धारा 478 से 496 अध्याय 35 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 35

जमानत और बंधपत्रों के बारे में उपबंध

478.किन मामलों में जमानत ली जाएगी

1. जब अजमानतीय अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से भिन्न कोई व्यक्ति पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा वारण्ट के बिना गिरफ्तार या निरुद्ध किया जाता है या न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है और जब वह ऐसे अधिकारी की अभिरक्षा में है उस बीच किसी समय, या ऐसे न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम में, जमानत देने के लिए तैयार है तब ऐसा व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाएगा :

परन्तु यदि ऐसा अधिकारी या न्यायालय ठीक समझता है तो वह ऐसे व्यक्ति से जमानत लेने के बजाय उसे इसमें इसके पश्चात् उपबंधित प्रकार से अपने हाजिर होने के लिए प्रतिभुओं रहित बंधपत्र निष्पादित करने पर उन्मोचित कर सकेगा और यदि ऐसा व्यक्ति निर्धन है और जमानत देने में असमर्थ है, तो उसे ऐसे उन्मोचित करेगा ।

स्पष्टीकरण

जहां कोई व्यक्ति अपनी गिरफ्तारी की तारीख के एक सप्ताह के भीतर जमानत देने में असमर्थ है वहां अधिकारी या न्यायालय के लिए यह उपधारणा करने का पर्याप्त आधार होगा कि वह इस परन्तुक के प्रयोजनों के लिए निर्धन व्यक्ति है:

परन्तु यह और कि इस धारा की कोई बात धारा 135 की उपधारा ( 3 ) या धारा 492 के उपबंधों पर प्रभाव डालने वाली न समझी जाएगी ।

2. उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां कोई व्यक्ति, हाजिरी के समय और स्थान के बारे में बंधपत्र या जमानतपत्र की शर्तों का अनुपालन करने में असफल रहता है वहां न्यायालय उसे, जब वह उसी मामले में किसी पश्चात्वर्ती अवसर पर न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या अभिरक्षा में लाया जाता है, जमानत पर छोड़ने से इंकार कर सकता है और ऐसी किसी इंकारी का, ऐसे बंधपत्र या जमानतपत्र से आबद्ध किसी व्यक्ति से धारा 491 के अधीन उसको शास्ति देने की अपेक्षा करने की न्यायालय की शक्तियों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

479 अधिकतम अवधि, जिसके लिए विचाराधीन कैदी निरुद्ध किया जा सकता है

1. जहां कोई व्यक्ति, किसी विधि के अधीन किसी अपराध के लिए इस संहिता के अधीन (जो ऐसा अपराध नहीं है जिसके लिए उस विधि के अधीन मृत्यु दंड या आजीवन कारावास एक दंड के रूप में विनिर्दिष्ट किया गया है) अन्वेषण, जांच या विचारण की अवधि के दौरान कारावास की उस अधिकतम अवधि के, जो उस विधि के अधीन उस अपराध के लिए विनिर्दिष्ट की गई है, आधे से अधिक की अवधि के लिए निरोध भोग चुका है, वहां वह न्यायालय द्वारा जमानत पर छोड़ दिया जाएगा :

परन्तु ऐसा व्यक्ति प्रथमबार का अपराधी है और (अतीत में किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध नहीं किया गया है) तो वह न्यायालय द्वारा बंधपत्र पर छोड़ दिया जाएगा यदि वह उस विधि के अधीन ऐसे अपराध के लिए विनिर्दिष्ट कारावास की अधिकतम अवधि की एक-तिहाई विस्तार की अवधि तक निरोध रह चुका है:

परन्तु यह और कि न्यायालय, लोक अभियोजक की सुनवाई के पश्चात् और उन कारणों से जो उस द्वारा लेखबद्ध किए जाएंगे, ऐसे व्यक्ति के उक्त आधी अवधि से दीर्घतर अवधि के लिए निरोध को जारी रखने का आदेश कर सकेगा या उसके बंधपत्र के बजाय जमानतपत्र पर उसे छोड़ देगा :

परन्तु यह भी कि कोई भी ऐसा व्यक्ति अन्वेषण, जांच या विचारण की अवधि के दौरान उस विधि के अधीन उक्त अपराध के लिए उपबंधित कारावास की अधिकतम अवधि से अधिक के लिए किसी भी मामले में निरुद्ध नहीं रखा जाएगा ।

स्पष्टीकरण

जमानत मंजूर करने के लिए इस धारा के अधीन निरोध की अवधि की गणना करने में अभियुक्त द्वारा कार्यवाही में किए गए विलंब के कारण भोगी गई निरोध की अवधि को अपवर्जित किया जाएगा ।

2. उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, तथा उसके तीसरे परन्तुक के अधीन रहते हुए, जहां किसी व्यक्ति के विरुद्ध या एक से अधिक अपराध या बहु मामले अन्वेषण, जांच या विचारण के लिए लंबित हैं तो उसे न्यायालय द्वारा जमानत पर नहीं छोड़ा जाएगा ।

3. जेल का अधीक्षक, जहां अभियुक्त व्यक्ति निरुद्ध है, यथास्थिति, उपधारा (1) में उल्लिखित अवधि का आधा या एक-तिहाई पूर्ण होने पर ऐसे व्यक्ति को जमानत पर निर्मुक्त करने के लिए उपधारा (1) के अधीन न्यायालय को कार्यवाही करने के लिए तुरन्त लिखित में आवेदन करेगा ।

480. अजमानतीय अपराध की दशा मैं कब जमानत ली जा सकेगी

1. जब कोई व्यक्ति, जिस पर अजमानतीय अपराध का अभियोग है या जिस पर यह संदेह है कि उसने अजमानतीय अपराध किया है, पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा वारण्ट के बिना गिरफ्तार या निरुद्ध किया जाता है या उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय से भिन्न न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है तब वह जमानत पर छोड़ा जा सकता है, किन्तु -

i. यदि यह विश्वास करने के लिए उचित आधार प्रतीत होते हैं कि ऐसा व्यक्ति मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध का दोषी है तो वह इस प्रकार नहीं छोड़ा जाएगा;

ii. यदि ऐसा अपराध कोई संज्ञेय अपराध है और ऐसा व्यक्ति मृत्यु, आजीवन कारावास या सात वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय किसी अपराध के लिए पहले दोषसिद्ध किया गया है, या वह तीन वर्ष या उससे अधिक के, किन्तु सात वर्ष से अनधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय किसी संज्ञेय अपराध के लिए दो या अधिक अवसरों पर पहले दोषसिद्ध किया गया है तो वह इस प्रकार नहीं छोड़ा जाएगा :

परन्तु न्यायालय यह निदेश दे सकेगा कि खंड (i) या खंड (ii) में निर्दिष्ट व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाए यदि ऐसा व्यक्ति, बालक है या कोई महिला या कोई रोगी या शिथिलांग व्यक्ति है :

परन्तु यह और कि न्यायालय यह भी निदेश दे सकेगा कि खंड (ii) में निर्दिष्ट व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाए, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि किसी अन्य विशेष कारण से ऐसा करना न्यायोचित तथा ठीक है :

परन्तु यह और भी कि केवल यह बात कि अभियुक्त की आवश्यकता, अन्वेषण में साक्षियों द्वारा पहचाने जाने के लिए या प्रथम पन्द्रह दिन से अधिक की पुलिस अभिरक्षा के लिए हो सकती है, जमानत मंजूर करने से इंकार करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं होगी, यदि वह अन्यथा जमानत पर छोड़ दिए जाने के लिए हकदार है और यह वचन देता है कि वह ऐसे निदेशों का, जो न्यायालय द्वारा दिए जाएं, अनुपालन करेगा:

परन्तु यह भी कि किसी भी व्यक्ति को, यदि उस द्वारा किया गया अभिकथित अपराध मृत्यु, आजीवन कारावास या सात वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय है तो लोक अभियोजक को सुनवाई का कोई अवसर दिए बिना इस उपधारा के अधीन न्यायालय द्वारा जमानत पर नहीं छोड़ा जाएगा ।

2. यदि ऐसे अधिकारी या न्यायालय को यथास्थिति, अन्वेषण, जांच या विचारण के किसी प्रक्रम में यह प्रतीत होता है कि यह विश्वास करने के लिए उचित आधार नहीं हैं कि अभियुक्त ने अजमानतीय अपराध किया है किन्तु उसके दोषी होने के बारे में और जांच करने के लिए पर्याप्त आधार हैं तो अभियुक्त धारा 494 के उपबंधों के अधीन रहते हुए और ऐसी जांच लंबित रहने तक जमानत पर या ऐसे अधिकारी या न्यायालय के स्वविवेकानुसार, इसमें इसके पश्चात् उपबंधित प्रकार से अपने हाजिर होने के लिए बंधपत्र निष्पादित करने पर छोड़ दिया जाएगा ।

3. जब कोई व्यक्ति, जिस पर ऐसे कारावास से जिसकी अवधि सात वर्ष तक की या उससे अधिक की है, दंडनीय कोई अपराध या भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अध्याय 6, अध्याय 7 या अध्याय 17 के अधीन कोई अपराध करने या ऐसे किसी अपराध का दुष्प्रेरण या षड्यंत्र या प्रयत्न करने का अभियोग या संदेह है, उपधारा (1) के अधीन जमानत पर छोड़ा जाता है तो न्यायालय यह शर्त अधिरोपित करेगा :-

क. कि ऐसा व्यक्ति इस अध्याय के अधीन निष्पादित बंधपत्र की शर्तों के अनुसार हाजिर होगा

ख. कि ऐसा व्यक्ति उस अपराध जैसा, जिसको करने का उस पर अभियोग या संदेह है, कोई अपराध नहीं करेगा; और

ग.    कि ऐसा व्यक्ति उस मामले के तथ्यों से अवगत किसी व्यक्ति को न्यायालय या किसी पुलिस अधिकारी के समक्ष ऐसे तथ्यों को प्रकट न करने के लिए मनाने के वास्ते प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उसे कोई उत्प्रेरणा, धमकी या वचन नहीं देगा या साक्ष्य को नहीं बिगाड़ेगा, और न्याय के हित में ऐसी अन्य शर्तें, जिसे वह ठीक समझे भी अधिरोपित कर सकेगा ।

 

4. उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन जमानत पर किसी व्यक्ति को छोड़ने वाला अधिकारी या न्यायालय ऐसा करने के अपने कारणों या विशेष कारणों को लेखबद्ध करेगा |

5. यदि कोई न्यायालय, जिसने किसी व्यक्ति को उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन जमानत पर छोड़ा है, ऐसा करना आवश्यक समझता है तो ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने का निदेश दे सकता है और उसे अभिरक्षा के लिए सुपुर्द कर सकता है ।

6. यदि मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय किसी मामले में ऐसे व्यक्ति का विचारण, जो किसी अजमानतीय अपराध का अभियुक्त है, उस मामले में साक्ष्य देने के लिए नियत प्रथम तारीख से साठ दिन की अवधि के अन्दर पूरा नहीं हो जाता है तो, यदि ऐसा व्यक्ति उक्त सम्पूर्ण अवधि के दौरान अभिरक्षा में रहा है तो, जब तक ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे मजिस्ट्रेट अन्यथा निदेश न दे वह मजिस्ट्रेट की समाधानप्रद जमानत पर छोड़ दिया जाएगा ।

7. यदि अजमानतीय अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के विचारण के समाप्त हो जाने के पश्चात् और निर्णय दिए जाने के पूर्व किसी समय न्यायालय की यह राय है कि यह विश्वास करने के उचित आधार हैं कि अभियुक्त किसी ऐसे अपराध का दोषी नहीं है और अभियुक्त अभिरक्षा में है तो वह अभियुक्त को, निर्णय सुनने के लिए अपने हाजिर होने के लिए बंधपत्र उसके द्वारा निष्पादित किए जाने पर छोड़ देगा ।

481.अभियुक्त को अगले अपील न्यायालय के समक्ष उपसंजात होने की अपेक्षा के लिए जमानत

1. विचारण के समाप्त होने से पूर्व और अपील के निपटान से पूर्व, यथास्थिति, अपराध का विचारण करने वाला न्यायालय या अपील न्यायालय अभियुक्त से यह अपेक्षा कर सकेगा कि जब उच्चतर न्यायालय संबंधित न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध फाइल की गई किसी अपील या याचिका की बाबत सूचना जारी करे, तो वह उच्चतर न्यायालय के समक्ष उपसंजात होने के लिए बंधपत्र या जमानतपत्र निष्पादित करे और ऐसे बंधपत्र छह मास तक प्रभावी रहेंगे ।

2. यदि ऐसा अभियुक्त उपसंजात होने में असफल रहता है तो बंधपत्र समपहृत हो जाएगा और धारा 491 के अधीन प्रक्रिया लागू होगी ।

482. गिरफ्तारी की आशंका करने वाले व्यक्ति की जमानत मंजूर करने के लिए निदेश

1. जब किसी व्यक्ति को यह विश्वास करने का कारण है कि हो सकता है उसको किसी अजमानतीय अपराध के किए जाने के अभियोग में गिरफ्तार किया जा सकता है, तो वह इस धारा के अधीन निदेश के लिए उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय को आवेदन कर सकता है; और यदि वह न्यायालय ठीक समझे तो वह निदेश दे सकता है कि ऐसी गिरफ्तारी की स्थिति में उसको जमानत पर छोड़ दिया जाए ।

2. जब उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय उपधारा (1) के अधीन निदेश देता है तब वह उस विशिष्ट मामले के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उन निदेशों में ऐसी शर्तें, जो वह ठीक समझे, सम्मिलित कर सकता है जिनके अन्तर्गत निम्नलिखित भी हैं—

i. यह शर्त कि वह व्यक्ति पुलिस अधिकारी द्वारा पूछे जाने वाले परिप्रश्नों का उत्तर देने के लिए जैसे और जब अपेक्षित हो, उपलब्ध होगा ;

ii. यह शर्त कि वह व्यक्ति उस मामले के तथ्यों से अवगत किसी व्यक्ति को न्यायालय या किसी पुलिस अधिकारी के समक्ष ऐसे तथ्यों को प्रकट न करने के लिए मनाने के वास्ते प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उसे कोई उत्प्रेरणा, धमकी या वचन नहीं देगा

iii. यह शर्त कि वह व्यक्ति न्यायालय की पूर्व अनुज्ञा के बिना भारत नहीं छोड़ेगा

iv. ऐसी अन्य शर्तें जो धारा 480 की उपधारा (3) के अधीन ऐसे अधिरोपित की जा सकती हैं मानो उस धारा के अधीन जमानत मंजूर की गई हो ।

3. यदि तत्पश्चात् ऐसे व्यक्ति को ऐसे अभियोग पर पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा वारण्ट के बिना गिरफ्तार किया जाता है और वह या तो गिरफ्तारी के समय या जब वह ऐसे अधिकारी की अभिरक्षा में है तब किसी समय जमानत देने के लिए तैयार है, तो उसे जमानत पर छोड़ दिया जाएगा तथा यदि ऐसे अपराध का संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट यह विनिश्चय करता है कि उस व्यक्ति के विरुद्ध प्रथम बार ही वारण्ट जारी किया जाना चाहिए, तो वह उपधारा (1) के अधीन न्यायालय के निदेश के अनुरूप जमानतीय वारण्ट जारी करेगा ।

4. इस धारा की कोई बात भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 65 या धारा 70 की उपधारा (2) के अधीन किसी अपराध को कारित करने के अभियोग पर किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी अंतर्वलित करने वाले किसी मामले को लागू नहीं होगी ।

483. जमानत के बारे मैं उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय की विशेष शक्तियां

1. उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय यह निदेश दे सकता है कि, -

क. किसी ऐसे व्यक्ति को, जिस पर किसी अपराध का अभियोग है और जो अभिरक्षा में है, जमानत पर छोड़ दिया जाए और यदि अपराध धारा 480 की उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट प्रकार का है, तो वह ऐसी कोई शर्त जिसे वह उस उपधारा में वर्णित प्रयोजनों के लिए आवश्यक समझे, अधिरोपित कर सकता है;

ख. किसी व्यक्ति को जमानत पर छोड़ने के समय मजिस्ट्रेट द्वारा अधिरोपित कोई शर्त अपास्त या उपांतरित कर दी जाए :

परन्तु उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति की, जो ऐसे अपराध का अभियुक्त है जो अनन्यतः सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है, या जो यद्यपि इस प्रकार विचारणीय नहीं है, आजीवन कारावास से दंडनीय है, जमानत लेने के पूर्व जमानत के लिए आवेदन की सूचना लोक अभियोजक को उस दशा के सिवाय देगा जब उसकी, ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे यह राय है कि ऐसी सूचना देना साध्य नहीं है

परंतु यह और कि उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति को जमानत देने से पूर्व जो भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 65 या धारा 70 की उपधारा (2) के अधीन विचारण योग्य किसी अपराध का अभियुक्त है, ऐसे आवेदन की सूचना की प्राप्ति की तारीख से पन्द्रह दिन की अवधि के भीतर लोक अभियोजक को जमानत के लिए आवेदन की सूचना देगा |

2. सूचना देने वाले या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति की उपस्थिति भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 65 या धारा 70 की उपधारा (2) के अधीन किसी व्यक्ति को जमानत के लिए आवेदन की सुनवाई करते समय बाध्यकारी होगी ।

3. उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय, किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसे इस अध्याय के अधीन जमानत पर छोड़ा जा चुका है, गिरफ्तार करने का निदेश दे सकता है और उसे अभिरक्षा के लिए सुपुर्द कर सकता है ।

484. बंधपत्र की रकम और उसे घटाना

1. इस अध्याय के अधीन निष्पादित प्रत्येक बंधपत्र की रकम मामले की परिस्थितियों का सम्यक् ध्यान रख कर नियत की जाएगी और अत्यधिक नहीं होगी ।

2. उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय यह निदेश दे सकता है कि पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट द्वारा अपेक्षित जमानत घटाई जाए ।

485. अभियुक्त और प्रतिभुओं का बंधपत्र

1. किसी व्यक्ति को बंधपत्र पर या जमानतपत्र पर छोड़े जाने के पूर्व उस व्यक्ति द्वारा, इतनी धनराशि के लिए जितनी, यथास्थिति, पुलिस अधिकारी या न्यायालय पर्याप्त समझे, बंधपत्र निष्पादित किया जाएगा और जब उसे बंधपत्र या जमानतपत्र पर छोड़ा जाएगा तो एक या अधिक पर्याप्त प्रतिभूओं द्वारा यह सशर्त माना जाएगा कि ऐसा व्यक्ति बंधपत्र में वर्णित समय और स्थान पर हाजिर होगा और जब तक यथास्थिति, पुलिस अधिकारी या न्यायालय द्वारा अन्यथा निदेश नहीं दिया जाता है इस प्रकार बराबर हाजिर होता रहेगा ।

2. जहां किसी व्यक्ति को जमानत पर छोड़ने के लिए कोई शर्त अधिरोपित की गई है, वहां बंधपत्र या जमानतपत्र में वह शर्त भी अंतर्विष्ट होगी ।

3. यदि मामले से ऐसा अपेक्षित है तो बंधपत्र या जमानतपत्र द्वारा जमानत पर छोड़े गए व्यक्ति को अपेक्षा किए जाने पर आरोप का उत्तर देने के लिए उच्च न्यायालय, सेशन न्यायालय या अन्य न्यायालय में हाजिर होने के लिए भी आबद्ध किया जाएगा ।

4. यह अवधारित करने के प्रयोजन के लिए कि क्या प्रतिभू उपयुक्त या पर्याप्त है या नहीं, न्यायालय शपथपत्रों को, प्रतिभुओं के पर्याप्त या उपयुक्त होने के बारे में उनमें अन्तर्विष्ट बातों के सबूत के रूप में, स्वीकार कर सकता है या यदि न्यायालय आवश्यक समझे तो वह ऐसे पर्याप्त या उपयुक्त होने के बारे में या तो स्वयं जांच कर सकता है या अपने अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट से जांच करवा सकता है ।

486.प्रतिभुओं द्वारा घोषणा

ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो जमानत पर अभियुक्त व्यक्ति के छोड़े जाने के लिए उसका प्रतिभू है, न्यायालय के समक्ष ऐसे व्यक्तियों की संख्या के बारे में घोषणा करेगा, जिनके लिए उसने प्रतिभूति दी है जिसके अन्तर्गत अभियुक्त भी है और उसमें सभी सुसंगत विशिष्टियां दी जाएंगी ।

487. अभिरक्षा से उन्मोचन

1. ज्यों ही बंधपत्र या जमानतपत्र निष्पादित कर दिया जाता है त्यों ही वह व्यक्ति, जिसकी हाजिरी के लिए वह निष्पादित किया गया है, छोड़ दिया जाएगा और जब वह जेल में हो तब उसकी जमानत मंजूर करने वाला न्यायालय जेल के भारसाधक अधिकारी को उसके छोड़े जाने के लिए आदेश जारी करेगा और वह अधिकारी आदेश की प्राप्ति पर उसे छोड़ देगा ।

2. इस धारा की या धारा 478 या धारा 480 की कोई भी बात किसी ऐसे व्यक्ति के छोड़े जाने की अपेक्षा करने वाली न समझी जाएगी जो ऐसी बात के लिए निरुद्ध किए जाने का भागी है जो उस बात से भिन्न है जिसके बारे में बंधपत्र या जमानतपत्र निष्पादित किया गया है ।

488. जब पहले ली गई जमानत अपर्याप्त है तब पर्याप्त जमानत के लिए आदेश देने की शक्ति

यदि भूल या कपट के कारण या अन्यथा अपर्याप्त प्रतिभू स्वीकार कर लिए गए हैं या यदि वे बाद में अपर्याप्त हो जाते हैं तो न्यायालय यह निदेश देते हुए गिरफ्तारी का वारण्ट जारी कर सकता है कि जमानत पर छोड़े गए व्यक्ति को उसके समक्ष लाया जाए और उसे पर्याप्त प्रतिभू देने का आदेश दे सकता है और उसके ऐसा करने में असफल रहने पर उसे जेल के सुपुर्द कर सकता है ।

489 प्रतिभुओं का उन्मोचन

1. जमानत पर छोड़े गए व्यक्ति की हाजिरी और उपस्थिति के लिए प्रतिभुओं में से सब या कोई बंधपत्र के या तो पूर्णतया या वहां तक, जहां तक वह आवेदकों से संबंधित है, प्रभावोन्मुक्त किए जाने के लिए किसी समय मजिस्ट्रेट से आवेदन कर सकते हैं ।

2. ऐसा आवेदन किए जाने पर मजिस्ट्रेट यह निदेश देते हुए गिरफ्तारी का वारण्ट जारी करेगा कि ऐसे छोड़े गए व्यक्ति को उसके समक्ष लाया जाए ।

3.वारण्ट के अनुसरण में ऐसे व्यक्ति के हाजिर होने पर या उसके स्वेच्छया अभ्यर्पण करने पर मजिस्ट्रेट बंधपत्र के या तो पूर्णतया या, वहां तक, जहां तक कि वह आवेदकों से संबंधित है, प्रभावोन्मुक्त किए जाने का निदेश देगा और ऐसे व्यक्ति से अपेक्षा करेगा कि वह अन्य पर्याप्त प्रतिभू दे और यदि वह ऐसा करने में असफल रहता है तो उसे जेल सुपुर्द कर सकता है।

490. मुचलके के बजाय निक्षेप

जब किसी व्यक्ति से किसी न्यायालय या अधिकारी द्वारा बंधपत्र या जमानतपत्र निष्पादित करने की अपेक्षा की जाती है तब वह न्यायालय या अधिकारी, उस दशा में जब वह बंधपत्र सदाचार के लिए नहीं है उसे ऐसे बंधपत्र के निष्पादन के बदले में इतनी धनराशि या इतनी रकम के सरकारी वचन पत्र, जितनी वह न्यायालय या अधिकारी नियत करे, निक्षिप्त करने की अनुज्ञा दे सकता है।

491.प्रक्रिया,जब  बंधपत्र समपड़त कर लिया जाता है

1. जहां

क. इस संहिता के अधीन कोई बंधपत्र किसी न्यायालय के समक्ष हाजिर होने या सम्पत्ति पेश करने के लिए है और उस न्यायालय या किसी ऐसे न्यायालय को, जिसे तत्पश्चात् मामला अंतरित किया गया है, समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया जाता है कि बंधपत्र समपहृत हो चुका है; या"

ख. इस संहिता के अधीन किसी अन्य बंधपत्र की बाबत उस न्यायालय को, जिसके द्वारा बंधपत्र लिया गया था, या ऐसे किसी न्यायालय को जिसे तत्पश्चात् मामला अंतरित किया गया है, या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के किसी न्यायालय को, समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया जाता है कि बंधपत्र समपहृत हो चुका है, वहां न्यायालय ऐसे सबूत के आधारों को अभिलिखित करेगा और ऐसे बंधपत्र से आबद्ध किसी व्यक्ति से अपेक्षा कर सकेगा कि वह उसकी शास्ति दे या कारण दर्शित करे कि वह क्यों नहीं दी जानी चाहिए ।

स्पष्टीकरण

न्यायालय के समक्ष हाजिर होने या सम्पत्ति पेश करने के लिए बंधपत्र की किसी शर्त का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अंतर्गत ऐसे न्यायालय के समक्ष, जिसको तत्पश्चात् मामला अन्तरित किया जाता है, यथास्थिति, हाजिर होने या सम्पत्ति पेश करने की शर्त भी है।

2. यदि पर्याप्त कारण दर्शित नहीं किया जाता है और शास्ति नहीं दी जाती है तो न्यायालय उसकी वसूली के लिए अग्रसर हो सकेगा मानो वह शास्ति इस संहिता के अधीन उसके द्वारा अधिरोपित जुर्माना हो :

परन्तु जहां ऐसी शास्ति नहीं दी जाती है और वह पूर्वोक्त रूप में वसूल नहीं की जा सकती है वहां, प्रतिभू के रूप में इस प्रकार आबद्ध व्यक्ति उस न्यायालय के आदेश से, जो शास्ति की वसूली का आदेश करता है, सिविल कारागार में कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा ।

3. न्यायालय ऐसा करने के अपने कारणों को लेखबद्ध करने के पश्चात् उल्लिखित शास्ति के किसी प्रभाग का परिहार और केवल भाग के संदाय का प्रवर्तन कर सकता है ।

4. जहां बंधपत्र के लिए कोई प्रतिभू बंधपत्र का समपहरण होने के पूर्व मर जाता है वहां उसकी संपदा, बंधपत्र के बारे में सारे दायित्व से उन्मोचित हो जाएगी ।

5. जहां कोई व्यक्ति, जिसने धारा 125 या धारा 136 या धारा 401 के अधीन प्रतिभूति दी है, किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जाता है, जिसे करना उसके बंधपत्र की या उसके बंधपत्र के बदले में धारा 494 के अधीन निष्पादित बंधपत्र की शर्तों का भंग होता है, वहां उस न्यायालय के निर्णय की, जिसके द्वारा वह ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया था, प्रमाणित प्रतिलिपि उसके प्रतिभू या प्रतिभुओं के विरुद्ध इस धारा के अधीन सब कार्यवाहियों में साक्ष्य के रूप में उपयोग में लाई जा सकती है और यदि ऐसी प्रमाणित प्रतिलिपि इस प्रकार उपयोग में लाई जाती है तो, जब तक प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता है, न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि ऐसा अपराध उसके द्वारा किया गया था ।

492. बंधपत्र और जमानतपत्र का रद्दकरण

धारा 491 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जहां इस संहिता के अधीन कोई बंधपत्र या जमानतपत्र किसी मामले में हाजिर होने के लिए है और उसकी किसी शर्त के भंग होने के कारण उसका समपहरण हो जाता है वहां-

क. ऐसे व्यक्ति द्वारा निष्पादित बंधपत्र तथा उस मामले में उसके प्रतिभुओं द्वारा निष्पादित एक या अधिक बंधपत्र भी यदि कोई हों, रद्द हो जाएंगे और;

ख. तत्पश्चात् ऐसा कोई व्यक्ति उस मामले में केवल अपने ही बंधपत्र पर छोड़ा नहीं जाएगा यदि, यथास्थिति, पुलिस अधिकारी या न्यायालय का, जिसके समक्ष हाजिर होने के लिए बंधपत्र निष्पादित किया गया था, यह समाधान हो जाता है कि बंधपत्र की शर्त का अनुपालन करने में असफल रहने के लिए बंधपत्र से आबद्ध व्यक्ति के पास कोई पर्याप्त कारण नहीं था :

परन्तु इस संहिता के किसी अन्य उपबंध के अधीन रहते हुए, उसे उस मामले में उस दशा में छोड़ा जा सकता है जब वह ऐसी धनराशि के लिए कोई नया व्यक्तिगत बंधपत्र निष्पादित कर दे और ऐसे एक या अधिक प्रतिभुओं से बंधपत्र निष्पादित करा दे जो, यथास्थिति, पुलिस अधिकारी या न्यायालय पर्याप्त समझे ।

493.प्रतिभू के दिवालिया  हो  जाने या उसकी मृत्यु हो जाने या बंधपत्र का समपहरण हो जाने की दशा मैं प्रक्रिया

जब इस संहिता के अधीन जमानतपत्र का कोई प्रतिभू दिवालिया हो जाता है। या मर जाता है या जब किसी बंधपत्र का धारा 491 के उपबंधों के अधीन समपहरण हो जाता है तब वह न्यायालय, जिसके आदेश से ऐसा बंधपत्र लिया गया था या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट, उस व्यक्ति को, जिससे ऐसी प्रतिभूति मांगी गई थी, यह आदेश दे सकता है कि वह मूल आदेश के निदेशों के अनुसार नई प्रतिभूति दे और यदि ऐसी प्रतिभूति न दी जाए तो वह न्यायालय या मजिस्ट्रेट ऐसे कार्यवाही कर सकता है मानो उस मूल आदेश के अनुपालन में व्यतिक्रम किया गया है ।

494.बालक से अपेक्षित बंधपत्र

यदि बंधपत्र निष्पादित करने के लिए किसी न्यायालय या अधिकारी द्वारा अपेक्षित व्यक्ति कोई बालक है तो वह न्यायालय या अधिकारी उसके बदले में केवल प्रतिभू या प्रतिभुओं द्वारा निष्पादित बंधपत्र स्वीकार कर सकता है ।

495. धारा 491 के अधीन आदेशों से अपील

धारा 491 के अधीन किए गए सभी आदेशों की निम्नलिखित को अपील होगी, अर्थात् :-

i. किसी मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए आदेश की दशा में सेशन न्यायाधीश ;

ii. सेशन न्यायालय द्वारा किए गए आदेश की दशा में वह न्यायालय जिसे ऐसे न्यायालय द्वारा किए गए आदेश की अपील होती है ।

496.कतिपय मुचलकों पर देय रकम का उदग्रहण करने का निदेश देने की शक्ति

उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय किसी मजिस्ट्रेट को निदेश दे सकता है कि वह उस रकम को उगृहीत करे जो ऐसे उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय में हाजिर और उपस्थित होने के लिए किसी बंधपत्र पर देय है ।

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