धारा 9 से  10 अध्याय 3 (दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन और न्यायिक पृथक्करण ) हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955

धारा 9 से 10 अध्याय 3 (दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन और न्यायिक पृथक्करण ) हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955

अध्याय 3

दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन और न्यायिक पृथक्करण

9. दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन -

जब कि पति या पत्नी ने अपने को दूसरे के साहचर्य से किसी युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना प्रत्याहत कर लिया हो तब व्यथित पक्षकार दाम्पत्यं अधिकारों के प्रत्यास्थापन के लिये जिला न्यायालय में अर्जी द्वारा आवेदन कर सकेगा और न्यायालय ऐसी अर्जी में किये गये कथनों के सत्य के बारे में तथा इस बात के बारे में कि इसके लिये कोई वैध आधार नहीं है कि आवेदन मंजूर क्यों न कर लिया जाये अपना समाधान हो जाने पर दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन डिक्री कर सकेगा।

 

स्पष्टीकरण - जहां यह प्रश्न उठता है कि क्या साहचर्य के प्रत्याहरण के लिये युक्तियुक्त प्रतिहेतु है, वहां युक्तियुक्त प्रतिहेतु साबित करने का भार उस व्यक्ति पर होगा जिसने साहचर्य से प्रत्याहरण किया है।

 

10. न्यायिक पृथक्करण -

(1) विवाह का कोई पक्षकार, चाहे वह विवाह इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् अनुष्ठापित हुआ हो, धारा 13 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट किसी आधार पर और पत्नी की दशा में उक्त धारा की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट किसी आधार पर भी, जिस पर विवाह विच्छेद के लिये अर्जी पेश की जा सकती थी, न्यायिक पृथक्करण की डिंक्री के लिये प्रार्थना करते हुये अर्जी पेश कर सकेगा ।

 

(2) जहां कि न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पारित हो गई हो, वहां अर्जीदार पर इस बात की बाध्यता न होगी कि वह प्रत्यर्थी के साथ सहवास करे, किन्तु दोनों पक्षकारों में से किसी के भी अर्जी द्वारा आवेदन करने पर तथा ऐसी अर्जी में किए गए कथनों की सत्यता के बारे में अपना समाधान हो जाने पर न्यायालय, यदि वह ऐसा करना न्यायसंगत और युक्तियुक्त समझे तो, डिक्री को विखण्डित कर सकेगा।

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