
भाग 19
प्रकीर्ण
361. राष्ट्रपति और राज्यपालों और राजप्रमुखों का संरक्षण –
1. राष्ट्रपति अथवा राज्य का राज्यपाल या राजप्रमुख अपने पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन के लिए या उन शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का पालन करते हुए अपने द्वारा किए गए या किए जाने के लिए तात्पर्यित किसी कार्य के लिए किसी न्यायालय को उत्तरदायी नहीं होगा :
परन्तु अनुच्छेद 61 के अधीन आरोप के अन्वेषण के लिए संसद् के किसी सदन द्वारा नियुक्त या अभिहित किसी न्यायालय, अधिकरण या निकाय द्वारा राष्ट्रपति के आचरण का पुनर्विलोकन किया जा सकेगा:
परन्तु यह और कि इस खंड की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के विरुद्ध समुचित कार्यवाहियां चलाने के किसी व्यक्ति के अधिकार को निर्बंधित करती है ।
2. राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल 1[***] के विरुद्ध उसकी पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में किसी भी प्रकार की दांडिक कार्यवाही संस्थित नहीं की जाएगी या चालू नहीं रखी जाएगी । (1. संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 29 और अनुसूची द्वारा (1-11-1956 से) "या राजप्रमुख" शब्दों का लोप किया गया ।)
3. राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल 1[***] की पदावधि के दौरान उसकी गिरफ्तारी या कारावास के लिए किसी न्यायालय से कोई आदेशिका निकाली नहीं जाएगी । (1. संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 29 और अनुसूची द्वारा (1-11-1956 से) "या राजप्रमुख" शब्दों का लोप किया गया ।)
4. राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल 1[***] के रूप में अपना पद ग्रहण करने से पहले या उसके पश्चात्, उसके द्वारा अपनी वैयक्तिक हैसियत में किए गए या किए जाने के लिए तात्पर्यित किसी कार्य के संबंध में कोई सिविल कार्यवाहियां, जिनमें राष्ट्रपति या ऐसे राज्य के राज्यपाल 1[***] के विरुद्ध अनुतोष का दावा किया जाता है, उसकी पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में तब तक संस्थित नहीं की जाएगी जब तक कार्यवाहियों की प्रकृति, उनके लिए वाद हेतुक, ऐसी कार्यवाहियों को संस्थित करने वाले पक्षकार का नाम, वर्णन, निवास स्थान और उस अनुतोष का जिसका वह दावा करता है, कथन करने वाली लिखित सूचना, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल 1[***] को परिदत्त किए जाने या उसके कार्यालय में छोड़े जाने के पश्चात् दो मास का समय समाप्त नहीं हो गया है । (1. संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 29 और अनुसूची द्वारा (1-11-1956 से) "या राजप्रमुख" शब्दों का लोप किया गया ।)
1[361क. संसद् और राज्यों के विधान-मंडलों की कार्यवाहियों के प्रकाशन का संरक्षण –
1. कोई व्यक्ति संसद् के किसी सदन या, यथास्थिति, किसी राज्य की विधान सभा या किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन की किन्ही कार्यवाहियों के सारतः सही विवरण के किसी समाचारपत्र में प्रकाशन के संबंध में किसी न्यायालय में किसी भी प्रकार की सिविल या दांडिक कार्यवाही का तब तक भागी नहीं होगा जब तक यह साबित नहीं कर दिया जाता है कि प्रकाशन विद्वेषपूर्वक किया गया है: (1. संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 42 द्वारा (20-6-1979 से) अंतःस्थापित ।)
परन्तु इस खंड की कोई बात संसद् के किसी सदन या, यथास्थिति, किसी राज्य की विधान सभा या किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन की गुप्त बैठक की कार्यवाहियों के विवरण के प्रकाशन को लागू नहीं होगी ।
2. खंड (1) किसी प्रसारण केन्द्र के माध्यम से उपलब्ध किसी कार्यक्रम या सेवा के भागरूप बेतार तारयांत्रिकी के माध्यम से प्रसारित रिपोर्टों या सामग्री के संबंध में उसी प्रकार लागू होगा जिस प्रकार वह किसी समाचारपत्र में प्रकाशित रिपोर्टों या सामग्री के संबंध में लागू होता है ।
स्पष्टीकरण –
इस अनुच्छेद में, "समाचारपत्र" के अंतर्गत समाचार एजेंसी की ऐसी रिपोर्ट है जिसमें किसी समाचारपत्र में प्रकाशन के लिए सामग्री अंतर्विष्ट है ।]
2[361ख. लाभप्रद राजनीतिक पद पर नियुक्ति के लिए निरर्हता –
किसी राजनीतिक दल से सम्बन्धित सदन का कोई सदस्य, जो दसवीं अनुसूची के परिच्छेद 2 के अधीन सदन का सदस्य होने के लिए निरर्हित किया जाता है, अपनी निरर्हता की तारीख से उस तारीख तक, जिसको वह ऐसे सदस्य के रूप में उसके पद की अवधि का अवसान होगा यह उस तारीख तक, जिसको वह सदन का चुनाव लड़ता है और निर्वाचित घोषित किया जाता है, जो भी पहले हो की अवधि के दौरान के लिए किसी लाभप्रद किसी राजनीतिक पद को धारण करने से भी निरर्हित होगा। (2. संविधान (इक्यानवेवां संशोधन) अधिनियम, 2003 की धारा 4 द्वारा (1-1-2004 से) अंतःस्थापित |)
स्पष्टीकरण –
इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए,-
(क) "सदन" अभिव्यक्ति का वही अर्थ है, जो उसे दसवीं अनुसूची के परिच्छेद 1 के खण्ड (क) में समनुदेशित किया गया है।
(ख) भिव्यक्ति लाभप्रद राजनीतिक पद से कोई पद अभिप्रेत है-
(i) जो भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन हो, जहाँ ऐसे पद के लिए वेतन या पारिश्रमिक का भुगतान भारत सरकार या राज्य सरकार, यथास्थिति के सार्वजनिक राजस्व से किया जाता है, या
(ii) जो निकाय के अधीन हो, चाहे निगमित हो या नहीं, जो पूर्णतः या अंशतः भारत सरकार या राज्य सरकार के स्वामित्वाधीन हो और ऐसे पद के लिए वेतन या पारिश्रमिक का भुगतान ऐसे निकाय द्वारा किया जाता है, सिवाय वहाँ के, जहाँ भुगतान किया गया ऐसा वेतन या पारिश्रमिक प्रकृति में प्रतीकात्मक है ।]
362. देशी राज्यों के शासकों के अधिकार और विशेषाधिकार-
संविधान (छब्बीसवां संशोधन) अधिनियम, 1971 की धारा 2 द्वारा निरसित।
363. कुछ संधियों, करारों आदि से उत्पन्न विवादों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन –
1. इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, अनुच्छेद 143 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय को किसी ऐसी संधि, करार, प्रसंविदा, बचनबंध, सनद या वैसी ही अन्य लिखत के किसी उपबंध से, जो इस संविधान के प्रारंभ से पहले किसी देशी राज्य के शासक द्वारा की गई थी या निष्पादित की गई थी और जिसमें भारत डोमिनियन की सरकार या उसकी पूर्ववर्ती कोई सरकार एक पक्षकार थी और जो ऐसे प्रारंभ के पश्चात् प्रवर्तन में है या प्रवर्तन में बनी रही है, उत्पन्न किसी विवाद में या ऐसी संधि, करार, प्रसंविदा, वचनबंध, सनद या वैसी ही अन्य लिखत से संबंधित इस संविधान के किसी उपबंध के अधीन प्रोद्भूत किसी अधिकार या उससे उद्भूत किसी दायित्व या बाध्यता के संबंध में किसी विवाद में अधिकारिता नहीं होगी।
2. इस अनुच्छेद में-
(क) "देशी राज्य" से ऐसा राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है जिसे हिज मजेस्टी से या भारत डोमिनियन की सरकार से इस संविधान के प्रारंभ से पहले ऐसे राज्य के रूप में मान्यता प्राप्त थी; और
(ख) "शासक" के अंतर्गत ऐसा राजा, प्रमुख या अन्य व्यक्ति है जिसे हिज मजेस्टी से या भारत डोमिनियन की सरकार से ऐसे प्रारंभ से पहले किसी देशी राज्य के शासक के रूप में मान्यता प्राप्त थी ।
1[363क. देशी राज्यों के शासकों को दी गई मान्यता की समाप्ति और निजी थैलियों का अंत –
इस संविधान या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी – (1. संविधान (छब्बीसवां संशोधन) अधिनियम, 1971 की धारा 3 द्वारा (28-12-1971 से) अंतःस्थापित ।)
(क) ऐसा राजा, प्रमुख या अन्य व्यक्ति, जिसे संविधान (छब्बीसवां संशोधन) अधिनियम, 1971 के प्रारंभ से पहले किसी समय राष्ट्रपति से किसी देशी राज्य के शासक के रूप में मान्यता प्राप्त थी, या ऐसा व्यक्ति, जिसे ऐसे प्रारंभ से पहले किसी समय राष्ट्रपति से ऐसे शासक के उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता प्राप्त थी, ऐसे प्रारंभ को और से ऐसे शासक या ऐसे शासक के उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं रह जाएगा;
(ख) संविधान (छब्बीसवां संशोधन) अधिनियम, 1971 के प्रारंभ को और से निजी शैली का अंत किया जाता है और निजी थैली की बाबत सभी अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं निर्वापित की जाती हैं और तदनुसार खंड (क) में निर्दिष्ट, यथास्थिति, शासक या ऐसे शासक के उत्तराधिकारी को या अन्य व्यक्ति को किसी राशि का निजी थैली के रूप में संदाय नहीं किया जाएगा |]
364. महापत्तनों और विमानक्षेत्रों के बारे में विशेष उपबंध –
1. इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति लोक अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगा कि ऐसी तारीख से, जो उस अँधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए,-
(क) संसद् या किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई कोई विधि किसी महापतन या विमानक्षेत्र को लागू नहीं होगी अथवा ऐसे अपवाद या उपांतरणों के अधीन रहते हुए लागू होगी जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं; या
(ख) कोई विद्यमान विधि किसी महापतन या विमानक्षेत्र में उन बातों के सिवाय प्रभावी नहीं रहेगी जिन्हें उक्त तारीख से पहले किया गया है या करने का लोप किया गया है अथवा ऐसे पतन या विमानक्षेत्र को लागू होने में ऐसे अपवादों या उपांतरणों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगी जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
2. इस अनुच्छेद में-
(क) "महापत्तन" से ऐसा पत्तन अभिप्रेत है जिसे संसद् द्वारा बनाई गई किसी विधि या किसी विद्यमान विधि द्वारा या उसके अधीन महापतन घोषित किया गया है और इसके अंतर्गत ऐसे सभी क्षेत्र हैं जो उस समय ऐसे पत्तन की सीमाओं के भीतर हैं ;
(ख) "विमानक्षेत्र” से वायु मार्गों, वायुयानों और विमान चालन से संबंधित अधिनियमितियों के प्रयोजनों के लिए यथा परिभाषित विमानक्षेत्र अभिप्रेत है ।
365. संघ द्वारा दिए गए निदेशों का अनुपालन करने में या उनको प्रभावी करने में असफलता का प्रभाव-
जहां इस संविधान के किसी उपबंध के अधीन संघ की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करते हुए दिए गए किन्हीं निदेशों का अनुपालन करने में या उनको प्रभावी करने में कोई राज्य असफल रहता है वहां राष्ट्रपति के लिए यह मानना विधिपूर्ण होगा कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें उस राज्य का शासन इस संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है।
366. परिभाषाएं –
इस संविधान में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, निम्नलिखित पदों के निम्नलिखित अर्थ हैं, अर्थात् :-
1. "कृषि आय" से भारतीय आय-कर से संबंधित अधिनियमितियों के प्रयोजनों के लिए यथा परिभाषित कृषि आय अभिप्रेत है;
2. "आंग्ल-भारतीय" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसका पिता या पितृ- परंपरा में कोई अन्य पुरुष जनक यूरोपीय उद्भव का है या था, किन्तु जो भारत के राज्यक्षेत्र में अधिवासी है और जो ऐसे राज्यक्षेत्र में ऐसे माता-पिता से जन्मा है या जन्मा था जो वहां साधारणतया निवासी रहे हैं और केवल अस्थायी प्रयोजनों के लिए वास नहीं कर रहे हैं;
3. "अनुच्छेद" से इस संविधान का अनुच्छेद अभिप्रेत है;
4. "उधार लेना” के अंतर्गत वार्षिकियां देकर धन लेना है और "उधार" का तदनुसार अर्थ लगाया जाएगा;
1[(4क) (1. संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 54 द्वारा (1-2-1977 से) खंड (क) अन्तःस्थापित किया गया और उसका संविधान (तैतालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1977 की धारा 11 द्वारा (13-4-1978 से लोप किया गया।)
5. "खंड” से उस अनुच्छेद का खंड अभिप्रेत है जिसमें वह पद आता है;
6. "निगम कर" से कोई आय पर कर अभिप्रेत है, जहां तक वह कर कंपनियों द्वारा संदेय है और ऐसा कर है जिसके संबंध में निम्नलिखित शर्तें पूरी होती हैं, अर्थात् :-
(क) वह कृषि आय के संबंध में प्रभार्य नहीं है;
(ख) कंपनियों द्वारा संदत्त कर के संबंध में कंपनियों द्वारा व्यष्टियों को संदेय लाभांशों में से किसी कटौती का किया जाना उस कर को लागू अधिनियमितियों द्वारा प्राधिकृत नहीं है;
(ग) ऐसे लाभांश प्राप्त करने वाले व्यष्टियों की कुल आय की भारतीय आय-कर के प्रयोजनों के लिए गणना करने में अथवा ऐसे व्यष्टियों द्वारा संदेय या उनको प्रतिदेय भारतीय आय-कर की गणना करने में, इस प्रकार संदत्त कर को हिसाब में लेने के लिए कोई उपबंध विद्यमान नहीं है;
7. शंका की दशा में, "तत्स्थानी प्रांत", "तत्स्थानी देशी राज्य" या "तत्स्थानी राज्य" से ऐसा प्रांत, देशी राज्य या राज्य अभिप्रेत है जिसे राष्ट्रपति प्रश्नगत किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए, यथास्थिति, तत्स्थानी प्रांत तत्स्थानी देशी राज्य या तत्स्थानी राज्य अवधारित करे ;
8. "ऋण" के अंतर्गत वार्षिकियों के रूप में मूलधन के प्रतिसंदाय की किसी बाध्यता के संबंध में कोई दायित्व और किसी प्रत्याभूति के अधीन कोई दायित्व है और "ऋणभार का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा;
9. "संपदा शुल्क" से वह शुल्क अभिप्रेत है जो ऐसे नियमों के अनुसार जो संसद् या किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा ऐसे शुल्क के संबंध में बनाई गई विधियों द्वारा या उनके अधीन विहित किए जाएं, मृत्यु पर संक्रांत होने वाली या उक्त विधियों के उपबंधों के अधीन इस प्रकार संक्रांत हुई समझी गई सभी संपत्ति के मूल मूल्य पर या उसके प्रति निर्देश से, निर्धारित किया जाए;
10. "विद्यमान विधि से ऐसी विधि, अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम या विनियम अभिप्रेत है जो इस संविधान के प्रारंभ से पहले ऐसी विधि, अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम या विनियम बनाने की शक्ति रखने वाले किसी विधान-मंडल, प्राधिकारी या व्यक्ति द्वारा पारित किया गया है या बनाया गया है;
11."फेडरल न्यायालय” से भारत शासन अधिनियम, 1935 के अधीन गठित फेडरल न्यायालय अभिप्रेत है;
12. “माल” के अंतर्गत सभी सामग्री, वाणिज्या और वस्तुएं हैं;
'1[ (12 क) "माल और सेवा कर" से मानवीय उपभोग के लिए एल्कोहाली लिकर के प्रदाय पर कर के सिवाय माल या सेवाओं अथवा दोनों के प्रदाय पर कोई कर अभिप्रेत है;] (1. संविधान (एक सौ एकवां संशोधन) अधिनियम, 2016 की धारा 14(i) द्वारा (16-9-2016 से अंतःस्थापित ।)
13. "प्रत्याभूति" के अंतर्गत ऐसी बाध्यता है जिसका किसी उपक्रम के लाभों के किसी विनिर्दिष्ट रकम से कम होने की दशा में, संदाय करने का वचनबंध इस संविधान के प्रारंभ से पहले किया गया है।
14. "उच्च न्यायालय से ऐसा न्यायालय अभिप्रेत है जो इस संविधान के प्रयोजनों के लिए किसी राज्य के लिए उच्च न्यायालय समझा जाता है और इसके अंतर्गत -
(क) भारत के राज्यक्षेत्र में इस संविधान के अधीन उच्च न्यायालय के रूप में गठित या पुनर्गठित कोई न्यायालय है, और
(ख) भारत के राज्यक्षेत्र में संसद् द्वारा विधि द्वारा इस संविधान के सभी या किन्हीं प्रयोजनों के लिए उच्च न्यायालय के रूप में घोषित कोई अन्य न्यायालय है;
15."देशी राज्य" से ऐसा राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है जिसे भारत डोमिनियन की सरकार से ऐसे राज्य के रूप में मान्यता प्राप्त थी;
16. "भाग" से इस संविधान का भाग अभिप्रेत है;
17. "पेंशन" से किसी व्यक्ति को या उसके संबंध में संदेय किसी प्रकार की पेंशन अभिप्रेत है चाहे वह अभिदायी है या नहीं है और इसके अंतर्गत इस प्रकार संदेय सेवानिवृत्ति वेतन इस प्रकार संदेय उपदान और किसी भविष्य निधि के अभिदानों की, उन पर ब्याज या उनमें अन्य परिवर्धन सहित या उसके बिना, वापसी के रूप में इस प्रकार संदेय कोई राशि या राशियां हैं;
18."आपात की उद्घोषणा से अनुच्छेद 352 के खंड (1) के अधीन की गई उद्घोषणा अभिप्रेत है;
19."लोक अधिसूचना" से, यथास्थिति, भारत के राजपत्र में या किसी राज्य के राजपत्र में अधिसूचना अभिप्रेत है;
20. "रेल" के अंतर्गत-
(क) किसी नगरपालिक क्षेत्र में पूर्णतया स्थित ट्राम नहीं है, या
(ख) किसी राज्य में पूर्णतया स्थित संचार की ऐसी अन्य लाइन नहीं है जिसकी बाबत संसद् ने विधि द्वारा घोषित किया है कि वह रेल नहीं है;
21. 1(1. संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 29 और अनुसूची द्वारा (1-11-1956 से) खंड (21) का लोप किया गया ।)
22. "शासक" से ऐसा राजा, 2[प्रमुख या अन्य व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे संविधान (छब्बीसवां संशोधन) अधिनियम, 1971 के प्रारंभ से पहले किसी समय, राष्ट्रपति से किसी देशी राज्य के शासक के रूप में मान्यता प्राप्त थी या ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे ऐसे प्रारंभ से पहले किसी समय, राष्ट्रपति से ऐसे शासक के उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता प्राप्त थी;] (2. संविधान (छब्बीसवां संशोधन) अधिनियम, 1971 की धारा 4 द्वारा (28-12-1971 से) प्रतिस्थापित ।)
23. "अनुसूची" से इस संविधान की अनुसूची अभिप्रेत है;
24. "अनुसूचित जातियों से ऐसी जातियां, मूलवंश या जनजातियां अथवा ऐसी जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भाग या उनमें के यूथ अभिप्रेत हैं जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए अनुच्छेद 341 के अधीन अनुसूचित जातियां समझा जाता है;
25. "अनुसूचित जनजातियों” से ऐसी जनजातियां या जनजाति समुदाय अथवा ऐसी जनजातियों या जनजाति समुदाय के भाग या उनमें के यूथ अभिप्रेत हैं जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए अनुच्छेद 342 के अधीन अनुसूचित जनजातियां समझा जाता है;
26. "प्रतिभूतियों के अंतर्गत स्टाक है;
1[(26क) "सेवाओं” से माल से भिन्न कुछ भी अभिप्रेत है; (1. संविधान (एक सौ एकवां संशोधन) अधिनियम, 2016 की धारा 14 (ii) द्वारा (16-9-2016 से) अंतःस्थापित ।)
(26 ख) "राज्य" के अंतर्गत, अनुच्छेद 246क, अनुच्छेद 268, अनुच्छेद 269, अनुच्छेद 269क और अनुच्छेद 279क के संदर्भ में, विधान मंडल सहित कोई संघ राज्यक्षेत्र भी आता है ]
2 [(26ग) "सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों से ऐसे पिछड़े वर्ग अभिप्रेत हैं, जिन्हें, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के प्रयोजनों के लिए अनुच्छेद 342क के अधीन ऐसा समझा गया है।](2. खण्ड (26ग) संविधान (एक सौ दोवां संशोधन) अधिनियम, 2018 की धारा 5 द्वारा अन्तः स्थापित (दिनांक 15-8-2018 से प्रभावी) ।)
27. "उपखंड” से उस खंड का उपखंड अभिप्रेत है जिसमें वह पद आता है;
28. "कराधान" के अंतर्गत किसी कर या लाग का अधिरोपण है चाहे वह साधारण या स्थानीय या विशेष है और "कर" का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा;
29."आय पर कर के अंतर्गत अतिलाभ कर की प्रकृति का कर है;
3[(29क) "माल के क्रय या विक्रय पर कर" के अंतर्गत- (3. संविधान (छियालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1982 की धारा 4 द्वारा (2-2-1983 से) अंतःस्थापित |)
(क) वह कर है जो नकदी, आस्थगित संदाय या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए किसी माल में संपति के ऐसे अंतरण पर है जो किसी संविदा के अनुसरण में न करके अन्यथा किया गया है;
(ख) वह कर है जो माल में संपति के (चाहे वह माल के रूप में हो या किसी अन्य रूप में) ऐसे अंतरण पर है जो किसी संकर्म संविदा के निष्पादन में अंतर्वलित है;
(ग) वह कर है जो अवक्रय या किस्तों में संदाय की पद्धति से माल के परिदान पर है;
(घ) वह कर है जो नकदी, आस्थगित संदाय या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए किसी माल का किसी प्रयोजन के लिए उपयोग करने के अधिकार के (चाहे वह विनिर्दिष्ट अवधि के लिए हो या नहीं) अतंरण पर है;
(ङ) वह कर है जो नकदी, आस्थगित संदाय या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए किसी माल के प्रदाय पर है जो किसी अनिगमित संगम या व्यक्ति निकाय द्वारा अपने किसी सदस्य को किया गया है;
(च) वह कर है, जो ऐसे माल के, जो खाद्य या मानव उपभोग के लिए कोई अन्य पदार्थे या कोई पेय है (चाहे वह मादक हो या नहीं) ऐसे प्रदाय पर है, जो किसी सेवा के रूप में या सेवा के भाग के रूप में या किसी भी अन्य रीति से किया गया है और ऐसा प्रदाय या सेवा नकदी, आस्थगित संदाय या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए की गई है, और माल के ऐसे अंतरण परिदान या प्रदाय के बारे में यह समझा जाएगा कि वह उस व्यक्ति द्वारा, जो ऐसा अंतरण, परिदान या प्रदाय कर रहा है, उस माल का विक्रय है, और उस व्यक्ति द्वारा, जिसको ऐसा अंतरण, परिदान या प्रदाय किया जाता है, उस माल का क्रय है |
30."संघ राज्यक्षेत्र" से 1[पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट कोई संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत ऐसा अन्य राज्यक्षेत्र है जो भारत के राज्यक्षेत्र में समाविष्ट है किंतु उस अनुसूची में विनिर्दिष्ट नहीं है ।] (1. संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 29 और अनुसूची द्वारा (1-11-1956 से) खंड (30) के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
367. निर्वचन –
1. जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, इस संविधान के निर्वचन के लिए साधारण खंड अधिनियम, 1897, ऐसे अनुकूलनों और उपांतरणों के अधीन रहते हए, जो अनुच्छेद 372 के अधीन उसमें किए जाए, वैसे ही लागू होगा जैसे वह भारत डोमिनियन के विधान-मंडल के किसी अधिनियम के निर्वचन के लिए लागू होता है ।
2. इस संविधान में संसद के या उसके द्वारा बनाए गए अधिनियमों या विधियों के प्रति किसी निर्देश का अथवा 2[***] किसी राज्य के विधान-मंडल के या उसके द्वारा बनाए गए अधिनियमों या विधियों के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अंतर्गत, यथास्थिति, राष्ट्रपति द्वारा निर्मित अध्यादेश या किसी राज्यपाल 3[***] द्वारा निर्मित अध्यादेश के प्रति निर्देश है। (2. संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 29 और अनुसूची द्वारा पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट भाग क और भाग खा (1-11-1956 से) का लोप किया गया ।) (3. संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 29 और अनुसूची द्वारा (1-11-1956 से) "या राजप्रमुख" शब्दों का लोप किया गया ।)
3. इस संविधान के प्रयोजनों के लिए, "विदेशी राज्य” से भारत से भिन्न कोई राज्य अभिप्रेत है :
परंतु संसद् द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राष्ट्रपति आदेश 4[***] द्वारा यह घोषणा कर सकेगा कि कोई राज्य उन प्रयोजनों के लिए, जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, विदेशी राज्य नहीं हैं। (4. संविधान (विदेशी राज्यों के बारे में घोषणा) आदेश, 1950, (सं. आ. 2) देखिए ।)