धारा 210 से 222 अध्याय 15 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 15 कार्यवाहियां शुरू करने के लिए अपेक्षित शर्तें

कार्यवाहियां शुरू करने के लिए अपेक्षित शर्तें

210. मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधों का संज्ञान

1. इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट और उपधारा (2) के अधीन विशेषतया सशक्त किया गया कोई द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट, किसी भी अपराध का संज्ञान निम्नलिखित दशाओं में कर सकता है :-

क. उन तथ्यों का, जिसमें किसी विशेष विधि के अधीन प्राधिकृत किए गए किसी व्यक्ति द्वारा दाखिल किया गया कोई परिवाद शामिल है, जिनसे ऐसा अपराध बनता है परिवाद प्राप्त होने पर ;

ख. ऐसे तथ्यों के बारे में ( इलैक्ट्रानिक रीति सहित किसी रीति में प्रस्तुत ) पुलिस रिपोर्ट पर ;

ग. पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी व्यक्ति से प्राप्त इस इत्तिला पर या स्वयं अपनी इस जानकारी पर कि ऐसा अपराध किया गया है ।

2. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट को ऐसे अपराधों का, जिनकी जांच या विचारण करना उसकी क्षमता के भीतर है, उपधारा (1) के अधीन संज्ञान करने के लिए सशक्त कर सकता है ।

211. अभियुक्त के आवेदन पर अंतरण

जब मजिस्ट्रेट किसी अपराध का संज्ञान धारा 210 की उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन करता है तब अभियुक्त को, कोई साक्ष्य लेने से पहले, इत्तिला दी जाएगी कि वह मामले की किसी अन्य मजिस्ट्रेट से जांच या विचारण कराने का हकदार है और यदि अभियुक्त, या यदि एक से अधिक अभियुक्त हैं तो उनमें से कोई संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष आगे कार्यवाही किए जाने पर आपत्ति करता है तो मामला उस अन्य मजिस्ट्रेट को अंतरित कर दिया जाएगा जो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए ।

212. मामले मजिस्ट्रेटों के हवाले करना

1. कोई मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, अपराध का संज्ञान करने के पश्चात् मामले को जांच या विचारण के लिए अपने अधीनस्थ किसी सक्षम मजिस्ट्रेट के हवाले कर सकता है ।

2. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट, अपराध का संज्ञान करने के पश्चात्, मामले को जांच या विचारण के लिए अपने अधीनस्थ किसी ऐसे सक्षम मजिस्ट्रेट के हवाले कर सकता है जिसे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट साधारण या विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, और तब ऐसा मजिस्ट्रेट जांच या विचारण कर सकता है ।

213. अपराधों का सेशन न्यायालयों द्वारा संज्ञान

इस संहिता द्वारा या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा अभिव्यक्त रूप से जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, कोई सेशन न्यायालय आरंभिक अधिकारिता वाले न्यायालय के रूप में किसी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं करेगा जब तक मामला इस संहिता के अधीन मजिस्ट्रेट द्वारा उसके सुपुर्द नहीं कर दिया गया है ।

214. अपर सेशन न्यायाधीशों को हवाले किए गए मामलों पर उनके द्वारा विचारण

अपर सेशन न्यायाधीश ऐसे मामलों का विचारण करेगा, जिन्हें विचारण के लिए उस खंड का सेशन न्यायाधीश साधारण या विशेष आदेश द्वारा उसके हवाले करता है या जिनका विचारण करने के लिए उच्च न्यायालय विशेष आदेश द्वारा उसे निदेश देता हैI

215. लोक न्याय के विरुद्ध अपराधों के लिए और साक्ष्य में दिए गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए लोक सेवकों के विधिपूर्ण प्राधिकार के अवमान के लिए अभियोजन

1. कोई न्यायालय,—

क i. भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 206 से धारा 223 (जिनके अंतर्गत 209 के सिवाय ये दोनों धाराएं भी हैं) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का ; या

ii. ऐसे अपराध के किसी दुष्प्रेरण या ऐसा अपराध करने के प्रयत्न का ; या

iii. ऐसा अपराध करने के लिए किसी आपराधिक षड्यंत्र का, संज्ञान संबद्ध लोक सेवक के, या किसी अन्य ऐसे लोक सेवक के, जिसके वह प्रशासनिक तौर पर अधीनस्थ है या कोई अन्य लोक सेवक जो संबद्ध लोक सेवक द्वारा ऐसा करने के लिए प्राधिकृत है, लिखित परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं ;

ख i. भारतीय न्याय संहिता, 2023 की निम्नलिखित धाराओं अर्थात् धारा 229 से धारा 233 (जिनके अंतर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं), धारा 236, धारा 237, धारा 242 से धारा 248 (जिनके अंतर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं) और धारा 267 से किन्हीं के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, जब ऐसे अपराध के बारे में यह अभिकथित है कि वह किसी न्यायालय में की कार्यवाही में या उसके संबंध में किया गया है ; याii. उक्त संहिता की धारा 336 की उपधारा (1) में वर्णित या धारा 340 की उपधारा (2) या धारा 342 के अधीन दंडनीय अपराध का, जब ऐसे अपराध के बारे में यह अभिकथित है कि वह किसी न्यायालय में की कार्यवाही में पेश किए गए या साक्ष्य में दिए गए किसी दस्तावेज के बारे में किया गया है ; या

iii. उपखंड (i) या उपखंड (ii) में विनिर्दिष्ट किसी अपराध को करने के लिए आपराधिक षड्यंत्र या उसे करने के प्रयत्न या उसके दुष्प्रेरण के अपराध का, संज्ञान ऐसे न्यायालय के, या न्यायालय के ऐसे अधिकारी के, जिसे वह न्यायालय इस निमित्त लिखित रूप में प्राधिकृत करे या किसी अन्य न्यायालय के, जिसके वह न्यायालय अधीनस्थ है लिखित परिवाद पर ही करेगा अन्यथा नहीं

2. जहां किसी लोक सेवक द्वारा या किसी अन्य लोक सेवक द्वारा जो उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन उसके द्वारा ऐसा करने के लिए प्राधिकृत है, कोई परिवाद किया गया है वहां ऐसा कोई प्राधिकारी, जिसके वह प्रशासनिक तौर पर अधीनस्थ है, उस परिवाद को वापस लेने का आदेश दे सकता है और ऐसे आदेश की प्रति न्यायालय को भेजेगा ; और न्यायालय द्वारा उसकी प्राप्ति पर उस परिवाद के संबंध में आगे कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी :

परंतु ऐसे वापस लेने का कोई आदेश उस दशा में नहीं दिया जाएगा जिसमें विचारण प्रथम बार के न्यायालय में समाप्त हो चुका है।

3. उपधारा (1) के खंड (ख) में " न्यायालय" शब्द से कोई सिविल, राजस्व या दंड न्यायालय अभिप्रेत है और उसके अंतर्गत किसी केंद्रीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन गठित कोई अधिकरण भी है, यदि वह उस अधिनियम द्वारा इस धारा के प्रयोजनार्थ न्यायालय घोषित किया गया है ।

4. उपधारा (1) के खंड (ख) के प्रयोजनों के लिए, कोई न्यायालय, उस न्यायालय के, जिसमें ऐसे पूर्वकथित न्यायालय की अपील योग्य डिक्रियों या दंडादेशों की साधारणतया अपील होती है, अधीनस्थ समझा जाएगा या ऐसा सिविल न्यायालय, जिसकी डिक्रियों की साधारणतया कोई अपील नहीं होती है, उस मामूली आरंभिक सिविल अधिकारिता वाले प्रधान न्यायालय के अधीनस्थ समझा जाएगा जिसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर ऐसा सिविल न्यायालय स्थित है :

परन्तु —

क. जहां अपीलें एक से अधिक न्यायालय में होती हैं वहां अवर अधिकारिता वाला अपील न्यायालय वह न्यायालय होगा जिसके अधीनस्थ ऐसा न्यायालय समझा जाएगा ;

ख. जहां अपीलें सिविल न्यायालय में और राजस्व न्यायालय में भी होती हैं वहां ऐसा न्यायालय उस मामले या कार्यवाही के स्वरूप के अनुसार, जिसके संबंध में उस अपराध का किया जाना अभिकथित है, सिविल या राजस्व न्यायालय के अधीनस्थ समझा जाएगा ।

216. धमकी देने आदि की दशा में साक्षियों के लिए प्रक्रिया

कोई साक्षी या कोई अन्य व्यक्ति भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 232 के अधीन अपराध के संबंध में परिवाद फाइल कर सकेगा ।

217. राज्य के विरुद्ध  अपराधों के लिए और ऐसे अपराध करने के लिए आपराधिक षड्यंत्र के लिए अभियोजन

1. कोई न्यायालय,—

क. भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अध्याय 7 के अधीन या धारा 196, धारा 299 या धारा 353 की उपधारा (1) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का ; या

ख. ऐसा अपराध करने के लिए आपराधिक षड्यंत्र का ; या

ग. भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 47 में यथावर्णित किसी दुष्प्रेरण का, संज्ञान, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से ही करेगा, अन्यथा नहीं ।

2. कोई न्यायालय, -

क. भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 197 या धारा 353 की उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, या

ख. ऐसा अपराध करने के लिए आपराधिक षड्यंत्र का, संज्ञान केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट की पूर्व मंजूरी से ही करेगा, अन्यथा नहीं ।

3. कोई न्यायालय भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 61 की उपधारा (2) के अधीन दंडनीय किसी आपराधिक षड्यंत्र के किसी ऐसे अपराध का, जो मृत्यु, आजीवन कारावास या दो वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कठोर कारावास से दंडनीय अपराध करने के आपराधिक षड्यंत्र से भिन्न है, संज्ञान तब तक नहीं करेगा, जब तक राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट ने कार्यवाही शुरू करने के लिए लिखित सम्मति नहीं दे दी है :

परंतु जहां आपराधिक षड्यंत्र ऐसा है, जिसे धारा 215 के उपबंध लागू हैं, वहां ऐसी कोई सम्मति आवश्यक नहीं होगी ।

4. केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार, उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन मंजूरी देने के पूर्व और जिला मजिस्ट्रेट, उपधारा (2) के अधीन मंजूरी देने से पूर्व, और राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट, उपधारा (3) के अधीन सम्मति देने के पूर्व, ऐसे पुलिस अधिकारी द्वारा जो निरीक्षक की पंक्ति से नीचे का नहीं है, प्रारंभिक अन्वेषण किए जाने का आदेश दे सकता है और उस दशा में ऐसे पुलिस अधिकारी की वे शक्तियां होंगी, जो धारा 174 की उपधारा ( 3 ) में निर्दिष्ट हैं ।

218. न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन

1. जब किसी व्यक्ति पर, जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट या ऐसा लोक सेवक है या था जिसे सरकार द्वारा या उसकी मंजूरी से ही उसके पद से हटाया जा सकता है, अन्यथा नहीं, किसी ऐसे अपराध का अभियोग है, जिसके बारे में यह अभिकथित है कि वह उसके द्वारा तब किया गया था, जब वह अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य कर रहा था या जब उसका ऐसे कार्य करना तात्पर्यित था, तब कोई भी न्यायालय, ऐसे अपराध का संज्ञान, जैसा लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 में अन्यथा उपबन्धित है, उसके सिवाय -

क. ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो संघ के कार्यकलाप के संबंध में, यथास्थिति, नियोजित है या अभिकथित अपराध के किए जाने के समय नियोजित था, केंद्रीय सरकार की ;

ख. ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो किसी राज्य के कार्यकलाप के संबंध में, यथास्थिति, नियोजित है या अभिकथित अपराध के किए जाने के समय नियोजित था, उस राज्य सरकार की, पूर्व मंजूरी से ही करेगा, अन्यथा नहीं :

परंतु जहां अभिकथित अपराध, खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा उस अवधि के दौरान किया गया था, जब राज्य में संविधान के अनुच्छेद 356 के खंड (1) के अधीन की गई उद्घोषणा प्रवृत्त थी, वहां खंड (ख) इस प्रकार लागू होगा, मानो उसमें आने वाले “राज्य सरकार" पद के स्थान पर " केंद्रीय सरकार” पद रख दिया गया है :

परन्तु यह और कि ऐसी सरकार मंजूरी के लिए अनुरोध की प्राप्ति की तारीख से एक सौ बीस दिनों की अवधि के भीतर निर्णय करेगी और उस अवस्था में यदि वह ऐसा करने में असफल हो जाती है, तो मंजूरी, ऐसी सरकार द्वारा दी गई समझी जाएगी :

परन्तु यह और कि ऐसे किसी लोक सेवक की दशा में, जिसके बारे में यह अभिकथन किया गया है कि उसने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79, धारा 143, धारा 199 या धारा 200 के अधीन कोई अपराध किया है, कोई पूर्व मंजूरी अपेक्षित नहीं होगी ।

3. कोई भी न्यायालय संघ के सशस्त्र बल के किसी सदस्य द्वारा किए गए किसी अपराध का संज्ञान, जिसके बारे में यह अभिकथित है कि वह उसके द्वारा तब किया गया था, जब वह अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य कर रहा था या जब उसका ऐसे कार्य करना तात्पर्यित था, केंद्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से ही करेगा, अन्यथा नहीं ।

4. राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकती है कि उसमें यथाविनिर्दिष्ट बल के ऐसे वर्ग या प्रवर्ग के सदस्यों को, जिन्हें लोक व्यवस्था बनाए रखने का कार्य-भार सौंपा गया है, जहां कहीं भी वे सेवा कर रहे हों, उपधारा (2) के उपबंध लागू होंगे और तब उस उपधारा के उपबंध इस प्रकार लागू होंगे, मानो उसमें आने वाले “केंद्रीय सरकार” पद के स्थान पर " राज्य सरकार" पद रख दिया गया है ।

5. केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार उस व्यक्ति का जिसके द्वारा और उस रीति का जिससे वह अपराध या वे अपराध, जिसके या जिनके लिए ऐसे न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या लोक सेवक का अभियोजन किया जाना है, अवधारण कर सकती है और वह न्यायालय विनिर्दिष्ट कर सकती है, जिसके समक्ष विचारण किया जाना है ।

219.विवाह के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन

1. कोई न्यायालय भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 81 से धारा 84 (दोनों सहित) के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान ऐसे अपराध से व्यथित किसी व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं :

परंतु

क. जहां ऐसा व्यक्ति बालक है या विकृत्त चित्त है या बौद्धिक रूप से दिव्यांग ऐसा व्यक्ति है, जिसे उच्चतर सहायता की आवश्यकता है या रोग या अंग - शैथिल्य के कारण परिवाद करने के लिए असमर्थ है, या ऐसी महिला है, जो स्थानीय रूढ़ियों और रीतियों के अनुसार लोगों के सामने आने के लिए विवश नहीं की जानी चाहिए, वहां उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति न्यायालय की इजाजत से परिवाद कर सकता है ;

ख. जहां ऐसा व्यक्ति पति है, और संघ के सशस्त्र बलों में से किसी में से ऐसी परिस्थितियों में सेवा कर रहा है, जिनके बारे में उसके कमान आफिसर ने यह प्रमाणित किया है कि उनके कारण उसे परिवाद कर सकने के लिए अनुपस्थिति छुट्टी प्राप्त नहीं हो सकती, वहां उपधारा (4) के उपबंधों के अनुसार पति द्वारा प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति उसकी ओर से परिवाद कर सकता है ;

ग. जहां भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 82 के अधीन दंडनीय अपराध से व्यथित व्यक्ति पत्नी है वहां उसकी ओर से उसके पिता, माता, भाई, बहन, पुत्र या पुत्री या उसके पिता या माता के भाई या बहन द्वारा या न्यायालय की इजाजत से, किसी ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा, जो उससे रक्त, विवाह या दत्तक द्वारा संबंधित है, परिवाद किया जा सकता है |

2. उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, महिला के पति से भिन्न कोई व्यक्ति, उक्त भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 84 के अधीन दंडनीय किसी अपराध से व्यथित नहीं समझा जाएगा ।

3. जब उपधारा (1) के परंतुक के खंड (क) के अधीन आने वाले किसी मामले में बालक या विकृत्त चित्त व्यक्ति की ओर से किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा परिवाद किया जाना है, जो सक्षम प्राधिकारी द्वारा बालक या विकृत्त चित्त व्यक्ति के शरीर का संरक्षक नियुक्त या घोषित नहीं किया गया है, और न्यायालय का समाधान हो जाता है कि ऐसा कोई संरक्षक जो ऐसे नियुक्त या घोषित किया गया है तब न्यायालय इजाजत के लिए आवेदन मंजूर करने के पूर्व, ऐसे संरक्षक को सूचना दिलवाएगा और सुनवाई का उचित अवसर देगा ।

4. उपधारा (1) के परंतुक के खंड (ख) में निर्दिष्ट प्राधिकार लिखित रूप में दिया जाएगा और वह पति द्वारा हस्ताक्षरित या अन्यथा अनुप्रमाणित होगा, उसमें इस भाव का कथन होगा कि उसे उन अभिकथनों की जानकारी दे दी गई है जिनके आधार पर परिवाद किया जाना है और वह उसके कमान आफिसर द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित होगा, तथा उसके साथ उस आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित इस भाव का प्रमाणपत्र होगा कि पति को स्वयं परिवाद करने के प्रयोजन के लिए अनुपस्थिति छुट्टी उस समय नहीं दी जा सकती है ।

5. किसी दस्तावेज के बारे में, जिसका ऐसा प्राधिकार होना तात्पर्यित है और जिससे उपधारा (4) के उपबंधों की पूर्ति होती है और किसी दस्तावेज के बारे में, जिसका उस उपधारा द्वारा अपेक्षित प्रमाणपत्र होना तात्पर्यित है, जब तक प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कि वह असली है और उसे साक्ष्य में ग्रहण किया जाएगा ।

6. कोई न्यायालय भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64 के अधीन अपराध का संज्ञान, जहां ऐसा अपराध किसी पुरुष द्वारा अठारह वर्ष से कम आयु की अपनी ही पत्नी के साथ मैथुन करता है, उस दशा में न करेगा जब उस अपराध के किए जाने की तारीख से एक वर्ष से अधिक व्यतीत हो चुका है ।

7. इस धारा के उपबंध किसी अपराध के दुष्प्रेरण या अपराध करने के प्रयत्न को ऐसे लागू होंगे, जैसे वे अपराध को लागू होते हैं ।

220. भारतीय न्याय संहिता, 2023  धारा 85 के अधीन अपराधों का अभियोजन

कोई न्यायालय भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान ऐसे अपराध को गठित करने वाले तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर या अपराध से व्यथित व्यक्ति द्वारा या उसके पिता, माता, भाई, बहन द्वारा या उसके पिता या माता के भाई या बहन द्वारा किए गए परिवाद पर या रक्त, विवाह या दत्तक ग्रहण द्वारा उससे संबंधित किसी अन्य व्यक्ति द्वारा न्यायालय की इजाजत से किए गए परिवाद पर ही करेगा अन्यथा नहीं ।

221. अपराध का संज्ञान

कोई भी न्यायालय भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 67 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, जहां व्यक्तियों में वैवाहिक संबंध है, उन तथ्यों का, जिनसे पत्नी द्वारा पति के विरुद्ध परिवाद फाइल किए जाने या किए जाने पर अपराध गठित होता है, प्रथमदृष्ट्या समाधान होने के सिवाय संज्ञान नहीं करेगा ।

222. मानहानि के  लिए अभियोजन

1. कोई न्यायालय भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 356 के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान ऐसे अपराध से व्यथित किसी व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं :

परंतु जहां ऐसा व्यक्ति बालक है या विकृत्त चित्त है या बौद्धिक रूप से दिव्यांग है या रोग या अंग- शैथिल्य के कारण परिवाद करने के लिए असमर्थ है, या ऐसी महिला है, जो स्थानीय रूढ़ियों और रीतियों के अनुसार लोगों के सामने आने के लिए विवश नहीं की जानी चाहिए, वहां उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति न्यायालय की इजाजत से परिवाद कर सकता है ।

2. इस संहिता में किसी बात के होते हुए भी, जब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 356 के अधीन आने वाले किसी अपराध के बारे में यह अभिकथित है कि वह ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो ऐसा अपराध किए जाने के समय भारत का राष्ट्रपति, या भारत का उपराष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल या किसी संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासक या संघ या किसी राज्य का या किसी संघ राज्यक्षेत्र का मंत्री या संघ या किसी राज्य के कार्यकलापों के संबंध में नियोजित अन्य लोक सेवक था, उसके लोक कृत्यों के निर्वहन में उसके आचरण के संबंध में किया गया है तब सेशन न्यायालय, ऐसे अपराध का संज्ञान, उसको मामला सुपुर्द हुए बिना, लोक अभियोजक द्वारा किए गए लिखित परिवाद पर कर सकता है ।

3. उपधारा (2) में निर्दिष्ट ऐसे प्रत्येक परिवाद में वे तथ्य, जिनसे अभिकथित अपराध बनता है, ऐसे अपराध का स्वरूप और ऐसी अन्य विशिष्टियां वर्णित होंगी जो अभियुक्त को उसके द्वारा किए गए अभिकथित अपराध की सूचना देने के लिए उचित रूप से पर्याप्त है ।

4. उपधारा (2) के अधीन लोक अभियोजक द्वारा कोई परिवाद पूर्व मंजूरी से ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं

क. राज्य सरकार की-

i. किसी ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो किसी राज्य का राज्यपाल है या रहा है या किसी राज्य की सरकार का मंत्री है या रहा है ;

ii. किसी राज्य के कार्यकलापों के संबंध में नियोजित किसी अन्य लोक सेवक की दशा में ;

ख. किसी अन्य दशा में, केंद्रीय सरकार की ।

5. कोई सेशन न्यायालय, उपधारा (2) के अधीन किसी अपराध का संज्ञान तभी करेगा जब परिवाद उस तारीख से छह मास के अंदर कर दिया जाता है, जिसको उस अपराध का किया जाना अभिकथित है ।

6. इस धारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति के, जिसके विरुद्ध अपराध का किया जाना अभिकथित है, उस अपराध की बाबत अधिकारिता वाले किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद करने के अधिकार पर या ऐसे परिवाद पर अपराध का संज्ञान करने की ऐसे मजिस्ट्रेट की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

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