
(1) किसी वाद, अपील या आवेदन के परिसीमा काल की संगणना करने में वह दिन अपवर्जित कर दिया जाएगा, जिससे ऐसे परिसीमा काल की गणना की जानी है।
(2) किसी अपील के लिए अथवा ऐसे आवेदन के लिए, जो अपील की इजाजत या पुनरीक्षण के, या किसी निर्णय के पुनर्विलोकन के लिए हो, परिसीमा काल की संगणना करने में वह दिन जिस दिन परिवादित निर्णय सुनाया गया था तथा उस डिक्री, दण्डादेश या आदेश की, जिसकी अपील की गई है या जिसका पुनरीक्षण या पुनर्विलोकन ईप्सित है प्रतिलिपि अभिप्राप्त करने के लिए अपेक्षित समय अपवर्जित कर दिया जाएगा।
(3) जहां कि किसी डिक्री या आदेश की अपील की जाती है या उसका पुनरीक्षण या पुनर्विलोकन ईप्सित है या जहां कि किसी डिक्री या आदेश की अपील की इजाजत के लिए आवेदन किया जाता है, वहां उस निर्णय की 1[***] प्रतिलिपि अभिप्राप्त करने के लिए अपेक्षित समय भी अपवर्जित कर दिया जाएगा। [1999 के अधिनियम सं. 46 की धारा 33 द्वारा (1-7-2002 से) कुछ शब्दों का लोप किया गया।]
(4) किसी पंचाट के अपास्त किए जाने के लिए आवेदन के परिसीमा काल की संगणना करने में पंचाट की प्रतिलिपि अभिप्राप्त करने के लिए अपेक्षित समय अपवर्जित कर दिया जाएगा।
किसी डिक्री या आदेश की प्रतिलिपि अभिप्राप्त करने के लिए अपेक्षित समय की इस धारा के अधीन संगणना करने में वह समय अपवर्जित नहीं किया जाएगा जो न्यायालय ने उस डिक्री या आदेश की प्रतिलिपि के लिए आवेदन किए जाने से पूर्व डिक्री या आदेश को तैयार करने में लगाया हो ।
जहां कि अकिंचन के रूप में वाद या अपील करने की इजाजत के लिए आवेदन किया गया हो और वह प्रतिक्षेपित हो गया हो वहां उस वाद अथवा अपील के लिए विहित परिसीमा काल की संगणना में उतना समय अपवर्जित कर दिया जाएगा जितने समय के दौरान आवेदक इस इजाजत के लिए अपना आवेदन सद्भावपूर्वक अभियोजित करता रहा हो, तथा ऐसे वाद या अपील के लिए विहित न्यायालय फीस दे दी जाने पर न्यायालय उस वाद या अपील को वही बल और प्रभाव रखने वाली मानकार बरतेगा मानो न्यायालय फीस प्रारंभ में ही दे दी गई हो ।
(1) किसी वाद की परिसीमा काल की संगणना में उतना समय जितने समय के दौरान वादी चाहे प्रथम बार के चाहे अपील या पुनरीक्षण न्यायालय में प्रतिवादी के विरुद्ध अन्य सिविल कार्यवाही सम्यक् तत्परता से अभियोजित करता रहा है, अपवर्जित कर दिया जाएगा जहां कि वह कार्यवाही उसी विवाद्य विषय से संबंधित हो और सद्भावपूर्वक किसी ऐसे न्यायालय में अभियोजित की गई हो जो अधिकारिता की त्रुटि या वैसी ही प्रकृति के अन्य हेतुक से उसे ग्रहण करने में असमर्थ हो ।
(2) किसी आवेदन के परिसीमा काल की संगणना में उतना समय जितने के दौरान वादी चाहे प्रथम बार की अपील चाहे पुनरीक्षण न्यायालय में उसी पक्षकार के विरुद्ध उसी अनुतोष के लिए अन्य सिविल कार्यवाही सम्यक् तत्परता से अभियोजित करता रहा है, अपवर्जित कर दिया जाएगा जहां कि कार्यवाही सद्भावपूर्वक किसी ऐसे न्यायालय में अभियोजित की गई हो जो अधिकारिता की त्रुटि या वैसी ही प्रकृति के अन्य हेतुक से ग्रहण करने में असमर्थ हो ।
(3) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के आदेश 23 के नियम 2 में अनर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी उपधारा (1) के उपबन्ध उस आदेश के नियम 1 के अधीन न्यायालय द्वारा दी गई अनुज्ञा के आधार पर संस्थित नए वाद के संबंध में लागू होंगे जहां कि ऐसी अनुज्ञा इस आधार पर दी गई है कि अधिकारिता में त्रुटियां वैसी ही प्रकृति के अन्य हेतुक से पहले वाद का असफल होना अवश्यम्भावी है ।
इस धारा के प्रयोजन के लिए--
(क) उस समय का अपवर्जन करने में, जिसके दौरान कोई पूर्ववर्ती सिविल कार्यवाही लम्बित थी वह दिन जिस दिन वह कार्यवाही संस्थित की गई और वह दिन जिस दिन उसका अन्त हुआ, दोनों गिने जाएंगे;
(ख) कोई वादी या आवेदक जो किसी अपील का प्रतिरोध कर रहा हो, कार्यवाही का अभियोजन करता हुआ समझा जाएगा:
(ग) पक्षकारों के या वाद-हेतुकों के कुसंयोजन को अधिकारिता में त्रुटि जैसी प्रकृति का हेतुक समझा जाएगा।
(1) किसी ऐसे वाद के या किसी ऐसी डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन के, जिसका संस्थित या निष्पादित किया जाना किसी व्यादेश या आदेश द्वारा रोक दिया गया हो, परिसीमा काल की संगणना में, उतना समय, जितने समय ऐसा व्यादेश या आदेश बना रहा हो, वह दिन जिस दिन वह निकाला गया या किया गया था और वह दिन जिस दिन उसका प्रत्याहरण किया गया था अपवर्जित कर दिए जाएंगे।
(2) किसी तत्समय प्रवृत्त विधि की अपेक्षाओं के अनुसार किसी ऐसे वाद के परिसीमा काल की संगणना में, जिसकी सूचना दी गई है या जिसके लिए सरकार या किसी अन्य प्राधिकारी की पूर्व सम्मति या मंजूरी अपेक्षित है, ऐसी सूचना की कालावधि या, यथास्थिति ऐसी सम्मति अथवा मंजूरी अभिप्राप्त करने के लिए अपेक्षित समय अपवर्जित कर दिया जाएगा।
सरकार या किसी अन्य प्राधिकारी की सम्मति या मंजूरी अभिप्राप्त करने के लिए अपेक्षित समय का अपवर्जन करने में वह तारीख जिसको सम्मति अथवा मंजूरी अभिप्राप्त करने के लिए आवेदन किया गया था और वह तारीख, जिसको सरकार या अन्य प्राधिकारी का आदेश प्राप्त हुआ था, दोनों गिनी जाएंगी।
(3) किसी व्यक्ति को दिवालिया न्यायनिर्णीत करने की कार्यवाही में नियुक्त किसी रिसीवर या अन्तरिम रिसीवर द्वारा या किसी कम्पनी के परिसमापन की कार्यवाही में नियुक्त किसी समापक या अनंतिम समापक द्वारा किए गए किसी वाद या डिक्री के निष्पादनार्थ आवेदन के परिसीमा काल की संगणना में वह कालावधि अपवर्जित कर दी जाएगी जो ऐसी कार्यवाही को संस्थित करने की तारीख को प्रारम्भ होकर यथास्थिति, रिसीवर या समापक की नियुक्ति की तारीख से तीन मास के अवसान पर समाप्त होती है ।
(4) किसी डिक्री के निष्पादन में हुए विक्रय में के क्रेता द्वारा कब्जे के लिए वाद के परिसीमा काल की संगणना में उतना समय अपवर्जित कर दिया जाएगा जिसके दौरान विक्रय अपास्त कराने के लिए कोई कार्यवाही अभियोजित की जाती रही हो ।
(5) किसी वाद के परिसीमा काल की संगणना में उतना समय अपवर्जित कर दिया जाएगा जिसके दौरान प्रतिवादी भारत से तथा भारत के बाहर के उन राज्यक्षेत्रों से जो केन्द्रीय सरकार के प्रशासन के अधीन है, अनुपस्थित रहा हो।
(1) जहां कि कोई व्यक्ति, जिसे यदि वह जीवित रहता तो वाद संस्थित करने या आवेदन करने का अधिकार होता, उस अधिकार के प्रोद्भूत होने के पहले मर जाए या जहां कि वाद संस्थित करने या आवेदन करने का अधिकार किसी व्यक्ति की मृत्यु पर ही प्रोद्भूत होता हो वहां परिसीमा काल की संगणना उस समय से की जाएगी जब मृतक का ऐसा विधिक प्रतिनिधि हो जाए जो ऐसा वाद संस्थित करने या आवेदन आवेदित करने के लिए समर्थ हो ।
(2) जहां कि कोई व्यक्ति, जिसके विरुद्ध यदि वह जीवित रहता तो वाद संस्थित करने या आवेदन करने का अधिकार प्रोद्भूत हुआ होता, उस अधिकार के प्रोद्भूत होने के पहले मर जाए, या जहां किसी व्यक्ति के विरुद्ध वाद संस्थित करने या आवेदन करने का अधिकार उसकी मृत्यु पर प्रोद्भूत होता हो, वहां परिसीमा काल की संगणना उस समय से की जाएगी जब मृतक का ऐसा विधिक प्रतिनिधि हो जाए जिसके विरुद्ध वादी ऐसा वाद संस्थित कर सके या आवेदन कर सके ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) की कोई भी बात शुफा अधिकारों को प्रवर्तित कराने के वादों को अथवा किसी स्थावर सम्पत्ति के या आनुवंशिक पद के कब्जे के बाद को लागू नहीं होती ।
(1) जहां कि किसी ऐसे वाद या आवेदन के मामले में, जिसके लिए इस अधिनियम द्वारा कोई परिसीमा काल विहित है—
(क) वह वाद या आवेदन प्रतिवादी या प्रत्यर्थी या उसके अभिकर्ता के कपट पर आधारित है; अथवा
(ख) उस अधिकार या हक का ज्ञान, जिस पर वाद या आवेदन आधारित है, किसी यथापूर्वोक्त व्यक्ति के कपट द्वारा छिपाया गया है अथवा
(ग) वह वाद या आवेदन किसी भूल के परिणाम से मुक्ति के लिए है; अथवा
(घ) वादी या आवेदक के अधिकार को स्थापित करने के लिए आवश्यक कोई दस्तावेज उससे कपटपूर्वक छिपाई गई है.
वहां परिसीमा काल का चलना तब तक के बिना आरम्भ न होगा जब वादी या आवेदक को उस कपट या भूल का पता चल न जाए या सम्यक् तत्परता से पता चल सकता था, अथवा छिपाई गई दस्तावेज की दशा में तब तक के बिना आरम्भ न होगा, जबकि छिपाई गई दस्तावेज के पेश करने या उसका पेश किया जाना विवश करने के साधन वादी या आवेदक को सर्वप्रथम प्राप्त न हुए हों :
परन्तु इस धारा की कोई भी बात किसी ऐसी सम्पत्ति के प्रत्युद्धरण के या उसके विरुद्ध कोई भार प्रवर्तित कराने के या तत्संबंधी किसी संव्यवहार को अपास्त कराने के वाद का संस्थित किया जाना या आवेदन का किया जाना शक्य नहीं बनाएगी जो—
(i) कपट के मामले में, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा मूल्यवान प्रतिफलेन क्रय की गई हो जिसका न तो कपट में कोई हाथ था और न जो क्रय के समय यह जानता या यह विश्वास करने का कारण रखता था कि कोई कपट किया गया है, अथवा
(ii) भूल के मामले में, उस संव्यवहार के पश्चात् जिसमें भूल की गई, ऐसे व्यक्ति द्वारा मूल्यवान प्रतिफलेन क्रय की गई है, जो न यह जानता या विश्वास करने का कारण रखता था कि भूल की गई है, अथवा
(iii) छिपाई गई दस्तावेज के मामले में, ऐसे व्यक्ति द्वारा मूल्यवान प्रतिफलेन क्रय की गई है जिसका न तो छिपाने में कोई हाथ था और न जो क्रय करने के समय यह जानता या विश्वास करने का कारण रखता था कि वह दस्तावेज छिपाई गई है।
(2) जहां कि किसी निर्णीतऋणी ने किसी डिक्री या आदेश का परिसीमा काल के भीतर निष्पादन कपट या बल प्रयोग द्वारा निवारित कर दिया हो, वहां न्यायालय उक्त परिसीमा काल के अवसान के पश्चात् निर्णीत लेनदार द्वारा किए गए आवेदन पर डिक्री या आदेश के निष्पादन के लिए परिसीमा काल को बढ़ा सकेगा:
परन्तु यह तब जबकि ऐसा आवेदन, यथास्थिति, कपट का पता लगाने की या बल प्रयोग के बन्द होने की तारीख से एक वर्ष के भीतर किया गया हो ।
(1) जहां कि किसी सम्पत्ति या अधिकार विषयक वाद या आवेदन के लिए विहित काल के अवसान के पहले ऐसी सम्पत्ति या अधिकार विषयक दायित्व की लिखित अभिस्वीकृत की गई है, जो उस पक्षकार द्वारा, जिसके विरुद्ध ऐसी सम्पत्ति या अधिकार का दावा किया जाता है, या ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा जिसमें वह अपना अधिकार या दायित्व व्युत्पन्न करता है, हस्ताक्षरित है वहां उस समय से, जब वह अभिस्वीकृति इस प्रकार हस्ताक्षरित की गई थी एक नया परिसीमा काल संगणित किया जाएगा।
(2) जहां कि वह लेख जिसमें अभिस्वीकृति अन्तर्विष्ट है, बिना तारीख का है वहां उस समय के बारे में जब वह हस्ताक्षरित किया गया था मौखिक साक्ष्य दिया जा सकेगा किन्तु भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1 )/ (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023) के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि उसकी अन्तर्वस्तु का मौखिक साक्ष्य ग्रहण नहीं किया जाएगा।
इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) अभिस्वीकृति पर्याप्त हो सकेगी यद्यपि वह उस सम्पत्ति या अधिकार की यथावत् प्रकृति विनिर्देश न करती हो अथवा यह प्रकथन करती हो कि संदाय, परिदान, पालन या उपभोग का समय अभी नहीं आया है, अथवा वह संदाय, परिदान या पालन के अथवा उपभोग की अनुज्ञा के इंकार सहित हो अथवा मुजरा के किसी दावे से युक्त हो, अथवा उस सम्पत्ति या अधिकार के हकदार व्यक्ति से भिन्न किसी अन्य व्यक्ति को सम्बोधित हो:
(ख) “हस्ताक्षरित " शब्द से या तो स्वयं द्वारा या इस निमित्त सम्यक् प्राधिकृत अभिकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित अभिप्रेत है तथा
(ग) वह आवेदन, जो डिक्री या आदेश के निष्पादन के लिए हो किसी सम्पत्ति या अधिकार की बाबत आवेदन नहीं समझा जाएगा।
जहां कि ऋण या वसीयत सम्पदा के संदाय के लिए दायी व्यक्ति द्वारा या उसके इस निमित्त सम्यक् प्राधिकृत अभिकर्ता द्वारा कोई संदाय उस ऋण लेखे या उस वसीयत के ब्याज लेखे विहित काल के अवसान के पूर्व किया जाता है, वहां उस समय से, जब संदाय किया गया था, नया परिसीमा काल संगणित किया जाएगा
परन्तु उस दशा के सिवाय, जिसमें ब्याज का संदाय सन् 1928 की जनवरी के प्रथम दिन के पूर्व किया गया था यह तब होगा जब उस संदाय की अभिस्वीकृति, संदाय करने वाले व्यक्ति के हस्तलेख में या उसके द्वारा हस्ताक्षरित लेख में हो ।
इस धारा के प्रयोजनों के लिए—
(क) जहां कि बन्धकित भूमि, बन्धकदार के कब्जे में हो वहां ऐसी भूमि के भाटक या उपज की प्राप्ति संदाय मानी जाएगी :
(ख) “ऋण" के अन्तर्गत वह धन नहीं आता जो न्यायालय की डिक्री या आदेश के अधीन संदेय हो ।
( 1 ) धारा 18 या धारा 19 में “इस निमित्त सम्यक् प्राधिकृत अभिकर्ता" पद के अन्तर्गत निर्योग्यता के अधीन व्यक्ति की दशा में उसका विधिपूर्ण संरक्षक, सुपुर्ददार या प्रबन्धक या अभिस्वीकृति हस्ताक्षर करने अथवा संदाय करने के लिए ऐसे संरक्षक, सुपुर्ददार या प्रबन्धक द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत अभिकर्ता आता है ।
(2) उक्त धाराओं में की कोई भी बात अनेक संयुक्त संविदाकर्ताओं, भागीदारों, निष्पादकों या बन्धकदारों में से किसी एक को उनमें से किसी अन्य या किन्हीं अन्यों द्वारा या के अभिकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित लिखित अभिस्वीकृति या किसी किए गए संदाय के कारण ही प्रभार्य नहीं कर देती।
(3) उक्त धाराओं के प्रयोजनों के लिए—
(क) सम्पत्ति के किसी परिसीमित स्वामी द्वारा, जो हिन्दू विधि से शासित हो या उसके सम्यक् प्राधिकृत अभिकर्ता द्वारा किसी दायित्व की बाबत हस्ताक्षरित अभिस्वीकृति या किया गया संदाय ऐसे दायित्व को उत्तराधिकार में पाने वाले उत्तरभोगी के विरुद्ध, यथास्थिति, विधिमान्य अभिस्वीकृति या संदाय होगा, तथा
(ख) वह अभिस्वीकृति या संदाय, जो उस अविभक्त हिन्दू कुटुम्ब के तत्समय कर्ता या उसके सम्यक् प्राधिकृत अभिकर्ता द्वारा किया गया है उस समस्त कुटुम्ब की ओर से किया गया समझा जाएगा, यदि किसी अविभक्त हिन्दू कुटुम्ब की उस हैसियत में उसके द्वारा या उसकी ओर से कोई दायित्व उपगत किया गया हो ।
(1) जहां कि वाद संस्थित होने के पश्चात् कोई नया वादी या प्रतिवादी प्रतिस्थापित किया या जोड़ा जाए वहां वाद, जहां तक कि उसका संबंध है, तब संस्थित किया गया समझा जाएगा जब वह इस प्रकार पक्षकार बनाया गया था:
परन्तु जहां कि न्यायालय का समाधान हो जाए कि नए वादी या प्रतिवादी को अन्तर्विष्ट करने में लोप सद्भावपूर्वक की गई भूल से हुआ था, वहां वह यह निदेश दे सकेगा कि बाद, जहां तक ऐसे वादी या प्रतिवादी का संबंध है, किसी पूर्ववर्ती तारीख से संस्थित किया गया समझा जाएगा।
(2) उपधारा (1) की कोई बात ऐसे मामले को लागू न होगी जिसमें वाद के लम्बित रहने के दौरान हुए किसी हित के समनुदेशन या न्यागमन के कारण कोई पक्षकार जोहा या प्रतिस्थापित किया जाए या जिसमें कि वादी को प्रतिवादी या प्रतिवादी को वादी समझा जाए।
किसी चालू रहने वाले संविदा-भंग या चालू रहने वाले अपकृत्य की दशा में एक नया परिसीमा काल उस समय के दौरान प्रति क्षण चलना आरम्भ होता रहता है जिसमें यथास्थिति, ऐसा भंग या ऐसा अपकृत्य चालू रहे ।
उस कार्य के लिए, जिसमें कोई वाद- हेतुक तब तक उद्भूत नहीं होता जब तक उससे कोई विनिर्दिष्ट क्षति वस्तुतः नहीं होती, प्रतिकर के बाद की दशा में परिसीमा काल उस समय से संगणित किया जाएगा जब वह क्षति हो जाए।
सब लिखतें इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए ग्रिगोरियन कलेंडर को निर्दिष्ट करके लिखी गई समझी जाएंगी।