धारा 38 से 42 अध्याय 8 विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 8

शाश्वत व्यादेश

38. शाश्वत व्यादेश कब अनुदत्त किया जाता है -

(1) इस अध्याय में अन्तर्विष्ट या निर्दिष्ट अन्य उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि शाश्वत व्यादेश वादी को उसके पक्ष में विद्यमान बाध्यता के, चाहे वह अभिव्यक्त हो या विवक्षित भंग का निवारण करने के लिए अनुदत्त किया जा सकेगा।

(2) जबकि ऐसी कोई बाध्यता संविदा के उद्भूत होती हो तब न्यायालय अध्याय 2 में अन्तर्विष्ट नियमों और उपबन्धों द्वारा मार्गदर्शित होगा।

(3) जबकि प्रतिवादी वादी के सम्पत्ति के अधिकार या उपभोग पर आक्रमण करे या आक्रमण की धमकी दे तब न्यायालय निम्नलिखित दशाओं में शाश्वत व्यादेश दे सकेगा, अर्थात् :-

(क) जहां कि प्रतिवादी वादी के लिए उस सम्पत्ति का न्यासी हो।

(ख) जहां कि उस वास्तविक नुकसान का, जो उस आक्रमण द्वारा कारित है या जिसका उस आक्रमण द्वारा कारित होना संभाव्य है, अभिनिश्चय करने के लिए कोई मानक विद्यमान न हों;

(ग) जहां कि वह आक्रमण ऐसा हो कि धन के रूप में प्रतिकर यथायोग्य अनुतोष न देगा;

(घ) जहां कि व्यादेश न्यायिक कार्यवाहियों के बाहुल्य निवारित करने के लिए आवश्यक हो।

39. आज्ञापक व्यादेश –

जबकि किसी बाध्यता के भंग का निवारण करने के लिए कतिपय ऐसे कार्यों का जिनका प्रवर्तन कराने को न्यायालय समर्थ है पालन विवश करना आवश्यक हो, तब न्यायालय, परिवादित भंग को निवारित करने और अपेक्षित कार्यों का पालन विवश करने के लिए भी, स्वविवेक में, व्यादेश अनुदत्त कर सकेगा।

40. व्यादेश के स्थान पर या उसके अतिरिक्त नुकसानी -

(1) धारा 38 के अधीन शाश्वत व्यादेश के वा धारा 39 के अधीन आज्ञापक व्यादेश के बाद में वादी ऐसे व्यादेश के अतिरिक्त या स्थान पर, नुकसानी का दावा कर सकेगा और न्यायालय यदि ठीक समझे तो ऐसी नुकसानी दिला सकेगा।

(2) इस धारा के अधीन नुकसानी का कोई अनुतोष तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक कि वादी ने अपने वादपत्र में ऐसे अनुतोष का दावा न किया हो

परन्तु जहां कि वादपत्र में ऐसी किसी भी नुकसानी का दावा न किया गया हो वहां न्यायालय कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में इसलिए कि वादी ऐसे दावे को वादपत्र में अन्तर्गत कर सके वादपत्र का संशोधन करने के लिए ऐसे निबन्धनों पर अनुज्ञा देगा जैसे न्यायसंगत हों।

(3) वादी के पक्ष में विद्यमान बाध्यता के भंग को निवारित करने के बाद की खारिजी ऐसे भंग के लिए नुकसानी का बाद लाने के उसके अधिकार को वर्जित करेगी।

41. व्यावेश कब नामंजूर किया जाता है —

व्यादेश अनुदत्त नहीं किया जा सकता:-

(क) किसी व्यक्ति को किसी ऐसी न्यायिक कार्यवाही के अभियोजन से अवरुद्ध करने को जो ऐसे वाद के, जिसमें व्यादेश ईप्सित है, संस्थित किए जाने के समय लंबित हो, जब तक कि ऐसा अवरोध कार्यवाहियों के बाहुल्य को निवारित करने के लिए आवश्यक न हो;

(ख) किसी व्यक्ति को ऐसे न्यायालय में, जो उस न्यायालय के अधीनस्थ नहीं है जिससे व्यादेश ईप्सित है, किसी कार्यवाही को संस्थित या अभियोजित करने से अवरुद्ध करने को

(ग) किसी व्यक्ति को किसी विधायी निकाय के समक्ष आवेदन करने से अवरुद्ध करने को

(घ) किसी व्यक्ति को किसी आपराधिक मामले में कोई कार्यवाही संस्थित या अभियोजित करने से अवरुद्ध करने को

(ङ) ऐसी संविदा का भंग निवारित करने को जिसका विनिर्दिष्टतः पालन प्रवर्तनीय नहीं है;

(च) किसी ऐसे कार्य को न्यूसेंस के आधार पर निवारित करने को, जिसके संबंध में यह युक्तियुक्त तौर पर स्पष्ट न हो कि वह न्यूसेंस हो जाएगा;

(छ) किसी ऐसे चालू रहने वाले भंग को निवारित करने को, जिसमें वादी उपमत हो गया हो ;

(ज) जब कि समानतः प्रभावकारी अनुतोष, कार्यवाही के किसी अन्य प्रायिक ढंग द्वारा निश्चयपूर्वक अभिप्राप्त किया जा सकता हो सिवाय न्यासभंग की दशा के

(जक) यदि उससे किसी अवसंरचना परियोजना की प्रगति या पूरा होने में अड़चन आती है या विलंब होता है। अथवा उससे संबंधित सुसंगत सुविधा की सतत् व्यवस्था में या ऐसी परियोजना की विषय-वस्तु होने के कारण सेवाओं में हस्तक्षेप होता है।

(झ) जबकि वादी या उसके अभिकर्ताओं का आचरण ऐसा रहा हो जो उसे न्यायालय की मदद पाने के लिए निर्हकित कर दे

(अ) जबकि वादी का उस मामले में कोई वैयक्तिक हित न हो।

42. नकारात्मक करार के पालन का व्यावेश -

धारा 41 के खण्ड (ङ) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां कि किसी संविदा में किसी निश्चित कार्य को करने का सकारात्मक करार और उसी के साथ किसी निश्चित कार्य को न करने का अभिव्यक्त या विवक्षित नकारात्मक करार, समाविष्ट हो वहां यह परिस्थिति कि न्यायालय सकारात्मक करार का विनिर्दिष्टतः पालन विवश करने में असमर्थ है न्यायालय को नकारात्मक करार पालन का व्यादेश अनुदत्त करने से प्रवारित नहीं करेगी :

परन्तु यह तब जबकि बादी संविदा के पालन में, जहां तक वह उसके लिए आबद्धकर है असफल रहा हो।

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