धारा 234 से 247 अध्याय 18 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 18

आरोप

क- आरोपों का प्ररूप

234 आरोप की अंतर्वस्तु

1. इस संहिता के अधीन प्रत्येक आरोप में उस अपराध का कथन होगा, जिसका अभियुक्त पर आरोप है ।

2. यदि उस अपराध का सृजन करने वाली विधि द्वारा उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम दिया गया है तो आरोप में उसी नाम से उस अपराध का वर्णन किया जाएगा ।

3. यदि उस अपराध का सृजन करने वाली विधि द्वारा उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम नहीं दिया गया हो तो अपराध की इतनी परिभाषा देनी होगी जितनी से अभियुक्त को उस बात की सूचना हो जाए जिसका उस पर आरोप है ।

4. वह विधि और विधि की वह धारा, जिसके विरुद्ध अपराध किया जाना कथित है, आरोप में उल्लिखित होगी ।

5. यह तथ्य कि आरोप लगा दिया गया है इस कथन के समतुल्य है कि विधि द्वारा अपेक्षित प्रत्येक शर्त जिससे आरोपित अपराध बनता है उस विशिष्ट मामले में पूरी हो  गई है।

6. आरोप न्यायालय की भाषा में लिखा जाएगा ।

7. यदि अभियुक्त किसी अपराध के लिए पहले दोषसिद्ध किए जाने पर किसी पश्चात्वर्ती अपराध के लिए ऐसी पूर्व दोषसिद्धि के कारण वर्धित दंड का या भिन्न प्रकार के दंड का भागी है और यह आशयित है कि ऐसी पूर्व दोषसिद्धि उस दंड को प्रभावित करने के प्रयोजन के लिए साबित की जाए जिसे न्यायालय पश्चात्वर्ती अपराध के लिए देना ठीक समझे तो पूर्व दोषसिद्धि का तथ्य, तारीख और स्थान आरोप में कथित होंगे : और यदि ऐसा कथन रह गया है तो न्यायालय दंडादेश देने के पूर्व किसी समय भी उसे जोड़ सकेगा ।

दृष्टांत

(क). क पर ख की हत्या का आरोप है । यह बात इस कथन के समतुल्य है कि क का कार्य भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 100 और 101 में दी गई हत्या की परिभाषा के भीतर आता है और वह उसी संहिता के साधारण अपवादों में से किसी के भीतर नहीं आता और वह धारा 101 के पांच अपवादों में से किसी के भीतर भी नहीं आता, या यदि वह अपवाद 1 के भीतर आता है तो उस अपवाद के तीन परंतुकों में से कोई न कोई परंतुक  उसे लागू होता है ।

(ख). क पर असन के उपकरण द्वारा ख को स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने के लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 118 की उपधारा (2) के अधीन आरोप है । यह इस कथन के समतुल्य है कि उस मामले के लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 122 की उपधारा (2) द्वारा उपबंध नहीं किया गया है और साधारण अपवाद उसको लागू नहीं होते हैं ।

(ग). क पर हत्या, छल, चोरी, उद्यापन जारकर्म या आपराधिक अभित्रास या मिथ्या संपत्ति चिह्न को उपयोग में लाने का अभियोग है । आरोप में उन अपराधों की भारतीय न्याय संहिता, 2023 में दी गई परिभाषाओं के निर्देश के बिना यह कथन हो सकता है कि क ने हत्या या छल या चोरी या उद्यापन या जारकर्म या आपराधिक अभित्रास किया है या यह कि उसने मिथ्या संपत्ति चिह्न का उपयोग किया है; किंतु प्रत्येक दशा में वे धाराएं, जिनके अधीन अपराध दंडनीय है, आरोप में निर्दिष्ट करनी पड़ेंगी ।

(घ). क पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 219 के अधीन यह आरोप है कि उसने लोक सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा विक्रय के लिए प्रस्थापित संपत्ति के विक्रय में साशय बाधा डाली है। आरोप उन शब्दों में ही होना चाहिए ।

235. समय, स्थान और व्यक्ति के बारे में विशिष्टियां

1. अभिकथित अपराध के समय और स्थान के बारे में और जिस व्यक्ति के (यदि कोई हो) विरुद्ध या जिस वस्तु के (यदि कोई हो) विषय में वह अपराध किया गया उस व्यक्ति या वस्तु के बारे में ऐसी विशिष्टियां, जैसी अभियुक्त को उस बात की, जिसका उस पर आरोप है, सूचना देने के लिए उचित रूप से पर्याप्त हैं, आरोप में अंतर्विष्ट होंगी ।

2. जब अभियुक्त पर आपराधिक न्यास-भंग या बेईमानी से धन या अन्य जंगम संपत्ति के दुर्विनियोग का आरोप है तब इतना ही पर्याप्त होगा कि विशिष्ट मदों का जिनके विषय में अपराध किया जाना अभिकथित है, या अपराध करने की ठीक-ठीक तारीखों का विनिर्देश किए बिना, उस सकल राशि का विनिर्देश या उस जंगम संपत्ति का वर्णन कर दिया जाता है जिसके विषय में अपराध किया जाना अभिकथित है, और उन तारीखों का, जिनके बीच में अपराध का किया जाना अभिकथित है, विनिर्देश कर दिया जाता है और ऐसे विरचित आरोप धारा 242 के अर्थ में एक ही अपराध का आरोप समझा जाएगा :

परंतु ऐसी तारीखों में से पहली और अंतिम के बीच का समय एक वर्ष से अधिक का होगा |

236. कब अपराध किए जाने की रीति कथित की जानी चाहिए

जब मामला इस प्रकार का है कि धारा 234 और 235 में वर्णित विशिष्टियां अभियुक्त को उस बात की, जिसका उस पर आरोप है, पर्याप्त सूचना नहीं देती तब उस रीति की, जिसमें अभिकथित अपराध किया गया, ऐसी विशिष्टियां भी जैसी उस प्रयोजन के लिए पर्याप्त हैं, आरोप में अंतर्विष्ट होंगी ।

दृष्टांत

(क). क पर वस्तु- विशेष की विशेष समय और स्थान में चोरी करने का अभियोग है । यह आवश्यक नहीं है कि आरोप में वह रीति उपवर्णित हो जिससे चोरी की गई ।

(ख). क पर ख के साथ कथित समय पर और कथित स्थान में छल करने का अभियोग है। आरोप में वह रीति, जिससे क ने ख के साथ छल किया, उपवर्णित करनी होगी ।

(ग). क पर कथित समय पर और कथित स्थान में मिथ्या साक्ष्य देने का अभियोग है। आरोप में क द्वारा दिए गए साक्ष्य का वह भाग उपवर्णित करना होगा जिसका मिथ्या होना अभिकथित है ।

(घ). क पर लोक सेवक ख को उसके लोक कृत्यों के निर्वहन में कथित समय पर और कथित स्थान में बाधित करने का अभियोग है। आरोप में वह रीति उपवर्णित करनी होगी जिससे क ने ख को उसके कृत्यों के निर्वहन में बाधित किया ।

(ङ). क पर कथित समय पर और कथित स्थान में ख की हत्या करने का अभियोग है । यह आवश्यक नहीं है कि आरोप में वह रीति कथित हो जिससे क ने ख की हत्या की ।

(च). क पर ख को दंड से बचाने के आशय से विधि के निदेश की अवज्ञा करने का अभियोग है । आरोपित अवज्ञा और अतिलंधित विधि का उपवर्णन आरोप में करना होगा ।

237. आरोप के शब्दों का वह अर्थ लिया जाएगा जो उनका उस विधि में है जिसके अधीन वह अपराध दंडनीय है

प्रत्येक आरोप में अपराध का वर्णन करने में उपयोग में लाए गए शब्दों को उस अर्थ में उपयोग में लाया गया समझा जाएगा, जो अर्थ उन्हें उस विधि द्वारा दिया गया है जिसके अधीन ऐसा अपराध दंडनीय है ।

238. गलतियों का प्रभाव

अपराध के या उन विशिष्टियों के, जिनका आरोप में कथन होना अपेक्षित है, कथन करने में किसी गलती को और उस अपराध या उन विशिष्टियों के कथन करने में किसी लोप को मामले के किसी प्रक्रम में तब ही तात्त्विक माना जाएगा, जब ऐसी गलती या लोप से अभियुक्त वास्तव में भुलावे में पड़ गया है और उसके कारण न्याय नहीं हो पाया है, अन्यथा नहीं ।

दृष्टान्त

(क). क पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 180 के अधीन यह आरोप है कि "उसने कब्जे में ऐसा कूटकृत सिक्का रखा है जिसे वह उस समय, जब वह सिक्का उसके कब्जे में आया था, जानता था कि वह कूटकृत है" और आरोप में "कपटपूर्वक” शब्द छूट गया है । जब तक यह प्रतीत नहीं होता है कि क वास्तव में इस लोप से भुलावे में पड़ गया, इस गलती को तात्त्विक नहीं समझा जाएगा।

(ख). क पर ख से छल करने का आरोप है और जिस रीति से उसने ख के साथ छल किया है, वह आरोप में उपवर्णित नहीं है या अशुद्ध रूप में उपवर्णित है । क अपनी प्रतिरक्षा करता है, साक्षियों को पेश करता है और संव्यवहार का स्वयं अपना विवरण देता है । न्यायालय इससे अनुमान कर सकता है कि छल करने की रीति के उपवर्णन का लोप तात्त्विक नहीं है ।

(ग). क पर ख से छल करने का आरोप है और जिस रीति से उसने ख से छल किया है वह आरोप में उपवर्णित नहीं है । क और ख के बीच अनेक संव्यवहार हुए हैं और क के पास यह जानने का कि आरोप का निर्देश उनमें से किसके प्रति है कोई साधन नहीं था और उसने अपनी कोई प्रतिरक्षा नहीं की । न्यायालय ऐसे तथ्यों से यह अनुमान कर सकता है कि छल करने की रीति के उपवर्णन का लोप उस मामले में तात्त्विक गलती थी

(घ). क पर 21 जनवरी, 2023 को खुदाबख्श की हत्या करने का आरोप है । वास्तव में हत व्यक्ति का नाम हैदरबख्श था और हत्या की तारीख 20 जनवरी, 2023 थी । क पर कभी भी एक हत्या के अतिरिक्त दूसरी किसी हत्या का आरोप नहीं लगाया गया और उसने मजिस्ट्रेट के समक्ष हुई जांच को सुना था, जिसमें हैदरबख्श के मामले का ही अनन्य रूप से निर्देश किया गया था । न्यायालय इन तथ्यों से यह अनुमान कर सकता है कि क उससे भुलावे में नहीं पड़ा था और आरोप में यह गलती तात्त्विक नहीं थी ।

(ङ). क पर 20 जनवरी, 2023 को हैदरबख्श की हत्या और 21 जनवरी, 2023 को खुदाबख्श की (जिसने उसे उस हत्या के लिए गिरफ्तार करने का प्रयास किया था) हत्या करने का आरोप है । जब वह हैदरबख्श की हत्या के लिए आरोपित हुआ, तब उसका विचारण खुदाबख्श की हत्या के लिए हुआ । उसकी प्रतिरक्षा में उपस्थित साक्षी हैदरबख्श वाले मामले में साक्षी थे । न्यायालय इससे अनुमान कर सकता है कि क भुलावे में पड़ गया था और यह गलती तात्त्विक थी ।

239.न्यायालय आरोप परिवर्तित कर सकता है

1. कोई भी न्यायालय निर्णय सुनाए जाने के पूर्व किसी समय किसी भी आरोप में परिवर्तन या परिवर्धन कर सकता है।

2. ऐसा प्रत्येक परिवर्तन या परिवर्धन अभियुक्त को पढ़कर सुनाया और समझाया जाएगा ।

3. यदि आरोप में किया गया परिवर्तन या परिवर्धन ऐसा है कि न्यायालय की राय में विचारण को तुरंत आगे चलाने से अभियुक्त पर अपनी प्रतिरक्षा करने में या अभियोजक पर मामले के संचालन में कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है, तो न्यायालय ऐसे परिवर्तन या परिवर्धन के पश्चात् स्वविवेकानुसार विचारण को ऐसे आगे चला सकता है मानो परिवर्तित या परिवर्धित आरोप ही मूल आरोप है ।

4. यदि परिवर्तन या परिवर्धन ऐसा है कि न्यायालय की राय में विचारण को तुरंत आगे चलाने से इस बात की संभावना है कि अभियुक्त या अभियोजक पर पूर्वोक्त रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा तो न्यायालय या तो नए विचारण का निदेश दे सकता है या विचारण को इतनी अवधि के लिए, जितनी आवश्यक हो, स्थगित कर सकता है ।

5. यदि परिवर्तित या परिवर्धित आरोप में कथित अपराध ऐसा है, जिसके अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता है, तो उस मामले में ऐसी मंजूरी अभिप्राप्त किए बिना कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी जब तक कि उन्हीं तथ्यों के आधार पर, जिन पर परिवर्तित या परिवर्धित आरोप आधारित हैं, अभियोजन के लिए मंजूरी पहले ही अभिप्राप्त नहीं कर ली गई है।

240. जब आरोप परिवर्तित किया जाता है तब साक्षियों का पुनः बुलाया जाना

जब कभी विचारण प्रारंभ होने के पश्चात् न्यायालय द्वारा आरोप परिवर्तित या परिवर्धित किया जाता है, तब अभियोजक और अभियुक्त को-

क. किसी ऐसे साक्षी को, जिसकी परीक्षा की जा चुकी है, पुनः बुलाने की या पुनः समन करने की और उसकी ऐसे परिवर्तन या परिवर्धन के बारे में परीक्षा करने की अनुज्ञा दी जाएगी जब तक न्यायालय का ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह विचार नहीं है कि अभियोजक या अभियुक्त तंग करने के या विलंब करने के या न्याय के उद्देश्यों को विफल करने के प्रयोजन से ऐसे साक्षी को पुनः बुलाना या उसकी पुनः परीक्षा करना चाहता है ;

ख. किसी अन्य ऐसे साक्षी को भी, जिसे न्यायालय आवश्यक समझे, बुलाने की अनुज्ञा दी जाएगी ।

ख-आरोपों का संयोजन

241 सुभिन्न अपराधों के लिए पृथक् आरोप

1. प्रत्येक सुभिन्न अपराध के लिए, जिसका किसी व्यक्ति पर अभियोग है, पृथक् आरोप होगा और ऐसे प्रत्येक आरोप का विचारण पृथक्तः किया जाएगा :

परंतु जहां अभियुक्त व्यक्ति, लिखित आवेदन द्वारा ऐसा चाहता है और मजिस्ट्रेट की राय है कि उससे ऐसे व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा वहां मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति के विरुद्ध विरचित सभी या किन्हीं आरोपों का विचारण एक साथ कर सकेगा ।

2. उपधारा (1) की कोई बात, धारा 242, धारा 243, धारा 244 और धारा 246 के उपबंधों के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

दृष्टांत

क पर एक अवसर पर चोरी करने और दूसरे किसी अवसर पर घोर उपहति कारित करने का अभियोग है । चोरी के लिए और घोर उपहति कारित करने के लिए क पर पृथक्-पृथक् आरोप लगाने होंगे और उनका विचारण पृथक्तः करना होगा ।

242. एक ही वर्ष में किए गए एक किस्म के अपराधों  का आरोप एक साथ लगाया जा  सके

1. जब किसी व्यक्ति पर एक ही किस्म के ऐसे एक से अधिक अपराधों का अभियोग है, ऐसे अपराधों में से पहले अपराध से लेकर अंतिम अपराध, बारह मास के अंदर ही किए गए हैं, चाहे वे एक ही व्यक्ति के बारे में किए गए हों या नहीं, तब उस पर उनमें से पांच से अनधिक कितने ही अपराधों के लिए एक ही विचारण में आरोप लगाया और विचारण किया जा सकता है ।

2. अपराध एक ही किस्म के तब होते हैं जब वे भारतीय न्याय संहिता, 2023 या किसी विशेष या स्थानीय विधि की एक ही धारा के अधीन समान दंड से दंडनीय होते हैं

परंतु इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 303 की उपधारा (2) के अधीन दंडनीय अपराध उसी किस्म का अपराध है जिस किस्म का उक्त संहिता की धारा 305 के अधीन दंडनीय अपराध है, और भारतीय न्याय संहिता, 2023 या किसी विशेष या स्थानीय विधि की किसी धारा के अधीन दंडनीय अपराध उसी किस्म का अपराध है जिस किस्म का ऐसे अपराध करने का प्रयत्न है, जब ऐसा प्रयत्न ही अपराध हो ।

243 एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण

1. यदि परस्पर संबद्ध ऐसे कार्यों के, जिनसे एक ही संव्यवहार बनता है, एक क्रम में एक से अधिक अपराध एक ही व्यक्ति द्वारा किए गए हैं तो ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए एक ही विचारण में उस पर आरोप लगाया जा सकता है और उसका विचारण किया जा सकता है ।

2. जब धारा 235 की उपधारा (2) में या धारा 242 की उपधारा (1) में उपबंधित रूप में, आपराधिक विश्वास भंग या बेईमानी से सम्पत्ति के दुर्विनियोग के एक या अधिक अपराधों से आरोपित किसी व्यक्ति पर उस अपराध या उन अपराधों के किए जाने को सुकर बनाने या छिपाने के प्रयोजन से लेखाओं के मिथ्याकरण के एक या अधिक अपराधों का अभियोग है, तब उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए एक ही विचारण में आरोप लगाया जा सकता है और विचारण किया जा सकता है |

3. यदि अभिकथित कार्यों से तत्समय प्रवृत्त किसी विधि की, जिससे अपराध परिभाषित या दंडनीय हों, दो या अधिक पृथक् परिभाषाओं में आने वाले अपराध बनते हैं तो जिस व्यक्ति पर उन्हें करने का अभियोग है, उस पर ऐसे अपराधों में से प्रत्येक के लिए एक ही विचारण में आरोप लगाया जा सकता है और विचारण किया जा सकता है ।

4. यदि कई कार्य, जिनमें से एक से या एक से अधिक से स्वयं अपराध गठित करते हैं, मिलकर भिन्न अपराध बनते हैं तो ऐसे कार्यों से मिलकर बने अपराध के लिए और ऐसे कार्यों में से किसी एक या अधिक द्वारा बने किसी अपराध के लिए अभियुक्त व्यक्ति पर एक ही विचारण में आरोप लगाया जा सकता है और विचारण किया जा सकता है।

5. इस धारा की कोई बात भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 9 पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

उपधारा (1) के दृष्टांत

(क).  क एक व्यक्ति ख को, जो विधिपूर्ण अभिरक्षा में है, छुड़ाता है और ऐसा करने में कांस्टेबल ग को, जिसकी अभिरक्षा में ख है, घोर उपहति कारित करता है । क पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 121 की उपधारा (2) और धारा 263 के अधीन अपराधों के लिए आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा ।

(ख).  क दिन में गृहभेदन इस आशय से करता है कि बलात्संग करे और ऐसे प्रवेश किए गए गृह में ख की पत्नी से बलात्संग करता है । क पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64 और धारा 331 की उपधारा (3) के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा ।

(ग).  क के कब्जे में कई मुद्राएं हैं जिन्हें वह जानता है कि वे कूटकृत हैं और कि जिनके संबंध में वह यह आशय रखता है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 337 के अधीन दंडनीय कई कूट रचनाएं करने के प्रयोजन से उन्हें उपयोग में लाए । क पर प्रत्येक मुद्रा पर कब्जे के लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 341 की उपधारा (2) के अधीन पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा ।

(घ).  ख को क्षति कारित करने के आशय से क उसके विरुद्ध दांडिक कार्यवाही यह जानते हुए संस्थित करता है कि ऐसी कार्यवाही के लिए कोई न्यायसंगत या विधिपूर्ण आधार नहीं है और ख पर अपराध करने का मिथ्या अभियोग, यह जानते हुए लगाता है कि ऐसे आरोप के लिए कोई न्यायसंगत या विधिपूर्ण आधार नहीं है । क पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 248 के अधीन दंडनीय दो अपराधों के लिए पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा ।

(ङ).  ख को क्षति कारित करने के आशय से क उस पर एक अपराध करने का अभियोग यह जानते हुए लगाता है कि ऐसे आरोप के लिए कोई न्यायसंगत या विधिपूर्ण आधार नहीं है । विचारण में ख के विरुद्ध क इस आशय से मिथ्या साक्ष्य देता है कि उसके द्वारा ख को मृत्यु से दंडनीय अपराध के लिए दोषसिद्ध करवाए । क पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 248 और धारा 230 के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा ।

(च).  क छह अन्य व्यक्तियों के सहित बलवा करने, घोर उपहति करने और ऐसे लोक सेवक पर, जो ऐसे बल्वे को दबाने का प्रयास ऐसे लोक सेवक के नाते अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में कर रहा है, हमला करने के अपराध करता है । क पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 117 की उपधारा (2), धारा 191 की उपधारा (2) और धारा 195 के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा ।

(छ).  ख, ग और घ के शरीर को क्षति की धमकी क इस आशय से एक ही समय देता है कि उन्हें संत्रास कारित किया जाए । क पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 351 की उपधारा (2) और उपधारा (3) के अधीन तीनों अपराधों में से प्रत्येक के लिए पृथक्त आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा ।

दृष्टांत (क) से लेकर (छ) तक में क्रमशः निर्दिष्ट पृथक् आरोपों का विचारण एक ही समय किया जा सकेगा ।

उपधारा (3) के दृष्टांत

(ज).  क बेंत से ख पर सदोष आघात करता है । क पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115 की उपधारा (2) और धारा 131 के अधीन अपराधों के लिए पृथक्त: आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।

(झ).  चुराए हुए धान्य के कई बोरे क और ख को, जो यह जानते हैं कि वे चुराई हुई संपत्ति हैं, इस प्रयोजन से दे दिए जाते हैं कि वे उन्हें छिपा दें। तब क और ख उन बोरों को अनाज की खेती के तले में छिपाने में स्वेच्छया एक दूसरे की मदद करते हैं । क और ख पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 317 की उपधारा (2) और उपधारा (5) के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और वे दोषसिद्ध किए जा सकेंगे ।

(ञ).  क अपने बालक को यह जानते हुए अरक्षित डाल देती है कि यह संभाव्य है  की  उससे वह उसकी मृत्यु कारित कर दे । बालक ऐसे अरक्षित डाले जाने के परिणामस्वरूप मर जाता है । क पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 93 और धारा 105 के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध की जा सकेगी ।

(ट).  क कूटरचित दस्तावेज को बेईमानी से असली साक्ष्य के रूप में इसलिए उपयोग में लाता है कि एक लोक सेवक ख को भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 201 के अधीन अपराध के लिए दोषसिद्ध करे । क पर उस संहिता की धारा 337 के साथ पठित )  धारा 233 और धारा 340 की उपधारा (2) के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा ।

उपधारा (4) का दृष्टांत

(ठ).  ख को क लूटता है और ऐसा करने में उसे स्वेच्छया उपहति कारित करता है । क पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115 की उपधारा (2) और धारा 309 की उपधारा (2) और उपधारा (4) के अधीन अपराधों के लिए पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा ।

244 जहां इस बारे में संदेह है कि कौन- सा अपराध किया गया है

1. यदि कोई एक कार्य या कार्यों का क्रम इस प्रकृति का है कि यह संदेह है कि उन तथ्यों से, जो सिद्ध किए जा सकते हैं, कई अपराधों में से कौन सा अपराध बनेगा तो अभियुक्त पर ऐसे सब अपराध या उनमें से कोई करने का आरोप लगाया जा सकेगा और ऐसे आरोपों में से कितनों पर एक साथ विचारण किया जा सकेगा या उस पर उक्त अपराधों में से किसी एक को करने का अनुकल्पतः आरोप लगाया जा सकेगा ।

2. यदि ऐसे मामले में अभियुक्त पर एक अपराध का आरोप लगाया गया है और साक्ष्य से यह प्रतीत होता है कि उसने भिन्न अपराध किया है, जिसके लिए उस पर उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन आरोप लगाया जा सकता था, तो वह उस अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकेगा जिसका उसके द्वारा किया जाना दर्शित है, यद्यपि उसके लिए उस पर आरोप नहीं लगाया गया था

दृष्टांत

(क).  क पर ऐसे कार्य का अभियोग है जो चोरी की, या चुराई गई संपत्ति प्राप्त करने की, या आपराधिक न्यास भंग की, या छल की कोटि में आ सकता है । उस पर चोरी करने, चुराई हुई संपत्ति प्राप्त करने, आपराधिक न्यास-2 न भंग करने और छल करने का आरोप लगाया जा सकेगा या उस पर चोरी करने का या चोरी की संपत्ति प्राप्त करने का या आपराधिक न्यास भंग करने का या छल करने का आरोप लगाया जा सकेगा ।

(ख).  ऊपर वर्णित मामले में क पर केवल चोरी का आरोप है। यह प्रतीत होता है कि उसने आपराधिक न्यास-भंग का या चुराई हुई संपत्ति प्राप्त करने का अपराध किया है । वह (यथास्थिति) आपराधिक न्यास-भंग या चुराई हुई संपत्ति प्राप्त करने के लिए दोषसिद्ध किया जा सकेगा, यद्यपि उस पर उस अपराध का आरोप नहीं लगाया गया था ।

(ग).  क मजिस्ट्रेट के समक्ष शपथ पर कहता है कि उसने देखा कि ख ने ग को लाठी मारी । सेशन न्यायालय के समक्ष क शपथ पर कहता है कि ख ने ग को कभी नहीं मारा । यद्यपि यह साबित नहीं किया जा सकता कि इन दो परस्पर विरुद्ध कथनों में से कौन सा

(घ).  मिथ्या है तथापि क पर साशय मिथ्या साक्ष्य देने के लिए अनुकल्पतः आरोप लगाया जा सकेगा और वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा ।

245.जब वह अपराध, जो साबित हुआ है, आरोपित अपराध  के अंतर्गत है

1. जब किसी व्यक्ति पर ऐसे अपराध का आरोप है जिसमें कई विशिष्टियां हैं, जिनमें से केवल कुछ के संयोग से एक पूरा छोटा अपराध बनता है और ऐसा संयोग साबित हो जाता है किन्तु शेष विशिष्टियां साबित नहीं होती हैं तब वह उस छोटे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकता है यद्यपि उस पर उसका आरोप नहीं था ।

2. जब किसी व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप लगाया गया है और ऐसे तथ्य साबित कर दिए जाते हैं जो उसे घटाकर छोटा अपराध कर देते हैं तब वह छोटे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकता है यद्यपि उस पर उसका आरोप नहीं था ।

3. जब किसी व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप है तब वह उस अपराध को करने के प्रयत्न के लिए दोषसिद्ध किया जा सकता है यद्यपि प्रयत्न के लिए पृथक् आरोप न लगाया गया हो ।

4. इस धारा की कोई बात किसी छोटे अपराध के लिए उस दशा में दोषसिद्धि प्राधिकृत करने वाली न समझी जाएगी जिसमें ऐसे छोटे अपराध के बारे में कार्यवाही शुरू करने के लिए अपेक्षित शर्तें पूरी नहीं हुई हैं ।

दृष्टांत

(क).  क पर उस संपत्ति के बारे में, जो वाहक के नाते उसके पास न्यस्त है, आपराधिक न्यास-भंग के लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 316 की उपधारा (3) के अधीन आरोप लगाया गया है। यह प्रतीत होता है कि उस संपत्ति के बारे में धारा 316 की उपधारा (2) के अधीन उसने आपराधिक न्यास भंग तो किया है किन्तु वह उसे वाहक के रूप में न्यस्त नहीं की गई थी। वह धारा 316 की उपधारा (2) के अधीन आपराधिक न्यास भंग के लिए दोषसिद्ध किया जा सकेगा ।

(ख).  क पर घोर उपहति कारित करने के लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 117 की उपधारा (2) के अधीन आरोप है । वह साबित कर देता है कि उसने घोर और आकस्मिक प्रकोपन पर कार्य किया था । वह उस संहिता की धारा 122 की उपधारा (2) के अधीन दोषसिद्ध किया जा सकेगा ।

246.किन व्यक्तियों पर संयुक्त रूप से आरोप लगाया जा सकेगा

निम्नलिखित व्यक्तियों पर एक साथ आरोप लगाया जा सकेगा और उनका एक साथ विचारण किया जा सकेगा, अर्थात्:-

क. वे व्यक्ति, जिन पर एक ही संव्यवहार के अनुक्रम में किए गए एक ही अपराध का अभियोग है ;

ख. वे व्यक्ति, जिन पर किसी अपराध का अभियोग है और वे व्यक्ति, जिन पर ऐसे अपराध का दुष्प्रेरण या प्रयत्न करने का अभियोग है ;

ग. वे व्यक्ति, जिन पर बारह मास की अवधि के भीतर संयुक्त रूप में उनके द्वारा किए गए धारा 242 के अर्थांतर्गत एक ही किस्म के एक से अधिक अपराधों का अभियोग है ;

घ. वे व्यक्ति, जिन पर एक ही संव्यवहार के अनुक्रम में दिए गए भन्न अपराधों का अभियोग है ;

ङ. वे व्यक्ति, जिन पर ऐसे अपराध का, जिसके अन्तर्गत चोरी, उद्दपन, छल या आपराधिक दुर्विनियोग भी है, अभियोग है और वे व्यक्ति, जिन पर ऐसी संपत्ति को, जिसका कब्जा प्रथम नामित व्यक्तियों द्वारा किए गए किसी ऐसे अपराध द्वारा अन्तरित किया जाना अभिकथित है, प्राप्त करने या रखे रखने या उसके व्ययन या छिपाने में सहायता करने का या किसी ऐसे अंतिम नामित अपराध का दुष्प्रेरण या प्रयत्न करने का अभियोग है ;

च. वे व्यक्ति, जिन पर ऐसी चुराई हुई संपत्ति के बारे में, जिसका कब्जा एक ही अपराध द्वारा अंतरित किया गया है, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 317 की उपधारा (2) और उपधारा (5) के, या उन धाराओं में से किसी के अधीन अपराधों का अभियोग है ;

छ. वे व्यक्ति, जिन पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अध्याय 10 के अधीन कूटकृत सिक्के के संबंध में किसी अपराध का अभियोग है और वे व्यक्ति जिन पर उसी सिक्के के संबंध में उक्त अध्याय के अधीन किसी भी अन्य अपराध का या किसी ऐसे अपराध का दुष्प्रेरण या प्रयत्न करने का अभियोग है; और इस अध्याय के पूर्ववर्ती भाग के उपबंध सब ऐसे आरोपों को यथाशक्य लागू होंगे :

परन्तु जहां अनेक व्यक्तियों पर पृथक् अपराधों का आरोप लगाया जाता है और वे व्यक्ति इस धारा में विनिर्दिष्ट कोटियों में से किसी में नहीं आते हैं वहां मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय ऐसे सब व्यक्तियों का विचारण एक साथ कर सकता है यदि ऐसे व्यक्ति लिखित आवेदन द्वारा ऐसा चाहते हैं और मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय का समाधान हो जाता है कि उससे ऐसे व्यक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा और ऐसा करना समीचीन है ।

247. कई आरोपों में से एक के लिए दोषसिद्धि पर शेष आरोपों को वापस लेना

जब एक ही व्यक्ति के विरुद्ध ऐसा आरोप विरचित किया जाता है जिसमें एक से अधिक शीर्ष हैं और, जब उनमें से एक या अधिक के लिए, दोषसिद्धि कर दी जाती है। तब परिवादी या अभियोजन का संचालन करने वाला अधिकारी न्यायालय की सम्मति से शेष आरोप या आरोपों को वापस ले सकता है या न्यायालय ऐसे आरोप या आरोपों की जांच या विचारण स्वप्रेरणा से रोक सकता है और ऐसे वापस लेने का प्रभाव ऐसे आरोप या आरोपों से दोषमुक्ति होगा; किन्तु यदि दोषसिद्धि अपास्त कर दी जाती है तो उक्त न्यायालय (दोषसिद्धि अपास्त करने वाले न्यायालय के आदेश के अधीन रहते हुए) ऐसे वापस लिए गए आरोप या आरोपों की जांच या विचारण में आगे कार्यवाही कर सकता है।

 

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