धारा 1 से 24 उत्तर प्रदेश गिरोहबन्द और समाज विरोधी क्रिया कलाप (निवारण) अधिनियम, 1986

धारा 1 से 24 उत्तर प्रदेश गिरोहबन्द और समाज विरोधी क्रिया कलाप (निवारण) अधिनियम, 1986

विविध

"भारत का संविधान" के अनुच्छेद 201 के अधीन राष्ट्रपति महोदय ने उत्तर प्रदेश विधान मण्डल द्वारा पारित उत्तर प्रदेश गिरोहबन्द और समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) विधेयक, 1986 पर दिनांक 19 मार्च, 1986 को अनुमति प्रदान की और वह उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 7 सन् 1986 के रूप में सर्वसाधारण की सूचनार्थ इस अधिसूचना द्वारा प्रकाशित किया जाता है।

उत्तर प्रदेश गिरोहबन्द और समाज विरोधी किया कलाप (निवारण) अधिनियम, 1986

[उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 7 सन् 1986]

 (जैसा उत्तर प्रदेश विधान मण्डल द्वारा पारित हुआ)

गिरोहबन्द और समाज विरोधी क्रियाकलाप को रोकने और उनका सामना करने के लिए और उनसे सम्बद्ध या आनुषंगिक विषयों के लिए विशेष उपबन्ध करने के लिए |

अधिनियम

भारत गणराज्य के सैंतीसवें वर्ष में निम्नलिखित अधिनियम बनाया जाता है:

1. संक्षिप्त नाम विस्तार और प्रारम्भ

(1) यह अधिनियम उत्तर प्रदेश गिरोहबन्द और समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1986 कहा जायेगा।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में होगा।

(3) यह 15 जनवरी, 1986 को प्रवृत्त हुआ समझा जायगा।

2 परिभाषा

इस अधिनियम में,-

(क) "संहिता" का तात्पर्य दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) से है,

(ख) "गिरोह का तात्पर्य ऐसे व्यक्तियों के समूह से है जो लोक-व्यवस्था को अस्त-व्यस्त करने या अपने या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई अनुचित दुनियावी (टेम्पोरल), आर्थिक, भौतिक या अन्य लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से या तो अकेले या समूहिक रूप से हिंसा, या हिंसा की धमकी या प्रदर्शन, या अभित्रास, या प्रपीड़न द्वारा, या अन्य प्रकार से निम्नलिखित समाज विरोधी क्रियाकलाप करते हैं, अर्थात्

(एक) भारतीय दण्ड संहिता के अध्याय 16 या अध्याय 17, या अध्याय 22 (भारतीय न्याय संहिता 2023 अध्याय 5 (81 से 87 धाराओं के सिवाय), या अध्याय 17, या अध्याय 19 के अधीन दण्डनीय अपराध, या

(दो) संयुक्त प्रान्त आबकारी अधिनियम, 1910 या नारकोटिक ड्रग्स एण्ड साइकोट्रापिक सब्सटैन्सेज ऐक्ट, 1985 या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के किन्हीं उपबन्धों का उल्लंघन करके किसी शराब या मादक या अनिष्टकर मादक द्रव्य या अन्य मादकों या स्वापकों का आसवन या निर्माण या संग्रह या परिवहन या आयात या निर्यात, या विक्रय या वितरण या किन्हीं पौधों की खेती करना; या

(तीन) विधि सम्मत प्रक्रिया से भिन्न प्रक्रिया द्वारा स्थावर सम्पत्ति पर अध्यासन करना या कब्जा लेना, या स्थावर सम्पत्ति पर चाहे स्वयं या अन्य किसी व्यक्ति के पक्ष में हक या कब्जा के लिए मिथ्या दावा करना; या

(चार) किसी लोक सेवक या किसी साक्षी को अपने विधिपूर्ण कर्तव्यों का पालन करने से रोकना या रोकने के लिए प्रथत्न करना; या

(पाँच) स्त्री तथा लड़की अनौतिक व्यापार दमन अधिनियम, 1956 के अधीन दण्डनीय अपराध, या

(छः) सार्वजनिक द्यूत अधिनियम, 1867 की धारा 3 के अधीन दण्डनीय अपराध; या

(सात) किसी सरकारी विभाग, स्थानीय निकाय या सार्वजनिक या निजी उपक्रम द्वारा या उसकी ओर से किसी पट्टे या अधिकार के लिए, या माल के संभरण या किये जाने वाले कार्य के लिए, विधिपूर्वक संचालित किसी नीलाम में बोली लगाने या विधिपूर्वक मांगे गये टेण्डर देने से किसी व्यक्ति को रोकना; या

(आठ) किसी व्यक्ति को अपने विधिपूर्ण कारबार, वृत्ति, व्यापार या जीविका या उससे सम्बद्ध किसी अन्य विधिपूर्ण क्रियाकलाम को सुचारू रूप से करने से रोकना या उसमें विघ्न डालना; या

(नौ) भारतीय दण्ड संहिता की धारा 171-(भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 173 के अधीन दण्डनीय अपराध, या मतदाता को अपने मताधिकार का प्रयोग करने से शारीरिक रूप से रोककर किसी विधिपूर्वक होने वाले किसी सार्वजनिक निर्वाचन को रोकना या उसमें बाधा डालना; या

(दस) अन्य व्यक्तियों को साम्प्रदायिक सामंजस्य में विघ्न डालने के लिए हिंसा करने के लिए उद्दीप्त करना; या

(ग्यारह) जनता में दहशत, संत्रास या आतंक फैलाना; या

(बारह) सार्वजनिक या निजी उपक्रमों या कारखानों के कर्मचारियों या स्वामियों या अध्यासियों को आतंकित करना या उन पर हमला करना और उनकी सम्पत्ति को हानि पहुंचाना, या

(तेरह) किसी व्यक्ति को इस मिथ्या व्यपदेशन पर कि उसे विदेश में कोई सेवायोजन, व्यापार या वृत्ति उपलब्ध करायी जायेगी, ऐसे विदेश में जाने के लिए उत्प्रेरित करना या उत्प्रेरित करने का प्रयास करना; या

(चौदह) फिरौती उद्यापित करने के आशय से किसी व्यक्ति का व्यपहरण या अपहरण करना; या

(पन्द्रह) किसी वायुयान या सार्वजनिक परिवहन यानों को उसके पूर्वनिर्धारित मार्ग से जाने से पथान्तरित करना या अन्यथा रोकनाः

*(सोलह) साहूकारी विनियमन अधिनियम, 1976 के अधीन दण्डनीय अपराध;

(सत्रह) गोवध निवारण अधिनियम, 1955 और पशुओं के प्रति कूरता का निवारण अधिनियम, 1960 में उपबन्धों के उल्लंघन में मवेशियों के अवैध परिवहन और / या तस्करी के कार्यों में संलिप्तता;

(अठ्ठारह) वाणिज्यिक शोषण, बंधुआ श्रम, वालश्रम, यौन शोषण, अंग हटाने तथा दुर्व्यापार, मिक्षावृत्ति और इसी प्रकार के कियाकलापों के प्रयोजनों हेतु मानव दुर्व्यापार करना;

(उन्नीस) विधि विरूद्ध कियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1966 के अधीन दण्डनीय अपराध;

(बीस) जाली भारतीय करेंसी नोट का मुद्रण, परिवहन और परिचालन करना;

(इक्कीस) नकली दवाओं का उत्पादन, विक्रय और वितरण में अन्तर्ग्रस्त होना,

(बाइस) आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 5, 7 और 12 के उल्लंघन में आयुध एवं गोला, बारूद के विनिर्माण, विक्रय और परिवहन में अन्तर्ग्रस्त होना;

(तेइस) भारतीय वन अधिनियम, 1927 और वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के उल्लंघन में आर्थिक अभिलाभ के लिए गिराना अथवा वध करना, उत्पादों की तस्करी करना,

(चौबीस) आमोद तथा पणकर अधिनियम, 1979 के अधीन दण्डनीय अपराध;

(पच्चीस) राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था और जीवन की गति को भी प्रभावित करने वाले अपराधों में संलिप्त होना।"

(ग) "गिरोहबन्द" का तात्पर्य किसी गिरोह के सदस्य या सरगना था संगठक से है और इसके अन्तर्गत कोई ऐसा व्यक्ति भी है जो खण्ड (ख) में प्रगणित किसी गिरोह के क्रियाकलाप के लिए, चाहे ऐसे कियाकलाप के किए जाने के पूर्व या पश्चात्, दुष्प्रेरित करता है या उसमें सहायता देता है. या किसी ऐसे व्यक्ति को जिसने ऐसे क्रियाकलाप किये हों, संश्रय देता है,

(घ) "लोक सेवक" का तात्पर्य भारतीय दण्ड संहिता की धारा 21 (भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 2(28) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में यथापरिभाषित लोक सेवक से है और इसके अन्तर्गत कोई ऐसा व्यक्ति भी है जो राज्य की पुलिस या अन्य प्राधिकारियों को इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के अन्वेषण या अभियोजन या दण्ड में, चाहें ऐसे अपराध या अपराधी के सम्बन्ध में सूचना या साक्ष्य देकर या किसी अन्य रीति से, विधिपूर्वक सहायता करता है;

(ड) "किसी लोक सेवक के कुटुम्ब का सदस्य" का तात्पर्य उसके माता-पिता या पति या पत्नी, और माई, बहिन पुत्र पुत्री, पौत्र, पौत्री, या इनमें से किसी के पति या पत्नी से है और इसके अन्तर्गत लोक सेवक पर आश्रित या उसके साथ निवास करने वाला कोई व्यक्ति और कोई ऐसा व्यक्ति भी है जिसके कल्याण में लोक सेवक हित रखता हो,

(च) इस अधिनियम में प्रयुक्त किन्तु अपरिभाषित, और दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) या भारतीय दंड संहिता (भारतीय न्याय संहिता 2023) में परिभाषित शब्दों और पर्दा के क्रमश: वहीं अर्थ होंगे जो ऐसी संहिताओं में उनके लिए दिए गये हैं। (*1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 14/2016 की धारा 2 में खण्ड (ख) में उपखण्ड (पन्द्रह) के पश्चात् उपखण्ड बढ़ा दिये गये हैं।)

3. शास्ति

(1) किसी गिरोहबन्द को दोनों में से किसी भांति के कारावास से ऐसी अवधि के लिए जो दो वर्ष से कम न होगी और जो दस वर्ष तक हो सकेगी और जुर्माने से भी जो पांच हजार रूपये से कम नहीं होगा, दण्डित किया जायगाः

परन्तु किसी गिरोहबन्द को जो किसी लोक सेवक के शरीर के प्रति या लोक सेवक के कुटुम्ब के किसी सदस्य के शरीर के प्रति कोई अपराध करता है दोनों में से किसी भांति के कारावास से ऐसी अवधि के लिए जो तीन वर्ष से कम न होगी और जुर्माना से भी, जो पांच हजार रूपये से कम नहीं होगा, दण्डित किया जायगा।

(2) किसी ऐसे व्यक्ति को जो लोक सेवक होते हुये चाहे स्वयं या अन्य के माध्यम से किसी गिरोहबन्द की किसी रीति से अवैध रूप से सहायता या समर्थन, चाहे गिरोहबन्द द्वारा कोई अपराध किये जाने के पूर्व या पश्चात् करता है, या विधिपूर्ण उपाय करने से विरत रहता है या इस संबंध में किसी न्यायालय या अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निदेशों को कार्यान्वित करने से जानबूझकर बचता है, दोनों में से किसी मांति के कारावास से ऐसी अवधि के लिए जो दस वर्ष तक की हो सकेगी, किन्तु तीन वर्ष से कम न होगी और जुर्माने से भी दंडित किया जायगा।

4. साक्ष्य के विशेष नियम

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता या भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023) में किसी प्रतिकूल बात के होते हुये भी. इस अधिनियम के अधीन अपराधों या सम्बद्ध अपराधों के लिए विचारण और दण्ड के प्रयोजनार्थ--

(क) न्यायालय इस तथ्य को ध्यान में रख सकता है कि अभियुक्त-

(एक) किसी पूर्व अवसर पर दंड संहिता की धारा 107 या धारा 108 या धारा 109 या धारा 110 (भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 45  या धारा 46 या धारा 49 या धारा 50 के अधीन आबद्ध किया गया था; या

(दो) निवारक निरोध से सम्बन्धित किसी विधि के अधीन निरूद्ध किया गया था, या

(तीन) उत्तर प्रदेश गुण्डा नियंत्रण अधिनियम, 1970 या ऐसी किसी अन्य विधि के अधीन वहिष्कासित किया गया था;

(ख) जहाँ यह साबित हो जाय कि किसी गिरोहबन्द या उसकी ओर से किसी व्यक्ति के पास किसी समय इतनी जंगम या स्थावर सम्पत्ति है या रही है जिसका वह सन्तोषजनक हिसाब नहीं दे सकता है, या जहाँ उसके वित्तीय साधन उसकी आय के ज्ञात स्रोतों के अनुपात में नहीं है; वहाँ न्यायालय, जब तक कि इसके प्रतिकूल न साबित कर दिया जाय, यह उपधारणा करेगा कि ऐसी सम्पत्ति या वित्तीय साधन गिरोहबन्द के रूप में उसके क्रिया-कलाप से अर्जित या प्राप्त किया गया है;

(ग) जहाँ यह साबित हो जाय कि अभियुक्त ने किसी व्यक्ति का व्यपहरण या अपहरण किया है. वहाँ न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि यह फिरौती के लिए किया गया था;

(घ) जहाँ यह साबित हो जाय कि किसी गिरोहबन्द ने किसी व्यपहृत या अपहृत व्यक्ति को सदोष छिपाया या परिरूद्ध किया है. यहां न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि गिरोहबन्द यह जानता था कि ऐसा व्यक्ति, यथास्थिति, व्यपहृत या अपहृत किया गया था,

(ड) यदि न्यायालय, उन कारणों से जो अभिलिखित किये जायेगें, ऐसा करना उचित समझे अभियुक्त की अनुपस्थिति में विचारण की कार्यवाही प्रारम्भ कर सकता है और किसी साक्षी का साक्ष्य अभिलिखित करसकता है, किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि यदि अभियुक्त ऐसा चाहे तो साक्षी को प्रति-परीक्षा के लिए पुनः बुलाया जा सकता है किन्तु अभियुक्त की उपस्थिति में उसकी मुख्य परीक्षा पुनः अभिलिखित करना आवश्यक न होगा।

5. विशेष न्यायालय

(1) राज्य सरकार इस अधिनियम के अधीन अपराधी के शीघ्र विचारण के हित में यदि ऐसा करना आवश्यक समझे तो सम्पूर्ण राज्य या उसके किसी भाग के लिए एक या अधिक विशेष न्यायालयों का गठन कर सकती है।

(2) किसी विशेष न्यायालय की अध्यक्षता एक न्यायाधीश द्वारा की जायगी जिसकी नियुक्ति उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति की सहमति से राज्य सरकार द्वारा की जायगी।

(3) राज्य सरकार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति की सहमति से किसी विशेष न्यायालय में अधिकारिता का प्रयोग करने के लिए अपर न्यायाधीशों की भी नियुक्ति कर सकती है।

(4) कोई व्यक्ति किसी विशेष न्यायालय का न्यायाधीश या अपर न्यायाधीश नियुक्त किये जाने के लिए अर्ह न होगा जब तक कि वह ऐसी नियुक्ति के ठीक पूर्व किसी राज्य में सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश न हो।

(5) जहाँ विशेष न्यायालय के न्यायाधीश का पद रिक्त हो, या ऐसा न्यायाधीश विशेष न्यायालय की बैठक के सामान्य स्थान से अनुपस्थित हो, या वह रूग्णता के कारण या अन्यथा अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो, वहाँ विशेष न्यायालय में किसी अति-आवश्यक कार्य का निस्तारण-

(क) उस विशेष न्यायालय में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले अपर न्यायाधीश, यदि कोई हो, द्वारा,

(ख) यदि कोई ऐसा अपर न्यायाधीश उपलब्ध न हो तो ऐसे सेशन न्यायाधीश के जिसका यथा अधिसूचित विशेष न्यायालय की बैठक के सामान्य स्थान पर अधिकारिता हो, निदेशों के अनुसार, किया जायगा।

(6) जहाँ किसी विशेष न्यायालय में एक अपर न्यायाधीश या अधिक अपर न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है, वहां विशेष न्यायालय का न्यायाधीश, समय-समय पर, सामान्य या विशेष लिखित आदेश द्वारा विशेष न्यायालय के कार्य का वितरण स्वयं अपने और अपर न्यायाधीश या अपर न्यायाधीशों के बीच करने के लिए और किसी अपर न्यायाधीश की अनुपस्थिति की दशा में तात्कालिक कार्य के निपटारे के लिए भी, व्यवस्था कर सकता है।

6. बैठक का स्थान

विशेष न्यायालय, यदि वह ऐसा करना समीचीन या वांछिनीय समझे तो अपनी बैठक के सामान्य स्थान से भिन्न किसी अन्य स्थान में अपनी किसी कार्यवाही के लिउए बैठक कर सकता है

परन्तु यदि लोक अभियोजक विशेष न्यायालय को यह विश्वास दिलाता है कि उसकी राय में अभियुक्त या किसी साक्षी की संरक्षा के लिए यह आवश्यक है या न्याय के हित में अन्यथा समीचीन है कि सम्पूर्ण विचारण या उसका कोई भाग विशेष न्यायालय की बैठक के सामान्य स्थान से भिन्न किसी अन्य स्थान में किया जाना चाहिए तो विशेष न्यायालय अभियुक्त की सुनवाई करने के पश्चात् उस आशय का आदेश देसकता है जब तक कि विशेष न्यायालय, उन कारणों से जो अभिलिखित किये जायेंगे कोई अन्य आदेश देना उचित न समझे।

7. विशेष न्यायालयों की अधिकारिता -

(1) भारतीय न्याय संहिता में किसी बात के होते हुये भी, जहाँ किसी स्थानीय क्षेत्र के लिए विशेष न्यायालय का गठन किया गया है, वहाँ इस अधिनियम या इसके अधीन बनाये गये किसी नियम के किसी उपबन्ध के अधीन दण्डनीय प्रत्येक अपराध पर केवल उस विशेष न्यायालय द्वारा विचारण किया जायगा जिसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर ऐसा अपराध चाहे ऐसे विशेष न्यायालय के गठन के पूर्व या पश्चात्, किया गया हो।

(2) विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय ऐसे सभी मामले, जो ऐसे विशेष न्यायालय के गठन के ठीक पूर्व किसी न्यायालय के समक्ष लम्बित हों, ऐसे विशेष न्यायालय के सूजन पर जिसकी ऐसे मामलों पर अधिकारिता हो, उसे अन्तरित हो जायेंगे।

(3) जहाँ किसी न्यायालय को किसी अपराध की किसी जांच या उसके सम्बन्ध में विचारण के दौरान यह प्रतीत हो कि मामला ऐसा है कि उस पर उस क्षेत्र के लिए जहां ऐसा मामला उत्पन्न हुआ हो, इस अधिनियम के अधीन गठित किसी विशेष न्यायालय द्वारा विधारण किया जाना चाहिए, वहां न्यायालय ऐसा मामला ऐसे विशेष न्यायालय को अन्तरित करेगा, और तदुपरान्त ऐसे मामले पर विशेष न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार विचारण और उसका निस्तारण किया जायगा;

परन्तु विशेष न्यायालय के लिए इस धारा के अधीन मामले के अन्तरण के पूर्व न्यायालय द्वारा मामले में अभियुक्त की उपस्थिति में अभिलिखित साक्ष्य पर, यदि कोई हो, कार्यवाही करना विधिपूर्ण होगा;

परन्तु यह और कि यदि विशेष न्यायालय की यह राय हो कि ऐसे साक्षियों की जिनके साक्ष्य मामले में पहिले ही अभिलिखित किये जा चुके है, न्याय के हित में अतिरिक्त परीक्षा करना आवश्यक है तो वह ऐसे किसी साक्षी को पुनः समन कर सकता है और ऐसी अतिरिक्त परीक्षा, प्रति-परीक्षा और पुनः परीक्षा, यदि कोई हो, जैसा वह अनुज्ञा दे, के पश्चात् साक्षी को उन्मोचित कर दिया जायगा।

(4) राज्य सरकार, यदि उसका यह समाधान हो जाय कि लोक-हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, किसी विशेष न्यायालय के समक्ष लम्बित कोई मामला किसी अन्य विशेष न्यायालय को अन्तरित कर सकती है।

8. अन्य अपराधों के संबंध में विशेष न्यायालय की शक्ति -

(1) इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण करते समय कोई विशेष न्यायालय किसी अन्य अपराध पर जिसका अभियुक्त पर तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन उसी विचारण में आरोप लगाया जाय, विचार कर सकता है।

(2) यदि किसी अपराध के, इस अधिनियम के अधीन किसी विचारण के दौरान यह पाया जाय कि अभियुक्त ने इस अधिनियम या इसके अधीन किसी नियम या किसी अन्य विधि के अधीन कोई अन्य अपराध किया है तो विशेष न्यायालय ऐसे व्यक्ति को ऐसे अन्य अपराध का सिद्ध-दोषी ठहरा सकता है और उसके दण्ड के लिए, यथास्थिति, इस अधिनियम या, ऐसे नियम या ऐसी अन्य विधि द्वारा प्राधिकृत कोई दण्डादेश दे सकता है।

9. लोक अभियोजक -

(1) राज्य सरकार प्रत्येक विशेष न्यायालय के लिए किसी व्यक्ति को लोक अभियोजक नियुक्त करेगी और एक या अधिक व्यक्तियों को अपर लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजकों के रूप में नियुक्त कर सकती है।

परन्तु राज्य सरकार किसी मामले या मामलों के वर्ग के लिए विशेष लोक अभियोजक भी नियुक्त कर सकती है।

(2) कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक या विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्ति के लिए तभी पात्र होगा जब उसने कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में कार्य किया हो या कम से कम सात वर्ष की अवधि तक संघ या किसी राज्य के अधीन कोई ऐसा पद धारण किया हो जिसमें विधि का विशेष ज्ञान अपेक्षित हो।

(3) इस धारा के अधीन लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक या विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 2 के खण्ड (प) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 2 के खण्ड (फ) के अर्थान्तर्गत लोक अभियोजक समझा जायगा, और दंड प्रक्रिया संहिता के उपबन्ध तद्नुसार प्रभावी होंगे।

10. विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां-

(1) विशेष न्यायालय अपने द्वारा विचारणीय किसी अपराध का संज्ञान, विचारण के लिए अभियुक्त को उसे सुपुर्द किये गये बिना उन तथ्यों का, जिनसे ऐसा अपराध बनता है, परिवाद प्राप्त होने पर या ऐसे तथ्यों की, पुलिस रिपोर्ट पर कर सकता है।

(2) जहाँ विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय कोई अपराध तीन वर्ष से अनधिक की अवधि के कारावास से या जुर्माने से या दोनों से दण्डनीय है, वहाँ विशेष न्यायालय, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 260 की उपधारा (1) या धारा 262 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 283 की उपधारा (2) या धारा 285) में किसी बात के होते हुए भी, उस अपराध का विचारण दंड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) में विहित प्रक्रिया के अनुसार संक्षेपतः कर सकता है और दंड प्रक्रिया संहिता  की धारा 263 से 265 तक (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023  की धारा 286 से 288 के उपबन्ध, यथासाध्य, ऐसे विचारण पर लागू होंगेः

परन्तु जब इस उपधारा के अधीन संक्षिप्त विचारण के दौरान विशेष न्यायालय को यह प्रतीत हो कि मामले का स्वरूप ऐसा है कि उसका संक्षेपतः विचारण करना अवांछनीय है, तब विशेष न्यायालय किन्हीं साक्षियों को जिनकी परीक्षा की जा चुकी है, पुनः बुलायेगा और ऐसे अपराध के विचारण के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के उपवन्धों द्वारा उपवन्धित रीति से मामले की पुनः सुनवाई प्रारंभ करेगा और उक्त उपवन्ध विशेष न्यायालय को और उसके संबंध में, उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे किसी मजिस्ट्रेट को और उसके सम्बन्ध में, लागू होते हैं:

परन्तु यह और कि इस उपधारा के अधीन संक्षिप्त विचारण में किसी दोषसिद्धि के मामले में दो वर्ष से अनधिक अवधि के कारावास का दण्डादेश देना विशेष न्यायालय के लिए विधिपूर्ण होगा।

(3) विशेष न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य प्राप्त करने की दृष्टि से जिसके बारे में किसी अपराध से प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः संपृक्त या संसर्गित होने का अनुमान है; ऐसे व्यक्ति को इस शर्त पर क्षमा प्रदान कर सकता है कि वह उस अपराध के और उससे संपृक्त अन्य प्रत्येक व्यक्ति के संबंध में, चाहे वह उसके करने में कर्ता रहा हो या दुष्प्रेरक, अपने ज्ञान से सभी परिस्थितियों को पूर्ण और सही रूप में प्रकट करें और इस प्रकार प्रदान की गयी कोई क्षमा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 308 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 345)  के प्रयोजनार्थ, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 307 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 344) के अधीन प्रदान की गयी समझी जायगी।

(4) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, विशेष न्यायालय को किसी अपराध के विचारण के प्रयोजन के लिए सेशन न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी और वह मजिस्ट्रेट द्वारा वारण्ट के मामलों में विचारण के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) में विहित प्रक्रिया का अनुसरण करेगा।

(5) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, धारा 7 की उप धारा (3) के अधीन विशेष न्यायालय को अन्तरित प्रत्येक मामले के संबंध में उसी प्रकार कार्यवाही की जायगी मानो ऐसा मामला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 406 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 446) के अधीन ऐसे विशेष न्यायालय को अन्तरित किया गया हो।

11. साक्षियों का संरक्षण-

(1) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण करने वाले न्यायालय के समक्ष सभी कार्यवाहियां बन्द कमरे में की जायेंगीः

परन्तु जहां लोक अभियोजक इस प्रकार आवेदन करता है, वहाँ कोई कार्यवाही या उसका भाग खुले न्यायालय में की जा सकती है।

(2) ऐसा न्यायालय अपने समक्ष किसी कार्यवाही में साक्षी द्वारा या ऐसे साक्षी के सम्बन्ध में लोक अभियोजक द्वारा आवेदन करने पर या स्वप्रेरणा से साक्षी का परिचय और पता गोपनीय रखने के लिए ऐसे उपाय कर सकता है जो वह उचित समझे।

(3) विशिष्टतया और उपधारा (2) के उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, वे उपाय जो ऐसा न्यायालय उस उपधारा के अधीन कर सकता है, उसके अन्तर्गत निम्नलिखित उपाय भी हैं:--

(क) अपने आदेशों या निर्णय में या मामले के किसी अभिलेख में जो जनता की पहुंच में हो, साक्षियों के नाम और पते का उल्लेख न करना;

(ख) यह सुनिश्चित करने के लिए कि साक्षियों का परिचय और पता प्रकट न हो जाय, कोई निदेश जारी करना।

(4) कोई व्यक्ति, जो उपधारा (3) के अधीन जारी किये गये किसी निदेश का उल्लंघन करता है, कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने सेजो एक हजार रूपये तक हो सकेगा, दण्डनीय होगा।

12. विशेष न्यायालयों द्वारा विचारण को पूर्वता-

किसी अन्य न्यायालय में (जो विशेष न्यायालय न हो) अभियुक्त के विरूद्ध किसी अन्य मामले के विचारण पर विशेष न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के विचारण को पूर्वता दी जायगी और उसे ऐसे अन्य मामले के विचारण के अधिमान में पहले समाप्त किया जायगा और तद्नुसार ऐसे अन्य मामले का विचारण आस्थगित रहेगा।

13. नियमित न्यायालयों को मामले अन्तरित करने की शक्ति- 

जहाँ किसी अपराध का संज्ञान करने के पश्चात् विशेष न्ययालय की यह राय हो कि अपराध उसके द्वारा विचारणीय नहीं है, वहाँ वह इस बात के होते हुए भी कि उसे ऐसे अपराध का विचारण करने की अधिकारिता नहीं है, ऐसे अपराध का विचारण करने के लिए मामले को किसी ऐसे न्यायालय को अन्तरित करेगा जिसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन अधिकारिता है और वह न्यायालय जिसे मामला अन्तरित किया जाय, अपराध के विचारण के संबंध में कार्यवाही करेगा मानों उसने अपराध का संज्ञान किया हो।

14. सम्पत्ति की कुर्की-

(1) यदि जिला मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का कारण हो कि किसी व्यक्ति के कब्जे में स्थित कोई सम्पत्ति, चाहे वह जंगम हो या स्थावर, किसी गिरोहबन्द के द्वारा इस अधिनियम के अधीन विचारणीय किसी अपराध कार्य के परिणामस्वरूप अर्जित की गयी है तो वह ऐसी सम्पत्ति को कुर्क करने का आदेश दे सकता है, चाहे किसी न्यायालय द्वारा ऐसे अपराध का संज्ञान किया गया हो या नहीं।

(2) प्रत्येक ऐसी कुर्की पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के उपबन्ध, यथावश्यक परिवर्तन सहित, लागू होंगे।

(3) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के उपबन्धों के होते हुए भी, जिला मजिस्ट्रेट, उपधारा (1) के अधीन कुर्क की गयी किसी सम्पत्ति का प्रशासक नियुक्त कर सकता है और प्रशासक को ऐसी सम्पत्ति के सर्वोत्तम हित में उसका प्रबन्ध करने की सभी शक्तियां होंगी।

(4) जिला मजिस्ट्रेट ऐसी सम्पत्ति के उचित और प्रभावी प्रबन्ध के लिए प्रशासक को पुलिस सहायता की व्यवस्था कर सकता है।

15. सम्पत्ति को निर्मुक्त करना-

(1) जहाँ कोई सम्पत्ति धारा 14 के अधीन कुर्क की जाय, वहाँ उसका दावेदार, ऐसी कुर्की की जानकारी के दिनांक से तीन मास के भीतर जिला मजिस्ट्रेट को अपने द्वारा उस सम्पत्ति के अर्जन की परिस्थितियों और स्रोतों को दर्शाते हुए अभ्यावेदन कर सकता है।

(2) यदि उपधारा (1) के अधीन किये गये दावे की वास्तविकता के बारे में जिला मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाय तो वह कुर्क की गयी सम्पत्ति को तत्काल निर्मुक्त कर देगा और तदुपरांत ऐसी सम्पत्ति दावेदार को सौंप दी जायेगी।

16. न्यायालय द्वारा सम्पत्ति के अर्जन के स्वरूप के बारे में जांच-

(1) जहाँ धारा 15 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर कोई अभ्यावेदन न दिया जाय या जिला मजिस्ट्रेट धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन सम्पत्ति को निर्मुक्त नहीं करता है, वहाँ वह मामले को अपनी रिपोर्ट के साथ इस अधिनियम के अधीन अपराध का विचाराण करने के लिए अधिकारितायुक्त न्यायालय को निर्दिष्ट करेगा।

(2) जहाँ जिला मजिस्ट्रेट ने किसी सम्पत्ति को धारा 14 की उपधारा (1) के अधीन कुर्क करने से इन्कार किया है या किसी सम्पत्ति को धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन निर्मुक्त करने का आदेश दिया है, वहाँ राज्य सरकार या कोई व्यक्ति जो इस प्रकार इन्कार करने या निर्मुक्त करने से व्यथित हो, यह जांच करने के लिए कि क्या सम्पत्ति इस अधिनियम के अधीन विचारणीय किसी अपराध कार्य के द्वारा या उसके परिणामस्वरूप अर्जित की गयी थी, उपधारा (1) में निर्दिष्ट न्यायालय को आवेदन-पत्र दे सकता है। ऐसा न्यायालय, यदि वह न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझे, ऐसी सम्पत्ति को कुर्क करने का आदेश दे सकता है।

(3) (क) उपधारा (1) के अधीन निर्देश या उपधारा (2) के अधीन आवेदन-पत्र की प्राप्ति पर न्यायालय जांच के लिए कोई दिनांक नियत करेगा और उसकी नोटिस उपधारा (2) के अधीन आवेदन-पत्र देने वाले व्यक्ति या, यथास्थिति, धारा 15 के अधीन अभ्यावेदन देने वाले व्यक्ति और राज्य सरकार और किसी अन्य व्यक्ति को भी जिसका हित मामले में अन्तर्ग्रस्त प्रतीत हो, देगा।

(ख) इस प्रकार नियत दिनांक को या किसी पश्चातवर्ती दिनांक को जब तक के लिए जांच आस्थगितकी जाय, न्यायालय पक्षकारों की सुनवाई करेगा, उनके द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य ग्रहण करेगा, ऐसे और साक्ष्य लेगा जिसे वह आवश्यक समझे, यह विनिश्चय करेगा कि क्या सम्पत्ति किसी गिरोहबन्द द्वारा इस अधिनियम के अधीन विचारणीय किसी अपराध कार्य के परिणामस्वरूप अर्जित की गयी थी और धारा 17 के अधीन ऐसा आदेश देगा जैसा मामले की परिस्थितियों में न्यायसंगत और आवश्यक हो।

(4) उपधारा (3) के अधीन जांच के प्रयोजनों के लिए विशेष न्यायालय को निम्नलिखित विषयों के सम्बन्ध में ऐसी शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन किसी वाद पर विचारण करते समय सिविल न्यायालय की होती है, अर्थात् --

(क) किसी व्यक्ति को समन कराना और उसे हाजिर कराना और शपथ पर उसका परीक्षण करना;

(ख) दस्तावेजों का पता लगाने और उन्हें प्रस्तुत करने की अपेक्षा करना;

(ग) शपथ-पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;

(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से कोई सार्वजनिक अभिलेख या उसकी प्रति अधियाचित करना;

(ड) साक्षियों या दस्तावेजों के परीक्षण के लिए कमीशन जारी करना;

(च) व्यतिक्रम के लिए निर्देश को खारिज करना या उसे एक पक्षीय विनिश्चित करना;

(छ) व्यतिक्रम के लिए खारिज करने के आदेश या एकपक्षीय विनिश्चय को अपास्त करना।

(5) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023) में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, इस धारा के अधीन किसी कार्यवाही में यह साबित करने का भार कि प्रश्नगत सम्पत्ति या उसका कोई भाग किसी गिरोहबन्द द्वारा इस अधिनियम के अधीन विचारणीय किसी अपराध कार्य के परिणामस्वरूप अर्जित नहीं किया गया था, सम्पत्ति पर दावा करने वाले व्यक्ति पर होगा।

17. जॉच के पश्चात् आदेश-

यदि ऐसी जांच पर न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सम्पत्ति किसी गिरोहबन्द द्वारा इस अधिनियम के अधीन विचारणीय किसी अपराध कार्य के परिणामस्वरूप अर्जित नहीं की गयी थी तो वह उस सम्पत्ति को ऐसे व्यक्ति के पक्ष में निर्मुक्त करने का आदेश देगा जिसके कब्जे से वह कुर्क की गयी थी। किसी अन्य मामले में न्यायालय सम्पत्ति को कुर्क करके, अधिहरण करके या सम्पत्ति पर कब्जा पाने के लिए हकदार व्यक्ति को देकर, या अन्य प्रकार से उसका निस्तारण करने का ऐसा आदेश दे सकता है, जैसा वह उचित समझे।

18. अपील-

दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 29 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023  के अध्याय 31)  के उपबन्ध, इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन पारित न्यायालय के किसी निर्णय या आदेश के विरूद्व अपील पर यथावश्यक परिवर्तन सहित, लागू होंगे।

19. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के कुछ उपबन्धों को उपान्तरित रूप में लागू किया जाना-

(1) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम या इसके अधीन बनाये गये किसी नियम के अधीन दण्डनीय प्रत्येक अपराध को दंड प्रक्रिया संहिता  की धारा 2 के खण्ड (ग) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 2 के खण्ड (छ) के अर्थान्तर्गत संज्ञेय अपराध समझा जायेगा और "संज्ञेय मामले" का, जैसा उसे उस खण्ड में परिभाषित किया गया है, तद्नुसार अर्थ लगाया जायगा।

(2) दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 187), इस अधिनियम या इसके अधीन बनाये गये किसी नियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध वाले मामले के संबंध में निम्नलिखित उपान्तरों के अधीन रहते हुए इस प्रकार लागू होगी कि --

(क) उसकी उपधारा (1) में, "न्यायिक मजिस्ट्रेट" के प्रति निर्देश का अर्थ "न्यायिक मजिस्ट्रेट या कार्यपालक मजिस्ट्रेट" के प्रति निर्देश के रूप में लगाया जायगा;

(ख) उसकी उपधारा (2) में, "पन्द्रह दिन", "नब्बे दिन" और "साठ दिन", जहां कहीं भी आये हों, के प्रति निर्देशों का अर्थ क्रमशः "साठ दिन", "एक वर्ष" और "एक वर्ष", के प्रति निर्देशों के रूप में लगाया जायगा;

(ग) उसकी उपधारा (2-क) निकाल दी गयी समझी जायगी।

(3) दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 366, 367, 368 और 371 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 407, 408, 409 और 412 विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय अपराध वाले मामले के सम्बन्ध में इस उपान्तर के अधीन रहते हुए लागू होगी कि उसमें "सेशन न्यायालय" जहा कहीं भी आया हो, के प्रति निर्देश का अर्थ "विशेष न्यायालय" के प्रति निर्देश के रूप में लगाया जायगा।

(4) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम या इसके अधीन बनाये गये किसी नियम के अधीन दण्डनीय अपराध से आरोपित किसी व्यक्ति को, यदि वह अभिरक्षा में है, जमानत पर या उसके अपने बधपत्र पर तब तक नहीं छोड़ा जायगा, जब तक कि--

(क) लोक अभियोजक को ऐसे छोड़े जाने के आवेदन का विरोध करने का अवसर नहीं दिया जाता; और

(ख) जहां लोक अभियोजक आवेदन का विरोध करता है, वहां न्यायालय का समाधान न हो जाय कि यह विश्वास करने क युक्तियुक्त आधार है कि वह ऐसे अपराध का दोषी नहीं है और यह कि जमानत पर रहते समय उसके द्वारा कोई अपराध करने की संभावना नहीं है।

(5) उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट जमानत मंजूर करने के बारे में निर्बन्धन, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के अधीन निर्बन्धनों के अतिरिक्त होंगे।

20. अधिभावी प्रभाव-

इस अधिनियम या इसके अधीन बनाये गये किसी नियम के उपबन्ध किसी अन्य अधिनियमिति में इससे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे।

21. आदेश के बारे में उपधारणा-

जहां यह तात्पर्यत हो कि कोई आदेश इस अधिनियम के द्वारा प्रदत्त या उसके अधीन किसी शक्ति का प्रयोग करके किसी प्राधिकारी द्वारा दिया गया और हस्ताक्षरित किया गया है, वहां न्यायालय भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023)  के अर्थान्तर्गत यह उपधारणा करेगा कि ऐसा आदेश उस प्राधिकारी द्वारा दिया गया था।

22. सद्भावना से किये गये कार्य का संरक्षण-

राज्य सरकार या राज्य सरकार के किसी अधिकारी या प्राधिकारी के विरूद्ध किसी ऐसे कार्य के लिए जो इस अधिनियम या इसके अधीन बनाये गये किसी नियम के अनुसरण में सद्भाव से किया गया हो या किये जाने के लिए आशयित हो, कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं की जा सकेगी।

23. नियम बनाने की शक्ति-

(1) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकती है।

(2) उपधारा (1) के अधीन बनाये गये नियमों में यह व्यवस्था की जा सकती है कि नियमों के किन्हीं उपबन्धों का उल्लंघन एक हजार रूपये से अनधिक के जुर्माने सहित या बिना जुर्माने के कारावास से ऐसी अवधि के लिए जो छःमास से अधिक न होगी, दण्डनीय होगा।

24. निरसन और अपवाद-

(1) उत्तर प्रदेश गिरोहबन्द और समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) निरसन और अपवाद अध्यादेश, 1986 एतद्वारा निरसित किया जाता है।

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उपधारा (1) में निर्दिष्ट अध्यादेश के अधीन कृत कोई कार्य या कार्यवाही इस अधिनियम के तद्नुरूप उपबन्धों के अधीन कृत कार्य या कार्यवाही समझी जायगी मानों इस अधिनियम के उपबन्ध सभी सारभूत समय पर प्रवृत्त थे।

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