप अन्याय हुआ है;

() कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अन्य आधार पर कार्यवाहियां नहीं रोकेगा और कोई न्यायालय किसी जांच, विचारण, अपील या अन्य कार्यवाही में पारित किसी अन्तर्वती आदेश के संबंध में पुनरीक्षण की शक्तियों का प्रयोग नहीं करेगा।

(4) उपधारा (3) के अधीन यह अवधारित करने में कि ऐसी मंजूरी के होने से या उसमें किसी त्रुटि, लोप या अनियमितता के होने से कोई अन्याय हुआ या परिणामित हुआ है या नहीं, न्यायालय इस तथ्य को ध्यान में रखेगा कि क्या कार्यवाहियों के किसी पूर्वतर प्रक्रम पर आक्षेप किया जा सकता था और किया जाना चाहिये था या नहीं।

स्पष्टीकरण. -

इस धारा के प्रयोजनों के लिये, -

() त्रुटि के अन्तर्गत मंजूरी देने वाले प्राधिकारी की सक्षमता भी है;

() अभियोजन के लिए अपेक्षित मंजूरी के अन्तर्गत इस अपेक्षा के प्रति निर्देश भी है कि अभियोजन किसी विनिर्दिष्ट प्राधिकारी की ओर से, या किसी विनिर्दिष्ट व्यक्ति की मंजूरी से होगा या समतुल्य प्रकृति की कोई अपेक्षा भी है।

1[20. जहां लोक सेवक असम्यक् लाभ प्रतिगृहीत करता है वहां उपधारणा. -

जहां धारा 7 के अधीन या धारा 11 के अधीन दंडनीय किसी अपराध के विचारण में यह साबित कर दिया जाता है कि किसी अपराध के अभियुक्त लोक सेवक ने किसी व्यक्ति से कोई असम्यक् लाभ अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए प्रतिगृहीत या अभिप्राप्त किया है या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न किया है, वहां जब तक प्रतिकूल साबित कर दिया जाए यह उपधारणा की जाएगी कि उसने, यथास्थिति या तो स्वयं या किसी अन्य लोकसेवक के द्वारा किसी लोक कर्तव्य को अनुचित रूप से या बेईमानी से निष्पादित करने या निष्पादित करवाने के लिए धारा 7 के अधीन हेतु या इनाम के रूप में उस असम्यक् लाभ को, बिना किसी प्रतिफल के या किसी ऐसे प्रतिफल के लिए, जिसके बारे वह यह जानता है कि वह धारा 11 के अधीन अपर्याप्त है, प्रतिगृहीत या अभिप्राप्त किया है या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न किया है।]


 

(1. अधिनियम क्रमांक 16 सन् 2018 द्वारा दिनांक 26-7-2018 से प्रतिस्थापित। प्रतिस्थापन से पूर्व धारा 20 निम्नवत थी :-

"20. जहां लोक सेवक वैध पारिश्रमिक से भिन्न परितोषण प्रतिगृहीत करता है, वहां उपधारणा. - (1) जहां धारा 7 या धारा 11 या धारा 13 की उपधारा (1) के खण्ड () या खण्ड () के अधीन दण्डनीय अपराध के किसी विचारण में यह साबित कर दिया जाता है कि अभियुक्त व्यक्ति ने किसी व्यक्ति से (वैध पारिश्रमिक से भिन्न) कोई पारितोषण या कोई मूल्यवान चीज अपने लिये या किसी अन्य व्यक्ति के लिए प्रतिगृहीत या अभिप्राप्त की है अथवा प्रतिगृहीत करने के लिए सहमति दी है या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न किया है वहां जब तक प्रतिकूल साबित कर दिया जाये यह उपधारणा की जाएगी कि उसने, यथास्थिति, उस परितोषण या मूल्यवान चीज को ऐसे हेतु या इनाम के रूप में, जैसा धारा 7 में वर्णित है, या यथास्थिति, प्रतिफल के बिना या ऐसे प्रतिफल के लिए, जिसका अपर्याप्त होना यह जानता है, प्रतिगृहीत या अभिप्राप्त किया है अथवा प्रतिगृहीत करने के लिए सहमत हुआ है या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न किया है।

(2) जहां धारा 12 के अधीन या धारा 14 के खण्ड () के अधीन दण्डनीय अपराध के किसी विचारण में यह साबित कर दिया जाता है कि अभियुक्त व्यक्ति ने (वैध पारिश्रमिक से भिन्न) कोई परितोषण या कोई मूल्यवान चीज दी है या देने की प्रस्थापना की है, या देने का प्रयत्न किया है, वहां जब तक प्रतिकूल साबित कर दिया जाये यह उपधारणा की जाएगी कि उसने, यथास्थिति, उस परितोषण या मूल्यवान चीज को ऐसे हेतु या इनाम के रूप में, जैसा धारा 7 में वर्णित है, या यथास्थिति, प्रतिफल के बिना या ऐसे प्रतिफल के लिए, जिसका अपर्याप्त होना वह जानता हो, दिया है या देने की प्रस्थापना की है या देने का प्रयन्त किया है।

(3) उपधारा (1) और (2) में किसी बात के होते हुये भी न्यायालय उक्त उपधाराओं में से किसी में निर्दिष्ट उपधारणा करने से इंकार कर सकेगा यदि पूर्वोक्त परितोषण या चीज, उसकी राय में, इतनी तुच्छ है कि भ्रष्टाचार का कोई निष्कर्ष उचित रूप से नहीं निकाला जा सकता।")

21. अभियुक्त व्यक्ति का सक्षम साक्षी होना.-  

इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय अपराध से आरोपित कोई व्यक्ति प्रतिरक्षा पक्ष के लिये सक्षम साक्षी होगा और वह अपने विरुद्ध या उसी विचारण में अपने साथ आरोपित किसी व्यक्ति के विरुद्ध किये गये आरोपों को साबित करने के लिये शपथ पर साक्ष्य दे सकेगा :

परन्तु -

() साक्षी के रूप में वह अपनी प्रार्थना पर के सिवाय आहूत नहीं किया जाएगा;

() साक्ष्य देने में उसकी असफलता पर अभियोजन पक्ष कोई टीका-टिप्पणी नहीं करेगा अथवा इससे उसके या उसी विचारण में उसके साथ आरोपित किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई उपधारणा उत्पन्न नहीं होगी;

() कोई ऐसा प्रश्न जिसकी प्रकृति यह दर्शित करने की है कि जिस अपराध का आरोप उस पर लगाया गया है उससे भिन्न अपराध उसने किया है यदि वह उसके लिये सिद्धदोष हो चुका है, या वह बुरे चरित्र का है, उससे उस दशा में के सिवाय पूछा जाएगा या पूछे जाने पर उसका उत्तर देने की उससे अपेक्षा नहीं की जाएगी जिसमें-

(i) इस बात का सबूत कि उसने ऐसा अपराध किया है या उसके लिये वह सिद्धदोष हो चुका है, यह दर्शित करने के लिये ग्राह्य साक्ष्य है कि वह उस अपराध का दोषी है जिसका आरोप उस पर लगाया गया है; या

(ii) उसने स्वयं या अपने प्लीडर द्वारा अभियोजन पक्ष के किसी साक्षी से अपना अच्छा चरित्र सिद्ध करने की दृष्टि से कोई प्रश्न पूछा है या अपने अच्छे चरित्र का साक्ष्य दिया है अथवा प्रतिरक्षा का स्वरूप या संचालन इस प्रकार का है कि उसमें अभियोजक के या अभियोजन पक्ष के लिए किसी साक्षी के चरित्र पर लांछन अंतर्गत है; या

(iii) उसने उसी अपराध से आरोपित किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध साक्ष्य दिया है।

22. दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023)  का कुछ उपान्तरणों के अध्यधीन लागू होना. -

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) के उपबन्ध, इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के संबंध में किसी कार्यवाही पर लागू होने में ऐसे प्रभावी होंगे मानो-

(क) धारा 243 की उपधारा (1) में "तब अभियुक्त से अपेक्षा की जाएगी" शब्दों के स्थान पर "तब अभियुक्त से अपेक्षा की जाएगी कि वह तुरन्त या इतने समय के भीतर जितना न्यायालय अनुज्ञात करे, उन व्यक्तियों की (यदि कोई हों) जिनकी वह अपने साक्षियों के रूप में परीक्षा करना चाहता है और उन दस्तावेजों की (यदि कोई हों) जिन पर वह निर्भर करना चाहता है, एक लिखित सूची दे, और तब उससे अपेक्षा की जाएगी" शब्द प्रतिस्थापित कर दिये गए हों;

(ख) धारा 309 की उपधारा (1) में, तीसरे परन्तुक के पश्चात्, निम्नलिखित परन्तुक अन्तः स्थापित किया गया था, अर्थात् :-

"परन्तु यह और कि कार्यवाही मात्र इस आधार पर कि कार्यवाही के एक पक्षकार द्वारा धारा 307 के अधीन आवेदन किया गया है, स्थगित या मुल्तवी नहीं की जाएगी।";

(ग) धारा 317 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अन्तः स्थापित की जाएगी, अर्थात् :-

"(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुये भी न्यायाधीश, यदि वह ठीक समझता है तो और ऐसे कारणों से जो उसके द्वारा लेखबद्ध किए जाएंगे, अभियुक्त या उसके प्लीडर की अनुपस्थिति में जांच या विचारण करने के लिए अग्रसर हो सकता है और किसी साक्षी का साक्ष्य, प्रतिपरीक्षा के लिए साक्षी को पुनः बुलाने के अभियुक्त के अधिकार के अधीन रहते हुए, लेखबद्ध कर सकता है।";

(घ) धारा 397 की उपधारा (1) में स्पष्टीकरण के पहले निम्नलिखित परन्तुक अंतःस्थापित कर दिया गया हो, अर्थात् :-"परन्तु जहां किसी न्यायालय द्वारा इस उपधारा के अधीन शक्तियों का प्रयोग ऐसी कार्यवाहियों के किसी एक पक्षकार द्वारा किये गये आवेदन पर किया जाता है, वहां वह न्यायालय कार्यवाही के अभिलेख को मामूली तौर पर-

(क) दूसरे पक्षकार को इस बात का हेतुक दर्शित करने का अवसर दिये बिना नहीं मंगाएगा कि अभिलेख क्यों न मंगाया जाए; या

(ख) उस दशा में नहीं मंगाएगा जिसमें उसका यह समाधान हो जाता है कि कार्यवाही के अभिलेख की परीक्षा प्रमाणित प्रतियों से की जा सकती है।"।

23. 1[धारा 13 (1) ()] के अधीन अपराध के संबंध में आरोप की विशिष्टियां.-

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) में किसी बात के होते हुये भी, जब किसी अपराधी पर धारा 13 को उपधारा (1) के 2[खंड ()] के अधीन किसी बात का आरोप है, तब उसे आरोप में उस सम्पत्ति को, जिसके संबंध में अपराध का किया जाना अभिकथित है और उन तारीखों को जिनके बीच अपराध का किया जाना अभिकथित है, विशिष्ट मदों या निश्चित तारीख को विनिर्दिष्ट किए बिना, वर्णित करना पर्याप्त होगा और इस प्रकार विरचित आरोप उक्त संहिता की धारा 219 के अर्थ में एक अपराध का आरोप समझा जाएगा:

परन्तु ऐसी तारीखों में से प्रथम और अंतिम तारीख के बीच का समय एक वर्ष से अधिक नहीं होगा। (1. अधिनियम क्रमांक 16 सन् 2018 द्वारा दिनांक 26-7-2018 से "धारा 13 (1) (ग) शब्दों, कोष्ठकों, अंकों और अक्षर के स्थान पर प्रतिस्थापित।)

(2. अधिनियम क्रमांक 16 सन् 2018 द्वारा दिनांक 26-7-2018 से "खंड (ग)" शब्द, कोष्ठक और अक्षर के स्थान पर प्रतिस्थापित।)

24. 3[ ***] - (3. अधिनियम क्रमांक 16 सन् 2018 द्वारा दिनांक 26-7-2018 से विलुप्त। पूर्व में धारा 24 निम्नवत थी

:- "24. रिश्वत देने वाले का उसके कथन पर अभियोजित होना. -

तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी धारा 7 से धारा 11 या धारा 13 या धारा 15 के अधीन किसी अपराध के लिए किसी लोक सेवक के विरुद्ध किसी कार्यवाही में किसी व्यक्ति के इस कथन से कि उससे उस लोक सेवक को (वैध पारिश्रमिक से भिन्न) कोई परितोषण या कोई मूल्यवान चीज देने की प्रस्थापना की थी या प्रस्थापना करने के लिए सहमति दो थी, ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध धारा 12 के अधीन कोई अभियोजन नहीं हो सकेगा।")

25. सेना, नौसेना और वायुसेना सम्बन्धी या अन्य विधियों का प्रभावित नहीं होगा.-  

(1) इस अधिनियम की कोई बात सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45), वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46), नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) सीमा सुरक्षा बल अधिनियम, 1968 (1968 का 47),

तटरक्षक अधिनियम, 1978 (1978 का 30) और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1986 (1986 का 47) के अधीन किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारों द्वारा प्रयोक्तव्य अधिकारिता को, या उसको लागू होने वाली प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करेगी।

(2) शंकाओं के निराकरण के लिए घोषित किया जाता है कि ऐसी विधि के प्रयोजनार्थ जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, विशेष न्यायाधीश का न्यायालय सामान्य दाण्डिक न्याय का न्यायालय समझा जाएगा।

26. 1952 के अधिनियम 46 के अधीन नियुक्ति विशेष न्यायाधीशों का इस अधिनियम के अधीन नियुक्त विशेष न्यायाधीश होना. - 

किसी क्षेत्र या किन्हीं क्षेत्रों के लिए दण्ड विधि (संशोधन) अधिनियम, 1952 के अधीन नियुक्त किया गया और इस अधिनियम के प्रारम्भ पर पद धारण कर रहा प्रत्येक विशेष न्यायाधीश उस क्षेत्र या उन क्षेत्रों के लिए इस अधिनियम की धारा 3 के अधीन नियुक्त किया गया विशेष न्यायाधीश समझा जाएगा और ऐसे प्रारम्भ से ही प्रत्येक ऐसा न्यायाधीश, तद्नुसार, ऐसे प्रारम्भ पर उसके समक्ष लम्बित सब कार्यवाहियों का निपटारा, इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार करता रहेगा।

27. अपील और पुनरीक्षण. -

इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए उच्च न्यायालय दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) के अधीन उच्च न्यायालय को प्रदत्त अपील और पुनरीक्षण की सभी शक्तियों का प्रयोग जहां तक वे लागू हो सकती हैं, कर सकता है, मानो विशेष न्यायाधीश का उच्च न्यायालय की स्थानीय सीमाओं के भीतर मामलों का विचारण करने वाला सेशन न्यायालय है।

28. अधिनियम का किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होना.-  

इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होंगे कि उसका अल्पीकरण करेंगे, और इसमें की कोई बात किसी लोक सेवक को किसी ऐसे कार्यवाही से छूट नहीं देगी जो, इस अधिनियम के अतिरिक्त, उसके विरुद्ध संस्थापित की जा सकती है।

29. 1944 के अध्यादेश सं० 38 का संशोधन. -

दण्ड विधि (संशोधन) अध्यादेश, 1944 में, -

 () धारा 2 की उपधारा (1), धारा 9 की उपधारा (1), धारा 10 के खण्ड () और धारा 11 की उपधारा (1) और धारा 13 की उपधारा (1) में "राज्य सरकार" शब्दों के स्थान पर, जहां भी वे आते हैं, यथास्थिति, "राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार" शब्द रखे जाएंगे;

(ख) धारा 10 के खण्ड (क) में "तीन मास" शब्दों के स्थान पर "एक वर्ष" शब्द रखे जाएंगे;

(ग) अनुसूची के, -

(1) पैरा 1 का लोप किया जाएगा;

(ii) पैरा 2 और पैरा 4 में, -

(क) "स्थानीय प्राधिकरण" शब्दों के पश्चात् "या किसी केन्द्रीय, प्रांतीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित कोई नियम, या सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन या उससे सहायता प्राप्त कोई प्राधिकरण या निकाय, या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1)* की धारा 617 में यथापरिभाषित कोई सरकारी कम्पनी या ऐसे निगम, प्राधिकरण, निकाय या सरकारी कम्पनी द्वारा सहायता प्राप्त कोई सोसाइटी" शब्द और अंक अन्तः स्थापित किये जाएंगे; (*अब कम्पनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18)

(ख) "या प्राधिकरण" शब्दों के पश्चात् "या निगम या निकाय या सरकारी कम्पनी या सोसाइटी" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे।

(iii) पैरा 4अ के स्थान पर, निम्नलिखित पैरा रखा जाएगा, अर्थात् :-

"4अ. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन दण्डनीय अपराध।";

(iv) पैरा 8 में, "मद 2, मद 3 और मद 4" शब्दों और अंकों के स्थान पर "मद 2, मद 3, मद 4 और मद 4-अ" शब्द, अंक और अक्षर रखे जाएंगे।

1[29क. नियम बनाने की शक्ति. -

 (1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को क्रियान्वित करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा अर्थात् :-

(क) ऐसे मार्गदर्शक सिद्धान्त, जो धारा 9 के अधीन वाणिज्यिक संगठन द्वारा बनाए जा सकते हैं;

(ख) धारा 19 की उपधारा (1) के अधीन अभियोजन की मंजूरी के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत;

(ग) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाना अपेक्षित है या विहित किया जाए।

(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा। यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु उस नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।] (1. अधिनियम क्रमांक 16 सन् 2018 द्वारा दिनांक 26-7-2018 से अंत: स्थापित।)

30. निरसन और व्यावृत्ति. -

(1) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 (1947 का 2) और दण्ड विधि संशोधन

अधिनियम, 1952 (1952 का 46) निरसित किए जाते हैं।

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, किन्तु साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 के लागू होने पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना इस प्रकार निरसित अधिनियमों के अधीन या उनके अनुसरण में की गई या किए जाने के लिए तात्पर्यित कोई बात या कोई कार्रवाई जहां तक कि वह इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत नहीं है, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबन्धों के अधीन या उनके अनुसरण में की गई बात या कार्रवाई समझी जाएगी।

31. 1860 के अधिनियम सं० 45 की कुछ धाराओं का लोप. -

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 161 से धारा 165क तक का  (जिसमें ये दोनों धाराएं सम्मिलित हैं) लोप किया जाएगा, और साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 ऐसे लोप को लागू होगी, मानो उक्त धाराओं का लोप किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा किया गया हो।

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