
(उत्तर प्रदेश विधान सभा ने दिनांक 15 दिसम्बर, 1970 ई० तथा उत्तर प्रदेश विधान परिषद् ने दिनांक 24 दिसम्बर, 1970 ई0 की बैठक में स्वीकृत किया ।
"भारत का संविधान" के अनुच्छेद 201 के अन्तर्गत राष्ट्रपति ने दिनांक 13 जनवरी, 1971 ई० को स्वीकृति प्रदान की और उत्तर प्रदेशीय सरकारी असाधारण गजट में दिनांक 18 जनवरी, 1971 ई0 को प्रकाशित हुआ।]
सार्वजनिक व्यवस्था बनाये रखने के उद्देश्य से गुंडों पर नियंत्रण करने और उनको दबाने के निमित्त विशेष व्यवस्था करने के लिये | (1. उद्देश्यों और कारणों के विवरण के लिये दिनांक 15 मई, 1970 का सरकारी असाधारण गजट देखिये।)
भारतीय गणराज्य के इक्कीसवें वर्ष में निम्नलिखित अधिनियम बनाया जाता है-
(1) यह अधिनियम उत्तर प्रदेश गुण्डा नियंत्रण अधिनियम, 1970 कहलायेगा ।
(2) इसका प्रसार सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में होगा ।
जब तक कि प्रसंग द्वारा अन्यथ अपेक्षित न हो, इस अधिनियम में-
(क) "जिला मजिस्ट्रेट" के अन्तर्गत राज्य सरकार द्वारा तदर्थ अधिकृत कोई अपर जिला मजिस्ट्रेट भी है;
2(ख) "गुण्डा" का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है;
(1) जो स्वयं या किसी गिरोह के सदस्य या सरगना के रूप में अभ्यासतः भारतीय दण्ड संहिता की धारा 153 या धारा 153-ख 294 या उक्त संहिता के अध्याय 15, अध्याय 16, अध्याय 17 या अध्याय 22 के अधीन (भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 192 या धारा 197, 296 या उक्त संहिता के अध्याय 16, अध्याय 5 (81 से 87 धाराओं के सिवाय), अध्याय 6, अध्याय 17 या अध्याय 19 के अधीन) दण्डनीय कोई अपराध करता है, या करने का प्रयास करता है, या करने के लिए दुष्प्रेरित करता हैः या
(2) जो स्त्री तथा लड़की अनैतिक व्यापार दमन अधिनियम, 1956 के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया हो; या
(3) जो संयुक्त प्रान्त आबकारी अधिनियम, 1910 या सार्वजनिक द्यूत अधिनियम, 1867 या आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 25, धारा 27 या धारा 29 के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के लिए कम से कम तीन बार सिद्धदोष ठहराया गया होः या
(4) जिसकी सामान्य ख्याति दुःसाहसिक और जनसमुदाय के लिए खतरनाक व्यक्ति है: या
(5) जो अभ्यासतः स्त्रियों या लड़कियों के प्रति अशिष्ट उक्ति कहता रहा हो या उनसे छेड़खानी करता रहा होः या
(6) जो दलाल (टाउट) है: (2. उ०प्र० अधिनियम संख्या 1 वर्ष 1985 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित।)
"दलाल" का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो-
(क) किसी व्यक्ति को अपने लिये या किसी अन्य व्यक्ति के लिये किसी प्रकार का परितोषण किसी लोक सेवक या सरकार या संसद या राज्य विधान मण्डल के सदस्य को भ्रष्ट या अवैध साधनों द्वारा केन्द्रीय या राज्य सरकार, संसद या राज्य विधान मण्डल, किसी स्थानीय प्राधिकारी, निगम, सरकारी कम्पनी या लोक सेवक से कुछ करने या कुछ करने से प्रविरत रहने या किसी व्यक्ति के प्रति अनुग्रह करने को उत्पेरित करने के लिए किसी व्यक्ति का उपकार या अपकार करने का प्रयत्न करने को उत्प्रेरित करने के लिए प्रतिग्रहीत करता है या अभिप्राप्त करता है या प्रतिग्रहीत करने को सहमत होता है या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करता है: या
(ख) विधि व्यवसाय में हितबद्ध किसी विधि व्यवसायी द्वारा प्रस्तावित किसी पारिश्रमिक के प्रतिफल स्वरूप उस व्यवसाय में किसी विधि व्यवसायी का नियोजन प्राप्त करता है या उसको प्राप्त करने के लिए किसी विधि व्यवसायी से या विधि व्यवसाय हितबद्ध किसी व्यक्ति से, उनमें से किसी के द्वारा प्रस्तावित किसी पारिश्रमिक के प्रतिफल स्वरूप प्रस्ताव करता है: या
(ग) खण्ड (क) या (ख) में उल्लेखित प्रयोजनों के लिए सिविल दाण्डिक या राजस्व न्यायालयों के अहातों में राजस्व या अन्य कार्यालयों, आवासिक कालोनी या निवास स्थानों या उपर्युक्त स्थानों या रेल या बस स्टेशनों, उतरने के स्थानों ठहरने के स्थानों या अन्य लोक समागम स्थलों के आस-पास आता-जाता है; या
(7) गृह अपग्राही है।
स्पष्टीकरण –
"गृह अपग्राही" का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो किसी भवन का, जिसके अन्तर्गत भवन से सम्बद्ध भूमि, बाग, गैराज या बाह्यगृह भी है, अप्राधिकृत कब्जा लेता है या लेने का प्रयत्न करता है या उसके लेने में सहायता देता है या उसके लिए दुष्प्रेरित करता है या भवन में विधिपूर्वक प्रवेश करने के उपरान्त उस पर अविधिपूर्वक कब्जा बनाये रखता है।}1 (1. उ०प्र० अधिनियम संख्या 1 वर्ष 1985 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित।)
(1) यदि जिला मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत हो कि-
(क) कोई व्यक्ति गुण्डा है; और
(ख) (1) जिले या उसके किसी भाग में उसकी गतिविधियां या कार्य व्यक्तियों की जान या सम्पत्तियों के लिये संत्रास, संकट या अपहानि करते है या करने के लिये आयोजित है; या
(2) ऐसा विश्वास करने का युक्तियुक्त कारण है कि वह जिले या उसके किसी भाग में, धारा 2 के खण्ड (ख) के उपखण्ड (1) से (3) तक में निर्दिष्ट किसी अपराध को करने में या किसी ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण में लगा है या लगने वाला है; और}2 (2. उपर्युक्त की धारा 3 (क) द्वारा प्रतिस्थापित।)
(ग) साक्षीगण अपनी जान या सम्पत्ति के क्षेत्र में अपनी आशंका के कारण उसके विरूद्ध साक्ष्य देने को तैयार नही है;
तो मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को लिखित नोटिस द्वारा खण्ड (क), (ख) और (ग) के संबंध में उसके संबंध में उसके विरूद्ध सारवान आरोपों की सामान्य प्रकृति की सूचना देगा और उसको उनके विरूद्ध स्पष्टीकरण देने का समुचित अवसर देगा।
(2) उस व्यक्ति को, जिसके विरूद्ध इस धारा के अधीन आदेश देने का प्रस्ताव हो, अपने पसंद के वकील से परामर्श करने और उसके द्वारा प्रतिरक्षित किये जाने का अधिकार होगा तथा, जब तक जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अभिलिखित किये जाने वाले कारणों से उनकी राय में उनकी तदर्थ प्रार्थना परेशान या विलम्ब करने के प्रयोजन से न की गई हो, उसे, यदि वह ऐसा चाहे स्वयं परीक्षित होने का और ऐसे अन्य किन्हीं साक्षियों को भी जिन्हें वह अपने स्पष्टीकरण के समर्थन में पेश करना चाहें, परीक्षित करने का समुचित अवसर दिया जायेगा ।
(3) तदुपरान्त जिला मजिस्ट्रेट अपना यह समाधान करने पर कि उपधारा (1) के खण्ड (क), (ख) और (ग) में उल्लिखित शर्तें विद्यमान है, लिखित आदेश द्वारा -
(क) उसे यह निदेश दे सकता है कि वह ऐसे मार्ग से यदि कोई हो, और ऐसे समय के भीतर जैसा आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, अपनी स्थानीय अधिकार्यता की सीमा के भीतर के क्षेत्र से या ऐसे क्षेत्र और ऐसे किसी जिले या जिलों या उनके किसी भाग से, जो उसे आसन्न हो स्वयं बाहर चला जाए और उक्त क्षेत्र और ऐसे आसन्न जिला या जिलों या उसके या उनके किसी भाग में, यथास्थिति जहां से उसे स्वंय बाहर जाने का निदेश दिया गया था, तब तक प्रवेश न करे जब तक कि छः माह से अनधिक ऐसी अवधि, जो उक्त आदेश में निर्दिष्ट की जाए, समाप्त न हो जाए;}1 (1. उ०प्र० अधिनियम संख्या 1 वर्ष 1985 की धारा 3 (ख) द्वारा प्रतिस्थापित।)
(ख) (1) ऐसे व्यक्ति से, ऐसी रीति से, ऐसे समय पर और ऐसे प्राधिकारी या व्यक्ति को, जैसा आदेश में निर्दिष्ट किया जाय, अपनी गतिविधि की सूचना देने या स्वयं उपस्थित होने अथवा दोनों कार्यों की तब तक अपेक्षा कर सकता है:
(2) उसके द्वारा किसी ऐसी वस्तु को, जैसा आदेश में निर्दिष्ट किया जाय, कब्जे में रखने या उसको प्रयोग करने से तब तक के लिये प्रतिसिद्ध या निर्बन्धित करने का;
(3) उसके द्वारा अन्यथा ऐसी रीति से, जैसा आदेश में निर्दिष्ट किया जाय, आचरण करने का तब तक के लिये आदेश कर सकता है-
जब तक कि छः माह से अनधिक ऐसी अवधि, जो आदेश में निर्दिष्ट की जाये, समाप्त न हो जाये।
जिला मजिस्ट्रेट आदेश द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके संबंध में धारा 3 की उपधारा (3) के खण्ड (क) के अधीन आदेश दिया गया हो, अस्थायी अवधि के लिये उस क्षेत्र में, जहां उसे हटाने का निदेश दिया गया था, ऐसी शर्तों पर, जिन्हें जिला मजिस्ट्रेट निर्दिष्ट करें, प्रवेश करने या वापस आने की अनुज्ञा दे सकता है और किसी भी समय भी ऐसी किसी अनुज्ञा का निरसन कर सकता है।
जिला मजिस्ट्रेट सम्बद्ध व्यक्ति को तदर्थ अभ्यावेदन करने का अवसर, जब तक कि ऐसे कारणों से जो अभिलिखित किये जायेगें, उनका यह समाधान न हो जाय कि ऐसा करना व्यवहारिक होगा, देने के पश्चात् धारा 3 के अधीन दिये गये आदेश में निर्दिष्ट अवधि को, सामान्य जनता के हित में समय-समय पर बढ़ा सकता है, किन्तु इस प्रकार बढ़ायी गयी अवधि किसी भी दशा में कुल मिलाकर दो वर्ष से अधिक न होगी।
(1) धारा 3, 4, 5 के अधीन दिये गये किसी आदेश से क्षुब्ध कोई व्यक्ति ऐसे आदेश के दिनांक से पन्द्रह दिन के भीतर आयुक्त के पास अपील कर सकता है।
(2) अपीलार्थी या उसके वकील को किसी ऐसे अभिलेख का, जो धारा 3 के अधीन हुई जांच, यदि कोई हुई हो, उसे प्रकट न किया गया हो, निरीक्षण करने या उसके संबंध में सूचना देने का अधिकार न होगा।
(3) आयुक्त आदेश की, परिष्कार सहित अथवा रहित, पुष्टि कर सकता है या उसे रद्द कर सकता है, और अपील का निस्तारण होने तक आदेश के प्रवर्तन को, ऐसी शर्तों पर, यदि कोई हो, जिन्हें वह उचित समझे, स्थगित कर सकता है।
(1) जिला मजिस्ट्रेट या आयुक्त-
(क) किसी ऐसे व्यक्ति, जिसके विरूद्ध धारा 3 के अधीन आदेश देने का प्रस्ताव हो, या आदेश दिया गया हो, किन्तु ऐसे आदेश का प्रवर्तन धारा 6 के अधीन स्थगित कर दिया गया हो, की उपस्थित सुनिश्चित करने; या
(ख) धारा 3, धारा 4, धारा 5 या धारा 6 के अधीन किसी व्यक्ति के संबंध में दिये गये आदेश में निर्दिष्ट किये निदेश, अपेक्षा, प्रतिषेध, निर्बधन या शर्त का यथोचित अनुपालन सुनिश्चित करने, या
के प्रयोजनार्थ किसी ऐसे व्यक्ति से, प्रतिभुओं सहित या रहित, बंधपत्र निष्पादित करने की अपेक्षा कर सकता है, और {दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973(भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023)}1 के उपबंध ऐसे बंधपत्र के संबंध में आवश्यक परिवर्तनों के साथ उसी प्रकार लागू होगें, जिस प्रकार वह उक्त संहिता के अधीन निष्पादित या निष्पादित किये जाने के लिये अपेक्षित बंधपत्र के संबंध में लागू होते है। (1. उ०प्र० अधिनियम संख्या 1 वर्ष 1985 की धारा 4 (क) द्वारा प्रतिस्थापित।)
(2) विशेषतः और उपरोक्त उपबंधो की व्यापक्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना-
(क) जिला मजिस्ट्रेट धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन किसी व्यक्ति को नोटिस जारी करते समय उसको गिरफ्तारी के लिये वारंट, जिसमें उक्त दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की {धारा 71}2(भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की {धारा 73) के अनुसार पृष्ठांकित निदेश दिया गया हो, जारी कर सकता है और दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की {धारायें 70 से 85 और 87 से 89 तक}2 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की {धारायें 72 से 85, 87, 88, और 90 से 92 तक} के उपबंध जहां तक हो सके, ऐसे वारंट के संबंध में उसी प्रकार लागू होगें मानो जिला मजिस्ट्रेट न्यायालय हो; (2. उपर्युक्त की धारा 4 (ख) (एक) द्वारा प्रतिस्थापित।)
(ख) यदि कोई व्यक्ति जिससे किसी निदेश, अपेक्षा, प्रतिषेध, निर्बधन या शर्त के अनुपालन के लिये बंधपत्र निष्पादित करने की अपेक्षा की गयी हो, ऐसा करने में चूक करता है, तो उसे उस कालावधि के लिये जिसके लिए उक्त निदेश, अपेक्षा, प्रतिषेध, निर्वधन या शर्त की प्रवृत्ति हो या उस कालावधि के भीतर जब तक कि वह, प्रतिभुओं सहित या रहित, यथास्थिति आदेश के अनुसार बंधपत्र निष्पादित नहीं करता, कारागार को सुपुर्द किया जायेगा अथवा यदि वह पहले से ही कारागार में है तो, वह कारागार में निरूद्ध रखा जायेगा व उक्त दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की {धारायें 119 से 121 तक, 123 और 124} (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की {धारायें 138 से 140 तक, 142 और 143} के उपबंध आवश्यक परिवर्तनों के साथ उस पर लागू होगें मानो जिला मजिस्ट्रेट या आयुक्त न्यायालय हो। (3. उपर्युक्त की धारा 4 (ख) (दो) द्वारा प्रतिस्थापित।)
(ग) उक्त दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की {धारायें 445 से 447 तक}3 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की {धारायें 490 से 493 तक}इस धारा के अधीन निष्पादित सभी बंधपत्रों के संबंध में आवश्यक परिवर्तनों के साथ उस पर लागू होगें मानो जिला मजिस्ट्रेट या आयुक्त न्यायालय हो। (4 उपर्युक्त की धारा (ख) (तीन) द्वारा प्रतिस्थापित।)
जिला मजिस्ट्रेट या आयुक्त, किसी समय अपना यह समाधान करने के प्रयोजनार्थ कि धारा 3 या धारा के अधीन आदेश दिये जाने के लिये आवश्यक शर्तें विद्यमान है या नहीं, किसी ऐसे साक्ष्य पर विचार कर सकता है, जिससे वह प्रमाणक मूल्य का समझे, तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023) के उपबंध लागू नहीं होगें ।
जिला मजिस्ट्रेट या आयुक्त किसी समय धारा 3 के अधीन दिये गये आदेश का, चाहे उस आदेश की धारा 6 के अधीन पर पुष्टि की गयी हो या नहीं, निरसन कर सकता है।
जो व्यक्ति धारा 3, 4, 5 या 6 के अधीन दिये आदेशों का उल्लंघन करें, वह कठिन कारावांस से, जो तीन वर्ष तक का हो सकता है, परन्तु यह छः माह से कम नहीं होगा, दण्डित होगा और जुर्माने का भी भागी होगा।
(1) धारा 3, धारा 4, धारा 5 या धारा 6 के अधीन किसी व्यक्ति के विरूद्ध आदेश दिये जाने के पश्चात् ऐसा व्यक्ति-
(क) आदेश द्वारा दिये गये निदेश के अनुसार जिले या उसके भाग में अपने का हटाने में चूक करता है, या
(ख) उक्त आदेश के प्रवर्तन की अवधि में उस क्षेत्र में, जहां से उसे हटने का आदेश दिया गया था, पुनः प्रवेश करता है:
तो जिला मजिस्ट्रेट उसे गिरफ्तार करा सकता है और पुलिस की अभिरक्षा में उक्त आदेश में, निर्दिष्ट क्षेत्र के बाहर किसी ऐसे स्थान के लिये जैसा वह निदेश दे हटवा सकता है।
(2) कोई पुलिस अधिकारी किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके प्रति उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई कार्य या चूक करने के लिये युक्तियुक्त संदेह हो, बिना वारंट गिरफ्तार कर सकता है और इस प्रकार गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को तुरन्त निकटतम मजिस्ट्रेट के पास अग्रसारित करेगा जो उसे जिला मजिस्ट्रेट के पास अग्रसारित करायेगा, जो तदुपरान्त उस व्यक्ति को उक्त आदेश में निर्दिष्ट क्षेत्र के बाहर ऐसे स्थान के लिये, जैसा वह निदेश दें, पुलिस अभिरक्षा में हटवा सकता है।
(3) इस धारा के उपबंध धारा 10 के उपबंधों के अतिरिक्त हैं और उनके प्रभाव को कम नहीं करते।
कोई मजिस्ट्रेट धारा 10 के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का, सिवाय -
(क) ऐसे तथ्यों की जिनमें ऐसा अपराध गठित होता हो, किसी पुलिस आफिसर की गयी लिखित रिपोर्ट पर या
(ख) पुलिस अफसर से मिन्न किसी व्यक्ति से प्राप्त इत्तिला पर या अपने इस ज्ञान या संदेह पर कि ऐसा अपराध किया गया है;
संज्ञान नहीं करेगा।
इस अधिनियम द्वारा उसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति का प्रयोग करके दिये गये किसी आदेश पर किसी न्यायालय में कोई आपत्ति नहीं की जायेगी।
(1) किसी व्यक्ति के विरूद्ध किसी ऐसे कार्य के लिये जो इस अधिनियम या तदधीन दिये गये किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावना से किया गया हो, या किये जाने के लिये अभिप्रेत हो, कोई वाद, अभियोग या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं की जा सकेगी।
(2) राज्य सरकार के विरूद्ध किसी ऐसी बात से, जो इस अधिनियम या तद्धीन दिये गये किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावना से की गयी हो या किये जाने के लिये अभिप्रेत हो, हुई या संभावित क्षति के लिये कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं की जा सकेगी।
(1) राज्य सरकार, गजट में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिये नियम बना सकती है।
(2) इस अधिनियम के अधीन बनाये गये सभी नियम, बनाये जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, राज्य विधान मंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब उसका सत्र हो रहा हो, उसके एक सत्र या एकाधिक अनुक्रमिक सत्रों में से कम से कम चौदह दिन की अवधि पर्यन्त रखे जायेगें, और जब तक कि कोई बाद का दिनांक निर्धारित न किया जाये, गजट में प्रकाशित होने के दिनांक से, ऐसे परिष्कारों या अभिशून्यनों के अधीन रहते हुये, प्रभावी होगें, जो विधान मंडल के दोनों सदन उक्त अवधि में करने के लिये सहमत हों, किन्तु इस प्रकार का कोई परिष्कार या अभिशून्यन {सम्बद्ध नियमों के} उनके अधीन पहले की गयी किसी बात की वैधता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न डालेगा।
उत्तर प्रदेश गुण्डा नियंत्रण अध्यादेश, 1970 एतद्द्वारा निरस्त किया जाता है।