
[1 अप्रैल, 1955]
कतिपय वस्तुओं के उत्पादन, प्रदाय और वितरण तथा उनमें व्यापार और वाणिज्य के नियंत्रण के लिए जनसाधारण के हित में उपबन्ध करने के लिए अधिनियम
भारण गणराज्य के छठे वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-
(1) यह अधिनियम आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 कहा जा सकेगा।
(2) इसका विस्तार 2* * * सम्पूर्ण भारत पर है।
इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-
3[(iक) "कलक्टर" के अन्तर्गत अपर कलक्टर और ऐसा अन्य अधिकारी भी है, जो उपखंड अधिकारी की पंक्ति से नीचे का न हो और जो इस अधिनियम के अधीन कलक्टर के कृत्यों का पालन और उसकी शक्तियों का प्रयोग करने के लिए कलक्टर द्वारा प्राधिकृत किया जाए;]
4* * *
(ख) “खाद्य फसलों” के अंतर्गत गन्ने की फसलें भी हैं;
(ग) “अधिसूचित आदेश" से शासकीय राजपत्र में अधिसूचित आदेश अभिप्रेत है;
5[(गग) "आदेश" के अन्तर्गत तद्धीन जारी किया गया कोई निदेश भी है;]
6[(घ) “राज्य सरकार" से किसी संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में उसका प्रशासक अभिप्रेत है;]
5[(ङ) "चीनी" से अभिप्रेत है-
(i) किसी प्रकार की चीनी जिसमें नब्बे प्रतिशत से अधिक सुक्रोज अन्तर्विष्ट हो, और उसके अन्तर्गत मिश्री भी है;
(ii) खांडसारी चीनी या बूरा चीनी या पीसी हुई चीनी अथवा रवे या चूर्ण के रूप में कोई चीनी; अथवा
(iii) वैक्यूम पैन चीनी कारखाने में प्रक्रियाधीन चीनी या उससे उत्पादित कच्ची चीनी।]
(1) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए "आवश्यक वस्तु" से अनुसूची में विनिर्दिष्ट वस्तु अभिप्रेत है। (1. इस अधिनियम का विस्तार 1962 के विनियम सं० 12 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा गोवा, दमण और दीव पर तथा 1963 के विनियम सं० 6 की धारा 3 और अनुसूची 1 द्वारा दादरा और नागर हवेली पर और 1965 के विनियम सं० 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा लक्षद्वीप और अमीन दीवी द्वीप समूह पर और अधिसूचना सं०का०आ०28 (अ), तारीख 7-1-1976 द्वारा (7-1-1976 से) सिक्किम राज्य पर किया गया है।
इस अधिनियम का 1976 के महाराष्ट्र अधिनियम सं० 71 द्वारा महाराष्ट्र में, 1976 के उड़ीसा अधिनियम सं० 8 द्वारा उड़ीसा में, 1974 के उत्तर प्रदेश अधिनियम सं० 9, 1975 के उत्तर प्रदेश अधिनियम सं० 18, 1975 उत्तर प्रदेश अधिनियम सं० 39 और 1978 के उत्तर प्रदेश अधिनियम सं० 16 द्वारा उत्तर प्रदेश में, संशोधन किया गया।)
(2. 1968 के अधिनियम सं० 25 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15-8-1968 से) "जम्मू कश्मीर राज्य से सिवाय" शब्दों का लोप किया गया।)
(3. 1976 के अधिनियम सं० 92 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित।)
(4. 2006 के अधिनियम सं० 54 की धारा 2 द्वारा (... से) लोप किया गया।)
(5. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित।)
(6. विधि अनुकूलन (सं०3) आदेश, 1956 द्वारा पूर्ववर्ती खण्ड (घ) के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(7. 2006 के अधिनियम सं० 54 की धारा 3 द्वारा (से) अंतःस्थापित।)
(2) केन्द्रीय सरकार, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि लोकहित में और उन कारणों से जो राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ऐसा करना आवश्यक है, उपधारा (4) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अनुसूची का संशोधन कर सकेगी जिससे कि वह राज्य सरकारों के परामर्श से-
(क) उक्त अनुसूची में से किसी वस्तु को जोड़ सके;
(ख) उक्त अनुसूची में से किसी वस्तु को हटा सके।
(3) उपधारा (2) के अधीन जारी किसी अधिसूचना द्वारा यह भी निदेश दिया जा सकेगा कि उक्त अनुसूची में ऐसी वस्तु के सामने यह घोषणा करते हुए प्रविष्टि की जाएगी कि ऐसी वस्तु छह मास से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, आवश्यक वस्तु समझी जाएगी:
परन्तु केन्द्रीय सरकार, लोकहित में और उन कारणों से जो विनिर्दिष्ट किए जाएं, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसी अवधि को उक्त छह मास की अवधि से आगे बढ़ा सकेगी।
(4) केन्द्रीय सरकार, किसी ऐसी वस्तु के संबंध में, जिसके लिए संसद् को संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 3 की प्रविष्टि 33 के आधार पर विधि बनाने की शक्ति है, उपधारा (2) के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग कर सकेगी।
(5) उपधारा (2) के अधीन जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना, उसके जारी किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखी जाएगी।]
(1) यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय हो कि किसी आवश्यक वस्तु के प्रदाय को बनाए रखने या बढ़ाने के लिए या उसका साम्यिक वितरण और उचित कीमतों पर उसकी उपलभ्यता सुनिश्चित करने के लिए 1[अथवा भारत की रक्षा के लिए या सैनिक संक्रियाओं के दक्ष संचालन के लिए किसी आवश्यक वस्तु की प्राप्ति के लिए ऐसा करना] आवश्यक या समीचीन है तो वह आदेश द्वारा उसके उत्पादन, प्रदाय और वितरण तथा उसमें व्यापार और वाणिज्यिक के विनियमन या प्रतिषेध के लिए उपबंध कर सकेगी।
2[(1क) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, -
(क) ऐसे खाद्य पदार्थों की पूर्ति को, जिसके अंतर्गत अनाज, दाल, आलू, प्याज, खाद्य तेलहन और तेल भी हैं, जैसा केंद्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, केवल असाधारण परिस्थितियों जिसमें युद्ध, अकाल, असाधारण कीमत वृद्धि और गंभीर प्रकृति की प्राकृतिक आपदा भी सम्मिलित है, में ही विनियमित किया जा सकेगा;
(ख) स्टॉक सीमा अधिरोपित करने संबंधी कोई कार्रवाई, कीमत वृद्धि पर आधारित होगी और किसी कृषि उपज की स्टॉक सीमा को विनियमति करने वाला कोई आदेश इस अधिनियम के अधीन केवल तभी जारी किया जा सकेगा, यदि-
i) उद्यान उत्पाद के खुदरा मूल्य में शत प्रतिशत वृद्धि हो; या
ii)गैर-विनश्वर कृषि खाद्य पदार्थों के खुदरा कीमत में पचास प्रतशित वृद्धि हो,
बारह मास के ठीक पूर्ववर्ती विद्यमान कीमत पर या पिछले पांच वर्ष की औसत खुदरा कीमत पर, इनमें से जो भी कम हो, हैः
परंतु स्टॉक सीमा को विनियमित करने वाला ऐसा आदेश किसी कृषि उत्पाद के किसी प्रक्रमणक या मूल्य श्रृंखला सहभागी को लागू नहीं होगा, यदि ऐसे व्यक्ति की स्टॉक सीमा, प्रसंस्करण करने की अधिष्ठापित क्षमता की समग्र अधिकतम सीमा से अधिक या किसी निर्यातक की दशा में निर्यात की मांग से अधिक नहीं होती है:
परंतु यह और कि इस उपधारा में अंतर्विष्ट कोई बात, सरकार द्वारा इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली या लक्ष्यित सार्वजनिक वितरण प्रणाली से संबंधित, किए गए किसी आदेश को लागू नहीं होगी ।
(2) उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, तद्धीन किए गए आदेश द्वारा निम्नलिखित का उपबन्ध किया जा सकेगा-
(क) किसी आवश्यक वस्तु के उत्पादन या विनिर्माण का अनुज्ञप्तियों, अनुज्ञापत्रों द्वारा या अन्यथा विनियमन;
(ख) किसी बंजर या कृष्य भूमि को, चाहे वह किसी भवन से अनुलग्न हो या न हो उस पर सामान्यतः खाद्य फसलों या विनिर्दिष्ट खाद्य फसलों को उगाने के लिए खेती के अधीन लाना और सामान्यतः खाद्य फसलों या विनिर्दिष्ट खाद्य फसलों की खेती अन्यथा बनाए रखना या बढ़ाना;
(ग) ऐसी कीमत नियंत्रित करना जिस पर किसी आवश्यक वस्तु का क्रय या विक्रय किया जा सकेगा;
(घ) किसी आवश्यक वस्तु के भण्डारकरण, परिवहन, वितरण, व्ययन, अर्जन, प्रयोग या खपत का अनुज्ञप्तियों, अनुज्ञापत्रों द्वारा या अन्यथा विनियमन;
(ङ) सामान्यतः विक्रय के लिए रखी गई किसी आवश्यक वस्तु को विक्रय से रोक रखने का प्रतिषेध;
2[(च) किसी व्यक्ति से, जो किसी आवश्यक वस्तु को स्टाक में रखता है या उसके उत्पादन में या उसके क्रय या विक्रय के कारबार में लगा हुआ है, यह अपेक्षा करना कि वह -
(क) उस सम्पूर्ण मात्रा या उसके विनिर्दिष्ट भाग का जिसे वह स्टाक में रखता है या जिसका उसने उत्पादन किया है या जिसे उसने प्राप्त किया है, अथवा
(ख) किसी ऐसी वस्तु की दशा में, जिसका वह सम्भवतः उत्पादन करेगा या जिसे वह सम्भवतः प्राप्त करेगा, उसके द्वारा उत्पादन या प्राप्त करने पर उस सम्पूर्ण वस्तु या उसके विनिर्दिष्ट भाग का,
केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार को या ऐसी सरकार के किसी अधिकारी या अभिकर्ता को या ऐसी सरकार के स्वामित्वाधीन या उसके द्वारा नियंत्रित किसी निगम को या ऐसे अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग को और ऐसी परिस्थितियों में जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, विक्रय करे।
स्पष्टीकरण 1-
खाद्यान्नों, खाद्य तिलहनों या खाद्य तेलों के सम्बन्ध में इस खण्ड के अधीन किए गए किसी आदेश द्वारा, संबंधित क्षेत्र में ऐसे खाद्यान्नों, खाद्य तेलों के प्राक्कलित उत्पादन को ध्यान में रखते हुए, ऐसे क्षेत्र में उत्पादकों द्वारा विक्रय की जाने वाली मात्रा नियत की जा सकेगी और श्रेणी के आधार पर ऐसी मात्रा उत्पादकों द्वारा धृत या उनकी जोत के कुल क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए भी नियत की जा सकेगी या उसके नियतन के लिए उपबंध किया जा सकेगा।
स्पष्टीकरण 2-
इस खण्ड के प्रयोजन के लिए, "उत्पादन" के अन्तर्गत, उसके व्याकरणिक रूपभेदों और सजातीय पदों सहित, खाद्य तेलों और चीनी का विनिर्माण भी है;]
(1. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित।)
(2. 1976 के अधिनियम सं० 92 की धारा 3 द्वारा खण्ड (च) के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(छ) खाद्य पदार्थों 1*** से सम्बन्ध ऐसे वर्ग के किन्हीं वाणिज्यिक या वित्तीय संव्यवहारों का विनियमन या प्रतिषेध जो कि आदेश देने वाले प्राधिकारी की राय में लोकहित के लिए हानिकार है यदि अविनियमित रहे तो हानिकार हो सकते हैं;
(ज) पूर्वोक्त बातों में से किसी का विनियमन या प्रतिषेध करने की दृष्टि से किसी जानकारी या आंकड़ों का संग्रहण;
(झ) किसी आवश्क वस्तु के उत्पादन, प्रदाय या वितरण अथवा उसमें व्यापार और वाणिज्य में लगे व्यक्तियों से यह अपेक्षा करना कि वे अपने कारबार से सम्बद्ध ऐसी पुस्तकें, लेखे और अभिलेख रखें और निरीक्षण के लिए पेश करें तथा उसके संबंध में ऐसी जानकारी दें जैसा कि आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए;
2[(झझ) अनुज्ञप्तियों, अनुज्ञापत्रों या दस्तावेजों का दिया जाना या जारी किया जाना, उनके लिए फिसें लिया जाना, ऐसी किसी अनुज्ञप्ति, अनुज्ञापत्र या अन्य दस्तावे की शर्तों के सम्यक् पालन के लिए प्रतिभूति के रूप में ऐसी राशि का, यदि कोई है, जो आदेश में विनिर्दिष्ट हो, जमा किया जाना, ऐसी जमा की गई राशि या उसके किसी भाग का किन्हीं ऐसी शर्तों के उल्लंघन पर समपहरण तथा ऐसे समपहरण का ऐसे प्राधिकारी द्वारा जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए न्यायनिर्णयन;]
3[(ञ) कोई आनुषंगिक और अनुपूरक विषय, जिनके अन्तर्गत विशिष्टतया परिसरों, विमानों, गाड़ियों अथवा अन्य प्रवहणों में प्रवेश तथा उनकी एवं पशुओं की तलाशी और परीक्षा एवं ऐसा प्रवेश, तलाशी या परीक्षा करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा निम्नलिखित कार्य भी हैं:-
(i) किन्हीं ऐसी चीजों का, जिनकी बाबत ऐसे व्यक्ति के पास यह विश्वास करने का कारण है कि आदेश का उल्लंघन किया गया है, किया जा रहा है या किया ही जाने वाला है, और किन्हीं ऐसे पैकेजों, आवेष्टकों या पात्रों का, जिनमें ऐसी चीजें पाई जाएं, अभिग्रहण;
(ii) ऐसी चीजों को ले जाने में प्रयुक्त विमानों, जलयानों, गाड़ियों अथवा अन्य प्रवहणों या पशुओं का उस दशा में अभिग्रहण, जब ऐसे व्यक्ति के पास यह विश्वास करने का कारण हो कि ऐसा विमान, जलयान, गाड़ी या अन्य प्रवहण या पशु इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन समपहरणीय है;
4[(iii) किन्हीं ऐसी लेखा-पुस्तकों और दस्तावेजों का अभिग्रहण, जो ऐसे व्यक्ति की राय में इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के लिए उपयोगी या सुसंगत हों तथा वह व्यक्ति, जिसकी अभिरक्षा में ऐसी लेखा-पुस्तकों या दस्तावेजों का अभिग्रहण किया गया है, उस अधिकारी की उपस्थिति में, जिसकी अभिरक्षा में ऐसी लेखा-पुस्तकें या दस्तावेजें हैं, उनकी प्रतियां बनाने या उनसे उद्धरण लेने का हकदार होगा।]
(3) जहां कोई व्यक्ति किसी आवश्यक वस्तु का विक्रय उपधारा (2) के खण्ड (च) के प्रति निर्देश से किए गए किसी आदेश के अनुपालन में करता है वहां उसके लिए उसे ऐसी कीमत दी जाएगी जो इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित है: -
(क) जहां कीमत, इस धारा के अधीन नियत नियंत्रित कीमत से, यदि कोई हो, संगत रह कर करार पाई जा सकती है वहां वह करार पाई गई कीमत;
(ख) जहां ऐसा कोई करार नहीं हो सकता वहां नियंत्रित कीमत के, यदि कोई हो, प्रति निर्देश से परिकलित कीमत;
(ग) जहां न तो खण्ड (क) और न खण्ड (ख) ही लागू होता है वहां उस परिक्षेत्र में विक्रय की तारीख को अभिभावी बाजार दर पर परिकलित कीमत।
5[(3क) (i) यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि किसी परिक्षेत्र में किन्हीं खाद्य पदार्थों में कीमतों के चढ़ाव को नियंत्रित करने या उनमें जमाखोरी को निवारित करने के लिए ऐसा करना आवश्यक है तो वह शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि उपधारा (3) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, वह कीमत, जिस पर कि उस परिक्षेत्र में खाद्य पदार्थ का विक्रय उपधारा (2) के खण्ड (च) के प्रति निर्देश से किए गए आदेश के अनुपालन में किया जाएगा, इस उपधारा के उपबन्धों के अनुसार विनियमित की जाएगी। (1. 2006 के अधिनियम सं० 54 की धारा 4 द्वारा (…..से) लोप किया गया।)
(2. 1961 के अधिनियम सं० 17 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित।)
(3. 1971 के अधिनियम सं० 66 की धारा 2 द्वारा खण्ड (ञ) के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(4. 1976 के अधिनियम सं० 92 की धारा 3 द्वारा उपखण्ड (iii) के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(5. 1957 के अधिनियम सं० 13 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित।)
(ii) इस उपधारा के अधीन जारी की गई कोई अधिसूचना तीन मास से अधिक की ऐसी कालावधि के लिए प्रवृत्त रहेगी जैसी उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट हो।
(iii) जहां इस उपधारा के अधीन अधिसूचना के जारी होने के पश्चात् कोई व्यक्ति उसमें विनिर्दिष्ट प्रकार के खाद्य पदार्थ का, और ऐसे विनिर्दिष्ट परिक्षेत्र में, विक्रय उपधारा (2) के खण्ड (च) के प्रति निर्देश से किए गए किसी आदेश के अनुपालन में करता है, वहां उसके लिए विक्रेता को निम्नलिखित कीमत दी जाएगी :-
(क) जहां कीमत, इस धारा के अधीन नियत खाद्य पदार्थ की नियंत्रित कीमत से, यदि कोई हो, संगत रह कर करार पाई जा सकती है वहां वह करार पाई गई कीमत;
(ख) जहां ऐसा कोई करार नहीं हो सकता वहां नियंत्रित कीमत के, यदि कोई हो, प्रति निर्देश से परिकलित कीमत;
(ग) जहां न तो खण्ड (क) और न खण्ड (ख) ही लागू होता है वहां अधिसूचना की तारीख के ठीक पूर्वगामी तीन मास की कालावधि के दौरान उस परिक्षेत्र में अभिभावी औसत बाजार दर के प्रति निर्देश से परिकलित कीमत।
(iv) खण्ड (iii) के उपखण्ड (ग) के प्रयोजनों के लिए उस परिक्षेत्र में अभिभावी औसत बाजार दर का अवधारण इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत अधिकारी द्वारा उस परिक्षेत्र की या पड़ोस के परिक्षेत्र की बाबत अभिभावी ऐसे बाजार दरों के प्रति निर्देश से किया जाएगा जिनके लिए प्रकाशित आंकड़े उपलभ्य हैं, और ऐसे अवधारित औसत बाजार दर अन्तिम होंगे और किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किए जाएंगे।]
1[(3ख) जहां उपधारा (2) के खण्ड (च) के प्रति निर्देश से किए गए किसी आदेश द्वारा किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा की गई है कि वह केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार को या ऐसी सरकार के किसी अधिकारी या अभिकर्ता को अथवा ऐसी सरकार के स्वामित्वाधीन या उसके द्वारा नियंत्रित किसी निगम को, किसी ऐसी श्रेणी या किस्म के खाद्यान्नों, खाद्य तिलहनों या खाद्य तेलों का, विक्रय करे जिनके संबंध में उपधारा (3क) के अधीन या तो कोई अधिसूचना निकाली ही नहीं गई है या ऐसी अधिसूचना निकाली गई है किन्तु प्रवृत्त नहीं है, वहां संबंधित व्यक्ति को, उपधारा (3) में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, उतनी रकम का संदाय, जो राज्य सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट, यथास्थिति, ऐसे खाद्यान्नों, खाद्य तिलहनों या खाद्य तेलों की वसूली कीमत के बराबर हो, निम्नलिखित बातों का ध्यान रखते हुए किया जाएगा :-
(क) यदि ऐसी श्रेणी या किस्म के खाद्यान्नों, खाद्य तिलहनों या खाद्य तेलों के लिए कोई नियंत्रित कीमत इस धारा के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन नियत की गई हो तो उस कीमत का;
(ख) फसल की साधारण सम्भावनाओं का;
(ग) उपभोक्ताओं की विशेष रूप से उपभोक्ताओं के दुर्बल वर्गों को, ऐसी श्रेणी या किस्म के खाद्यान्न, खाद्य तिलहन या खाद्य तेल युक्तियुक्त कीमत पर उपलब्ध कराने की आवश्यकता का; और
(घ) यदि संबंधित श्रेणी या किस्म के खाद्यान्नों, खाद्य तिलहनों या खाद्य तेलों की कीमत के संबंध में कृषि मूल्य आयोग की सिफिरिशें, यदि कोई हों, तो उन सिफारिशों का।]
2[(3ग) जहां उपधारा (2) के खंड (च) के प्रति निर्देश से किए गए किसी आदेश द्वारा किसी उत्पादक से यह अपेक्षित है कि वह किसी प्रकार की चीनी (चाहे केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार को या ऐसी सरकार के किसी अधिकारी या अभिकर्ता को या किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग को) विक्रीत करे, चाहे उपधारा (3क) के अधीन कोई अधिसूचना जारी की गई थी या अन्यथा, वहां उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, उस उत्पादक को केवल वह रकम संदत्त की जाएगी, जो केन्द्रीय सरकार, निम्नलिखित को ध्यान में रखते हुए, आदेश द्वारा, अवधारित करे-
(क) उचित और लाभकारी कीमत, यदि कोई हो, जो इस धारा के अधीन विचार में ली जाने वाली गन्ने की कीमत के रूप में केंद्रीय सरकार द्वारा अवधारित की गई हों; (1. 1976 के अधिनियम सं० 92 की धारा 3 द्वारा उपधारा (3ख) के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(2. 2009 के अधिनियम सं० 36 की धारा 2 द्वारा (1-10-2009 से) प्रतिस्थापित।)
(ख) चीनी की विनिर्माण लागत;
(ग) उस पर संदत्त या संदेय शुल्क या कर, यदि कोई हो; और
(घ) चीनी विनिर्माण के कारबार में लगाई गई पूंजी पर युक्तियुक्त प्रत्यागम:
परंतु केंद्रीय सरकार भिन्न-भिन्न क्षेत्रों या कारखानों अथवा भिन्न-भिन्न प्रकार की चीनी के लिए, समय-समय पर, भिन्न-भिन्न कीमतें अवधारित कर सकेगा:
परंतु यह और कि जहां चीनी सत्र 2008-2009 तक उत्पादित चीनी के संबंध में उद्गृहीत चीनी की कीमत का कोई अनंतिम अवधारण किया गया है, वहां अंतिम कीमत, इस उपधारा के उपबंधों के अधीन, जैसी वह 1 अक्तूबर, 2009 से ठीक पूर्व थी, अवधारित की जा सकेगी।
1[स्पष्टीकरण 1-
इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, -
(क) “उचित और लाभकारी कीमत" से इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा अवधारित गन्ने की कीमत अभिप्रेत है;
(ख) "चीनी की विनिर्माण लागत" से गन्ने के चीनी में संपरिवर्तन पर उपगत शुद्ध लागत अभिप्रेत है, जिसके अंतर्गत उत्पादक द्वारा वहन की गई सीमा तक क्रय केन्द्र से कारखाने के द्वार तक गन्ने के परिवहन की शुद्ध लागत भी है;
(ग) “उत्पादक" से चीनी विनिर्माण का कारबार करने वाला व्यक्ति अभिप्रेत है;
(घ) “लगाई गई पूंजी पर युक्तियुक्त प्रत्यागम" से चीनी के विनिर्माण के संबंध में कुल स्थिर आस्तियों सहित उत्पादक की कामकाज पूंजी पर प्रत्यागम अभिप्रेत है, जिसके अंतर्गत इस धारा के अधीन अवधारित उचित और लाभकारी कीमत पर गन्ने का उपापन भी है।]
2स्पष्टीकरण 2-
शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस उपधारा के खंड (क) में निर्दिष्ट "उचित और लाभकारी कीमत" खण्ड (ख) में निर्दिष्ट "चीनी का विनिर्माण लागत" और खंड (घ) में निर्दिष्ट "लगाई गई पूंजी पर युक्तियुक्त प्रत्यागम" पदों में किसी राज्य सरकार के किसी आदेश या किसी अधिनियमिति के अधीन संदत्त या संदेय कीमत तथा उत्पादक और गन्ना उगाने वाले या गन्ना उगाने वालों की किसी सहकारी समिति के बीच तय की गई कोई कीमत, सम्मिलित नहीं है।]
3[(3घ) केन्द्रीय सरकार यह निदेश दे सकेगी कि कोई भी उत्पादक, आयातकर्ता या निर्यातकर्ता, ऐसे कारखाने के जिसमें वह उत्पादित की जाती है, बंधित गोदामों से, भले ही ऐसे गोदाम उस कारखाने के परिसर के भीतर स्थित हों या बाहर अथवा, यथास्थिति, आयातकर्ताओं या निर्यातकर्ताओं के भांडागारों से, उस सरकार द्वारा जारी निदेश के अधीन या उसके अनुसार के सिवाय, किसी प्रकार की चीनी का विक्रय नहीं करेगा या उसका किसी अन्य रीति में व्ययन नहीं करेगा अथवा परिदान नहीं करेगा या किसी प्रकार की चीनी को नहीं हटाएगा:
परंतु यह धारा, किसी उत्पादक या आयातकर्ता द्वारा ऐसी चीनी को भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 2 के खंड (ङ) में यथापरिभाषित किसी अनुसूचित बैंक या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन गठित किसी तत्स्थानी नए बैंक के पक्ष में गिरवी रखने को प्रभावित नहीं करेगी, तथापित ऐसा कोई बैंक उसके पास गिरवी रखी गई चीनी का, केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी किसी निदेश के अधीन और उसके अनुसार के सिवाय, विक्रय नहीं करेगा। (1. 2010 के अधिनियम सं० 35 की धारा 2 द्वारा संख्यांकित।)
(2. 2010 के अधिनियम सं० 35 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित।)
(3. 2003 के अधिनियम सं० 37 की धारा 2 द्वारा (14-6-1999 से) अंतःस्थापित।)
(3ङ) केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, किसी उत्पादक या आयातकर्ता या निर्यातकर्ता या मान्यताप्राप्त व्यौहारी या उत्पादकों अथवा मान्यताप्राप्त व्यौहारियों के किसी वर्ग को किसी प्रकार की चीनी के, उस निदेश में विनिर्दिष्ट रीति से, उत्पादन, स्टाक के रखरखाव, भंडारकरण, विक्रय, श्रेणीकरण, पैकिंग, चिह्नांकन, तौल, व्ययन, परिदान और वितरण के संबंध में कार्रवाई करने के लिए निदेश दे सकेगी।
स्पष्टीकरण-
उपधारा (3घ) और इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, -
(क) “उत्पादक" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो चीनी विनिर्माण का कारबार कर रहा है;
(ख) “मान्यताप्राप्त व्यौहारी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो चीनी का क्रय करने, विक्रय करने या वितरण करने का कारोबार कर रहा है;
(ग) “चीनी" के अन्तर्गत रोपण सफेद चीनी, कच्ची चीनी और परिष्कृत चीनी भी है, भले ही वह देश में ही उत्पादित हो या आयात की गई हो।]
(4) यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय हो कि किसी आवश्यक वस्तु के उत्पादन और प्रदाय को बनाए रखने या बढ़ाने के लिए ऐसा करना आवश्यक है तो वह आदेश द्वारा किसी व्यक्ति को (जो इसके पश्चात् इसमें प्राधिकृत नियंत्रक के रूप में निर्दिष्ट है) उस वस्तु के उत्पादन और प्रदाय में संलग्न किसी ऐसे उपक्रम या उसके किसी भाग की बाबत, जैसा कि उस आदेश में विनिर्दिष्ट हो, नियंत्रण के ऐसे कृत्यों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी जैसे उसमें उपबंधित किए जाएं और जब तक ऐसे आदेश किसी उपक्रम या उसके भाग की बाबत प्रवृत्त हैं-
(क) जो भी आदेश प्राधिकृत नियंत्रक को केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए जाएं उनके अनुसार वह अपने कृत्यों का प्रयोग करेगा किन्तु इस प्रकार कि उसे उपक्रम के प्रबन्ध के भारसाधक व्यक्तियों के कृत्यों का अवधारण करने वाली किसी अधिनियमिति या किसी लिखत के उपबन्धों से असंगत कोई निदेश वहां तक के सिवाय, जहां तक कि आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट या उपबंधित हों, देने की शक्ति नहीं होगी; और
(ख) आदेश के उपबन्धों के अधीन प्राधिकृत नियंत्रक द्वारा जो भी आदेश दिए जाएं उनके अनुसार उपक्रम या उसके भाग को चलाया जाएगा और उस उपक्रम या उस भाग के सम्बन्ध में प्रबन्ध के किन्हीं कृत्यों से सम्बद्ध कोई भी व्यक्ति ऐसे सभी निर्देशों का अनुपालन करेगा।
(5) इस धारा के अधीन किया गया कोई आदेश-
(क) सामान्य प्रकार के या व्यक्तियों के किसी वर्ग को प्रभावित करने वाले आदेश की दशा में, शासकीय राजपत्र में अधिसूचित किया जाएगा; और
(ख) किसी विनिर्दिष्ट व्यक्ति को निदिष्ट आदेश की दशा में, ऐसे व्यष्टि पर-
(i) उस व्यष्टि को देकर या देने के लिए प्रस्तुत करके तामील किया जाएगा, या
(ii) यदि वह इस प्रकार दिया या देने के लिए प्रस्तुत नहीं किया जा सकता तो उसे उन परिसरों के जिनमें वह व्यष्टि रहता है बाहरी दरवाजे या किसी अन्य सहजदृश्य भाग पर लगा कर तामील किया जाएगा और उसकी एक लिखित रिपोर्ट तैयार की जाएगी और पड़ोस में रहने वाले दो व्यक्तियों द्वारा साबित की जाएगी।
(6) केन्द्रीय सरकार द्वारा या केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा इस धारा के अधीन किया गया हर एक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाएगा।
धारा 3 के अधीन किया गया कोई आदेश केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार अथवा केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के अधिकारियों और प्राधिकारियों को शक्तियां प्रदत्त कर सकेगा और उन पर कर्तव्य अधिरोपित कर सकेगा तथा उसमें ऐसी किन्हीं शक्तियों के प्रयोग या ऐसे किन्हीं कर्तव्यों के निर्वहन के बारे में किसी राज्य सरकार या उसके अधिकारियों और प्राधिकारियों के लिए निदेश भी हो सकेंगे।
केन्द्रीय सरकार अधिसूचित आदेश द्वारा निदेश दे सकेगी कि 1[धारा 3 के अधीन आदेश करने या अधिसूचना निकालने की शक्ति], ऐसे विषयों के सम्बन्ध में और ऐसी शर्तों के अध्यधीन, यदि कोई हों, जो उस निदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, निम्नलिखित द्वारा भी प्रयोक्तव्य होंगी-
(क) केन्द्रीय सरकार के अधीनस्थ ऐसा अधिकारी या प्राधिकारी; अथवा
(ख) ऐसी राज्य सरकार या राज्य सरकार के अधीनस्थ ऐसा अधिकारी या प्राधिकारी, जो निदेश में विनिर्दिष्ट हो।
धारा 3 के अधीन किया गया कोई आदेश, इस आधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति में या इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभाव रखेगा।
3[(1)] जहां कोई 4[आवश्यक वस्तु] उसके सम्बन्ध में धारा 3 के अधीन किए गए आदेशों के अनुसरण में 4[अभिगृहीत की जाती है] 5[जहां ऐसे अभिग्रहण की रिपोर्ट; अयुक्तियुक्त विलंब के बिना,] उस जिले या प्रेसीडेंसी नगर के, जिसमें ऐसी 4[आवश्यक वस्तु का अभिग्रहण किया जाता है] कलक्टर को 5[की जाएगी] और चाहे ऐसे आदेश के उल्लंघन के लिए अभियोजन संस्थित किया जाता है या नहीं, 4[यदि कलक्टर ऐसा करना समीचीन समझता है तो वह इस प्रकार अभिगृहीत आवश्यक वस्तु को अपने समक्ष निरीक्षण के लिए पेश किए जाने का निदेश दे सकेगा और यदि उसका समाधान हो जाता है कि] आदेश का का उल्लंघन हुआ है 6[तो वह-
(क) ऐसे अभिगृहीत की गई आवश्यक वस्तु के;
(ख) जिसे पैकेज, आवेष्टक या पात्र में ऐसी आवश्यक वस्तु पाई जाए उसके; और
(ग) ऐसी आवश्यक वस्तु को ले जाने में प्रयुक्त किसी पशु, गाड़ी, जलयान या अन्य प्रवहण के, अधिग्रहण का आदेश कर सकेगा:] (1. 1971 के अधिनियम सं० 66 की धारा 3 द्वारा "धारा 3 के अधीन आदेश करने की शक्ति" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(2. 1966 के अधिनियम सं० 25 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित।)
(3. 1976 के अधिनियम सं० 92 की धारा 4 द्वारा धारा 6क को उसकी उपधारा (1) के रूप में पुनःसंख्यांकित किया गया।)
(4. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 4 द्वारा कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(5. 1976 के अधिनियम सं० 92 की धारा 4 द्वारा कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(6. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 4 द्वारा (22-6-1974 से) "ऐसे अभिगृहीत की गई आवश्यक वस्तु के अभिग्रहण का आदेश कर सकेगा" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
परन्तु इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध के अधीन की जा सकने वाली किसी कार्यवाही पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना कोई खाद्यान्न; खाद्य तिलहन जो उनके सम्बन्ध में धारा 3 के अधीन किए गए आदेश के अनुसरण में किसी उत्पादक से अभिगृहीत किए गए हों, यदि अभिगृहीत खाद्यान्न या खाद्य तिलहन उसके द्वारा उत्पादित किए गए हों, इस धारा के अधीन अधिगृहीत नहीं किए जाएंगे;
1[परन्तु यह और कि भाड़े पर माल या यात्रियों को ले जाने के लिए प्रयुक्त किसी पशु, गाड़ी, यान या अन्य प्रवहण की दशा में ऐसे पशु, गाड़ी, यान या अन्य प्रवहण के स्वामी को उसका अधिहरण किए जाने के बदले में ऐसा जुर्माना जो ऐसे पशु, गाड़ी, यान या अन्य प्रवहण द्वारा ले जाई जाने वाली आवश्यक वस्तु के अभिग्रहण की तारीख को उसकी बाजार कीमत से अधिक का न हो संदाय करने का विकल्प दिया जाएगा।]
6[(2) जहां उपधारा (1) अधीन किसी आवश्यक वस्तु के अभिग्रहण की रिपोर्ट प्राप्त करने पर या उसके निरीक्षण पर कलक्टर की यह राय है कि आवश्यक वस्तु शीघ्रतया और प्रकृत्या क्षयशील है या लोकहित में ऐसा करना अन्यथा समीचीन है वहां वह-
(i) उसका विक्रय उस नियंत्रित कीमत पर, यदि कोई हो, किए जाने का आदेश दे सकेगा जो ऐसी आवश्यक वस्तु के लिए इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन नियत की गई हो; या
(ii) जहां कोई ऐसी कीमत नियत नहीं की गई है वहां लोक नीलाम द्वारा उसका विक्रय किए जाने का आदेश दे सकेगा:
परन्तु क्लक्टर, खाद्यानों की दशा में, उनके साभियक वितरण और उनकी उचित कीमत पर उपलभ्यता के लिए उनका विक्रय उचित दर की दुकानों के माध्यम से जनता को उस कीमत पर किए जाने का आदेश दे सकेगा जो, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा ऐसे खाद्यान्नों के फुटकर विक्रय के लिए नियत की गई हो।
(3) जहां किसी आवश्यक वस्तु का विक्रय पूर्वोक्त रीति से किया जाता है वहां उसके विक्रय आगम, किसी ऐसे विक्रय या नीलाम के व्यय या उससे संबंधित अन्य आनुषंगिक व्यय की कटौती करने के पश्चात्-
(क) जहां अधिहरण का कोई आदेश कलक्टर द्वारा अन्तिम रूप से पारित नहीं किया जाता है,
(ख) धारा 6ग की उपधारा (1) के अधीन अपील में पारित किसी आदेश में ऐसी अपेक्षा की गई है, या
(ग) जहां ऐसे आदेश के उल्लंघन के लिए, जिसके संबंध में इस धारा के अधीन अधिहरण का आदेश किया गया है संस्थित किसी अभियोजन में संबंधित व्यक्ति दोषमुक्त कर दिया जाता है,
वहां उसके स्वामी या उस व्यक्ति को, जिससे उसका अभिग्रहण किया गया है, संदत्त किए जाएंगे।]
2[(1)] 3[ किसी 4[आवश्यक वस्तु पैकेज, आवेष्टक, पात्र, पशु, गाड़ी, जलयान या अन्य प्रवहण]] का अधिहरण करने वाला कोई आदेश धारा 6 क के अधीन तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि उसका 3[आवश्यक वस्तु पैकेज, आवेष्टक, पात्र, पशु, गाड़ी, जलयान या अन्य प्रवहण] के स्वामी या उस व्यक्ति को 5[जिससे वह अभिगृहीत की जाती है]-
(क) उन आधारों की, जिन पर उस 3[आवश्यक वस्तु पैकेज, आवेष्टक, पात्र, पशु, गाड़ी, जलयान या अन्य प्रवहण] को अधिहृत करने का विचार है, उसे जानकारी देने वाली एक लिखित सूचना नहीं दे दी जाती;
(ख) अधिहरण के आधारों के विरुद्ध, इतने उचित समय के भीतर जितना सूचना में विनिर्दिष्ट हो, लिखित अभ्यावेदन करने का अवसर नहीं दे दिया जाता; और
(ग) मामले में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया जाता।
6[(2) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, धारा 6 क के अधीन किसी पशु, गाड़ी, जलयान या अन्य प्रवहण का अधिहरण करने वाला आदेश उस दशा में नहीं दिया जाएगा जब उस पशु, गाड़ी, जलयान या अन्य प्रवहण का स्वामी कलक्टर को समाधान रूप में यह साबित कर देता है कि आवश्यक वस्तु को ले जाने में उसका प्रयोग उस पशु, गाड़ी, जलयान या अन्य प्रवहण के स्वामी या अभिकर्ता, यदि कोई हो, और भारसाधक व्यक्ति की जानकारी या मौनानुकूलता के बिना किया गया था और उनमें से प्रत्येक ने ऐसे प्रयोग के विरुद्ध सभी उचित और आवश्यक पूर्वावधनियां बरती थी।]
7[(3) यदि ऐसी सूचना देने में उस खण्ड के उपबन्धों का पर्याप्त रूप से पालन कर दिया गया है तो किसी आवश्यक वस्तु, पैकेज, आवेष्टक, पात्र, पशु, गाड़ी, जलयान या अन्य प्रवहण का अधिहरण करने वाला कोई आदेश केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगा कि उपधारा (1) के खण्ड (क) के अधीन दी गई सूचना में कोई त्रुटि या अनियमितता है।]
(1. 1976 के अधिनियम सं० 92 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित।)
(2. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 5 द्वारा धारा 6 ख को उसकी उपधारा (1) के रूप में पुनःसंख्यांकित किया गया।)
(3. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 5 द्वारा " किन्हीं खाद्यान्नों, खाद्य तिलहनों और खाद्य तेल" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(4. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 5 द्वारा (22-6-1974 से) "आवश्यक वस्तु" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(5. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 5 द्वारा "वे अभिगृहीत की जाती हैं" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(6. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 5 द्वारा (22-6-1974 से) अंतःस्थापित।)
(7. 1976 के अधिनियम सं० 92 की धारा 5 द्वारा अंतःस्थापित।)
(1) धारा 6क के अधीन अधिहरण के किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति ऐसे आदेश की अपने को संसूचना की तारीख से एक मास के भीतर 1[किसी ऐसे न्यायिक प्राधिकारी को अपील कर सकेगा जो सम्बन्धित राज्य सरकार द्वारा नियुक्त हो और वह न्यायिक प्राधिकारी, अपीलार्थी को सुने जाने का अवसर देने के पश्चात् उस आदेश को, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्ट, उपान्तरित या बातिल करते हुए ऐसा आदेश पारित करेगा, जैसा वह ठीक समझे।
(2) जहां धारा 6क के अधीन हुआ कोई आदेश ऐसे न्यायिक प्राधिकारी द्वारा उपान्तरित या बातिल किया जाता है या जहां किसी ऐसे आदेश के जिसकी बाबत अधिहरण का आदेश धारा 6 क के अधीन किया गया है, उल्लंघन के लिए संस्थित अभियोजन में, सम्बन्धित व्यक्ति दोषमुक्त कर दिया जाता है, तथा दोनों में से किसी भी दशा में किसी कारण से यह सम्भव नहीं है कि 2[अभिगृहीत आवश्यक वस्तु लौटा दी जाए] 2[ऐसे व्यक्ति को, धारा 6क की उपधारा (3) द्वारा जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, उनके लिए कीमत 3[उस आवश्यक वस्तु] के अभिग्रहण के दिन से परिकलित ब्याज सहित इस प्रकार संदत्त की जाएगी] 4[मानो] सरकार को उस 4[आवश्यक वस्तु] का विक्रय किया गया हो] 5[और ऐसी कीमत निम्नलिखित रूप से अवधारित की जाएगी-
(i) खाद्यान्नों, खाद्य तिलहनों या खाद्य तेलों की दशा में धारा 3 की उपधारा (3ख) के उपबन्धों के अनुसार;
(ii) चीनी की दशा में, धारा 3 की उपधारा (3ग) के उपबन्धों के अनुसार; और
(iii) किसी अन्य आवश्यक वस्तु की दशा में धारा 3 की उपधारा (3) के उपबन्धों के अनुसार।]
कलक्टर द्वारा इस अधिनियम के अधीन किसी अधिहरण का अधिनिर्णय किसी ऐसे दंड के दिए जाने को निवारित नहीं करेगा जिसका कि उस द्वारा प्रभावित व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन भागी है।]
जब कभी कोई आवश्यक वस्तु उसके सम्बन्ध में धारा 3 के अधीन किए गए आदेश के अनुसरण में अभिगृहीत की जाती है या धारा 6 क के अधीन अधिहरण के लम्बित रहने के दौरान ऐसा कोई पैकेज, आवेष्टक या पात्र, जिसमें ऐसी आवश्यक वस्तु पाई जाती है, या ऐसा कोई पशु, गाड़ी, जलयान या अन्य प्रवहण जिसे ऐसी आवश्यक वस्तु को ले जाने में प्रयुक्त किया गया है, अभिगृहीत किया जाता है, तब, यथास्थिति, कलक्टर को या धारा 6ग के अधीन संबंधित राज्य सरकार को ऐसी आवश्यक वस्तु, पैकेज, आवेष्टक, पात्र, पशु, गाड़ी, जलयान या अन्य प्रवहण के कब्जे, परिदान, व्ययन, निर्मोचन या वितरण के संबंध में आदेश करने की अधिकारिता होगी और तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी को ऐसी अधिकारिता नहीं होगी।]
7[(1) यदि कोई व्यक्ति धारा 3 के अधीन किए गए किसी आदेश का उल्लंघन करेगा, -
(क) तो वह, -
(i) उस धारा की उपधारा (2) के खण्ड (ज) या खण्ड (झ) के प्रति निर्देश से किए गए आदेश की दशा में कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा, तथा
(ii) किसी अन्य आदेश की दशा में कारावास से जिसकी अवधि तीन मास से कम की नहीं होगी किन्तु सात वर्ष की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा:
परन्तु न्यायालय किन्हीं पर्याप्त और विशेष कारणों के आधार पर, जिनका निर्णय में उल्लेख किया जाएगा, तीन मास से कम की अवधि के कारावास का दण्डादेश दे सकेगा;
(ख) तो ऐसी सम्पत्ति जिसकी बाबत आदेश का उल्लंघन किया गया है सरकार के पक्ष में समपहृत कर ली जाएगी,
(ग) तो कोई पैकेज, आवेष्टक या पात्र जिसमें सम्पत्ति पाई गई हो और कोई पशु, गाड़ी, जलयान या अन्य प्रवहण जिसे सम्पत्ति को ले जाने में प्रयुक्त किया गया हो, न्यायालय द्वारा आदेश दिए जाने पर सरकार के पक्ष में समपहृत कर लिए जाएंगे।
(2) यदि कोई व्यक्ति जिसके धारा 3 की उपधारा (4) के खण्ड (ख) के अधीन निदेश दिया गया हो उस निदेश का अनुपालन करने में असफल रहेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से कम नहीं होगी किन्तु सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा:
परन्तु न्यायालय किन्हीं पर्याप्त और विशेष कारणों के आधार पर, जिनका निर्णय में उल्लेख किया जाएगा, तीन मास से कम की अवधि के कारावास का दण्डादेश दे सकेगा।
(1. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 6 द्वारा "खाद्यानों या खाद्य तिलहनों और खाद्य तेल लौटा दे" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(2. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 6 द्वारा "ऐसे व्यक्ति को संदत्त की जाएगी" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(3. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 6 द्वारा "वस्तु" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(4. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 6 द्वारा "मानो कि, यथास्थिति खाद्यान्नों, खाद्य तिलहनों या खाद्य तेलों" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(5. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 6 द्वारा "और धारा 3 की उपधारा (3ख) के उपबन्धों के अनुसार ऐसी कीमत अवधारित की जाएगी" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(6. 1986 के अधिनियम सं० 42 की धारा 2 द्वारा धारा 6ङ के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(7. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 6 द्वारा (22-6-1947 से) उपधारा (1) और (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(2क) यदि उपधारा (1) के खण्ड (क) के उपखण्ड (ii) के अधीन या उपधारा (2) के अधीन सिद्धदोष ठहराया गया कोई व्यक्ति उसी उपबन्ध के अधीन किसी अपराध के लिए पुनः सिद्धदोष ठहराया जाएगा तो, वह द्वितीय और प्रत्येक पश्चात्वर्ती अपराध के लिए कारावास से जिसकी अवधि छह मास से कम की नहीं होगी किन्तु सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा:
परन्तु न्यायालय किन्हीं पर्याप्त और विशेष कारणों के आधार पर, जिनका निर्णय में उल्लेख किया जाएगा, छह मास से कम की अवधि के कारावास का दंडादेश दे सकेगा।
(2ख) उपधारा (1), (2) और (2क) के प्रयोजनों के लिए यह बात कि उपधारा (1) के खण्ड (क) के उपखण्ड (ii) के अधीन या उपधारा (2) के अधीन किसी अपराध से जनसाधरण या किसी व्यक्ति को कोई खास हानि नहीं हुई है, यथास्थिति, तीन मास या छह मास से कम की अवधि के लिए कारावास का दण्डादेश देने का पर्याप्त और विशेष कारण होगी।]
1[(3) जहां उपधारा (1) के अधीन किसी अपराध से सिद्धदोष हुआ कोई व्यक्ति, किसी आवश्यक वस्तु की बाबत किसी आदेश के उल्लंघन के लिए उस उपधारा के अधीन किसी अपराध का पुनः सिद्धदोष होता है वहां वह न्यायालय जिसके द्वारा ऐसा व्यक्ति सिद्धदोष किया जाए उस किसी शास्ति के अतिरिक्त, जो उस धारा के अधीन उस पर अधिरोपित की जाए, आदेश द्वारा निदेश दे सकेगा कि वह व्यक्ति उस आवश्यक वस्तु से छह मास से अन्यून ऐसी कालावधि तक, जैसी आदेश में न्यायालय द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, कोई कारोबार नहीं करेगा।]
(1) जहां कोई व्यक्ति, जो-
(क) धारा 3 के अधीन किए गए, किसी आदेश के अनुसरण में, किसी रकम का संदाय करने के लिए, या
(ख) किसी रकम को किसी खाते में या उस धारा के अधीन किए गए किसी आदेश द्वारा या उसके अनुसरण में गठित निधि में जमा करने के लिए,
दायी है ऐसी सम्पूर्ण रकम या उसके किसी भाग का संदाय करने में या उसे जमा करने में व्यतिक्रम करता है वहां ऐसी रकम जिसकी बाबत ऐसा व्यतिक्रम किया गया है [चाहे ऐसा आदेश आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 1984 के प्रारंभ के पूर्व या पश्चात् किया गया हो और चाहे ऐसे व्यक्ति का ऐसी रकम का संदाय करने या जमा करने का दायित्व ऐसे प्रारंभ के पूर्व या पश्चात् उत्पन्न हुआ हो] सरकार द्वारा, ऐसे व्यक्तिक्रम की तारीख से ऐसी रकम के वसूल किए जाने की तारीख तक प्रतिवर्ष 3[ पन्द्रह प्रतिशत की दर से उन पर संगणित साधारण ब्याज सहित, भू-राजस्व की बकाया के रूप में 4[या लोक मांग के रूप में] वसूल की जाएगी।
(2) उपधारा (1) के अधीन वसूल की गई रकम को ऐसे आदेश के अनुसार बरता जाएगा जिसके अधीन ऐसी रकम का संदाय या जमा करने का दायित्व उत्पन्न हुआ था।
(3) उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या उसके प्रतिकूल किसी संविदा में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी कोई न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण किसी सरकार को उपधारा (1) के उपबन्धों के अनुसरण में भू-राजस्व की बकाया के रूप में 4[या लोक मांग के रूप में] किसी रकम को वसूल करने से प्रतिषिद्ध या अवरुद्ध करने वाला कोई व्यादेश मंजूर नहीं करेगा या कोई आदेश नहीं करेगा।
(4) यदि कोई आदेश, जिसके अनुसरण में कोई रकम सरकार द्वारा उपधारा (1) के अधीन भू-राजस्व की बकाया के रूप में 4[या लोक मांग के रूप में। वसूल की गई है किसी सक्षम न्यायालय द्वारा सरकार को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् अविधिमान्य घोषित कर दिया जाता है, तो सरकार उसके द्वारा इस प्रकार वसूल की गई रकम का प्रतिदाय उस व्यक्ति को जिससे ऐसी रकम वसूल की गई थी, उसके वसूल किए जाने की तारीख से उस तारीख तक जिसको ऐसा प्रतिदाय किया जाता है, प्रतिवर्ष 3[पंद्रह प्रतिशत] की दर से उस पर संगणित साधारण ब्याज सहित करेगी। (1. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 7 द्वारा अंतःस्थापित।)
(2. 1984 के अधिनियम सं० 34 की धारा 2 द्वारा (1-7-1984 से) अन्तःस्थापित।)
(3. 1986 के अधिनियम सं० 42 की धारा 3 द्वारा "छह प्रतिशत" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(4. 1986 के अधिनियम सं० 42 की धारा 3 द्वारा अन्तः स्थापित।)
इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "सरकार" से वह सरकार अभिप्रेत है जिसने धारा 3 के अधीन संयुक्त आदेश किया था, अथवा जहां ऐसा आदेश किसी सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा किया गया था वहां वह सरकार अभिप्रेत है।]
ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में जो धारा 3 के अधीन किए गए किसी आदेश का उल्लंघन करने का प्रयत्न करता है या उल्लंघन का दुष्प्रेरण करता है, यह समझा जाएगा कि उसने उस आदेश का उल्लंघन किया है।
यदि कोई व्यक्ति-
(i) धारा 3 के अधीन किए गए आदेश द्वारा कोई कथन करने या कोई जानकारी देने के लिए अपेक्षित होने पर कोई ऐसा कथन करेगा या ऐसी जानकारी देगा जो किसी सारवान् विशिष्टि में मिथ्या हो और जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान हो या विश्वास करने के लिए उसके पास युक्तियुक्त हेतुक या जिसके सही होने का उसे विश्वास न हो, या
(ii) यथापूर्वोक्त कोई कथन किसी पुस्तक, लेखा अभिलेख, घोषणा, विवरणी या अन्य दस्तावेज में करेगा जिसे रखने या देने के लिए वह किसी ऐसे आदेश द्वारा अपेक्षित है,
तो वह कारावास से, जिसकी अवधि 1[पांच वर्ष] तक की हो सकेगी या जुर्माने से अथवा दोनों से दण्डनीय होगा।
(1) यदि धारा 3 के अधीन किए गए किसी आदेश का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति कम्पनी हो तो प्रत्येक व्यक्ति, जो उस उल्लंघन के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था, और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे उल्लंघन के दोषी समझे जाएंगे तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे:
परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे किसी व्यक्ति को दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह साबित कर दे कि उल्लंघन उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे उल्लंघन का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया हो तथा यह साबित हो कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सम्मति या मौनानुकूलता से किया गया है, या उसकी किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा।
इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) “कम्पनी” से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; तथा
(ख) फर्म के सम्बन्ध में "निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है।
3[दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973](भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) में किसी बात के होते हुए भी इस धारा के अधीन दण्डनीय हर एक अपराध संज्ञेय 4*** होगा।]
(1) जब कोई कम्पनी इस अधिनियम के अधीन सिद्धदोष ठहराई जाती है तब उस कम्पनी को सिद्धदोष ठहराने वाला न्यायालय इस बात के लिए सक्षम होगा कि वह कम्पनी का नाम और कारबार का स्थान, उल्लंघन का स्वरूप, यह बात कि कम्पनी उस प्रकार सिद्धदोष ठहराई गई है और ऐसी अन्य विशिष्टियां, जिन्हें न्यायालय मामले की परिस्थितियों में समुचित समझे, कम्पनी के खर्चे पर ऐसे समाचारपत्रों में या ऐसी अन्य रीति से प्रकाशित कराए जैसी, न्यायालय निदिष्ट करे।
(1. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 8 द्वारा "तीन वर्ष" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(2. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 9 द्वारा अन्तःस्थापित।)
(3. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 7 द्वारा "दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5)" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(4. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 7 द्वारा "और जमानतीय" शब्दों का लोप किया गया।)
(5. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 7 द्वारा (22-6-1974 से) अन्तःस्थापित।)
(2) उपधारा (1) के अधीन कोई प्रकाशन तब तक नहीं किया जाएगा जब तक न्यायालय के आदेशों के विरुद्ध अपील करने की अवधि अपील किए बिना समाप्त न हो गई हो या ऐसी अपील किए जाने पर निपटा न दी गई हो।
(3) उपधारा (1) के अधीन किसी प्रकाशन के खर्च कम्पनी से इस प्रकार वसूल किए जा सकेंगे मानो वे न्यायालय द्वारा अधिरोपित जुर्माने हों।
इस धारा के प्रयोजनों के लिए "कम्पनी" का वही अर्थ है जो धारा 10 के स्पष्टीकरण के खण्ड (क) में है।
(1) इस अधिनियम के अधीन किसी ऐसे अपराध के अभियोजन में जिसमें अभियुक्त की आपराधिक मनःस्थिति होनी अपेक्षित है न्यायालय ऐसी मनःस्थिति विद्यमान होने की उपधारणा करेगा, किन्तु अभियुक्त के लिए यह साबित करना प्रतिवाद होगा कि उस अभियोजन में अपराध के रूप में आरोपित कार्य की बाबत उसकी ऐसी मनःस्थिति नहीं थी।
इस धारा में "आपराधिक मनःस्थिति" के अन्तर्गत आशय, मन्तव्य, किसी तथ्य की जानकारी और किसी तथ्य पर विश्वास या विश्वास करने कारण का है।
(2) इस धारा के प्रयोजन के लिए कोई तथ्य तभी साबित हुआ कहा जाता है जब न्यायालय को विश्वास है कि उसका विद्यमान होना युक्तियुक्त रूप से संदेह के परे है न कि जब उसका विद्यमान होना केवल अत्यधिक संभावनाओं से सिद्ध होता है।]
कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान उस दशा के सिवाय नहीं करेगा जिसमें कि ऐसे अपराध को गठित करने वाले तथ्यों की लिखित रिपोर्ट ऐसे व्यक्ति द्वारा की गई हो जो भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 भारतीय न्याय संहिता की धारा 2(28) में यथापरिभाषित लोक सेवक है 1[या कोई व्यथित व्यक्ति या कोई मान्यताप्राप्त उपभोक्ता संगम है, चाहे ऐसा व्यक्ति उस संगम का सदस्य है या नहीं]।
2[स्पष्टीकरण-
इस धारा और धारा 12कक के प्रयोजनों के लिए "मान्यताप्राप्त उपभोक्ता संगम" से कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत स्वैच्छिक उपभोक्ता संगम अभिप्रेत है।]
दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 29 (भारतीय नागरिक सुरक्षा न्याय 2023 धारा 23) में किसी बात के होते हुए भी, धारा 3 के अधीन किए गए आदेश के उल्लंघन के लिए सिद्धदोष किसी व्यक्ति के बारे में पांच हजार रुपए से अधिक जुर्माने का दण्डादेश पारित करना किसी महानगर मजिस्ट्रेट या किसी प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिए जो इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से सशक्त किया गया हो विधिसम्मत होगा।
(1) यदि केन्द्रीय सरकार की राय हो कि ऐसी परिस्थिति पैदा हो गई है जिसमें 4[किसी आवश्यक वस्तु के जो उपधारा (2) के खण्ड (क) में निर्दिष्ट आवश्यक वस्तु नहीं है,] उत्पादन, प्रदाय या वितरण अथवा उसमें व्यापार या वाणिज्य और अन्य सुसंगत बातों के हित में यह आवश्यक है कि ऐसी आवश्यक वस्तु के सम्बन्ध में धारा 3 के अधीन किए गए किसी आदेश के उल्लंघन का सक्षेपतः विचारण किया जाए तो केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसे आदेश को इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण के प्रयोजन के लिए विशेष आदेश विनिर्दिष्ट कर सकेगी और ऐसी हर एक अधिसूचना, जारी किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखी जाएगी:
5[परन्तु -
(क) आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 1971 के प्रारम्भ के पश्चात् निकाली गई हर ऐसी अधिसूचना जब तक वह पहले ही विखंडित न कर दी जाए, राजपत्र में उस अधिसूचना के प्रकाशन के पश्चात् दो वर्ष के अवसान पर प्रवृत्त न रह जाएगी;
(ख) ऐसे प्रारम्भ के ठीक पूर्व प्रवृत्त हर ऐसी अधिसूचना, जब तक वह पहले ही विखंडित न कर दी जाए, ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् दो वर्ष के अवसान पर प्रवृत्त न रह जाएगी:
परन्तु यह और कि यदि किसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी विशेष आदेश के उल्लंघन से संबंधित किसी मामले में संक्षिप्त विचारण के रूप में कार्यवाही उस अधिसूचना के विखण्डित किए जाने के या प्रवृत्त न रह जाने के पूर्व प्रारम्भ की गई हो तो पूर्वगामी परन्तुक की कोई बात उस मामले पर कोई प्रभाव न डालेगी और इस धारा के उपबन्ध उस मामले को ऐसे लागू बने रहेंगे मानो वह अधिसूचना विखण्डित न की गई हो या उसका प्रवृत्त रहना समाप्त न हुआ हो।]
6[(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 ((भारतीय नागरिक सुरक्षा न्याय 2023 धारा 23) में किसी बात के होते हुए भी, उन सभी अपराधों का जो, -
(क) धारा (3) के अधीन किए गए किसी आदेश के-
7* * *
(ii) खाद्य पदार्थ की बाबत जिसके अन्तर्गत खाद्य तिलहन और तेल भी है; या
(iii) ओषधि की बाबत, उलंल्घन से संबंधित है; और
(ख) उस दशा में जब किसी विशेष आदेश के संबंध में उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना प्रवृत्त है ऐसे विशेष आदेश के उल्लंघन से संबंधित है,
राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेष रूप से सशक्त प्रथम वर्ग के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा या महानगर मजिस्ट्रेट द्वारा संक्षेपतः विचारण किया जाएगा और जहां तक हो सकेगा उक्त संहिता की धारा 262 से लेकर धारा 265 तक के उपबन्ध ऐसे विचारण को लागू होंगे:
(1. 1986 के अधिनियम सं० 73 की धारा 2 द्वारा (1-5-1987 से) अंतःस्थापित।)
(2. 1986 के अधिनियम सं० 73 की धारा 2 द्वारा (1-5-1987 से) जोड़ा गया।)
(3. 1964 के अधिनियम सं० 47 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित।)
(4. 1967 के अधिनियम सं० 36 की धारा 10 द्वारा कुछ शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(5. 1971 के अधिनियम सं० 66 की धारा 5 द्वारा जोड़ा गया।)
(6. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 10 द्वारा उपधारा (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(7. 2006 के अधिनियम सं० 54 की धारा 5 द्वारा लोप किया गया।)
परन्तु इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण में दोषसिद्धि की दशा में, मजिस्ट्रेट के लिए यह विधिसम्मत होगा कि वह इतनी अवधि के लिए जो एक वर्ष से अधिक की न हो कारावास का दण्डादेश पारित करे:
परन्तु यह और कि यदि इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण के प्रारम्भ में या उसके दौरान मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि मामले की प्रकृति ऐसी है कि एक वर्ष से अधिक की अवधि के लिए कारावास का दण्डादेश पारित करना पड़े या किसी अन्य कारण से मामले का संक्षेपतः विचारण करना अवांछनीय है तो मजिस्ट्रेट पक्षकारों को सुनने के पश्चात्, उस भाव का आदेश अभिलिखित करेगा और तत्पश्चात् किन्हीं भी साक्षियों को जिनकी परीक्षा की जा चुकी हो पुनः बुलाएगा और मामले को उक्त संहिता द्वारा उपबंधित रीति से सुनने या पुनः सुनने के लिए अग्रसर होगा।]
(3) 1[दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (भारतीय नागरिक सुरक्षा न्याय 2023 धारा 23)] में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, इस धारा के अधीन संक्षेपतः विचारित किसी मामले में सिद्धदोष व्यक्ति द्वारा उस दशा में कोई अपील नहीं हो सकेगी जिसमें कि मजिस्ट्रेट एक मास से अनधिक के कारावास का 2[और दो हजार रुपए से अनधिक के जुर्माने का] दण्डादेश पारित करता है चाहे ऐसे दण्डादेश के अतिरिक्त सम्पत्ति के समपहरण का कोई आदेश या उक्त संहिता की 3[धारा 452] के अधीन कोई आदेश किया जाता है या नहीं, किन्तु उस दशा में अपील हो सकेगी जिसमें मजिस्ट्रेट द्वारा उपरोक्त परिसीमाओं से अधिक 4*** का दण्डादेश पारित किया जाता है।
5[(4) उपधारा (2) के खण्ड (क) में निर्दिष्ट आदेश के, जो विशेष आदेश नहीं है, उल्लंघन से संबंधित सभी मामलों का, जो आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 1974 के प्रारम्भ के ठीक पहले किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष लम्बित है और जहां किसी विशेष आदेश के संबंध में उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचना जारी की जाती है वहां ऐसे विशेष आदेश के उल्लंघन से संबंधित सभी मामलों का, जो ऐसी अधिसूचना के जारी किए जाने की तारीख से ठीक पहले किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष लम्बित है, इस धारा के अधीन उस दशा में संक्षेपतः विचारण किया जाएगा, जब, यथास्थिति, ऐसे प्रारम्भ या उक्त तारीख से पहले किसी साक्षी की परीक्षा नहीं हुई है और यदि वह मामला किसी ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष लम्बित है जो इस धारा के अधीन उसका संक्षेपतः विचारण करने के लिए सक्षम नहीं है तो वह इस प्रकार सक्षम मजिस्ट्रेट को भेजा जाएगा।]
इस अधिनियम के अधीन या तद्धीन बनाए गए किसी आदेश के अधीन केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी लोक अधिकारी द्वारा अपनी पदीय हैसियत से किए गए या किए गए तात्पर्यित किसी कार्य की बाबत उस सरकार या उस लोक अधिकारी के विरुद्ध कोई सिविल न्यायालय तब तक कोई व्यादेश नहीं देगा या किसी अन्य अनुतोष के लिए आदेश नहीं करेगा जब तक ऐसे व्यादेश या अनुतोष के लिए आवेदन की सूचना उस सरकार या अधिकारी को न दे दी गई हो।]
जहां कोई आदेश इस धारा के द्वारा या अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के प्रयोग में किसी प्राधिकारी द्वारा किया गया और हस्ताक्षरित हुआ तात्पर्यित है वहां न्यायालय यह उपधारित करेगा कि ऐसा आदेश भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) के अर्थ में उस प्राधिकारी द्वारा वैसे किया गया था।
जहां कोई व्यक्ति धारा 3 के अधीन किए गए किसी ऐसे आदेश का उल्लंघन करने के लिए अभियोजित किया जाता है जो उसे विधिपूर्ण प्राधिकार के बिना अथवा किसी अनुज्ञा-पत्र, अनुज्ञप्ति या अन्य दस्तावेज के बिना कोई कार्य करने से या किसी चीज का कब्जे में रखने से प्रतिषिद्ध करता है वहां यह साबित करने का भार कि उसके पास ऐसा प्राधिकार, अनुज्ञा-पत्र, अनुज्ञप्ति या अन्य दस्तावेज है, उसी पर होगा।
(1) किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी ऐसी बात के लिए नहीं हो सकेगी जो धारा 3 के अधीन किए गए किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई है या की जानी आशयित है।
(2) सरकार के खिलाफ कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी ऐसे नुकसान के लिए नहीं हो सकेगी जो धारा 3 के अधीन किए गए किसी आदेश के अनुसरण में सद्भापूर्वक की गई या की जाने के लिए आर्थात किसी बात से कारित हुआ हो या कारित होना संभाव्य हो।
जहां कोई ऐसा व्यक्ति, जो सेवक है, किसी ऐसे अपराध का अभियुक्त है जो धारा 3 के अधीन किए गए किसी आदेश के अनुसरण में उसके कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करने या किए जाने के लिए तात्पर्यित कार्य करने के दौरान उसके द्वारा किया गया अभिकथित है वहां कोई न्यायालय ऐसे अपराध का संज्ञान निम्नलिखित की पूर्व मंजूरी के बिना नहीं करेगा, अर्थात्:-
(क) उस व्यक्ति की दशा में जो अभिकथित अपराध के किए जाने के समय संघ के कार्यकलापों के संबंध में, यथास्थिति, नियोजित है या था, केन्द्रीय सरकार;
(ख) उस व्यक्ति की दशा में जो अभिकथित अपराध के लिए किए जाने के समय राज्य के कार्यकलापों के संबंध में, यथास्थिति, नियोजित है या था, राज्य सरकार।] (1. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 10 द्वारा "दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5)" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(2. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 10 द्वारा कुछ शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(3. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 10 द्वारा धारा "धारा 517" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(4. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 10 द्वारा कुछ शब्दों का लोप किया गया।)
(5. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 10 द्वारा (22-6-1974 से) उपधारा (4) के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
(6. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 11 द्वारा अंतःस्थापित।)
(7. 1974 के अधिनियम सं० 30 की धारा 8 द्वारा अंतःस्थापित।)
(1) निम्नलिखित विधियां एतद्द्वारा निरसित की जाती हैं:-
(क) आवश्यक वस्तु अध्यादेश, 1955 (1955 का 1);
(ख) इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व किसी राज्य में प्रवृत्त कोई अन्य विधि जहां तक कि ऐसी विधि किसी आवश्यक वस्तु के उत्पादन, प्रदाय और वितरण तथा उसमें व्यापार और वाणिज्य को नियंत्रित करती है या उसका नियंत्रण प्राधिकृत करती है।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, एतद्द्वारा निरसित और इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व प्रवृत्त किसी विधि के अधीन किसी भी प्राधिकारी द्वारा किया गया समझा गया कोई आदेश जहां तक कि ऐसा आदेश इस अधिनियम के अधीन किया जा सकता है, इस अधिनियम के अधीन किया गया समझा जाएगा और प्रवृत्त रहेगा, तथा ऐसी कोई नियुक्ति, अनुज्ञप्ति या अनुज्ञापत्र अथवा निदेश जो ऐसे किसी आदेश के अधीन की गई हो, अनुदत्त हो, किया गया हो या जारी किया गया हो और ऐसे प्रारम्भ से ठीक पूर्व प्रवृत्त हो, तब तक प्रवृत्त रहेगी या रहेगा जब तक कि उसे ऐसी किसी नियुक्ति, अनुज्ञप्ति या अनुज्ञा-पत्र अथवा निदेश से अतिष्ठित नहीं कर दिया जाता जो इस अधिनियम के अधीन की गई, अनुदत्त, दिया गया या जारी किया गया हो।
(3) उपधारा (2) के उपबन्ध साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होंगे जो कि उपधारा (1) में निर्दिष्ट अध्यादेश या अन्य विधि के निरसन को भी लागू होंगे मानो ऐसा अध्यादेश या अन्य विधि कोई अधिनियमिति रहा हो।
आवश्यक वस्तुएं
(1) ओषधि।
स्पष्टीकरण-
इस अनुसूची के प्रयोजनों के लिए "ओषधि” का वही अर्थ है जो ओषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (1940 का 23) की धारा 3 के खंड (ख) में है;
(2) उर्वरक, चाहे वह अकार्बनिक, कार्बनिक या मिश्रित हो;
(3) खाद्य पदार्थ, जिनके अंतर्गत खाद्य तिलहन और तेल भी है;
(4) पूर्णतया कपास से बने अट्टी सूत;
(5) पेट्रोलियम और पेट्रोलियम उत्पाद;
(6) कच्चा पटसन और पटसन टेक्सटाइल;
(7) (i) खाद्य फसलों के बीज और फलों तथा सब्जियों के बीज;
(ii) पशु चारे के बीच; और
(iii) पटसन बीज।
(1. 2006 के अधिनियम सं० 54 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित।)