
[23 नवम्बर, 1946]
विदेशियों के सम्बन्ध में केन्द्रीय सरकार को कतिपय शक्तियां प्रदान करने के लिए अधिनियम
भारत में विदेशियों का प्रवेश, उसमें उनकी उपस्थिति और उनके उससे प्रस्थान के संबंध में केन्द्रीय सरकार द्वारा कतिपय शक्तियों का प्रयोग करने के लिए उपबंध करना समीचीन है;
अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है :-
(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 है।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण 2[भारत] पर है 3***।
इस अधिनियम में,-
4[(क) “विदेशी” से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो भारत का नागरिक नहीं है;]
5* * * *
(ख) “विहित” से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए आदेशों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ग) “विनिर्दिष्ट” से विहित प्राधिकारी के निदेशों द्वारा विनिर्दिष्ट अभिप्रेत है।
(1) केन्द्रीय सरकार या तो साधारणतः या सब विदेशियों के संबंध में या किसी विशिष्ट विदेशी संबंध में या किसी विहित वर्ग या विवरण के विदेशी के संबंध में 2[भारत] में विदेशियों के प्रवेश, उससे उनके प्रस्थान या उसमें उनकी उपस्थिति या उनकी निरन्तर उपस्थिति को प्रतिषिद्ध, विनियमित या निर्बंधित करने के लिए, 6आदेश द्वारा उपबन्ध बना सकती है।
(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इस धारा के अधीन बनाए गए आदेशों में यह उपबंधित हो सकता है कि विदेशी-
(क) 2[भारत] में प्रवेश नहीं करेगा, या 2[भारत] में केवल ऐसे समयों पर और ऐसे मार्ग से और ऐसे पत्तन या स्थान से, और अपने आगमन पर ऐसी शर्तों के, जैसे विहित की जाएं, अनुपालन के अधीन रहते हुए, प्रवेश करेगा;
(ख) 2[भारत] से प्रस्थान नहीं करेगा, या ऐसे समयों पर और ऐसे मार्ग से और ऐसे पत्तन या स्थान से और प्रस्थान पर ऐसी शर्तों के, जैसी विहित की जाएं, अनुपालन के अधीन रहते हुए प्रस्थान करेगा;
(ग) 2[भारत] में या भारत में किसी विहित क्षेत्र में नहीं रहेगा;
7[(गग) यदि इस धारा के अधीन आदेश द्वारा उससे भारत में न रहने की अपेक्षा की गई है, तो वह अपने व्ययनाधीन साधनों से भारत से अपने हटाए जाने का और ऐसे हटाए जाने तक भारत में अपने भरण-पोषण का व्यय वहन करेगा;]
(घ) 2[भारत] में ऐसे क्षेत्र में जैसा विहित किया जाए आने को ले जाएगा और उसमें रहेगा;
(ङ) ऐसी शर्तों का अनुपालन करेगा जो विहित या विनिर्दिष्ट की जाएं-
(1. इस अधिनियम का-
1962 के विनियम सं० 12 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा उपांतरणों सहित, गोवा, दमन और दीव पर अधिसूचना सं० सा० का० नि० 1557, तारीख 24-11-1962, भारत का राजपत्र, भाग 2, अनुभाग 3 (ⅰ), पृ० 1886 द्वारा उपांतरणों सहित पांडिचेरी पर विस्तार किया गया, और यह अधिनियम, 1963 के विनियम सं० 6 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा दादरा और नागर हवेली पर 1965 के विनियम सं० 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा (1-10-1967 से) लक्षद्वीप, मिनिकाय और अमीनदीवी द्वीप पर और अधिसूचना सं० सा० का० नि० 41 (अ), तारीख 27-1-1976 द्वारा (1-2-1976 से) सिक्किम राज्य पर प्रवृत्त किया गया।)
(2. 1947 के अधिनियम सं० 38 की धारा 2 द्वारा "ब्रिटिश भारत" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(3. "हैदराबार राज्य के सिवाय" शब्दों का जो विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा अंतःस्थापित किए गए थे, 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 तथा अनुसूची द्वारा लोप किया गया।)
(4. 1957 के अधिनियम सं० 11 की धारा 2 द्वारा (19-1-1957 से) पूर्ववर्ती खण्ड के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(5. खण्ड (कक) का, जो विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा अंतःस्थापित किया गया था, 1951 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 तथा अनुसूची द्वारा लोप किया गया।)
(6. विदेशियों विषयक आदेश, 1948 देखिए भारत का राजपत्र (अंग्रेजी) 1948, भाग 1, पृ० 198।)
(7. 1947 के अधिनियम सं० 38 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित।)
(i) जिनसे किसी विशिष्ट स्थान में निवास करने की उससे अपेक्षा की जाए,
(ii) जिनसे उसकी गतिविधियों पर किन्हीं निर्बंधनों को अधिरोपित किया जाए,
(iii) जिनसे उनको पहचान का ऐसा सबूत देने और ऐसे प्राधिकारी को ऐसी विशिष्टियां ऐसी रीति से और ऐसे समय और स्थान पर जो विहित या विनिर्दिष्ट किए जाएं, रिपोर्ट करने के लिए अपेक्षा की जाए,
(iv) जिनसे उसके फोटोचित्र और अंगुली छाप लिए जाने के लिए, अनुज्ञात करने के लिए और उसके हस्तलेख और हस्ताक्षर का नमूना ऐसे प्राधिकारी को ऐसे समय और स्थान पर जो विहित या विनिर्दिष्ट किए जाएं देने की अपेक्षा की जाए,
(v) जिनसे ऐसे प्राधिकारी द्वारा और ऐसे समय और स्थान पर जैसे विहित या विनिर्दिष्ट किए जाएं ऐसी चिकित्सीय परीक्षा के लिए जो विहित या विनिर्दिष्ट की जाएं स्वयं को प्रस्तुत करने के लिए उससे अपेक्षा की जाएं,
(vi) जिनसे विहित या विनिर्दिष्ट प्रकार के व्यक्तियों के साथ मेलजोल से उसे प्रतिषिद्ध किया जाए,
(vii) जिनसे विहित या विनिर्दिष्ट विवरण के क्रियाकलापों के करने से उसे प्रतिषिद्ध किया जाए,
(viii) जिनसे विहित या विनिर्दिष्ट वस्तुओं के उपयोग या कब्जे से उसे प्रतिषिद्ध किया जाए,
(ix) जिनसे किसी ऐसी विशिष्टि में जैसी विहित या विनिर्दिष्ट की जाए, उसके आचरण को अन्यथा विनियमित किया जाए;
(च) किन्हीं या सभी विहित या विनिर्दिष्ट निर्बंधनों या शर्तों के, सम्यक् अनुपालन के लिए, या प्रवर्तन के विकल्प के रूप में, प्रतिभू सहित या रहित बंधपत्र निष्पादित करेगा;
1[(छ) गिरफ्तार और निरुद्ध या परिरुद्ध किया जाएगा;],
और 2[किसी ऐसे मामले के लिए जो विहित किया जाना है या विहित किया जा सकता है और] ऐसे आनुषंगिक या अनुपूरक मामलों के लिए जो केन्द्रीय सरकार की राय में इस अधिनियम को प्रभावी करने के लिए समीचीन या आवश्यक है, उपबंध कर सकते हैं।
2[(3) इस निमित्त विहित कोई भी प्राधिकारी किसी विशिष्ट विदेशी के संबंध में उपधारा (2) के खण्ड (ङ) 3[या खण्ड (च)] के अधीन आदेश दे सकता है।]
4[3क. कतिपय मामलों में अधिनियम लागू होने से राष्ट्रमंडलीय देशों के नागरिकों और अन्य व्यक्तियों को छूट देने की शक्ति-
(1) केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा यह घोषणा कर सकती है कि इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए आदेश के सब या कोई उपबंध लागू नहीं होंगे या ऐसी परिस्थितियों में या ऐसे अपवादों या उपांतरों सहित या ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, निम्नलिखित को या के संबंध में लागू होंगे-
(क) ऐसे किसी राष्ट्रमंडलीय देश के नागरिक जो इस प्रकार विनिर्दिष्ट किया जाए; या
(ख) कोई अन्य विदेशी व्यक्ति या वर्ग या प्रकार का विदेशी ।
(2) इस धारा के अधीन बनाए गए प्रत्येक आदेश की प्रति उसके बनाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संसद् के दोनों सदनों के पटल पर रखी जाएगी।]
5[(1) कोई भी विदेशी (जिसे इसमें इसके पश्चात् नजरबंद कहा गया है) जिसके संबंध में धारा 3 की उपधारा (2) के खण्ड (छ) के अधीन दिया गया कोई आदेश प्रवृत्त है जिसमें यह निदेश है कि उसे निरुद्ध या परिरुद्ध रखा जाए तो वह ऐसे स्थान में और ऐसी रीति से तथा भरण-पोषण, अनुशासन और अपराधों के दंड और अनुशासन के भंग के बारे में ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो केन्द्रीय सरकार समय-समय पर आदेश द्वारा अवधारित करे, निरुद्ध या परिरुद्ध रखा जाएगा।]
(2) कोई भी विदेशी (जिसे इसमें इसके पश्चात् परोल पर छोड़ा गया व्यक्ति कहा गया है) जिसके संबंध में धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (ड) के अधीन कोई आदेश प्रवृत्त है जिसमें उससे पर्यवेक्षणाधीन विदेशियों के समूह के निवास के लिए पृथक् किए गए स्थान पर निवास करने के लिए अपेक्षा की गई है, उसमें निवास करने के दौरान भरण-पोषण, अनुशासन और अपराधों के दंड और अनुशासन के भंग के बारे में ऐसी शर्तों के अधीन होगा जो केन्द्रीय सरकार समय-समय पर आदेश द्वारा अधारित करे।
(1. 1962 के अधिनियम सं० 42 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित । पूर्ववर्ती कोष्ठकों, अक्षर और शब्दों का "(छ) गिरफ्तार और निरुद्ध या परिरुद्ध किया जाएगा," 1957 के अधिनियम सं० 11 की धारा 3 द्वारा (19-1-1957 से) लोप किया गया।)
(2. 1947 के अधिनियम सं० 38 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित।)
(3. 1957 के अधिनियम सं० 11 की धारा 3 द्वारा (19-1-1957) "खण्ड (च) या खण्ड (छ)" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(4. 1957 के अधिनियम सं० 11 की धारा 4 द्वारा (19-1-1957 से) अंतःस्थापित।)
(5. 1962 के अधिनियम सं० 42 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित पूर्ववर्ती उपधारा (1) का 1957 के अधिनियम सं० 11 की धारा 5 द्वारा (19-1-1957 से) लोप किया गया।)
1[(3) कोई भी व्यक्ति-
(क) नजरबन्द या परोल पर छोड़े गए व्यक्ति की अभिरक्षा से या उसके निवास के लिए पृथक् किए गए स्थान से निकल भागने में जानबूझकर सहायता नहीं करेगा या निकल भागे नजरबन्द या परोल पर छाड़े गए किसी व्यक्ति को जानबूझकर संश्रय नहीं देगा, या
(ख) निकल भागे नजरबन्द या परोल पर छोड़े गए व्यक्ति की इस आशय से सहायता नहीं करेगी कि तद्द्वरा नजरबन्द या परोल पर छोड़े गए व्यक्ति के पकड़े जाने में रोक, प्रतिबाधा या हस्तक्षेप हो।
(4) केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, भारत में उन स्थानों तक जहां नजरबन्द या परोल पर छोड़े गए व्यक्ति, यथास्थिति, निरुद्ध या निर्बन्धित है पहुंच, और उनमें व्यक्तियों के आचरण को विनियमित करने के लिए और ऐसे स्थानों के बाहर से नजरबन्दों या परोल पर छोड़े गए व्यक्तियों को या के लिए ऐसी वस्तुओं का जो विहित की जाएं, भेजना या प्रवहन के प्रतिषेध या विनियमन के लिए उपबन्ध कर सकती है।]
(1) कोई भी विदेशी जो 2[भारत] में उस तारीख को था जब यह अधिनियम प्रवृत्त हुआ, उस तारीख के पश्चात् जब वह 2[भारत] में है, उस नाम से भिन्न जिससे उक्त तारीख से ठीक पहले वह साधारणतः ज्ञात था किसी भी प्रयोजनार्थ किसी अन्य नाम का, ग्रहण या उपयोग नहीं करेगा या ग्रहण या प्रयोग करना तात्पर्यत नहीं करेगा ।
(2) जहां उस तारीख के पश्चात् जब यह अधिनियम प्रवृत्त हुआ था, कोई विदेशी (चाहे स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति के साथ) उस नाम या अभिधान से भिन्न जिससे उक्त तारीख के ठीक पहले वह व्यापार या कारबार चलाया जा रहा था, किसी नाम या अभिधान से कोई व्यापार या कारबार चलाता है या उसके द्वारा चलाना तात्पर्यित है, तो उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि वह उस नाम से भिन्न जिसके द्वारा वह उक्त अधिनियम के ठीक पहले साधारणतः ज्ञात था किसी अन्य नाम का प्रयोग कर रहा है।
(3) किसी ऐसे विदेशी के संबंध में, जो उस तारीख को जब यह अधिनियम प्रवृत्त हुआ था, 2[भारत] में नहीं था, और तत्पश्चात् 2[भारत] में प्रवेश करता है तो उपधारा (1) और (2) ऐसे प्रभावी होंगी मानो उन उपधाराओं में जिस तारीख को यह अधिनियम प्रवृत्त हुआ था उसके लिए निर्देश के स्थान पर उस तारीख के प्रति निर्देश प्रतिस्थापित किए गए, जिसको वह तत्पश्चात् प्रथम बार ² [भारत] में प्रवेश करता है।
(4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) "नाम" पद के अंतर्गत उपनाम भी है, और
(ख) नाम परिवर्तित हुआ समझा जाएगा यदि उसकी वर्तनी में परिवर्तन किया जाता है।
(5) इस धारा की कोई बात-
(क) केन्द्रीय सरकार द्वारा 3*** अनुदत्त अनुज्ञा या अनुज्ञप्ति के अनुसरण में किसी नाम के; या
(ख) किसी विवाहित स्त्री द्वारा अपने पति के नाम के, ग्रहण या उपयोग को लागू नहीं होगी।
(1) 2[भारत] में किसी पत्तन पर समुद्र से उस पत्तन को आने वाले या उससे जाने वाले यात्रियों को उस पत्तन पर उतारने या चढ़ाने वाले जलयान का मास्टर और 4[भारत] में किसी स्थान से वायु से उस स्थान को आने वाले या जाने वाले यात्रियों को उस स्थान पर उतारने या चढ़ाने वाले वायुयान का चालक ऐसे व्यक्ति को और ऐसी रीति से जो विहित की जाए एक विवरणी देगा जिसमें ऐसे यात्रियों या कर्मीदल के सदस्यों के संबंध में जो विदेशी हों, विहित विशिष्टियां होंगी।
(2) कोई जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस आयुक्त या जहां पर पुलिस आयुक्त नहीं है वहां पुलिस अधीक्षक इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए आदेश के प्रवर्तन से संबंधित प्रयोजनार्थ ऐसे किसी जलयान के मास्टर या ऐसे किसी वायुयान के चालक से अपेक्षा कर सकता है कि वह, यथास्थिति, ऐसे जलयान या वायुयान पर यात्रियों या कर्मीदल के सदस्यों के संबंध में ऐसी सूचना दे जो विहित की जाए।
(3) ऐसे जलयान या ऐसे वायुयान पर कोई यात्री और ऐसे जलयान या वायुयान के कर्मीदल का कोई सदस्य, यथास्थिति, जलयान के मास्टर और वायुयान के चालक को उपधारा (1) में निर्दिष्ट विवरणी देने के प्रयोजन से या उपधारा (2) में अपेक्षित सूचना देने के लिए ऐसी सूचना जो उसके द्वारा अपेक्षित है, देगा।
4[(4) यदि कोई विदेशी इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए आदेश के किसी उपबंध के उल्लंघन में भारत में प्रवेश करता है, तो विहित प्राधिकारी ऐसे प्रवेश की तारीख से दो माह के भीतर ऐसे जलयान के मास्टर या वायुयान चालक को जिस पर ऐसी प्रविष्टि की गई थी या ऐसे जलयान या वायुयान के स्वामी या स्वामी के अभिकर्ता को, उक्त प्राधिकारी के समाधानपर्यन्त और सरकार के व्यय से अन्यथा, किसी जलयान या वायुयान पर भारत से उक्त विदेशी को हटाने के प्रयोजनार्थ स्थान देने के लिए निदेश दे सकता है।
(1. 1962 के अधिनियम सं० 42 की धारा 3 द्वारा उपधारा (3) और उपधारा (4) के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(2. 1947 के अधिनियम सं० 38 की धारा 2 द्वारा "ब्रिटिश भारत" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(3. 1957 के अधिनियम सं० 11 की धारा 6 द्वारा (19-1-1957) "रायल" शब्द का लोप किया गया।)
(4. 1947 के अधिनियम सं० 38 की धारा 5 द्वारा उपधारा (4) और उपधारा (5) अंतःस्थापित की गई और मूल उपधारा (4) को उपधारा (6) के रूप में पुनःसंख्यांकित किया गया।)
(5) किसी जलयान का मास्टर या किसी वायुयान का चालक जो भारत में किसी पत्तन या स्थान से भारत से बाहर किसी गन्तव्य स्थान पर यात्रियों को ले जाने वाला है या किसी ऐसे जलयान या वायुयान का स्वामी या ऐसे स्वामी का अभिकर्ता यदि उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे निर्दिष्ट किया जाता है, और वर्तमान दरों पर उसके लिए संदाय किया जाता है तो भारत के बाहर ऐसे पतन या स्थान के लिए जैसा केन्द्रीय सरकार विनिर्दिष्ट करे धारा 3 के अधीन भारत में न रहने के लिए आदिष्ट किसी विदेशी और उसके साथ यात्रा कर रहे ऐसे आश्रितों के लिए, यदि कोई हों, उस जलयान या वायुयान पर ऐसे पत्तन या स्थान के लिए स्थान की व्यवस्था करेगा जो ऐसा पत्तन या स्थान है जहां वह जलयान या वायुयान जाना है।]
1[(6)] इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) “जलयान के मास्टर" और "किसी वायुयान के चालक" के अन्तर्गत, यथास्थिति, ऐसे मास्टर या चालक द्वारा, उसकी ओर से इस धारा द्वारा उस पर अधिरोपित कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए, प्राधिकृत कोई व्यक्ति भी है;
(ख) “यात्री” से ऐसा यात्री अभिप्रेत है जो ऐसे कर्मीदल का वास्तविक सदस्य नहीं है और जो किसी जलयान या वायुयान पर यात्रा कर रहा है या यात्रा करना चाहता है।
(1) किसी ऐसे परिसर को चाहे वह सुसज्जित हो या असुसज्जित, जहां पारिश्रमिक के लिए निवास और शयन की व्यवस्था की जाती है, चलाने वाले का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे परिसरों में उन विदेशियों की बाबत जिन्हें स्थान दिया गया है, ऐसी सूचना ऐसे व्यक्ति को ऐसी रीति से देगा जो विहित की जाए।
इस उपधारा में निर्दिष्ट सूचना ऐसे सभी या किन्हीं विदेशियों से संबंधित हो सकती है जिन्हें ऐसे परिसरों में स्थान दिया गया है और कालिकतः या किसी विनिर्दिष्ट समय या अवसर पर प्रस्तुत किए जाने के लिए अपेक्षा की जा सकती है।
(2) ऐसे परिसरों में ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जिसे स्थान दिया गया है, उसके चलाने वाले को एक विवरणी देगा जिसमें ऐसी विशिष्टियां होंगी जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट सूचना देने के प्रयोजन के लिए चलाने वाला अपेक्षा करे।
(3) प्रत्येक ऐसे परिसर को चलाने वाला, उपधारा (1) के अधीन अपने द्वारा दी गई सूचना तथा उपधारा (2) के अधीन अपने द्वारा अभिप्राप्त सूचना का अभिलेख रखेगा और ऐसा अभिलेख ऐसी रीति से रख जाएगा और ऐसी कालावधि तक परिरक्षित होगा जो विहित की जाए तथा किसी पुलिस अधिकारी या इस निमित्त जिला मजिस्ट्रेट द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति के निरीक्षण के लिए हर समय खुला रहेगा ।
2[(4) यदि इस निमित्त विहित किसी क्षेत्र में विहित प्राधिकारी, ऐसी रीति से प्रकाशित सूचना द्वारा जो प्राधिकारी की राय में ऐसे संपृक्त व्यक्तियों को सूचित करने के लिए सर्वाधिक अनुकूलित है ऐसा निदेश देता है तो किसी ऐसे आवासिक परिसरों को अधिभोग में या अपने नियंत्रणाधीन रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे व्यक्ति को जिन्हें ऐसे परिसरों में स्थान दिया गया है उन विदेशियों की बाबत ऐसी रीति से ऐसी सूचना प्रस्तुत करे जो विनिर्दिष्ट की जाए और उपधारा (2) के उपबन्ध प्रत्येक ऐसे व्यक्ति को लागू होंगे जिसे ऐसे परिसर में स्थान दिया गया है।]
(1) विहित प्राधिकारी, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, उपाहार गृह या सार्वजनिक समागम या आमोद-प्रमोद के स्थान या क्लब के रूप में प्रयुक्त और जिसमें विदेशी बार-बार आते हैं ऐसे किन्हीं परिसरों के स्वामी या नियंत्रण रखने वाले व्यक्ति को यह निदेश दे सकेगा कि वह-
(क) ऐसे परिसरों को या तो सम्पूर्णतः या विनिर्दिष्ट कालावधि के लिए बन्द करे, या
(ख) ऐसे परिसरों का केवल ऐसी शर्तों के अधीन जो विनिर्दिष्ट की जाएं उपयोग करे या उपयोग के लिए अनुज्ञात करे, या
(ग) ऐसे परिसरों में या तो सभी विदेशियों को या किसी विनिर्दिष्ट विदेशी या विदेशी के वर्ग को प्रवेश देने से इन्कार करे।
(2) कोई ऐसा व्यक्ति जिसे उपधारा (1) के अधीन कोई निदेश दिया गया है, जब तक ऐसा निदेश प्रवृत्त रहता है तब तक, विहित प्राधिकारी की लिखित में पूर्व अनुज्ञा के और जिन्हें वह प्राधिकारी अधिरोपित करना ठीक समझे ऐसी शर्तों के अनुसार ही पूर्वोक्त प्रयोजनों में से किसी के लिए किसी अन्य परिसर का उपयोग करेगा या उपयोग के लिए अनुज्ञात करेगा अन्यथा नहीं।
(3) कोई व्यक्ति जिसे उपधारा (1) के अधीन कोई निदेश दिया गया है और जो एतद्द्वारा व्यथित है, ऐसे निदेश की तारीख से तीस दिन के अन्दर केन्द्रीय सरकार को अपील कर सकता है; और इस मामले में केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा।]
(1. 1947 के अधिनियम सं० 38 की धारा 5 द्वारा (4) और उपधारा (5) अंतःस्थापित की गई और मूल उपधारा (4) को उपधारा (6) के रूप में पुनःसंख्यांकित किया गया।)
(2. 1947 के अधिनियम सं० 38 की धारा 6 द्वारा अंतःस्थापित।)
(3. 1947 के अधिनियम सं० 38 की धारा 7 द्वारा अंतःस्थापित।)
(1) जहां कोई विदेशी एक से अधिक विदेशों की विधि द्वारा राष्ट्रिक के रूप में मान्यता प्राप्त है या जहां किसी कारण से यह अनिश्चित है कि किसी विदेशी को किस देश की राष्ट्रिकता, यदि कोई है, दी जानी है तो उस विदेशी को उस देश का राष्ट्रिक माना जाएगा जिस देश के साथ वह विहित प्राधिकारी को तत्समय उसके हित में या सहानुभूति में अधिक निकटतम रूप से संबद्ध प्रतीत होता है और यदि उसकी राष्ट्रिकता अनिश्चित है तो उस देश का जिसके साथ वह सबसे बाद में ऐसे सम्बन्धित था:
परन्तु जहां विदेशी ने जन्म से राष्ट्रिकता अर्जित की है वहां उस दशा के सिवाय जहां केन्द्रीय सरकार या तो साधारणतः या किसी विशिष्ट मामले में ऐसा निदेश देती है यह समझा जाएगा कि उसने वह राष्ट्रिकता रखी है जब तक कि वह उक्त प्राधिकारी के समाधानपर्यन्त यह साबित नहीं कर देता है कि उसने तत्पश्चात् देशीयकरण से या अन्यथा कोई अन्य राष्ट्रिकता अर्जित कर ली है और अभी भी उस देश की जिसकी राष्ट्रिकता उसने इस प्रकार अर्जित की है सरकार द्वारा संरक्षण के हकदार के रूप में मान्यताप्राप्त है।
(2) राष्ट्रिकता के बारे में उपधारा (1) के अधीन किया गया विनिश्चय अन्तिम होगा और किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा:
परन्तु केन्द्रीय सरकार, या तो स्वप्रेरणा से या किसी संयुक्त विदेशी द्वारा आवेदन पर ऐसे विनिश्चय का पुनरीक्षण कर सकेगी।
यदि किसी मामले में, जो धारा 8 में नहीं आता है इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किसी आदेश या दिए गए किसी निदेश के संदर्भ में कोई प्रश्न उठता है, कि क्या कोई व्यक्ति विदेशी है या नहीं या किसी विशिष्ट वर्ग या प्रकार का विदेशी है या नहीं है तो यह साबित करने का भार कि ऐसा व्यक्ति, यथास्थिति, विदेशी नहीं है, या ऐसे विशिष्ट वर्ग या प्रकार का विदेशी नहीं है, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) (भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023) में किसी बात के होते हुए भी ऐसे व्यक्ति पर होगा।
विदेशियों विषयक विधि (संशोधन) अधिनियम, 1957 (1957 का 11) की धारा 7 द्वारा (19-1-1957 से) निरसित।
(1) इस अधिनियम के उपबन्धों द्वारा या उनके अधीन या उनके अनुसरण में कोई निदेश देने के लिए या किसी अन्य शक्ति का प्रयोग करने के लिए सशक्त प्राधिकारी इस अधिनियम में अभिव्यक्ततः उपबंधित किसी अन्य कार्रवाई के अतिरिक्त, ऐसी कार्रवाई कर सकता है या करा सकता है और इतना बल प्रयोग कर सकता है या करा सकता है जितना उसकी राय में, यथास्थिति, ऐसे निदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए उसके भंग के निवारण या परिशोधन के लिए या ऐसी शक्ति के प्रभावपूर्ण प्रयोग के लिए युक्तियुक्त रूप से आवश्यक है।
(2) कोई भी पुलिस अधिकारी ऐसी कार्रवाई कर सकता है और ऐसे बल का प्रयोग कर सकता है जो उसकी राय में, इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन या अनुसरण में किए गए निदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए ऐसे आदेश या निदेश के भंग के निवारण या परिशोधन के लिए युक्तियुक्त रूप से आवश्यक है।
(3) इस धारा द्वारा प्रदत्त शक्ति से, उसका प्रयोग करते हुए कार्य करने वाले व्यक्ति को, किसी भूमि या अन्य संपत्ति पर पहुंच का अधिकार प्रदत्त समझा जाएगा।
कोई प्राधिकारी जिसे इस अधिनियम या तद्धीन किए गए किसी आदेश द्वारा कोई निदेश, सम्मति या अनुज्ञा करने या देने या किसी अन्य कार्य को करने की शक्ति प्रदत्त है, जब तक कि इसके प्रतिकूल अभिव्यक्ततः उपबन्ध न किया जाए, सशर्त या अन्यथा अपने अधीनस्थ किसी प्राधिकारी को अपनी ओर से ऐसी शक्ति प्रयोग करने के लिए लिखित रूप से प्राधिकृत कर सकता है और तदुपरि उक्त अधीनस्थ प्राधिकारी, ऐसी शर्तों के अधीन जो प्राधिकरण में अन्तर्विष्ट हों, ऐसा प्राधिकारी समझा जाएगा जिसे इस अधिनियम के अधीन या द्वारा ऐसी शक्ति प्रदत्त है।
(1) कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के उपबन्धों या तद्धीन बनाए गए किसी आदेश या दिए गए किसी निदेश का उल्लंघन या दुष्प्रेरण की तैयारी करता है या दुष्प्रेरण करने का प्रयास करता है या उल्लंघन में कोई कार्य करता है या किसी ऐसे आदेश के अनुसरण में दिए गए किसी निदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है तो यह समझा जाएगा कि उसने इस अधिनियम के उपबन्धों का उल्लंघन किया है।
(2) कोई व्यक्ति जो यह जानते हुए या यह विश्वास करने का युक्तियुक्त कारण होते हुए कि किसी अन्य व्यक्ति ने इस अधिनियम या तद्धीन किए गए किसी आदेश या दिए गए किसी निदेश के उपबन्धों का उल्लंघन किया है, उस अन्य व्यक्ति की इस आशय से सहायता करता है कि तद्द्वारा उक्त उल्लंघन के लिए उसकी गिरफ्तारी, विचारण या दण्ड में रुकावट, प्रतिबाधा या अन्यथा हस्तक्षेप होगा तो यह समझा जाएगा कि उसने ऐसे उल्लंघन को दुष्प्रेरित किया है।
(3) यथास्थिति, किसी ऐसे जलयान के मास्टर या वायुयान के चालक के बारे में जिसके माध्यम से कोई विदेशी धारा 3 के अधीन किए गए किसी आदेश या उक्त धारा के अनुसरण में दिए गए किसी निदेश के उल्लंघन में 1[भारत] में प्रवेश या भारत से प्रस्थान करता है, जब तक वह यह साबित नहीं कर दे कि उसने उक्त उल्लंघन का निवारण करने के लिए सभी सम्यक् तत्परता बरती थी, यह समझा जाएगा कि उसने इस अधिनियम का उल्लंघन किया है। (1. 1947 के अधिनियम सं० 38 की धारा 2 द्वारा "ब्रिटिश भारत" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
जो कोई-
(क) भारत के किसी क्षेत्र में, उस अवधि से, जिसके लिए उसे वीजा जारी किया गया था, अधिक अवधि तक रहता है;
(ख) भारत में या उसके किसी भाग में उसके प्रवेश तथा ठहरने के लिए उसे जारी किए गए विधिमान्य वीजा की शर्तों के अतिक्रमण में कोई कार्य करता है;
(ग) इस अधिनियम के ऐसे उपबंधों या उसके अधीन किए गए किसी आदेश या इस अधिनियम या ऐसे आदेश के अनुसरण में किए गए किसी निदेश का उल्लंघन करता है, जिसके लिए इस अधिनियम के अधीन किसी विनिर्दिष्ट दंड का उपबंध नहीं किया गया है,
तो वह कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा और यदि उसने धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (च) के अनुसरण में बंधपत्र दिया है तो उसका बंधपत्र समपहृत कर लिया जाएगा और तद्द्वारा आबद्ध कोई व्यक्ति उसके लिए शास्ति का संदाय करेगा या दोषसिद्ध करने वाले न्यायालय के समाधानपर्यन्त हेतुक दर्शित करेगा कि उसके द्वारा ऐसी शास्ति का संदाय क्यों न किया जाए। (1. 2004 के अधिनियम सं० 16 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित।)
इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "वीजा" पद का वही अर्थ होगा जो उसका पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 (1920 का 34) के अधीन बनाए गए पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) नियम, 1950 में है।
जो कोई-
(क) भारत के किसी ऐसे क्षेत्र में, जो इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी आदेश या उसके अनुसरण में दिए गए किसी निदेश के अधीन उसके प्रवेश के लिए निर्बन्धित है, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस प्रयोजन के लिए राजपत्र में अधिसूचित प्राधिकारी की अनुज्ञा प्राप्त किए बिना प्रवेश करता है या ऐसे अनुज्ञापत्र में उसके ठहरने के लिए विनिर्दिष्ट अवधि से परे ऐसे क्षेत्र में रहता है; या
(ख) भारत के किसी क्षेत्र में, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किए गए किसी आदेश या उसके अनुसरण में दिए गए किसी निदेश के अधीन, यथास्थिति, ऐसे प्रवेश या ऐसे ठहरने के लिए अपेक्षित विधिमान्य दस्तावेजों के बिना प्रवेश करता है या ठहरता है,
तो वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु आठ वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने का भी, जो दस हजार रुपए से कम नहीं होगा, किन्तु पचास हजार रुपए तक का हो सकेगा, दायी होगा और यदि ऐसे व्यक्ति ने धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (च) के अनुसरण में बंधपत्र दिया है तो उसका बंधपत्र समपहृत कर लिया जाएगा और तद्द्वारा आबद्ध कोई व्यक्ति उसके लिए शास्ति का संदाय करेगा या दोषसिद्ध करने वाले न्यायालय के समाधानपर्यन्त हेतुक दर्शित करेगा कि उसके द्वारा ऐसी शास्ति का संदाय क्यों न किया जाए।
जो कोई जानते हुए भी भारत में प्रवेश करने के लिए कूटरचित पासपोर्ट का उपयोग करता है या तत्समय प्रवृत्त विधि के प्राधिकार कि बिना वहां रहता है, तो वह कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु आठ वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने का भी, जो दस हजार रुपए से कम का नहीं होगा, किन्तु पचास हजार रुपए तक का हो सकेगा, दायी होगा।
जो कोई धारा 14 या धारा 14क या धारा 14ख के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का दुष्प्रेरण करता है यदि दुष्प्रेरित कार्य, दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया जाता है तो वह उस दण्ड से दण्डित किया जाएगा जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है।
स्पष्टीकरण-
इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(i) कोई कार्य या अपराध दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया तब कहा जाता है जब वह उस उकसाहट के परिणामस्वरूप या उस षड्यंत्र के अनुसरण में या उस सहायता से किया जाता है, जिससे अपराध गठित होता है;
(ii) "दुष्प्रेरण" पद का वही अर्थ होगा, जो उसका भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 107 भारतीय न्याय संहिता की धारा 45 में है।]
कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात के बारे में जो इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिए आशयित हो, किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी।
इस अधिनियम के उपबन्ध, विदेशियों का रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1939 (1939 का 16), भारतीय पासपोर्ट अधिनियम, 1920 (1920 का 34) और तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति के उपबन्धों के अतिरिक्त होंगे न कि उनके अल्पीकरण में।
निरसन और संशोधन अधिनियम, 1950 (1950 का 35) की धारा 2 तथा अनुसूची 1 द्वारा निरसित।