धारा 26 अध्याय 3 विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 3

लिखतों की परिशुद्धि

26. लिखतें कब परिशोधित की जा सकेंगी-

(1) जबकि पक्षकारों के कपट वा पारस्परिक भूल के कारण कोई लिखित संविदा या अन्य लिखत जो किसी ऐसी कम्पनी के संगम - अनुच्छेद न हों, जिसे कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) लागू होता हो उनके वास्तविक आशय को अभिव्यक्त नहीं करती, तब-

(क) दोनों में से कोई पक्षकार या उसका हित प्रतिनिधि लिखत को परिशोधित कराने का वाद संस्थित कर सकेगा अथवा

(ख) वादी किसी ऐसे वाद में, जिसमें लिखत के अधीन उद्भूत कोई अधिकार विवाद्य हो, अपने अभिवचन में दावा कर सकेगा कि लिखत परिशोधित की जाए अथवा

(ग) ऐसे किसी बाद में जैसा खण्ड (ख) में निर्दिष्ट है, प्रतिवादी किसी अन्य प्रतिरक्षा के साथ-साथ जो उसको उपलब्ध हो, लिखत की परिशुद्धि की मांग कर सकेगा।

(2) यदि किसी वाद में, जिसमें संविदा या अन्य लिखत का उपधारा (1) के अधीन परिशोधित कराना ईप्सित हो, न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कपट या भूल के कारण वह लिखत, पक्षकारों का वास्तविक आशय अभिव्यक्त नहीं करती, तो जहां तक परव्यक्तियों द्वारा सद्भावपूर्वक और मूल्यार्थ अर्जित अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसा किया जा सके, न्यायालय स्वविवेक में लिखत को ऐसे परिशोधित करने का निदेश दे सकेगा जिससे वह आशय अभिव्यक्त हो जाए।

(3) लिखित संविदा पहले परिशोधित की जा सकेगी और तब यदि परिशुद्धि का दावा करने वाले पक्षकार ने अपने अभिवचन में ऐसी प्रार्थना की हो और न्यायालय ठीक समझे तो वह विनिर्दिष्टतः प्रवर्तित की जा सकेगी।

(4) किसी लिखत की परिशुद्धि के लिए इस धारा के अधीन किसी भी पक्षकार को अनुतोष अनुदत्त न किया जाएगा जब तक कि उसका विनिर्दिष्टतः दावा न किया गया हो:

परन्तु जहां कि किसी पक्षकार ने अपने अभिवचन में किसी ऐसे अनुतोष का दावा न किया हो, वहां न्यायालय कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में ऐसे दावे को अन्तर्गत करने के लिए अभिवचन को संशोधित करने की अनुज्ञा ऐसे निबन्धनों पर देगा, जो न्यायसंगत हों।

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