
उ० प्र० अधिनियम संख्या 17, 1961
उ० प्र० अधिनियम संख्या 23, 1961
उ० प्र० अधिनियम संख्या 24, 1979
उ० प्र० अधिनियम संख्या 14, 2002
उ० प्र० अधिनियम संख्या 20, 2020
द्वारा संशोधित
[उत्तर प्रदेशीय विधान सभा ने दिनांक 8 सितम्बर, 1955 ई० तथा उत्तर प्रदेश विधान परिषद् में दिनांक 21 सितम्बर, 1955 ई० की बैठक में स्वीकृत किया।
भारत संविधान के अनुच्छेद 201 के अन्तर्गत राष्ट्रपति ने दिनांक 30 दिसम्बर, 1956 ई० को स्वीकृति प्रदान की तथा उत्तर प्रदेशीय सरकारी असाधारण गजट में दिनांक 6 जनवरी, 1956 ई० को प्रकाशित हुआ।]
उत्तर प्रदेश में गाय तथा गाय के वंश के वध के प्रतिषेध (prohibit) तथा निवारण (prevent) करने का
अधिनियम
यह आवश्यक है कि उत्तर प्रदेश में गाय तथा गाय के वंश के वध के प्रतिषेध (prohibit) तथा निवारण (prevent) किया जाय;
अतएव भारतीय गणतन्त्र के छठें वर्ष में निम्नलिखित अधिनियम बनाया जाता है:
(1) यह अधिनियम उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 कहलाएगा।
(2) इसका प्रसार समस्त उत्तर प्रदेश में होगा।
(3) यह तुरन्त प्रचलित होगा।
विषय या प्रसंग में कोई बात प्रतिकूल न होने पर इस अधिनियम में:
2[(क) "गोमांस का तात्पर्य गाय के मांस से है किन्तु इसके अन्तर्गत ऐसा मांस नहीं है जो सीलबन्द डिब्बों में हो और उसी स्थिति में उत्तर प्रदेश में आयात किया गया हो;
(ख) "गाय" के अन्तर्गत बछिया अथवा बछड़ा (heifer or calf) है।
2[(ग) "गोशाला" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश गोशाला अधिनियम, 1964 के अधीन रजिस्ट्रीकृत गोशाला से है;
(गग) "संस्था" का तात्पर्य धारा 6 के अधीन स्थापित किसी संस्था से है
(2. उ० प्र० अधिनियम संख्या 14, 2002 की धारा 2 द्वारा प्रत्तिस्थापित। )
(घ) "वध" (slaughter) का तात्पर्य किसी भी रीति से मारण (killing) से है तथा इसके अन्तर्गत इस प्रकार से अंगहीन करना (maiming) तथा शारीरिक आघात पहुंचाना भी है जिससे सामान्य रूप में (in the ordinary course) मृत्यु हो जाय ;
(ङ) "राज्य सरकार" का तात्पर्य उत्तर प्रदेश की सरकार से है, तथा
(च) 1[***] (1. उ० प्र० अधिनियम संख्या 14, 2002 की धारा 2 द्वारा निकाला गया।)
तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या किसी प्रथा या रूढ़ि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति उत्तर प्रदेश में किसी स्थान पर किसी गाय, सांड़ या बैल का न तो वध करेगा और न वध करवायेगा, न तो उसे वध के लिए प्रस्तुत करेगा और न वध के लिए प्रस्तुत करवायेगा। (2. उ० प्र० अधिनियम संख्या 14, 2002 की धारा 3 द्वारा प्रतिस्थापित।)
3[4***] (3. 3. उ० प्र० अधिनियम संख्या 14, 2002 की धारा 4 द्वारा निकाला गया।)
यहां पर दिये गये अपवाद को छोड़कर तथा समय विशेष पर प्रचलित किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी व्यक्ति सिवाय ऐसे चिकित्सकीय प्रयोजनों के निमित्त जो नियत किये जाय किसी भी रूप में गोमांस अथवा तज्जन्य पदार्थ न बेचेगा, न परिवहन करेगा, न बेचने अथवा परिवहन के लिए प्रस्तुत करेगा और न बिकवायेगा अथवा परिवहन करवायेगा।
अपवाद-
वायुयान के अथवा रेलवे ट्रेन के वास्तविक यात्री द्वारा उपभोग के लिये कोई भी व्यक्ति गोमांस अथवा तजज्य पदार्थ बेच सकता है तथा भोजनार्थ प्रस्तुत कर सकता है, अथवा बिकवा और भोजनार्थ प्रस्तुत करवा सकता है।
(1) कोई व्यक्ति राज्य के भीतर किसी स्थान से राज्य के बाहर किसी स्थान को, सिवाय राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित आदेश से प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा जारी किये गये अनुज्ञा-पत्र के, और सिवाय ऐसी अनुज्ञा-पत्र के निबन्धन और शर्तों के अनुसार, किसी गाय, सांड़ या बैल का जिसका उत्तर प्रदेश में किसी स्थान पर वध किया जाना इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय है, न तो परिवहन करेगा, न परिवहन करने के लिये प्रस्तुत करेगा और न परिवहन करायेगा। (4. उ० प्र० अधिनियम संख्या 24. 1979 की धारा 2 द्वारा बचाया गया।)
(2) ऐसा अधिकारी प्रत्येक गाय, सांड या बैल के लिए 5[पांच सौ रुपये] से अनधिक ऐसा शुल्क जिसे नियत किया जाय, देने पर अनुज्ञा-पत्र जारी करेगा: (5. उ० प्र० अधिनियम संख्या 14, 2002 की धारा 5 द्वारा प्रतिस्थापित।)
प्रतिबन्ध यह है कि कोई शुल्क प्रभार्य नहीं होगा यदि गाय, सांड़ या बैल के परिवहन अनुज्ञा-पत्र में विनिर्दिष्ट छः मास से अनधिक अवधि के लिऐ हो।
(3) यदि अनुज्ञा-पत्र पर सीमित अवधि के लिए गाय, सांड़ या बैल का परिवहन करने वाला व्यक्ति अनुज्ञा-पत्र में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर ऐसी गाय, सांड या बैल को राज्य में वापस न लाये तो यह समझा जायगा कि उसने उपधारा (1) के उपबन्धों का उल्लंघन किया है।
(4) अनुज्ञा-पत्र का प्रारूप, उसके लिए आवेदन-पत्र का प्रारूप और ऐसे आवेदन-पत्र के निस्तारण की प्रक्रिया ऐसी होगी जैसी नियत की जाय।
(5) राज्य सरकार या उसके द्वारा इस निमित्त सामान्य या विशेष अधिसूचित आदेश से प्राधिकृत कोई अधिकारी, इस धारा के अधीन की गयी कार्यवाही की वैधता या औचित्य के सम्बन्ध में अपना समाधान करने के प्रयोजनार्थ, किसी समय, किसी मामले के अभिलेख को मंगा सकता है और उसका परीक्षण कर सकता है और ऐसा आदेश उस पर दे सकता है जैसा वह उचित समझे ॥
1[(6) जहां उक्त वाहन इस अधिनियम के अधीन सक्षम प्राधिकारी या प्राधिकृत प्रयोगशाला द्वारा गोमांस से सम्बन्धित होना पुष्टिकृत कर दिया गया हो, वहां तब तक चालक, आपरेटर तथा परिवहन से सम्बन्धित स्वामी को इस अधिनियम के अधीन अपराध से आरोपित किया जायेगा, जब तक कि यह सिद्ध नहीं हो जाता है कि परिवहन की साधन की समस्त सावधानियों के होते हुए और उसकी जानकारी के बिना अपराध में प्रयुक्त परिवहन के साधन का प्रयोग अपराध करने के निमित्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया गया है। (1. उ० प्र० अधिनियम संख्या 20, 2020 की धारा 2 द्वारा बढ़ाया गया।)
(7) इस अधिनियम और सुसंगत नियमावली के उपबंधों का उल्लंघन करके गोमांस या गाय और उसके वंशज का परिवहन करने वाला यान, विधि प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा अधिहृत एवं अभिगृहित किये जायेंगे। सम्बन्धित जिला मजिस्ट्रेट / आयुक्त यथास्थिति अधिहरण तथा निर्मुक्ति की समस्त कार्यवाहियां करेगा।
(8) अभिग्रहित यान द्वारा परिवहन किये गये गाय तथा गोवंश या गोमांस, विधि प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा अधिहृत एवं अभिगृहित किये जायेंगे। सम्बन्धित जिला मजिस्ट्रेट / आयुक्त यथास्थिति अधिहरण तथा निर्मुक्ति की समस्त कार्यवाहियां करेगा।
(9) अभिग्रहित गायों तथा उसके गोवंश के भरण-पोषण व्यय की वसूली अभियुक्त से एक वर्ष की अवधि तक अथवा गाय या गोवंश को निर्मुक्त किये जाने तक जो भी पहले हो, स्वामी के पक्ष में की जायेगी।
(10) जहां कोई व्यक्ति इस अधिनियम की धारा 3, 5 तथा 8 के अधीन कोई अपराध करने, उसका दुष्प्रेरण करने या प्रयास करने के लिये अभियोजित किया जाता है और अभियुक्त के पास गोमांश या गाय के होने की पुष्टि अभियोजन द्वारा कर दी गयी है और सक्षम प्राधिकारी या प्राधिकृत प्रयोगशाला द्वारा परिवहन की गयी चीजों का गोमांस होना पुष्टि कर दिया गया हो वहां न्यायालय की यह उपधारणा होगी कि ऐसे व्यक्ति ने यथास्थिति ऐसा अपराध किया है या ऐसा अपराध करने का प्रयास या दुष्प्रेरण किया है, जब तक अन्यथा सिद्ध न हो जाय।
(11) जहां तलाशी अधिग्रहण, व्ययन एवं जब्तीकरण के सम्बन्ध में इस अधिनियम अथवा सम्बन्धित नियमावली के उपबन्ध मौन हों वहां दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) के सुसंगत उपबन्ध प्रभावी होंगे।
2[5ख -
जो कोई किसी गाय या उसके गोवंश को ऐसे शारीरिक क्षति कारित करता है जो उसके जीवन को संकटापन्न करें यथा गोवंश का अंग भंग करना, उनके जीवन को संकटापन्न करने वाली किसी परिस्थिति में उनका परिवहन करना, उनके जीवन का संकटापन्न करने के आशय से भोजन पानी आदि का लोप करना, व ऐसी अवधि के कठोर कारावास जो अन्यून एक वर्ष होगी जो सात वर्ष तक हो सकती है, से और ऐसे जुर्माना, जो अन्यून एक लाख रुपये होगा और जो तीन लाख रुपये तक हो सकता है, दण्डित किया जायेगा। (2. उ० प्र० अधिनियम संख्या 20, 2020 की धारा 3 द्वारा बढ़ाया गया।)
राज्य सरकार द्वारा या राज्य सरकार द्वारा आदेश दिये जाने पर किसी भी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा या सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी सोसाइटी द्वारा राज्य सरकार की पूर्वानुमति से ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर जैसे विहित किये जायें, गायों, सांड़ों या बैलों की देखभाल के लिये आवश्यकतानुसार संस्थाएं स्थापित की जायेगी || (3. उ० प्र० अधिनियम संख्या 14, 2002 की धारा 6 द्वारा प्रतिस्थापित।)
(1) कोई व्यक्ति अपनी गाय, सांड़ या बैल को किसी गोशाला या संस्था को अभ्यर्पित कर सकता है जो स्थान की उपलब्धता के अनुसार ऐसी गाय, सांड़ या बैल को स्वीकार करेगा। इस प्रकार से अभ्यर्पित गाय, सांड या बैल उस व्यक्ति को वापस नहीं दिया जायेगा। (1. उ० प्र० अधिनियम संख्या 14. 2002 की धारा 7 द्वारा प्रतिस्थापित।)
(2) राज्य सरकार ऐसी गायों, सांड़ों या बैलों की देखभाल के लिए ऐसी अन्य वैकल्पिक और अतिरिक्त व्यवस्था कर सकती है जैसी वह आवश्यक समझे।
(3) कोई गोशाला या कोई संस्था किसी गाय, सांड़ या बैल को पुलिस या अन्य व्यक्ति से अभिरक्षा के लिए स्वीकार कर सकती है जो उसके स्वामी को ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर और ऐसी रीति से और ऐसे प्रभार का भुगतान करने पर, जैसा विहित किया जाय, निर्मुक्त किया जा सकता है।]
(1) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी. इस अधिनियम, या तद्दीन बनायी गयी नियमावली के अधीन किसी दण्डिक अपराध से आरोपित किसी व्यक्ति को, अभिरक्षा रहने के दौरान जमानत पर या उसके स्वयं के बन्धपत्र पर तब तक निर्मुक्त नहीं किया जायेगा जब तक कि -
(क) विशेष लोक अभियोजक को ऐसी निर्मुक्ति के आवेदन का विरोध करने का अवसर प्रदान नहीं कर दिया जाता है, और (2. उ० प्र० अधिनियम संख्या 20, 2020 की धारा 4 द्वारा बढ़ाया गया।)
(ख) जहां विशेष लोक अभियोजक, आवेदन का विरोध करता है. न्यायालय का यह विश्वास न हो जाय कि यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है कि वह ऐसे अपराध का दोषी नहीं है और यह कि जमानत के दौरान कोई अपराध करना असंभव है।
(2) उपधारा (1) के अधीन जमानत प्रदान किये जाने सम्बन्धी निर्बन्धन, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973(भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) के अधीन निर्बन्धनों के अतिरिक्त होंगे।
(3) इस अधिनियमों के उपबन्धों के अधीन राज्य अभियोजन सेवा का ऐसा प्रत्येक अभियोजक, जिसने सात वर्ष तक अभियोजन कार्य किया हो, चाहे वह जिस भी नाम से ज्ञात हो, विशेष लोक अभियोजक समझा जायेगा।
3[8. शास्ति -
(1) जो कोई धारा 3 धारा 5 या धारा 5-क के उपबन्धों का उल्लंघन करता है या उल्लंघन करने का प्रयास करता है या उल्लंघन करने के लिये दुष्प्ररित करता है, यह ऐसी अवधि के कठोर कारावास, जो अन्यून तीन वर्ष होगी और जो 10 वर्ष तक हो सकती है, से और ऐसे जुर्माना जो अन्यून तीन लाख रुपये होगा और जो पांच लाख रुपये तक हो सकता है, से दण्डनीय किसी अपराध का दोषी होगा। (3. उ० प्र० अधिनियम संख्या 20. 2020 की धारा 5 द्वारा प्रतिस्थापित।)
(2) जो कोई इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध की दोषसिद्धि के पश्चात इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का पुनः दोषी हो तो वह द्वितीय दोषसिद्धि हेतु उक्त अपराध के लिये उपबन्धित दोहरे दण्ड से दण्डित किया जायेगा।
(3) धारा 5-क के उपबन्ध के उल्लंघन के अभियुक्त व्यक्ति का नाम तथा फोटोग्राफ मुहल्ला में ऐसे किसी महत्त्वपूर्ण स्थान पर जहां अभियुक्त सामान्यतः निवास करता हो अथवा ऐसे किसी सार्वजनिक स्थल पर जहां वह विधि प्रवर्तन अधिकारियों से स्वयं को छिपाता हो, प्रकाशित किया जायेगा।
दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) से में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी धारा 5 (ख) एवं धारा 8 के उपधारा (1) के अधीन दण्डनीय अपराध संज्ञेय तथा अजमानतीय होंगे। (1. उ० प्र० अधिनियम संख्या 20, 2020 की धारा 6 द्वारा प्रतिस्थापित।)
(1) राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिये नियम बना सकती है।
(2) पूर्वोक्त अधिकार को व्याप्ति को न बाधित करते हुए, ऐसे नियम निम्नलिखित की व्यवस्था कर सकते हैं :-
2[(क) ***] (2. उ० प्र० अधिनियम संख्या 14, 2002 की धारा 9 (क) द्वारा निकाला गया।)
4[(कक) * * *]
4[(ख) * * *]
4[(ग)***
3[((घ) गायों, सांड़ों और बैलों का अभ्यर्पण, उनके स्वीकार करने, उनकी अभिरक्षा और उनको निर्मुक्त करने की प्रक्रिया;
(घघ) गायों, सांड़ों और बैलों को निर्मुक्त करने की निबन्धन और शर्तें।]
(ङ) धारा 6 में अभिदिष्ट संस्थाओं के अधिष्ठान, रख-रखाव, प्रबन्ध, पर्यवेक्षण तथा नियंत्रण से संबद्ध विषय :
(च) इस अधिनियम के अधीन अधिक्षेत्र रखने वाले किसी अधिकारी अथवा प्राधिकारी के कर्त्तव्य, ऐसे अधिकारी अथवा प्राधिकारी द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया ; और
(छ) वे विषय जो नियत किये जाने वाले है और नियत किये जायं
(3. उ० प्र० अधिनियम संख्या 14, 2002 की धारा 9 (ख) द्वारा प्रतिस्थापित।)