धारा 9 से 25 अध्याय 2 विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963

धारा 9 से 25 अध्याय 2 विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963

अध्याय 2

संविदाओं का विनिर्दिष्ट पालन

9. संविदा पर आधारित अनुतोष के वादों में प्रतिरक्षाएं –

एतस्मिन् अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, जहां कि किसी संविदा के बारे में किसी अनुतोष का दावा इस अध्याय के अधीन किया जाए, वहां वह व्यक्ति, जिसके विरुद्ध उस अनुतोष का दावा किया जाए, किसी भी ऐसे आधार का अभिवचन प्रतिरक्षा के तौर पर कर सकेगा जो उसे संविदाओं से संबंधित किसी भी विधि के अधीन उपलभ्य हो।

संविदाएं जिनका विनिर्विष्टः प्रवर्तन कराया जा सकता है

10. संविदाओं की बाबत विनिर्दिष्ट पालन -

न्यायालय द्वारा किसी संविदा का विनिर्दिष्ट पालन धारा 11 की उपधारा (2), धारा 14 और धारा 16 में अंतर्विष्ट उपबंधों के अधीन रहते हुए कराया जाएगा

11. दशाएं जिनमें न्यासों के संसक्त संविदाओं का विनिर्दिष्ट पालन प्रवर्तनीय हैं -

(1) इस अधिनियम में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, किसी संविदा का विनिर्दिष्ट पालन, कराया जाएगा जबकि वह कार्य, जिसके करने का करार हुआ है, किसी न्यास के, पूर्णत: या भागतः पालन में हो।

(2) न्यासी द्वारा अपनी शक्तियों के बाहर या न्यास के भंग में की गई संविदा का विनिर्दिष्टतः प्रवर्तन नहीं कराया जा सकता।

12. संविदा के भाग का विनिर्दिष्ट पालन -

(1) इस धारा में एतस्मिन् पश्चात्, अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, न्यायालय किसी संविदा के किसी भाग के विनिर्दिष्ट पालन का निदेश नहीं देगा।

(2) जहां कि किसी संविदा का कोई पक्षकार उसमें के अपने पूरे भाग का पालन करने में असमर्थ हो किन्तु वह भाग, जिसे अपालित रह जाना ही है, पूरे भाग के अनुपात में मूल्य में बहुत कम हो और उसके लिए धन के रूप में प्रतिकर हो सकता हो, वहां दोनों में से किसी भी पक्षकार के बाद लाने पर न्यायालय संविदा में से उतने भर के विनिर्दिष्ट पालन का निदेश दे सकेगा जितने का पालन किया जा सकता हो और उतने के लिए धन के रूप में प्रतिकर दिलवा सकेगा।

(3) जहां कि संविदा का कोई पक्षकार उसमें के अपने पूरे भाग का पालन करने में असमर्थ हो और वह भाग जिसे अपालित रह जाना ही है या तो-

(क) सम्पूर्ण का प्रचुर भाग हो यद्यपि उसका धन के रूप में प्रतिकर हो सकता हो या

(ख) उसका धन के रूप में प्रतिकर न हो सकता हो, वहां वह विनिर्दिष्ट पालन के लिए डिक्री अभिप्राप्त करने का हकदार नहीं है किन्तु न्यायालय दूसरे पक्षकार के वाद लाने पर व्यतिक्रम करने वाले पक्षकार को यह निदेश दे सकेगा कि संविदा के अपने उतने भाग का, जितने का वह पालन कर सकता है, विनिर्दिष्ट: पालन करे, यदि दूसरा पक्षकार-

(i) खंड (क) के अधीन आने वाली दशा में, पूरी संविदा के लिए करारित प्रतिफल उसमें से उस भाग के प्रतिफल को, जिसे अपालित रह जाना ही है घटाकर दे दे या दे चुका हो और, खंड (ख) के अधीन आने वाली दशा में पूरी संविदा के लिए प्रतिफल, कोई कमी किए बिना, दे दे या दे चुका हो तथा

(ii) दोनों दशाओं में से हर एक में संविदा के शेष भाग के पालन कराने के सब दावों को तथा शेष की ऊनता के लिए या प्रतिवादी के व्यतिक्रम द्वारा उसे हुई हानि या नुकसान के लिए प्रतिकर पाने के समस्त अधिकार को त्याग दे।

(4) जबकि संविदा का कोई भाग जिसका, यदि उसे अलग से ले तो विनिर्दिष्टतः पालन किया जा सकता है और किया जाना चाहिए, उसी संविदा के ऐसे अन्य भाग से पृथक् और स्वतन्त्र आधार पर खड़ा हो जिसका विनिर्दिष्टतः पालन नहीं किया जा सकता या नहीं किया जाना चाहिए, वहां न्यायालय पूर्वकथित भाग के विनिर्दिष्ट पालन का निदेश दे सकेगा।

स्पष्टीकरण - संविदा का कोई पक्षकार उसमें के अपने पूरे भाग का पालन करने में इस धारा के प्रयोजनों के लिए असमर्थ माना जाएगा, यदि उसकी विषय-वस्तु का कोई प्रभाग जो संविदा की तारीख को अस्तित्व में था उसके पालन के समय अस्तित्व में न रह जाए।

13. हक रखने वाले या अपूर्ण हक वाले व्यक्ति के विरुद्ध क्रेता या पट्टेदार के अधिकार -

(1) जहां कि किसी स्थावर सम्पत्ति को ऐसा व्यक्ति, जिसका उसमें कोई हक न हो अथवा केवल अपूर्ण हक हो, बेचने की अथवा पट्टे पर देने की संविदा करे वहां क्रेता या पट्टेदार के इस अध्याय के अन्य उपबन्धों के अध्यधीन निम्नलिखित अधिकार हैं, अर्थात् :-

(क) यदि विक्रेता अथवा पट्टाकर्ता में संविदा के पश्चात् सम्पत्ति में कोई हित अर्जित किया हो तो क्रेता या पट्टेदार ऐसे हित में से संविदा की पूर्ति करने के लिए उसे विवश कर सकेगा;

(ख) जहां कि हक को विधिमान्य बनाने के लिए अन्य व्यक्तियों की सहमति आवश्यक हो और विक्रेता या पट्टाकर्ता की प्रार्थना पर वे सहमति देने को आबद्ध हों, वहां क्रेता या पट्टेदार उसको ऐसी सहमति उपाप्त करने के लिए विवश कर सकेगा और जबकि हक को विधिमान्य बनाने के लिए अन्य व्यक्तियों द्वारा हस्तान्तरण आवश्यक हो और विक्रेता या पट्टाकर्ता की प्रार्थना पर वे हस्तान्तरण करने को आबद्ध हों तब क्रेता या पट्टेदार उसको ऐसा हस्तान्तरण उपाप्त करने के लिए विवश कर सकेगा;

(ग) जहां कि विक्रेता विल्लंगम रहित सम्पत्ति को बेचने की प्रव्यंजना करे किन्तु सम्पत्ति क्रय-धन से अनधिक राशि के लिए बंध है और विक्रेता को वास्तव में केवल मोचन का ही अधिकार हो वहां क्रेता उसे उस बंधक का मोचन कराने के लिए और बंधकदार से विधिमान्य उन्मोचन और जहां आवश्यक हो, वहां हस्तान्तरण भी अभिप्राप्त करने के लिए विवश कर सकेगा;

(घ) जहां कि विक्रेता या पट्टाकर्ता संविदा के विनिर्दिष्ट पालन के लिए वाद लाए और हक के अभाव या अपूर्ण हक के आधार पर वाद खारिज हो जाए वहां प्रतिवादी को अपने निक्षेप की यदि कोई हो, उस पर ब्याज सहित वापसी की और बाद के अपने खर्चे पाने का अधिकार है तथा ऐसे निक्षेप, ब्याज और खाचों के लिए उस हित पर, यदि कोई हो, धारणाधिकार है जो उस सम्पत्ति में विक्रेता अथवा पट्टाकर्ता का हो जो संविदा की विषय-वस्तु है

(2) उपधारा (1) के उपबन्ध जंगम सम्पत्ति के विक्रय या भाड़े की संविदाओं को भी, यावत्शक्य, लागू होंगे।

संविदाएं जिनका विनिर्दिष्ट; प्रवर्तन नहीं कराया जा सकता है

14. ऐसी संविदाएं जो विनिर्दिष्टतया प्रवर्तनीय नहीं हैं—

निम्नलिखित संविदाओं को विनिर्दिष्टतया प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता, अर्थात्:–

(क) जहां संविदा के किसी पक्षकार ने संविदा का प्रतिस्थापित पालन धारा 20 के उपबंधों के अनुसार अभिप्राप्त कर लिया है:

(ख) कोई ऐसी संविदा, जिसके पालन में ऐसे किसी निरंतर कर्तव्य का पालन अंतर्वलित है, जिसका न्यायालय पर्यवेक्षण नहीं कर सकता

(ग) कोई ऐसी संविदा, जो पक्षकारों की व्यक्तिगत अर्हताओं पर इतनी निर्भर है कि न्यायालय उसके तात्विक निबंधनों का विनिर्दिष्ट पालन नहीं करा सकता; और

(घ) कोई ऐसी संविदा, जो अवधारणीय प्रकृति की है।

14 क. न्यायालय की विशेषज्ञों को नियुक्त करने की शक्ति -

(1) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अंतर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इस अधिनियम के अधीन किसी भी वाद में, जहां न्यायालय, वाद में अंतर्वलित किसी विनिर्दिष्ट विवाद्यक पर अपनी सहायता के लिए विशेषज्ञ की राय प्राप्त करना आवश्यक समझता है, वहां वह एक या अधिक विशेषज्ञ नियुक्त कर सकेगा और उन्हें ऐसे विवाद्यक पर उसको रिपोर्ट करने का निदेश दे सकेगा तथा साक्ष्य उपलब्ध कराने के लिए, जिसके अंतर्गत उक्त विवाद्यक पर दस्तावेजों का पेश किया जाना भी है, विशेषज्ञ की उपस्थिति सुनिश्चित कर सकेगा।

(2) न्यायालय किसी व्यक्ति को, विशेषज्ञ को सुसंगत सूचना देने या कोई सुसंगत दस्तावेज, माल या अन्य संपत्ति को उसके निरीक्षण के लिए पेश करने या उस तक पहुंच उपलब्ध कराने की अपेक्षा कर सकेगा वा उसे निदेश दे सकेगा।

(3) विशेषज्ञ द्वारा दी गई राय या रिपोर्ट, वाद के अभिलेख का भाग होगी; और न्यायालय या न्यायालय की अनुज्ञा से वाद का कोई भी पक्षकार वैयक्तिक रूप से विशेषज्ञ को खुले न्यायालय में उसको निर्दिष्ट या उसकी राय या रिपोर्ट में उल्लिखित किसी भी विषय पर या उसकी रिपोर्ट के बारे में या उस रीति के बारे में, जिसमें उसने निरीक्षण किया है, परीक्षा कर सकेगा।

(4) विशेषज्ञ ऐसी फीस, खर्च या व्यय का हकदार होगा, जो न्यायालय नियत करे, जो पक्षकारों द्वारा ऐसे अनुपात में और ऐसे समय पर संदेय होंगे, जो न्यायालय निवेश करे ।

वे व्यक्ति जिनके पक्ष में या विरुद्ध संविदाएं विनिर्दिष्टतः प्रवर्तित की जा सकेंगी

15. कौन विनिर्दिष्ट पासन अभिप्राप्त कर सकेगा -

इस अध्याय में अन्यथा उपबंधित के सिवाय किसी संविदा का विनिर्दिष्ट पालन अभिप्राप्त किया जा सकेगा

(क) उसमें के किसी भी पक्षकार द्वारा

(ख) उसमें के किसी भी पक्षकार के हित प्रतिनधि वा मालिक द्वारा :

परन्तु जहां कि ऐसे पक्षकार की विद्वत्त, कौशल, शोधन क्षमता या कोई वैयक्तिक गुण संविदा का तात्त्विक अंग हो या जहां कि संविदा उपबन्ध करती हो कि उसका हित समनुदेशित नहीं किया जाएगा, वहां उसका हित प्रतिनिधि या उसका मालिक संविदा का विनिर्दिष्ट पालन कराने का हकदार न होगा, जब तक कि ऐसे पक्षकार ने संविदा के अपने भाग का विनिर्दिष्ट पालन पहले ही न कर दिया हो या उसके हित प्रतिनिधि या उसके मालिक द्वारा किया गया उसका पालन दूसरे पक्षकार द्वारा पहले ही प्रतिगृहीत न किया जा चुका हो;

(ग) जहां कि संविदा विवाह पर का व्यवस्थापन या एक ही कुटुम्ब के सदस्यों के बीच संदेहपूर्ण अधिकारों का कोई समझौता हो, वहां तद्धीन फायदा पाने के हकदार किसी भी व्यक्ति द्वारा;

(घ) जहां कि किसी आजीवन अभिधारी द्वारा किसी शक्ति के सम्यक् प्रयोग में कोई संविदा की गई हो, वहां शेष भोगी द्वारा;

(ङ) सकब्जा उत्तरभोगी द्वारा, जहां कि करार ऐसी प्रसंविदा हो जो उसके हक पूर्वाधिकारी के साथ की गई हो और उत्तरभोगी उस प्रसंविदा के फायदे का हकदार हो;

(च) शेष के उत्तरभोगी द्वारा, जहां कि करार वैसी प्रसंविदा हो, और उत्तरभोगी उसके फायदे का हकदार हो, उसके भंग के कारण तात्त्विक क्षति उठाएगा;

(चक) जब किसी सीमित दायित्व भागीदारी ने कोई करार किया है और तत्पश्चात् अन्य सीमित दायित्व भागीदारी कंपनी में समामेलित हो जाती है, वहां उस नई सीमित दायित्व भागीदारी द्वारा, जो समामेलन से उत्पन्न होती है।

(छ) जबकि किसी कम्पनी ने संविदा की हो और तत्पश्चात् वह किसी दूसरी कम्पनी में समामेलित हो गई हो, तब उस समामेलन से उद्भूत नई कम्पनी द्वारा;

(ज) जबकि किसी कम्पनी के सम्प्रवर्तकों ने उसके निगमन के पहले कम्पनी के प्रयोजनों के लिए कोई संविदा की हो और संविदा निगमन के निबन्धनों द्वारा समर्थित हो तब उस कम्पनी द्वारा:

परन्तु यह तब जबकि कम्पनी ने संविदा को प्रतिगृहीत कर लिया हो और संविदा के दूसरे पक्षकार को ऐसा प्रतिग्रहण संसूचित कर दिया हो।

16. अनुतोष का वैयक्तिक वर्जन-

संविदा का विनिर्दिष्ट पालन किसी ऐसे व्यक्ति के पक्ष में नहीं कराया जा सकता—

(क) जिसने धारा 20 के अधीन संविदा का प्रतिस्थापित पालन अभिप्राप्त कर लिया है; या

(ख) जो संविदा के किसी मर्मभूत निबन्धन का, जिसका उसकी ओर से पालन किया जाना शेष हो, पालन करने में असमर्थ हो गया हो, या उसका अतिक्रमण करे, या संविदा के प्रति कपट करे अथवा जानबूझकर ऐसा कार्य करे जो संविदा द्वारा स्थापित किए जाने के लिए आशयित संबंध का विसंवादी या ध्वंसक हो; अथवा

(ग) जो यह साबित करने में असफल रहे कि उसके संविदा के उन निबन्धनों से भिन्न जिनका पालन प्रतिवादी द्वारा निवारित अथवा अधित्यक्त किया गया है, ऐसे मर्मभूत निबन्धनों का, जो उसके द्वारा पालन किए जाने हैं, उसने पालन कर दिया है अथवा पालन करने के लिए वह सदा तैयार और रजामन्द रहा है।

स्पष्टीकरण – खण्ड (ग) के प्रयोजनों के लिए—

(i) जहां कि संविदा में धन का संदाय अन्तर्वलित हो, वादी के लिए आवश्यक नहीं है कि वह प्रतिवादी को किसी धन का वास्तव में निविदान करे या न्यायालय में निक्षेप करे सिवाय जबकि न्यायालय ने ऐसा करने का निदेश दिया हो;

(ii) वादी को यह साबित करना होगा कि वह संविदा का उसके शुद्ध अर्थान्वयन के अनुसार पालन कर चुका, अथवा पालन करने को तैयार और रजामन्द है।

17. किसी सम्पति के बेचने या पट्टे पर देने की ऐसे व्यक्ति द्वारा संविदा जिसका उस पर कोई हक हो विनिर्दिष्टतः प्रवर्तनीय नहीं है -

(1) किसी स्थावर सम्पत्ति के बेचने अथवा पट्टे पर देने की संविदा ऐसे विक्रेता अथवा पट्टाकर्ता के पक्ष में विनिर्दिष्टतः प्रवर्तित नहीं कराई जा सकती-

(क) जिसने यह जानते हुए कि उस सम्पत्ति पर उसका हक नहीं है उसे बेचने की या पट्टे पर देने की संविदा की हो;

(ख) जिसने यद्यपि इस विश्वास के साथ संविदा की थी कि सम्पत्ति पर उसका अच्छा हक है, तथापि जो विक्रय के या पट्टे के पूरा करने के लिए पक्षकारों या न्यायालय द्वारा नियत किए गए समय पर क्रेता या पट्टेदार को युक्तियुक्त शंका से रहित हक नहीं दे सकता।

(2) उपधारा (1) के उपबन्ध, जंगम सम्पत्ति के विक्रय या अविक्रय की संविदाओं को भी यावत्शक्य लागू होंगे।

18. फेरफार किए बिना अप्रवर्तन-

जहां कि वादी ऐसी किसी लिखित संविदा का विनिर्दिष्ट पालन कराना चाहता है, जिसमें फेरफार होना प्रतिवादी अभिकथित करता है, वहां वादी, ऐसे अभिकथित फेरफार के बिना ईप्सित पालन निम्नलिखित दशाओं में अभिप्राप्त नहीं कर सकता, अर्थात् :-

(क) जहां कि ऐसी लिखित संविदा जिसका पालन ईप्सित है, कपट, तथ्य की भूल तथा दुर्व्यपदेशन के कारण, अपने निबन्धनों और प्रभाव में उससे भिन्न हो जिसका पक्षकारों ने करार किया था अथवा जिसमें पक्षकारों के बीच करार किए गए वे सारे निबन्धन अन्तर्विष्ट न हों जिनके आधार पर प्रतिवादी ने संविदा की थी;

(ख) जहां कि पक्षकरों का उद्देश्य ऐसा कोई विधिक परिणाम पैदा करना था जो यह संविदा, जैसी वह विरचित की गई है, पैदा करने के लिए परिकल्पित न हों;

(ग) जहां कि संविदा के निष्पादन के पश्चात् पक्षकारों ने उसके निबन्धनों में फेरफार कर दिया हो।

19. पक्षकारों के और उनसे व्युत्पन्न पश्चात्वर्ती के अधीन दावा करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध अनुतोष-

इस अध्याय द्वारा यथा उपबन्धित के सिवाय संविदा के विनिर्दिष्ट पालन का प्रवर्तन निम्नलिखित के विरुद्ध कराया जा सकेगा—

(क) उसमें का कोई पक्षकार

(ख) ऐसे मूल्यार्थ अन्तरिती के सिवाय, जिसने अपना धन सद्भावपूर्वक तथा मूल संविदा की सूचना के बिना दिया हो, ऐसा कोई दूसरा व्यक्ति, जो उससे व्युत्पन्न ऐसे हक के अधीन दावा कर रहा हो जो संविदा के पश्चात् उद्भूत हुआ हो

(ग) ऐसा कोई व्यक्ति जो ऐसे हक के अधीन दावा कर रहा हो जो हक, यद्यपि संविदा के पहले का और वादी की जानकारी में था, तथापि प्रतिवादी द्वारा विस्थापित किया जा सकता था;

(गक) जब किसी सीमित दायित्व भागीदारी ने कोई करार किया है और तत्पश्चात् अन्य सीमित दायित्व भागीदारी कंपनी में समामेलित हो जाती है, वहां वह नई सीमित दायित्व भागीदारी, जो समामेलन से उत्पन्न होती है।

(घ) जबकि किसी कम्पनी ने कोई संविदा की हो और उसके पश्चात् किसी दूसरी कम्पनी से समामेलित हो गई हो तब ऐसे समामेलन से उद्भूत नई कम्पनी;

(ङ) जबकि किसी कम्पनी के सम्प्रवर्तकों ने उसके निगमन के पहले कोई संविदा कम्पनी के प्रयोजन के लिए की हो और संविदा ऐसी हो जो निगमन के निबन्धनों द्वारा समर्पित हो, तब वह कम्पनी:

परन्तु यह तब जब कि कम्पनी ने संविदा को प्रतिगृहीत कर लिया हो और संविदा के दूसरे पक्षकार को ऐसा प्रतिग्रहण संसूचित कर दिया हो।

संविदाओं का प्रतिस्थापित पालन

20. संविदा का प्रतिस्थापित पालन -

(1) भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 9) में अंतर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना और उसके सिवाय, जिस पर पक्षकार सहमत हैं, जहां संविदा किसी पक्षकार के वचन का पालन नहीं करने के कारण टूट जाती है, वहां उस पक्षकार के पास, जो ऐसे भंग से पीड़ित होता है, किसी तीसरे पक्षकार के माध्यम से या अपने स्वयं के अभिकरण द्वारा प्रतिस्थापित पालन का और ऐसा भंग करने वाले पक्षकार से उसके द्वारा वास्तविक रूप से उपगत, व्यवनित वा भुगते गए व्ययों और अन्य खर्चों को वसूल करने का विकल्प रहेगा।

(2) उपधारा (1) के अधीन संविदा का कोई भी प्रतिस्थापित पालन तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक ऐसे पक्षकार ने, जो ऐसे भंग से पीड़ित है, भंग करने वाले पक्षकार को तीस दिन से अन्यून का लिखित में एक नोटिस, उससे ऐसे समय के भीतर संविदा का पालन करने के लिए कहते हुए, जो उस नोटिस में विनिर्दिष्ट हो, नहीं दे देता हो और उसका ऐसा करने से इनकार करने या ऐसा करने में असफल रहने पर वह उसका पालन किसी तीसरे पक्षकार द्वारा या अपने स्वयं के अभिकरण द्वारा करा सकेगा:

परंतु वह पक्षकार, जो ऐसे भंग से पीड़ित है, उपधारा (1) के अधीन व्ययों और खर्चों को वसूल करने का हकदार तब तक नहीं होगा, जब तक उसने किसी तीसरे पक्षकार के माध्यम से या अपने स्वयं के अभिकरण द्वारा संविदा का पालन न करा लिया हो।

(3) जहां संविदा के भंग से पीड़ित पक्षकार ने उपधारा (1) के अधीन नोटिस देने के पश्चात् किसी तीसरे पक्षकार के माध्यम से या अपने स्वयं के अभिकरण द्वारा संविदा का पालन करा लिया है, वहां वह भंग करने वाले पक्षकार के विरुद्ध विनिर्दिष्ट पालन के अनुतोष का दावा करने का हकदार नहीं होगा।

(4) इस धारा की कोई बात उस पक्षकार को, जो संविदा के भंग से पीड़ित है, भंग करने वाले पक्षकार से प्रतिकर का दावा करने से निवारित नहीं करेगी।

20 क. अवसंरचना परियोजना से संबंधित संविदा के लिए विशेष उपबंध -

 (1) इस अधिनियम के अधीन किसी वाद में अनुसूची में विनिर्दिष्ट अवसंरचना परियोजना से संबंधित संविदा में न्यायालय द्वारा कोई भी व्यादेश वहां मंजूर नहीं किया जाएगा, जहां व्यादेश की मंजूरी से ऐसी अवसंरचना परियोजना की प्रगति या पूरा होने में कोई अड़चन आती हो या विलंब होता हो।

स्पष्टीकरण— इस धारा, धारा 20ख और धारा 41 के खंड (जक) के प्रयोजनों के लिए, "अवसंरचना परियोजना" पद से अनुसूची में विनिर्दिष्ट परियोजनाओं और अवसंरचना उप-सेक्टरों के प्रवर्ग अभिप्रेत हैं।

(2) केंद्रीय सरकार अवसंरचना परियोजनाओं के विकास की अपेक्षा पर निर्भर करते हुए और यदि ऐसा करना आवश्यक और समीचीन समझती है, तो राजपत्र में अधिसूचना द्वारा परियोजनाओं और अवसंरचना उप-सेक्टरों के प्रवर्ग से संबंधित अनुसूची को संशोधित कर सकेगी।

(3) इस अधिनियम के अधीन जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना को केंद्रीय सरकार द्वारा, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की कुल अवधि के लिए रखा जाएगा, जो एक सत्र या दो या अधिक क्रमवर्ती सत्रों में पूरी हो सकेगी और यदि पूर्वोक्त सत्र या क्रमवर्ती सत्र के ठीक पश्चात् वाले सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन, अधिसूचना में कोई उपांतरण करने के लिए सहमत होते हैं या दोनों सदन इस बात के लिए सहमत होते हैं कि ऐसी अधिसूचना जारी नहीं की जानी चाहिए, तो तत्पश्चात् अधिसूचना, यथास्थिति, ऐसे उपांतरित रूप में ही प्रभावी होगी या निष्प्रभाव हो जाएगी; तथापि अधिसूचना के ऐसे उपांतरित या निष्प्रभाव होने से उस अधिसूचना के अधीन पहले से की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

20 ख. विशेष न्यायाल—

राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति के परामर्श से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा एक या अधिक सिविल न्यायालयों को अवसंरचना परियोजनाओं से संबंधित संविदाओं की बाबत अधिकारिता के प्रयोग के क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं के भीतर और इस अधिनियम के अधीन बाद का विचारण करने के लिए विशेष न्यायालयों के रूप में अभिहित करेगी।

20 ग. वादों का शीघ्र निपटारा -

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन फाइल किए गए किसी बाद का निपटारा न्यायालय द्वारा प्रतिवादी को समन की तामील से बारह मास की अवधि के भीतर किया जाएगा:

परंतु उक्त अवधि को न्यायालय द्वारा ऐसी अवधि को बढ़ाने के लिए कारण लेखबद्ध करने के पश्चात् कुल मिलाकर छह मास से अनधिक की और अवधि के लिए बढ़ाया जा सकेगा।

21. कतिपय मामलों में प्रतिकर दिलाने की शक्ति -

 (1) किसी संविदा के विनिर्दिष्ट पालन के बाद में वादी, ऐसे पालन के स्थान पर उसके भंग के लिए प्रतिकर का भी दावा कर सकेगा।

(2) यदि किसी ऐसे वाद में, न्यायालय यह विनिश्चय करे कि विनिर्दिष्ट पालन तो अनुदत्त नहीं किया जाना चाहिए किन्तु पक्षकार के बीच ऐसी संविदा है जो प्रतिवादी द्वारा भंग की गई है और बादी उस भंग के लिए प्रतिकर पाने का हकदार है, तो वह उसे तद्नुसार वैसा प्रतिकर दिलाएगा।

(3) यदि किसी ऐसे बाद में, न्यायालय यह विनिश्चय करे कि विनिर्दिष्ट पालन तो अनुदत्त किया जाना चाहिए किन्तु उस मामले में न्याय की तुष्टि के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है और संविदा के भंग के लिए बादी को कुछ प्रतिकर भी दिया जाना चाहिए तो वह तद्नुसार उसको ऐसा प्रतिकर दिलाएगा।

(4) इस धारा के अधीन अधिनिर्णीत किसी प्रतिकर की रकम के अवधारण में न्यायालय, भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 का 9) की धारा 73 में विनिर्दिष्ट सिद्धांतों द्वारा मार्गदर्शित होगा।

(5) इस धारा के अधीन कोई प्रतिकर नहीं दिलाया जाएगा जब तब कि वादी ने अपने वादपत्र में ऐसे प्रतिकर का दावा न किया हो:

परन्तु जहां वादपत्र में वादी ने किसी ऐसे प्रतिकर का दावा न किया हो वहां न्यायालय कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में वाद को वादपत्र में ऐसे प्रतिकर का दावा अन्तर्गत करने के लिए संशोधित करने की अनुशा ऐसे निबन्धनों पर देगा जैसे न्यायसंगत हो।

स्पष्टीकरण – यह परिस्थिति कि संविदा विनिर्दिष्ट पालन के अयोग्य हो गई है न्यायालय को इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकारिता के प्रयोग से प्रवारित नहीं करती।

22. कब्बा, विभाजन, अग्रिम धन का प्रतिदाय आदि के लिए अनुतोष अनुदत करने की शक्ति -

(1) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) मे किसी तत्प्रतिकूल बात के अन्तर्विष्ट होते हुए भी, स्थावर सम्पत्ति के अन्तरण की संविदा के विनिर्दिष्ट पालन का वाद लाने वाला कोई व्यक्ति, समुचित मामले में—

(क) ऐसे पालन के अतिरिक्त सम्पत्ति का कब्जा या विभाजन और पृथक् कब्जा मांग सकेगा ; अथवा

(ख) उस दशा में जिसमें कि उसका विनिर्दिष्ट पालन का दावा नामंजूर कर दिया गया हो कोई भी अन्य अनुतोष, जिसका वह हकदार हो और जिसके अन्तर्गत उस द्वारा दिए गए किसी अग्रिम धन या निक्षेप का प्रतिदाय भी आता है, मांग सकेगा।

(2) उपधारा (1) के खण्ड (क) या खण्ड (ख) के अधीन कोई भी अनुतोष न्यायालय द्वारा अनुदत्त नहीं किया जाएगा जब तक कि उसका विनिर्दिष्टतः दावा न किया गया हो:

परन्तु जहां कि वादपत्र में वादी ने किसी ऐसे अनुतोष का दावा न किया हो वहां न्यायालय कार्यवाही के किसी भी प्रकम में वादी को वादपत्र में ऐसे अनुतोष का दावा अन्तर्गत करने के लिए संशोधन करने की अनुज्ञा ऐसे निबन्धनों पर देगा जैसे न्यायसंगत हों।

(3) उपधारा (1) के खण्ड (ख) के अधीन अनुतोष अनुदत्त करने की न्यायालय की शक्ति धारा 21 के अधीन प्रतिकर देने की उसकी शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी।

23. नुकसानी का परिनिर्धारण विनिर्दिष्ट पालन के लिए वर्जन होगा -

(1) जिस संविदा का विनिर्दिष्टतः प्रवर्तन अन्यथा उचित हो, यद्यपि उसके भंग की दशा में संदेय रकम के तौर पर कोई राशि उसमें नामित हो और व्यतिक्रम करने वाला पक्षकार उसे देने के लिए रजामन्द हो तथापि उसका ऐसे प्रवर्तन किया जा सकेगा, यदि न्यायालय का संविदा के निबन्धनों और अन्य विद्यमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए समाधान हो जाए कि वह राशि केवल संविदा के पालन को सुनिश्चित करने के प्रयोजन से ही नामित है, न कि व्यतिक्रम करने वाले पक्षकार को यह विकल्प देने के प्रयोजन से कि वह विनिर्दिष्ट पालन के स्थान पर धन का संदाय कर सके।

(2) इस धारा के अधीन विनिर्दिष्ट पालन का प्रवर्तन करते समय, न्यायालय संविदा में ऐसी नामित राशि के संदाय की भी डिक्री नहीं करेगा।

24. विनिर्दिष्ट पालन के वाद के ख़ारिज होने के पश्चात् भंग के लिए प्रतिकर के वाद का वर्णन -

किसी संविदा के या उसके किसी भाग में विनिर्दिष्ट पालन के वाद की खारिजी, यथास्थिति, ऐसी संविदा या उसके भाग के भंग के लिए प्रतिकर का बाद लाने के वादी के अधिकार का वर्जन कर देगी किन्तु किसी अन्य ऐसे अनुतोष के लिए वाद लाने के उसके अधिकार का वर्जन नहीं करेगी जिसका वह ऐसे भंग के कारण हकदार होगा।

पंचाटों का प्रवर्तन और व्यवस्थापनों के निष्पादन के लिए निवेश

25. कतिपय पंचाटों को और व्यवस्थापनों को निष्पादित करने की वसीयती निवेशों को पूर्ववर्ती धाराओं का लागू होना-

इस अध्याय के संविदा विषयक उपबन्ध उन पंचाटों को जिन्हें माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 ( 1996 का 26) लागू नहीं होता, और बिल या क्रोडपत्र के ऐसे निदेशों को, जो किसी विशिष्ट व्यवस्थापन को निष्पादित करने के बारे में हो लागू होंगे।

Free Judiciary Coaching
Free Judiciary Notes
Free Judiciary Mock Tests
Bare Acts