Hindi Medium One Liner Notes · साम्या विधि वन लाइनर नोट्स
साम्या विधि वन लाइनर नोट्स
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साम्या विधि (Law OF Equity) | |
| साम्या विधि का विषय क्या है? | साम्या विधि, विधि का एक स्त्रोत है जो प्राकृतिक न्याय, ईमानदारी तथा अन्तःकरण पर आधारित है। |
| सामान्यतः क्या साम्या एक अधिनियमित विधि है? | नहीं, साम्या सामान्यतः अधिनियमित विधि नहीं है। |
| साम्या कब कार्य करती है? | विधि के विशिष्ट नियम के अभाव में साम्या कार्य करती है। |
| साम्या का आधार क्या है? | साम्या मनुष्यों के प्राकृतिक न्याय, ईमानदारी तथा अन्तःकरण पर आधारित है। |
| साम्य का अर्थ | |
| साम्या से क्या तात्पर्य है? | नैसर्गिक नियमों, निष्पक्षता तथा न्यायिक युक्तियुक्तता पर आधारित सिद्धान्तों से है। |
| "साम्य" शब्द किसका हिन्दी रूपान्तरण है? | अंग्रेजी शब्द "Equity" का। |
| "Equity" शब्द किस भाषा के शब्द से लिया गया है? | लैटिन शब्द "Ecquitas" से। |
| "Ecquitas" का क्या अर्थ है? | समान अथवा समतल बनाना। |
| "Ecquitas" के अर्थ का तात्पर्य क्या है? | दो हितों को समान रखना। |
| समता का मूल अर्थ क्या है? | न्याय, उचित व्यवहार तथा ईमानदारी। |
| समता में कौन-कौन से सिद्धान्त समाहित हैं? | ऋजुता, शुद्ध अन्तःकरण तथा नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्त। |
| साम्य की परिभाषा | |
| साम्य का विषय क्या है? | प्राकृतिक न्याय, समता, ईमानदारी एवं ऐसा व्यवहार करना जैसा हम दूसरों से अपने प्रति अपेक्षा करते हैं। |
| साम्य में व्यवहार का सिद्धान्त क्या है? | जैसा हम दूसरों से अपने प्रति व्यवहार की आशा करते हैं वैसा ही व्यवहार करना। |
| साम्य किस धारणा में निहित होता है? | औचित्य एवं प्राकृतिक न्याय की धारणा में। |
| ब्लैकस्टोन के अनुसार- | "साम्य समस्त विधियों की आत्मा तथा प्राण है। उसके दवारा वास्तविक विधि को अर्थ प्राप्त होता है और प्राकृतिक विधि का निर्माण होता है। इस सम्बन्ध में साम्य न्याय का पर्याय है, क्योंकि वह नियमों का ययार्थ एवं सही निर्वचन है।" |
| सर हेनरी मेन के अनुसार- | "साम्य कतिपय नियमों का एक समूह है, जो मूल व्यवहार विधि का सहवर्ती है, जो स्पष्ट सिद्धान्तों पर आधारित है और जो उन सिद्धान्तों में अन्तर्निहित एक श्रेष्ठतम पवित्रता के कारण संयोगवश व्यवहार विधि को निष्प्रभावी बनाने की क्षमता रखता है।" |
| मेटलैण्ड के अनुसार- | "साम्य नियमों का वह समूह है, जिसका प्रशासन, यदि न्यायतंत्र अधिनियम पारित नहीं होते, आंग्ल न्यायालयों द्वारा किया जाता एवं जिन्हें साम्य के न्यायालय के नाम से जाना जाता।"
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| अरस्तू के अनुसार- | "जहाँ विधि अपनी व्यापकता के कारण त्रुटिपूर्ण हो जाती है वहाँ विधि का सुधार ही साम्या है।" |
| ऐलन के अनुसार- | विधि प्राणलियों में प्रचलित के न्यायाधीश की स्वविवेक शक्ति भी होती है, जिससे वे प्रचलित विधियों की कठोरता एवं कमियों को दूर कर सकते है, इसी को 'साम्यय' कहते है।" |
| हैनरी लेबी ब्लूमेन के अनुसार- | "साम्या नियमों का एक ऐसा समूह है, जिसकर प्रारम्भिक बिन्दु न तो रुढियों है, न ही लिखित या अधिनियमित विधि बल्कि यह अन्तःकरण के आज्ञापक आदेश है जिनका विकास चान्सलरी न्यायालयों में हुआ।" |
| साम्य का उद्देश्य क्या है? | विधि को समाज की बदलती परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना। |
| साम्य विधि को कैसे लागू करता है? | सहज तथा सर्वसुलभ रूप में लागू कराता है। |
| साम्य का अंतिम लक्ष्य क्या है? | सभी को प्रभावी तथा सम्पूर्ण उपचार प्राप्त कराना। |
| साम्य की प्रकृति | |
| साम्य की प्रकृति किस पर आधारित है? | अन्तःकरण एवं प्राकृतिक न्याय पर आधारित है। |
| साम्य का सामान्य विधि से क्या संबंध है? | यह सामान्य विधि की पूर्ति करने वाला निकाय है। |
| साम्य का उद्भव किस लिए हुआ? | सामान्य विधि की कठोरता एवं कमियों को दूर करने के लिए। |
| क्या साम्य विधि का विरोध करता है? | नहीं, साम्य विधि का अनुसरण करता है। |
| साम्य की क्रिया किससे संबंधित है? | व्यक्ति से संबंधित है। |
| कपिल मोहन बनाम कमिश्नर ऑफ इन्कम टैक्स दिल्ली (1999) में क्या अभिनिर्धारित किया गया? | साम्य के सिद्धान्त कराधान सम्बन्धी विषयों पर लागू नहीं होते हैं। |
| साम्य का उद्भव तथा विधि के रूप में विकास | |
| साम्य कब हस्तक्षेप करता है? | साम्य सामान्य विधि के असफल होने पर हस्तक्षेप कर उचित अनुतोष प्रदान करता है। |
| साम्य का उद्देश्य हस्तक्षेप में क्या है? | पक्षकारों को उचित तथा पर्याप्त अनुतोष प्रदान करना। |
| क्या साम्य का उद्भव आकस्मिक है? | नहीं, यह आकस्मिक या संयोग का परिणाम नहीं है। |
| साम्य का उद्भव किस प्रकार हुआ है? | एक सुनियोजित रूप में हुआ है। |
| (A) रोमन विधि के अन्तर्गत- | |
| रोमन विधि के अन्तर्गत साम्य का विषय क्या है? | रोमन विधि में साम्य का उद्भव एवं विकास प्रेयटर के माध्यम से हुआ। |
| प्राचीन रोम में न्याय की सर्वोच्च संस्था कौन थी? | राजा। |
| रोमन विधि में राजा को सलाह एवं सहायता देने वाली परिषद को क्या कहा जाता था? | कोलोजियम। |
| रोमन विधि में राजा ने विधिक शक्ति किसे सौंप दी? | एक अधिकारी जिसे 'प्रेयटर' कहते थे, को, समयाभाव के कारण। |
| रोमन विधि के अन्तर्गत प्रेयटर को कौन-कौन से कार्य सौंपे गए? | विधि निर्माण एवं न्यायिक कार्य। |
| साम्य का सर्वप्रथम प्रादुर्भाव कहाँ हुआ? | रोम में। |
| साम्य की खोज का श्रेय किसे दिया जाता है? | प्रेयटर को। |
| प्रेयटर को किस प्रकार की शक्ति प्राप्त थी? | न्याय के सन्दर्भ में सर्वोच्च शक्ति। |
| प्रेयटर विधि का पालन कैसे करते थे? | लोग विधियों का अन्धानुकरण व करके बल्कि विधि की कठोरता, स्वेच्छाचारिता एवं औपचारिकता में परिवर्तन करके न्याय प्रदान करते थे। |
प्राचीन रोम में दो प्रकार की विधियाँ प्रचलित थी-
| प्राचीन रोम में सिविल विधि एवं स्थानीय विधि प्रचलित थीं। |
| सिविल विधि (Jus Civilie) किस पर लागू होती थी? | केवल रोम के नागरिकों पर लागू होती थी। |
| स्थानीय विधि (Jus Gentium) किस पर लागू होती थी? | बाहरी व्यक्तियों पर जो मूलतः रोमवासी नहीं थे। |
| रोम में विधि एवं साम्य का प्रशासन किसके द्वारा किया जाता था? | एक ही न्यायाधिकरण द्वारा। |
| रोम में विधि एवं साम्य के अधिकार क्षेत्रों का प्रयोग कौन करता था? | प्रेयटर। |
| प्रेयटर द्वारा दोनों अधिकार क्षेत्रों के प्रयोग का क्या परिणाम हुआ? | साम्य एवं सामान्य विधि का सामंजस्य बना रहा। |
| रोम में साम्य के सिद्धान्तों की शुरुआत किस बिन्दु से मानी जाती है? | जब प्रेयटर ने विधि एवं साम्य दोनों का संयुक्त प्रयोग किया। |
| रोम में साम्य के सिद्धान्त आगे चलकर किस रूप में विकसित हुए? | अपने आधुनिक स्वरूप में विकसित हुए। |
| (B) इंग्लैण्ड विधि के अन्तर्गत | |
| इंग्लैण्ड में साम्य के प्रसार का विषय क्या है? | इंग्लैण्ड में साम्य का प्रसार रोम के माध्यम से हुआ। |
| अंग्रेजी विधि में साम्य के विकास को किन चरणों में बाँटा गया है? | प्राचीन, परिवर्तनशील तथा आधुनिक चरणों में। |
| 13वीं शताब्दी तक इंग्लैण्ड में कितने प्रमुख न्यायालय स्थापित हो चुके थे? | तीन प्रमुख न्यायालय- राज न्यायालय सार्वजनिक प्रतिकचन न्यायालय सार्वजनिक प्रतिकचन न्यायालय |
| राज न्यायालय (Court of King Bench) का कार्य क्या था? | राजा से सम्बन्धित मामलों का निस्तारण करना। |
| सार्वजनिक प्रतिकचन न्यायालय (Court of Common Pleas) का आधार क्या था? | सामान्य विधि के आधार पर मामलों का निस्तारण करना। |
| सार्वजनिक प्रतिकचन न्यायालय (Court of Common Pleas) किन अधिकारों को मान्यता देता था? | उन्हीं विधिक अधिकारों को जिनके उपचार विधि में उपलब्ध थे। |
| राज्य कोष न्यायालय (Exchequer Court) का कार्य क्या था? | वित्तीय मामलों का निस्तारण करना। |
| राज्य कोष न्यायालय (Exchequer Court) का प्रधान कौन होता था? | चान्सलर। |
| चान्सलर की स्थिति क्या थी? | वह राजा का प्रधानमंत्री भी होता था। |
| लेख (रिट) जारी करने की शक्ति किसे प्राप्त थी? | राजा को। |
| राजा ने रिट जारी करने की शक्ति किसे प्रत्यायोजित की? | चान्सलर को। |
| रिट किन मामलों में जारी किए जाते थे? | जिनमें सामान्य विधि में कोई उपचार उपलब्ध नहीं था। |
| राज न्यायालय, सार्वजनिक प्रतिकचन न्यायालय, सार्वजनिक प्रतिकचन न्यायालय निर्णय देते समय किन विधियों का प्रयोग करते थे? | अधिनियमित तथा परम्परागत विधियों का। |
| इन विधियों (अधिनियमित तथा परम्परागत विधियों का) को किस नाम से जाना जाता था? | सामान्य विधि। |
| सामान्य विधि की कमी क्या थी? | सभी विषयों में उपचार उपलब्ध नहीं था या अपर्याप्त था। |
| अपर्याप्त न्याय के विरुद्ध आवेदन किसके समक्ष किए जाते थे? | सम्राट के समक्ष। |
| सम्राट आवेदनों को किसे सौंपता था? | चान्सलर को। |
| 1349 ई. में किसने चान्सलर को शक्ति सौंपने की पुष्टि की? | एडवर्ड तृतीय ने। |
| इंग्लैण्ड में चान्सरी न्यायालय के विकास का विषय क्या है? | चान्सलर को अधिकार क्षेत्र देकर साम्य न्यायालय के रूप में चान्सरी न्यायालय की स्थापना। |
| प्रारम्भ में चान्सलर न्यायिक कार्य किसके नाम से करता था? | सम्राट के नाम से। |
| 1474 ई. में चान्सलर को अधिकार क्षेत्र कैसे प्राप्त हुआ? | राजाज्ञा द्वारा। |
| चान्सरी न्यायालय की स्थापना का परिणाम क्या हुआ? | यह साम्य न्यायालय के रूप में स्थापित हुआ। |
| चान्सरी न्यायालय निर्णय किस आधार पर करता था? | न्यायिक अन्तःकरण एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों के आधार पर। |
| न्यायिक अन्तःकरण एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों को क्या कहा गया? | साम्या। |
| 1873 तक कितने प्रकार के न्यायालय कार्य कर रहे थे? | दो प्रकार के न्यायालय। |
| 1873 में दो न्यायालय कौन-कौन से थे? | सामान्य न्यायालय एवं चान्सरी न्यायालय। |
| सामान्य न्यायालय किसका पालन करते थे? | विधि के सिद्धान्तों का। |
| चान्सरी न्यायालय किसका पालन करते थे? | प्राकृतिक न्याय के नियमों का। |
| दोहरी न्याय प्रणाली से क्या समस्या उत्पन्न हुई? | असुविधा उत्पन्न हुई। |
| इस असुविधा को दूर करने के लिए कौन सा अधिनियम पारित किया गया? | न्यायातन्त्र अधिनियम, 1873 (Judicature Act)। |
| Judicature Act, 1873 का क्या प्रभाव हुआ? | दोनों न्यायालयों का एकीकरण कर दिया गया। |
| न्यायालयों का एकीकरण के बाद न्यायालय का क्या दायित्व हुआ? | विधिक एवं साम्यिक उपचार प्रदान करना। |
| भारतीय विधि में साम्य के प्रयोग का विषय क्या है? | भारत में साम्य का उद्भव हिन्दू काल से प्रारम्भ होकर युक्ति के रूप में प्रयोग किया गया। |
| भारत में साम्य का इतिहास कब से प्रारम्भ होता है? | हिन्दू काल से। |
| हिन्दू काल में शास्त्रकार साम्य का प्रयोग किस उद्देश्य से करते थे? | पुरातन विधियों को समय एवं परिस्थितियों के अनुकूल बनाने हेतु। |
| शास्त्रों में विरोध होने पर शास्त्रकार क्या करते थे? | साम्यिक व्यवस्था का प्रयोग कर निर्णय करते थे। |
| हिन्दू काल में साम्य को जाना जाता था- | युक्ति के रूप में। |
| भारतीय विधि में साम्य के उदाहरण किन ग्रंथों में मिलते हैं? | वेदों, उपनिषदों, रामायण एवं महाभारत में। |
| भारतीय विधि में साम्य के उदाहरण | धर्म शास्त्रों में विरोध होने पर युक्तियुक्त बात ही ठीक है- (नाख्य) केवल धर्मशास्त्रों के आधार पर ही किये गये निर्णय उचित नहीं है, जब तक कि उनमें प्रज्ञा का प्रयोग नहीं किया जाता- (वृहस्पति) जहाँ युक्ति तथा शास्त्रों में विरोध हैं, वहाँ पर युक्ति को अधिमान्य प्राप्त होगा।- (याज्ञवल्ये) |
| मुस्लिम विधि में साम्य | |
| मुस्लिम विधि में साम्य के प्रयोग का विषय क्या है? | मुस्लिम विधि में हनफी सम्प्रदाय द्वारा उदार व्याख्या के माध्यम से विधिक साम्य का प्रयोग। |
| हनफी सम्प्रदाय के किस विद्वान ने साम्य सम्बन्धी सिद्धान्त दिया? | अबु हनीफा। |
| अबु हनीफा का सिद्धान्त क्या था? | समय एवं परिस्थितियों के आधार पर विधि के नियमों को उदार व्याख्या द्वारा अपास्त किया जा सकता है। |
| उदारवादी सिद्धान्तों को क्या कहा जाता है? | विधिक साम्य या इस्तिहसन। |
| विधिक साम्य (इस्तिहसन) को किसने मान्यता दी? | पैगम्बर मोहम्मद ने। |
| भारत में आंग्ल साम्यिक सिद्धान्त | |
| भारत में आंग्ल साम्यिक सिद्धान्तों को सबसे पहले किसने लागू किया? | ईस्ट इंडिया कम्पनी ने। |
| क्या भारत में साम्य विधि स्वतंत्र अंग के रूप में विकसित हुआ? | नहीं, यह स्वतंत्र अंग के रूप में विकसित नहीं हुआ। |
| 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट में साम्य के सम्बन्ध में क्या प्रावधान था? | जिन वादों में विधिक प्रावधान न हो, उनका निर्णय साम्य, न्याय एवं शुद्ध अन्तःकरण के आधार पर किया जा सकता है। |
| रेग्युलेटिंग एक्ट, 1773 का उद्देश्य क्या था? | न्याय प्रशासन में साम्य, न्याय एवं शुद्ध अन्तःकरण के सिद्धान्तों को लागू करना। |
| साम्य को भारतीय विधि में कैसे समाविष्ट किया गया? | विभिन्न भारतीय अधिनियमों में समावेश कर। |
| साम्य के समावेशन का क्या परिणाम हुआ? | न्यायिक प्रक्रिया सरल एवं सुगम बनाई गई। |
भारत में प्रचलित अधिनियम, जिनमें साम्य को समाहित करके सांविधिक मान्यता दी गई, वे है-
| विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 (धारा-17, 18, 19, 20, 26, 30, 33) सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम-1882 (धारा-35, 40, 48, 51, 60, 62, 78, 82, 89, 114) भारतीय संविदा अधिनियम-1872 (धारा-19 (क), 42, 43, 64, 65, 74, 146, 147) भारतीय न्यास अधिनियम-1882 (धारा-62, 83-94 तक) भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम-1925 (धारा-330) सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (धारा-9, धारा-16 का परुन्तुक, 151) भारतीय परिसीमा अधिनियम 1963 (धारा-3) |
| स्वतन्त्रता के पश्चात् भारतीय संविधान में साम्य का विषय क्या है? | भारतीय संविधान में साम्य के आधारभूत सिद्धान्तों को समाहित कर विधिक व्यवस्था में स्थापित किया गया। |
| भारतीय संविधान में किन-किन साम्यिक सिद्धान्तों को समाहित किया गया है? | न्याय, समता, युक्तियुक्तता एवं नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्त। |
| स्वतन्त्रता के बाद साम्य को भारतीय विधिक व्यवस्था में कैसे स्थापित किया गया? | संविधान में उसके आधारभूत सिद्धान्तों को समाहित करके। |
| माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा साम्या के सिद्धान्त | |
| माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने साम्य के सिद्धान्त के संबंध में क्या मान्यता दी है? | इसे भारतीय विधिक व्यवस्था का एक अंग माना है। |
| हिन्दू विधि के स्थापित नियमों के आभाव में समस्याओं के निराकरण के लिये साम्या के सिद्धान्तों का प्रयोग किया जा सकता है, किस वाद में कहा गया? | गुरुनाथ बनाम् कमला बाई (1957, SC) |
| यदि किसी मामले में विधि द्वारा रिक्ति है, तो वहाँ पर साम्या के नियमों का प्रयोग किया जा सकता है, परन्तु यह नियम संविधान के विपरीत नहीं होना चाहिए, किस वाद में कहा गया? | एस.एस. बोला बनाम् बी.डी. सदाला (1965, SC)
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| हमने देश में उन सभी नियमों का संहिताकरण कर लिया है, जिनका प्रयोग इंग्लैण्ड में चान्सलरी न्यायालय किया करते थे, किस वाद में कहा गया? | आफिशियल ट्रस्टी वेस्ट बंगाल बनाम सचीन्द्र (1971, SC)
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| भारत के सभी न्यायालय साम्या के न्यायालय है और निर्णय देते समय उनसे साम्या के सिद्धान्तों का प्रयोग अपेक्षित है, किस वाद में कहा गया? | इन्द्रा बाई बनाम् बन्द किशोर (1990, SC)
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| भारत के सभी न्यायालय साम्या के न्यायालय है और निर्णय देते समय उनसे साम्या के सिद्धान्तों का प्रयोग अपेक्षित है, इस बात की पुष्टि किस मामले में की गई? | पुष्टि मेनका गाँधी, मिनर्वा मिल बनाम् भारत संघ |
| साम्य का अधिकार क्षेत्र | |
साम्य के अधिकार क्षेत्र का विषय क्या है?
| साम्य का अधिकार क्षेत्र सामान्य विधि की कमियों को दूर कर उचित अनुतोष प्रदान करना है। |
| साम्य का सामान्य विधि से क्या संबंध है? | सामान्य विधि की कमियों को दूर करने हेतु साम्य का प्रादुर्भाव हुआ। |
| साम्य कब हस्तक्षेप नहीं करता है? | जब सामान्य विधि उपचार प्रदान करने में सक्षम होती है। |
| साम्य कब हस्तक्षेप करता है? | जब सामान्य विधि उपचार देने में असक्षम, अपर्याप्त या कठोर हो। |
| साम्य के अधिकार क्षेत्रों को क्या कहा जाता है? | साम्य का त्रिमुखी क्षेत्राधिकार। |
| साम्य के त्रिमुखी क्षेत्राधिकार कौन-कौन से हैं? | अनन्य अधिकार क्षेत्र, समवर्ती अधिकार क्षेत्र, सहायक अधिकार क्षेत्र। |
| अनन्य अधिकार क्षेत्र क्या है? | जहाँ सामान्य विधि कोई उपचार नहीं देती परन्तु अन्तःकरण के अनुसार उपचार आवश्यक हो। |
| अनन्य अधिकार क्षेत्र का उदाहरण क्या है? | न्यास। |
| समवर्ती अधिकार क्षेत्र क्या है? | जहाँ सामान्य एवं साम्य दोनों को समान रूप से उपचार देने का अधिकार हो। |
| समवर्ती अधिकार क्षेत्र के उदाहरण क्या हैं? | प्रतिनिधि वाद एवं अन्तराभिवाची वाद। |
| समवर्ती अधिकार क्षेत्र के कितने प्रकार हैं? | दो प्रकार। |
| समवर्ती अधिकार क्षेत्र का पहला प्रकार क्या है? | सामान्य विधि उपचार देती है परन्तु वह अपर्याप्त होता है। |
| समवर्ती अधिकार क्षेत्र का दूसरा प्रकार क्या है? | वादी के चुनाव के आधार पर उपचार। |
| सहायक अधिकार क्षेत्र क्या है? | जब साम्य सामान्य विधि न्यायालय की सहायता कर उचित अनुतोष दिलाता है। |
| सहायक अधिकार क्षेत्र का उदाहरण क्या है? | व्यादेश। |
| न्यायतंत्र अधिनियम, 1873 का साम्य पर क्या प्रभाव पड़ा? | विधि एवं साम्य की क्रियात्मक प्रणालियों का एकीकरण हो गया। |
| न्यायतंत्र अधिनियम, 1873 के बाद सहायक अधिकार क्षेत्र का क्या हुआ? | इसका अन्त हो गया। |
| वर्तमान में न्यायालयों का क्या दायित्व है? | विधि एवं साम्य दोनों के नियमों का पालन करना। |
| साम्य की विषय-वस्तु | |
| साम्य का अन्तःकरण से सम्बन्ध होने के कारण इसके अधिकार क्षेत्र अत्यन्त ही व्यापक है, जिनका उल्लेख न्यायतंत्र अधिनियम-1873 की धारा-34 में किया गया है, जिनमें निम्नां विषयों को सम्मिलित किया गया है परन्तु ये पूर्ण नहीं है- | साझेदारी का विघटन एवं उसका लेखा। बन्धकों का मोचन अथवा मोचन रोध। मृत व्यक्तियों की सम्पदा का प्रशासन। खैराती या निजी न्यासों का निष्पादन। अचल सम्पतियों का विभाजन एवं विक्रय। संविदाओं का विनिर्दिष्ट पालन। धारणाधिकार और उससे प्राप्त आय का वितरण। शिशुओं एवं उनकी सम्पदाओं का देख-रेख एवं संरक्षण। भूमि के अंशी तया आरों की वसूली। विलेखों तथा अन्य लिखतों का अनुसमर्थन, समाप्ति तथा विलोपन। |
| साम्य एवं सामान्य विधि | |
| साम्य एवं सामान्य विधि का विषय क्या है? | साम्य एवं सामान्य विधि के अर्थ एवं उनके संबंधों का अध्ययन। |
| साम्य के महत्व को जानने से पूर्व क्या जानना आवश्यक है? | सामान्य विधि एवं साम्य के अर्थ जानना । |
| साम्य का उद्भव किसलिए हुआ? | सामान्य विधि की कठोरता एवं अपर्याप्त उपचार की कमियों को दूर करने के लिए। |
| सामान्य विधि क्या है? | ऐसी विधि जो समस्त देश या राज्य के निवासियों पर समान रूप से लागू होती है। |
| सामान्य विधि का आधार क्या है? | रुढ़ियों, प्रथाओं, रीति-रिवाजों एवं व्यवहारों के नियम। |
| सामान्य विधि का प्रयोग कौन करता था? | न्यायालय, वादों के निराकरण हेतु। |
| सामान्य विधि का स्वरूप कैसा था? | यह एक अलिखित विधि थी। |
| साम्य विधि का कार्यान्वयन किसके द्वारा किया जाता था? | चान्सरी न्यायालय द्वारा। |
| साम्य विधि का उद्भव क्यों हुआ? | सामान्य विधि की कठोरता एवं कमियों को दूर करने के लिए। |
| सामान्य विधि की पहली कमी क्या थी? | उपचारों का अभाव। |
| उपचारों के अभाव का क्या अर्थ है? | कई मामलों में सामान्य विधि कोई उपचार प्रदान नहीं करती थी। |
| उपचारों के अभाव का उदाहरण क्या है? | न्यास के मामलों में उपचार का अभाव। |
| सामान्य विधि की दूसरी कमी क्या थी? | अपर्याप्त अनुतोष। |
| अपर्याप्त अनुतोष का क्या अर्थ है? | उपचार उपलब्ध होने पर भी वह पर्याप्त नहीं होता था। |
| अपर्याप्त अनुतोष का उदाहरण क्या है? | संविदा भंग में सामान्य क्षतिपूर्ति हमेशा पर्याप्त नहीं होती। |
| सामान्य विधि की तीसरी कमी क्या थी? | दोषपूर्ण प्रक्रिया। |
| दोषपूर्ण प्रक्रिया का प्रभाव क्या था? | पक्षकारों को सरल, सुगम एवं सर्वसुलभ न्याय प्राप्त नहीं होता था। |
| साम्य का सामान्य विधि के साथ क्या संबंध है? | साम्य न तो सामान्य विधि के विरोध में है और न ही उसे नष्ट या सृजित करता है। |
| साम्य का जन्म किस उद्देश्य से हुआ था? | सामान्य विधि की सहायता कर उसे पूर्ण बनाने के लिए। |
| साम्य ने विधि में क्या भूमिका निभाई? | इसने विधि की खामियों की पूर्ति की। |
| साम्य का समाज के संदर्भ में क्या योगदान है? | इसने विधि को ऐसा बनाया कि वह समाज की बढ़ती आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। |
| मेटलैण्ड के अनुसार सामान्य विधि से रहित साम्य क्या है? | एक हवाई महल। |
| साम्य विधि का सामान्य विधि के प्रति क्या स्वरूप है? | यह उसकी सहायक एवं पूरक है, विरोधी नहीं। |
| न्यायतन्त्र अधिनियम-1873 एवं 1875 | |
| न्यायतन्त्र अधिनियम, 1873 एवं 1875 का विषय क्या है? | साम्यिक न्याय प्रशासन से सम्बन्धित अधिनियम। |
| न्यायतन्त्र अधिनियमों का साम्यिक न्याय प्रशासन में क्या महत्व है? | इन्होंने सामान्य विधि एवं साम्य विधि के विरोधाभास को समाप्त कर उनकी प्रतिस्पर्धा समाप्त की। |
| न्यायतन्त्र अधिनियम, 1873 के पूर्व आंग्ल न्याय व्यवस्था में कितने प्रकार के न्यायालय थे? | दो प्रकार के न्यायालय थे- सामान्य विधि के न्यायालय चान्सरी न्यायालय |
| सामान्य विधि के न्यायालय कितने भागों में विभक्त थे? | तीन भागों में विभक्त थे- राज न्यायालय (Court of Queen's Bench) सार्वजनिक प्रतिकवन के न्यायालय (Court of Common Pleas) राज्य कोष न्यायालय (Court of Exchequer) |
| सामान्य विधि के न्यायालय किसके अनुसार कार्य करते थे? | सामान्य विधि के सिद्धान्तों के अनुसार। |
| चान्सरी न्यायालय किसके अनुसार कार्य करते थे? | साम्य के सिद्धान्तों के अनुसार। |
| सामान्य विधि एवं चान्सरी न्यायालयों में क्या अंतर था? | उनकी कार्य पद्धति एवं क्षेत्राधिकार भिन्न थे। |
| सामान्य विधि के न्यायालय क्या प्रदान करते थे? | विधिक अधिकारों को मान्यता देकर उपचार प्रदान करते थे। |
| साम्य के न्यायालय कब हस्तक्षेप करते थे? | जब विवाद में साम्यिक अधिकार या हित निहित होता था। |
| न्यायतन्त्र अधिनियमों के पूर्व न्याय प्रशासन की स्थिति क्या थी? | परस्पर विरोधी कार्य पद्धतियों के अन्तर्गत न्याय प्रशासन चलता था। |
| न्यायतन्त्र अधिनियमों के पारित होने के बाद क्या परिवर्तन हुआ? | सामान्य विधि एवं साम्य न्यायालयों का एकीकरण किया गया। |
| न्यायतन्त्र अधिनियमों द्वारा किस न्यायालय की स्थापना की गई? | एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई। |
| सर्वोच्च न्यायालय का न्याय प्रशासन किस पर आधारित था? | सामान्य विधि एवं साम्य दोनों के सिद्धान्तों पर। |
| प्रशासनिक सुविधा हेतु सर्वोच्च न्यायालय के कार्यों का क्या किया गया? | उन्हें विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया। |
| न्यायतन्त्र अधिनियमों के अन्तर्गत स्थापित सर्वोच्च न्यायालय की संरचना क्या थी? | इसमें उच्च न्यायालय एवं अपील न्यायालय सम्मिलित थे। |
| उच्च न्यायालय के अन्तर्गत कौन-कौन से विभाग थे? | चान्सलरी न्यायालय एवं सामान्य विधि विभाग। |
| चान्सलरी न्यायालय किस प्रकार का न्यायालय था? | साम्या न्यायालय। |
| सामान्य विधि विभाग किस प्रकार का न्यायालय था? | सामान्य विधि न्यायालय। |
| न्यायतन्त्र अधिनियम द्वारा क्या अधिकार प्रदान किया गया? | सामान्य विधि एवं साम्य के बीच के अन्तर को समाप्त नहीं किया, बल्कि एक ही उच्च न्यायालय को उन दोनों से सम्बन्धित अनुतोष प्रदान करने का आधिकार दे दिया। |
| एशवर्नर के अनुसार अधिकार-क्षेत्र की धाराओं की क्या स्थिति है? | "अधिकार-क्षेत्र की दो धारायें एक ही मार्ग पर चलती है, साथ-साथ बहती हैं, परन्तु उनका जल आपस में मिश्रित नहीं होता है। सामान्य विधि तथा साम्य सम्बन्धी अध्यर्थनाओं का अन्तर इन अधिनियमों के पारित हो, जाने पर भी समाप्त नहीं हुआ। |
| अधिनियम का उद्देश्य- | |
| अधिनियम के पारित किये जाने का मुख्य उद्देश्य क्या थे? | किसी भी वाद के पक्षकार को एक ही वाद के माध्यम से, बिना दूसरे न्यायालय में गये, वे सभी उपचार दिये जा सके, जिनका वह हकदार है। है। साथ ही साथ वादों की बाहुल्यता भी रोकी जा सके, जिससे पक्षकारों एवं न्यायालयों के समय एवं धन की बचत हो सके। |
| न्यायतंत्र अधिनियम पारित करने के क्या कारण थे? | सभी हानियों एवं विवादों के लिये उपचार उपलब्ध नहीं थे। यदि उपचार उपलब्ध थे, तो वे पर्याप्त नहीं थे। उपचारों को प्राप्त करने की प्रक्रिया कठिन थी। एक ही विवाद से सम्बन्धित अनुतोषों को प्राप्त करने के लिए विभिन्न ल्यायालयों में जाना पड़ता था, जिससे समय और धन का दुरुपयोग होता था। |
| न्यायतन्त्र अधिनियम द्वारा परिवर्तन एवं उसका प्रभाव - | |
| न्यायतन्त्र अधिनियम द्वारा प्रथम प्रमुख परिवर्तन क्या था? | सामान्य विधि एवं साम्य न्यायालयों का एकीकरण कर एक न्यायालय को अधिकार क्षेत्र प्रदान किया गया। |
| न्यायतन्त्र अधिनियम द्वारा द्वितीय परिवर्तन क्या था? | एक ही व्यक्ति को दो उपचारों हेतु एक ही न्यायालय में आवेदन का अवसर मिला। |
| न्यायतन्त्र अधिनियम द्वारा तृतीय परिवर्तन क्या था? | दोनों न्याय पद्धतियों को मिलाकर एक सिविल प्रक्रिया संहिता का निर्माण किया गया। |
| न्यायतन्त्र अधिनियम द्वारा चतुर्थ परिवर्तन क्या था? | उच्च न्यायालय के प्रत्येक विभाग को अन्तर्वर्ती आदेश, व्यादेश, लेख जारी करने एवं प्रापक नियुक्ति का अधिकार दिया गया। |
| न्यायतन्त्र अधिनियम द्वारा पंचम परिवर्तन क्या था? | हितग्राही को न्यासधारी के विरुद्ध अवधि बीत जाने के आधार पर वाद से वंचित करने की बाधा समाप्त की गई। |
| न्यायतन्त्र अधिनियम द्वारा छठवां परिवर्तन क्या था? | अधिनियम की धारा-25(2)(घ) के अनुसार- यदि सामान्य विधि एवं साम्य विधि के नियमों में कोई विरोध हो तो साम्य के नियमों का पालन किया जायेगा। |
| न्यायतन्त्र अधिनियम द्वारा सातवां परिवर्तन क्या था? | इस अधिनियम के पारित होने के कारण साम्य के सहायक अधिकार दक्षेत्र का अंत हो गया। |
| न्यायतन्त्र अधिनियम का समग्र प्रभाव क्या था? | एक ही न्यायालय को सामान्य विधि एवं साम्य के अधिकारों एवं उपचारों के प्रवर्तन का अधिकार मिला। |
| विरोध की स्थिति में किसे प्राथमिकता दी गई? | साम्य को प्राथमिकता दी गई। |
| न्यायतन्त्र अधिनियम द्वारा क्या एकीकृत किया गया? | न्यायालयों एवं प्रशासन का एकीकरण किया गया। |
| न्यायतन्त्र अधिनियम द्वारा क्या एकीकृत नहीं किया गया? | सामान्य विधि एवं साम्य के सिद्धान्तों का एकीकरण नहीं किया गया। |
| साम्य विधि के आधारसूत्र | |
| साम्य विधि के आधारसूत्र का विषय क्या है? | साम्य के वे सिद्धान्त जिन पर उपचार आधारित होते हैं। |
| साम्य का उद्भव किस कारण हुआ? | सामान्य विधि की कठोरता एवं कमियों को दूर करने के लिए। |
| साम्य द्वारा प्रदान किये जाने वाले उपचार किस प्रकार के होते थे? | साम्य निरंकुश नहीं होते थे। साम्य निश्चित सिद्धान्तों की सीमा अधीन बंधा होता है| |
| साम्य के न्यायालय द्वारा दिया गया उपचार किस पर आधारित होता है? | साम्य के सिद्धान्तों पर। |
| विधि की भाषा में साम्य के सिद्धान्त क्या कहलाते हैं? | साम्य के आधारसूत्र। |
| साम्य के आधारसूत्र में क्या निहित होता है? | साम्य की समस्त विषय-वस्तु। |
साम्य किसी अपकृति को उपचार-विहिन नहीं रहने देता है (Equity will not suffer a wrong to be without a remed) | |
| साम्य के आधारसूत्रों में प्रथम सिद्धान्त क्या है? | साम्य किसी अपकृति को उपचार-विहीन नहीं रहने देता है। |
| इस आधारसूत्र का मूल सिद्धान्त क्या है? | समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के पास कुछ अधिकार होता है, जिनका वह उपयोग तथा उपभोग करता है |
| किस स्थिति में विधि हस्तक्षेप करती है? | जब कोई व्यक्ति दूसरे के अधिकार में हस्तक्षेप करता है। |
| विधि द्वारा हस्तक्षेप का उद्देश्य क्या है? | अधिकारों की रक्षा करना एवं दोषी को दण्डित करना। |
| साम्य का यह सिद्धान्त किस पर आधारित है? | अधिकार एवं उपचार के सहअस्तित्व पर। |
| "जहाँ अधिकार है, वहाँ उपचार है" सिद्धान्त किससे सम्बन्धित है? | साम्य के साम्य किसी अपकृति को उपचार-विहिन नहीं रहने देता है के आधारसूत्र से। |
| ऐशबी बनाम व्हाईट वाद में क्या निर्धारित किया गया? | अधिकार के उल्लंघन पर उपचार प्रदान करना आवश्यक है। |
| अधिकार एवं उपचार का संबंध कैसा है? | दोनों अन्योन्याश्रित हैं। |
| साम्य किन स्थितियों में हस्तक्षेप करता था? | जब सामान्य विधि उपचार नहीं देती थी या अपर्याप्त/दोषपूर्ण होती थी। |
| साम्य निर्णय किस आधार पर देता था? | साम्या एवं सद्विवेक के आधार पर। |
| न्यायाधीशों की धारणा क्या थी? | किसी दोषपूर्ण कार्य को बिना उपचार के नहीं छोड़ना चाहिए। |
| साम्य न्यायालयों ने किन मामलों में दण्ड की व्यवस्था की? | जिनमें सामान्य विधि उपचार प्रदान नहीं करती थी। |
| साम्य द्वारा प्रदान किये गये कुछ उदाहरणात्मक उपचार क्या हैं? | बंधक मोचन, व्यादेश, संविदा पालन, न्यास। |
| साम्य का मूल उद्देश्य इस आधारसूत्र के माध्यम से क्या है? | प्रत्येक अपकृति के लिए प्रभावी उपचार सुनिश्चित करना। |
साम्य विधि का अनुसरण करता है (Equity follows the law) | |
| साम्य के आधारसूत्रों में द्वितीय सिद्धान्त क्या है? | साम्य विधि का अनुसरण करता है। |
| साम्य के आधारसूत्रों में "साम्य विधि का अनुसरण करता है" का विषय क्या है? | साम्य द्वारा सामान्य विधि के अनुसरण का सिद्धान्त। |
| इस आधार सूत्र का उद्भव- | मेटलैण्ड के कथन "साम्य, सामान्य विधि के अनुपूरक के रूप में कार्य करता है, प्रतिद्न्दी के रूप में नहीं" से हुआ प्रतीत होता है। |
| यह आधारसूत्र किस कथन पर आधारित है? | मेटलैण्ड के कथन पर कि साम्य सामान्य विधि का अनुपूरक है, प्रतिद्न्दी नहीं। |
| मेटलैण्ड के अनुसार साम्य का स्वरूप क्या है? | सामान्य विधि का अनुपूरक, न कि प्रतिद्न्दी| |
| साम्य का प्रादुर्भाव किस उद्देश्य से हुआ? | सामान्य विधि की पूर्ति के लिए, न कि उसे नष्ट करने के लिए। |
| साम्य किन मामलों में हस्तक्षेप करता है? | जहाँ सामान्य विधि उपचार देने में असफल रहती है। |
| क्या साम्य सामान्य विधि के प्रतिकूल कार्य करता है? | नहीं, यह कभी भी प्रतिकूल कार्य नहीं करता। |
| साम्य सामान्यतः कितने प्रकार से विधि का अनुसरण करता है? | दो प्रकार से। |
| साम्य का प्रथम प्रकार से अनुसरण क्या है? | जहाँ विधि के नियम स्पष्ट हैं, उनका पालन करना। |
| साम्य का द्वितीय प्रकार से अनुसरण क्या है? | साम्यिक अधिकारों में सामान्य विधि के सिद्धान्तों का अनुसरण करना, यदि उपलब्ध हों। |
| साम्य विधि का अनुसरण किन विषयों पर लागू होता है? | विधिक एवं साम्यिक सम्पदाओं तथा अधिकारों पर। |
| न्यास सम्पदा के प्रशासन में कौन से नियम लागू होते हैं? | विधि सम्पदा के प्रशासन के नियम। |
| न्यास सम्पदा के प्रशासन में विधि नियमों का पालन क्यों किया जाता है? | सम्पत्ति सम्बन्धी नियमों में एकरूपता बनाए रखने के लिए। |
| भारतीय विधि में विधिक एवं साम्यिक अधिकारों की स्थिति क्या है? | इनमें कोई विभेद नहीं किया गया है। |
| यदि सामान्य विधि स्पष्ट एवं निश्चित है तो साम्य न्यायालय क्या करते हैं? | उसका अनुसरण करते हैं। |
| क्या साम्य कठोर या अनुचित विधि नियमों का भी पालन करता है? | हाँ, यदि वे स्पष्ट एवं निश्चित हों। |
| क्या साम्य सामान्य विधि न्यायालयों को अभिभूत करने का दावा करता है? | नहीं, ऐसा दावा नहीं करता। |
| भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1890 के अंतर्गत अनिवार्य पंजीकरण का क्या प्रभाव है? | बिना पंजीकरण के दस्तावेज साम्य न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं होंगे। |
| अनिवार्य पंजीकरण न होने पर दस्तावेज की स्थिति क्या है? | वह ग्राह्य नहीं होगा। |
| समयावधि व्यतीत होने के बाद वाद या आवेदन की स्थिति क्या होती है? | साम्य न्यायालय उसे ग्रहण नहीं करता। |
| समयसीमा का पालन साम्य में क्यों आवश्यक है? | क्योंकि साम्य भी विधि के नियमों का अनुसरण करता है। |
| साम्य का विधि के साथ संबंध का सार क्या है? | यह विधि का अनुसरण करता है एवं उसका पूरक है। |
साम्य चाहने वाले को साम्या का पालन करना चाहिए (He who seeks equity must do equity) | |
| साम्य के आधारसूत्रों में तृतीय सिद्धान्त क्या है? | साम्य चाहने वाले को साम्या का पालन करना चाहिए |
| साम्य के आधारसूत्रों में "साम्य चाहने वाले को साम्या का पालन करना चाहिए" क्या है? | सामान्यतः यदि कोई व्यक्ति, साम्य के न्यायालय से उपचार मांगे करे। साम्य का न्यायालय वादी से यह अपेक्षा करता है कि जिस उपचार की प्राप्ति के लिए वह आवेदन करता है तो उसी वाद के संदर्भमें कोई दायित्व हो तो वह उसके पालन करने के लिए तैयार एवं रजामन्द रहे। |
| आधार सूत्र "पारस्परिकता के सिद्धान्त" के अनुसार- | "जो कुछ अपना है, उसकी उचित रीति से माँग की जाये और जो कुछ दूसरे का है, उसे देने के लिए तत्पर रहा जाये।" |
| संविदा के विनिर्दिष्ट पालन के वाद में किस सिद्धान्त का प्रयोग होता है- | जब कोई पक्षकार संविदा के विशिष्ट पालन के लिए न्यायालय में वाद दायर करता है तो न्यायालय विशिष्ट पालन की डिक्री, तब तक पारित नहीं करता है, जब तक कि वह संविदा के अपने भाग का अनुपालन करने के लिए तैयार न हो।
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| शून्यकरणीय संविदा को शून्य घोषित करने की शर्त क्या है? | शून्यकरणीय संविदा को अधिकारपूर्वक विखण्डन करने वाला पक्षकार, संविदा के अन्तर्गत प्राप्त लाभ को वापस करेगा तभी न्यायालय संविदा को शून्य घोषित कर सकेगा। |
| सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 की धारा 35 किस सिद्धान्त से सम्बन्धित है? | निर्वाचन के सिद्धान्त से। |
| निर्वाचन के सिद्धान्त के अनुसार क्या नियम है? | कोई व्यक्ति जो किसी विलेख के माध्यम से लाभ प्राप्त करता है, तो उसे उसी विलेख में दिये गये आभार को भी स्वीकार करना होगा, वह या तो विलेख को पूर्ण रूप से स्वीकार करे या पूर्ण रूप से अस्वीकार करे। |
साम्य की शरण में आने वाले को स्वच्छ हाथों से आना चाहिए (He who seeks equity must come with clean hands) | |
| साम्य के आधारसूत्रों में चतुर्थ सिद्धान्त क्या है? | साम्य की शरण में आने वाले को स्वच्छ हाथों से आना चाहिए |
| साम्य के आधारसूत्रों में "साम्य की शरण में आने वाले को स्वच्छ हाथों से आना चाहिए" का विषय क्या है? | उपचार मांगने वाले के निष्कलंक आचरण का सिद्धान्त। |
| “साम्य की शरण में आने वाले को स्वच्छ हाथों से आना चाहिए” सिद्धान्त का अभिप्राय क्या है? | जो व्यक्ति न्यायालय से साम्य का आवेदन करता है, उसके लिए यह आवश्यक है कि वह स्वयं ऐसे कार्य के लिए दोषी न हो, जो उसे न्यायालय से उपचार प्राप्त करने के अयोग्य बना दे या उपचार देने में बाधा उत्पन्न कर दे। |
| साम्य न्यायालय उपचार देने से पूर्व क्या अपेक्षा करता है? | वादी का आचरण न्यायोचित, साम्यपूर्ण एवं न्यायसंगत हो। |
| यदि उसका आचरण प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के विरुद्ध तो वह चाहे कोई भी अधिकार रख रखता हो, उसके लिए साम्य न्यायालय में- | कोई भी उपचार नहीं होगा।
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| क्या दोषपूर्ण आचरण वाला व्यक्ति साम्य में उपचार प्राप्त कर सकता है? | नहीं, उसे कोई उपचार प्राप्त नहीं होगा। |
| "बटमारों का प्रकरण" क्या दर्शाता है? | दोषपूर्ण एवं अवैध आचरण वाले को साम्य में उपचार नहीं मिलता। |
| बटमारों के प्रकरण में न्यायालय ने क्या निर्णय दिया? | जिसमें दो लुटेरों ने राजमार्ग पर एक व्यक्ति को लूटा। लूट की सम्पत्ति के बंटवारे के सन्दर्भ में विवाद होने पर लूट की सम्पत्ति के लेखा के लिए एक बटमार ने वाद किया। सामान्यतः लेखे के वाद में न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह लेखे का आदेश पारित करे परन्तु इस प्रकरण में न्यायालय ने किसी प्रकार का उपचार न प्रदान करते हुए, उन्हें और दण्डित किया क्योंकि उनका कार्य स्वतः ही अवैध था। |
साम्य की शरण में आने वाले को स्वच्छ हाथों से आना चाहिए आधार सूत्र की प्रयोज्यता भारतीय विधि में निम्न अधिनियमों में की गई है-
| भारतीय ज्यास अधिनियम-1832 की धारा-23 में विशिष्ट अनुतोष अधिनियम 1963 में- i. धारा-20 ii. धारा-16 iii. धारा-17 iv. अध्याय-5 एवं 6 बेनामी संव्यवहारों के सन्दर्भ में। मोहरी बीबी बनाम् धर्मोदास घोष वाद में। |
| विशिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 में यह सिद्धान्त किन धाराओं में निहित है? | धारा 20, धारा 16, धारा 17 तथा अध्याय 5 एवं 6 में। |
| "मोहरी बीबी बनाम् धर्मोदास घोष" वाद किस सिद्धान्त से सम्बन्धित है? | स्वच्छ हाथों के सिद्धान्त से। |
| इस आधारसूत्र का सार क्या है? | जो साम्य चाहता है, उसे निष्कलंक आचरण के साथ न्यायालय आना चाहिए। |
विलम्ब साम्य को विफल कर देता है (Delay defeats equity) | |
| साम्य के आधारसूत्रों में पांचवा सिद्धान्त क्या है? | विलम्ब साम्य को विफल कर देता है | |
| साम्य के आधारसूत्रों में "विलम्ब साम्य को विफल कर देता है" का विषय क्या है? | उपचार प्राप्ति में विलम्ब के प्रभाव का सिद्धान्त। |
| साम्य सतर्क लोगों की सहायता करती है, आलसी लोगों की नहीं (Equity aids the vigilant, not those who slumber on their rights)- | अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें; बहुत देरी करने पर राहत नहीं मिलेगी। |
| विलम्ब साम्य को विफल कर देता है, आधारसूत्र का अन्य रूप क्या है? | विधि भी उसी की मदद करती है, जो अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होता है।" अर्थात् यदि कोई व्यक्ति अपने विधिक अधिकारों के उल्लंघन होने पर उपचार प्राप्ति के लिए आवेदन करने में अत्यधिक विलम्ब करता है तो उसका उपचार प्राप्ति का अधिकार अवरुद्ध हो जाता है एवं साम्य भी ऐसे मामलों में कुछ नहीं कर सकता है। अर्थात् उपचार नहीं प्रदान कर सकता है। |
| यदि व्यक्ति उपचार हेतु आवेदन में विलम्ब करता है तो क्या परिणाम होता है? | उसका उपचार प्राप्ति का अधिकार अवरुद्ध हो जाता है। |
| क्या साम्य विलम्ब करने वाले को उपचार प्रदान करता है? | नहीं, साम्य ऐसे मामलों में उपचार प्रदान नहीं करता। |
| विलम्ब साम्य को विफल कर देता है सिद्धान्त का मूल आधार क्या है? | अधिकारों के प्रति सजगता आवश्यक है। |
| स्मिथ बनाम क्ले वाद में क्या कहा गया? | साम्य के न्यायालयों ने सदैव ही ऐसे मामलों में उपचार देने से मना किया है, जिसमें कोई पक्षकार अपने अधिकारों के प्रति लम्बे समय तक उदासीन रहा अथवा शान्त रहा। |
| साम्य न्यायालय कब उपचार देने से मना करते हैं? | जब पक्षकार अपने अधिकारों के प्रति लम्बे समय तक निष्क्रिय या शान्त रहता है। |
| भारतीय विधि में परिसीमा का निर्धारण किस अधिनियम द्वारा किया गया है? | वादों एवं आवेदनों को संस्थित करने की परिसीमा काल, परिसीमा अधिनियम 1963 के अन्तर्गत निश्चित की गई है। |
| परिसीमा अधिनियम, 1963 का इस सिद्धान्त पर क्या प्रभाव है? | इस आधार सूत्र का महत्व कम हो गया,
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| किन स्थितियों में यह आधारसूत्र अभी भी लागू होता है? | जहाँ अवधि निश्चित नहीं है, वहाँ यदि आवेदक उपचार मांगने में अनुचित विलम्ब करे तो साम्य उसे उपचार नहीं देगा, क्योंकि साम्य उन्ही की सहायता करता है, जो अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है। अतः अब यह आधार सूत्र वहीं प्रयोज्य होता है, जहाँ परिसीमा काल न दिया गया हो। |
| यदि परिसीमा काल निर्धारित नहीं है और विलम्ब किया गया है तो क्या होगा? | साम्य उपचार प्रदान नहीं करेगा। |
| साम्य किनकी सहायता करता है? | जो अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होते हैं। |
| विलम्ब साम्य को विफल कर देता है आधारसूत्र का सार क्या है? | विलम्ब करने पर साम्य में उपचार नहीं मिलता। |
साम्य प्रारूप पर नहीं आशय पर विचार करता है (Equity considers intent, not form) | |
| साम्य के आधारसूत्रों में छठवाँ सिद्धान्त क्या है? | साम्य प्रारूप पर नहीं आशय पर विचार करता है |
| साम्य के आधारसूत्रों में "साम्य प्रारूप पर नहीं आशय पर विचार करता है" का विषय क्या है? | संव्यवहार के आशय को प्राथमिकता देने का सिद्धान्त। |
| साम्य प्रारूप पर नहीं आशय पर विचार करता है आधारसूत्र का अर्थ क्या है? | "साम्य किसी संव्यवहार के आशय पर ध्यान देता है, न कि उसके लिए प्रयुक्त किये गये विधिगत शब्दों पर"। ऐसा इसलिए है, क्योंकि किसी भी संव्यवहार में जितना महत्व प्रारूप का नहीं होता, उससे ज्यादा महत्व, उसमें के पक्षकारों के आशय पर होता है। इसलिए साम्य हमेशा, वस्तुओं के सार को ग्रहण करके पक्षकारों के बीच उत्पन्न होने वाले अधिकारों का उनके आशय के अनुकूल प्रवर्तन कराता है। |
साम्य प्रारूप पर नहीं आशय पर विचार करता है में किसका अधिक महत्व होता है? | पक्षकारों के आशय का। |
| साम्य किस आधार पर अधिकारों का प्रवर्तन करता है? | पक्षकारों के वास्तविक आशय के अनुरूप। |
| क्या साम्य प्रारूप को प्राथमिकता देता है? | नहीं, यह आशय को प्राथमिकता देता है। |
| साम्य का मुख्य उद्देश्य साम्य प्रारूप पर नहीं आशय पर विचार करता है, सिद्धान्त में क्या है? | संव्यवहार के वास्तविक सार को ग्रहण करना। |
| साम्य पक्षकारों के आशय को कैसे देखता है? | वास्तविक आशय को खोजकर उसे प्रभाव में लाता है। |
| क्या साम्य छिपे हुए आशय को भी मान्यता देता है? | हाँ, जब तक वह विधि द्वारा निषिद्ध न हो। |
| कब साम्य आशय को प्रभाव में नहीं लाता? | जब वह विधि के किसी स्पष्ट नियम द्वारा निषिद्ध हो। |
| साम्य साक्ष्य के किस पक्ष को महत्व देता है? | उसके भाव को। |
| क्या साम्य साक्ष्य के शाब्दिक अर्थ को प्राथमिकता देता है? | नहीं, वह भाव को प्राथमिकता देता है। |
| संविदा में किसका अधिक महत्व है? | पक्षकारों के वास्तविक आशय का। |
| क्या संविदा में प्रयुक्त शब्द निर्णायक होते हैं? | नहीं, वे उतने महत्वपूर्ण नहीं होते जितना आशय। |
| साम्य प्रारूप पर नहीं आशय पर विचार करता है, सिद्धान्त का प्रयोग किन विवादों में किया जाता है? | कोई संव्यवहार विक्रय है या बन्धक के सन्दर्भ में, शास्ति, जब्ती, प्रार्थनात्मक न्यास, कचक मोचन का अधिकार इत्यादि। |
| क्या यह सिद्धान्त शास्ति एवं जब्ती के मामलों में लागू होता है? | हाँ, लागू होता है। |
| क्या यह सिद्धान्त प्रार्थनात्मक न्यास के मामलों में लागू होता है? | हाँ, लागू होता है। |
| क्या यह सिद्धान्त बन्धक मोचन के अधिकार में लागू होता है? | हाँ, लागू होता है। |
| साम्य प्रारूप पर नहीं आशय पर विचार करता है, आधारसूत्र का सार क्या है? | साम्य प्रारूप नहीं बल्कि वास्तविक आशय को मान्यता देता है। |
साम्य की क्रिया व्यक्ति से सम्बन्ध रखती है (The action of equity pertains to the person) | |
| साम्य के आधारसूत्रों में सातवां सिद्धान्त क्या है? | साम्य की क्रिया व्यक्ति से सम्बन्ध रखती है | |
| साम्य के आधारसूत्रों में "साम्य की क्रिया व्यक्ति से सम्बन्ध रखती है" का विषय क्या है? | साम्य के आदेशों का व्यक्ति पर प्रभाव के माध्यम से प्रवर्तन। |
| साम्य की क्रिया व्यक्ति से सम्बन्ध रखती है, आधारसूत्र अन्य आधारसूत्रों की तुलना में कैसा है? | अत्यन्त व्यापक एवं विस्तृत है। |
| क्या सम्पूर्ण साम्य इस सिद्धान्त में निहित माना जाता है? | हाँ, सम्पूर्ण साम्य इसी में अन्तर्विष्ट माना जाता है। |
| साम्य की क्रिया व्यक्ति से सम्बन्ध रखती है सिद्धान्त का सामान्य अर्थ क्या है? | साम्य अपने आदेशों का प्रवर्तन, आरोपित व्यक्ति के अन्तःकरण पर प्रभाव उत्पन्न करके करता है, क्योंकि साम्य का न्यायालय अपनी आज्ञप्ति के निष्पादन अथवा पूर्ति के लिए प्रतिवादी के शरीर पर ही आश्रित है। |
| साम्य न्यायालय अपनी आज्ञप्ति के निष्पादन के लिए किस पर निर्भर होता है? | न्यायालयों का निर्णय, निष्पादन लेखों द्वारा प्रवर्तनीय होता था, जिसके द्वारा वादी को बलपूर्वक ऐसी सम्पत्ति पर आधिपत्य दे दिया जाता है, जिसका वह हकदार हो परन्तु साम्य के न्यायालय प्रतिवादी की सम्पत्ति में किसी प्रकार हस्तक्षेप नहीं करते थे, अपितु उसके विरूद्ध एक आदेश पारित करते थे एवं प्रतिवादी के द्वारा आदेश का पालन न किये जाने पर न्यायालय कारावास या अवमान के लिए कोई अन्य दण्ड देता था। |
| क्या साम्य न्यायालय प्रतिवादी की सम्पत्ति में हस्तक्षेप करते हैं? | नहीं, वे हस्तक्षेप नहीं करते। |
| साम्य न्यायालय किस प्रकार आदेश पारित करते हैं? | प्रतिवादी के विरुद्ध व्यक्तिगत आदेश। |
| यदि प्रतिवादी आदेश का पालन नहीं करता तो क्या होता है? | उसे कारावास या अवमान का दण्ड दिया जा सकता है। |
| साम्य की क्रिया व्यक्ति से सम्बन्ध रखती है, सिद्धान्त का भारत में क्या स्वरूप है? | सीमित रूप से लागू होता है। |
| सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 16 के परन्तुक का सम्बन्ध किससे है? | “साम्य की क्रिया व्यक्ति से सम्बन्ध रखती है” सिद्धान्त के प्रयोग से। |
| धारा 16 के परन्तुक के अनुसार वाद कहाँ संस्थित किया जा सकता है? | जहाँ प्रतिवादी स्वेच्छा से निवास, व्यापार या कार्य करता है। |
| धारा 16 का परन्तुक किस प्रकार का उदाहरण है? | "साम्य की क्रिया व्यक्ति से सम्बन्ध रखती है" का। |
| क्या भारत में इस सिद्धान्त का व्यापक प्रयोग होता है? | नहीं, इसका प्रयोग सीमित है। |
साम्य की क्रिया व्यक्ति से सम्बन्ध रखती है, आधारसूत्र का सार क्या है? | साम्य व्यक्ति पर आदेश लागू करके न्याय प्रवर्तित करता है। |
जहाँ साम्य समान हो, वहाँ विधि अभिभावी होगी (Where there are equal equities, the first in time shall prevail) | |
| साम्य के आधारसूत्रों में आठवां सिद्धान्त क्या है? | जहाँ साम्य समान हो, वहाँ विधि अभिभावी होगी |
| साम्य के आधारसूत्रों में "जहाँ साम्य समान हो, वहाँ विधि अभिभावी होगी" का विषय क्या है? | विधिक हित की प्राथमिकता का सिद्धान्त। |
| यह आधारसूत्र किस सिद्धान्त पर आधारित है? | पूर्वता के सिद्धान्त पर। |
| इस आधारसूत्र का अभिप्राय क्या है? | जहाँ एक ही विषय-वस्तु के सम्बन्ध में दो व्यक्ति समान हो अर्थात् समान साम्यिक् हित धारण करते हो परन्तु बाद में उनमें से कोई एक व्यक्ति विधिक हित भी प्राप्त कर लेता है, तो उक्त दोनों हितों को धारण करने वाला व्यक्ति उस विषय वस्तु को प्राप्त करेगा क्योंकि विधिक हित, साम्यिक हित पर अभिभावी होगा। |
| किन परिस्थितियों में जहाँ साम्य समान हो, वहाँ विधि अभिभावी होगी सिद्धान्त लागू होता है? | जब दो व्यक्तियों के समान साम्यिक हित हों और एक को विधिक हित भी प्राप्त हो जाये। |
| कौन व्यक्ति विषय-वस्तु प्राप्त करेगा? | वह व्यक्ति जिसके पास साम्यिक हित के साथ विधिक हित भी हो। |
| विधिक हित का साम्यिक हित पर क्या प्रभाव है? | विधिक हित साम्यिक हित पर अभिभावी होता है। |
| किसे प्राथमिकता दी जाती है? | विधिक सम्पदा के धारक को। |
| क्या केवल साम्यिक हित रखने वाला व्यक्ति प्राथमिकता प्राप्त करता है? | नहीं, उसे प्राथमिकता नहीं मिलती। |
जहाँ साम्य समान हो, वहाँ विधि अभिभावी होगी सिद्धान्त का आधार क्या है? | साम्य विधि का अनुसरण करता है। |
| एक मकान को क एवं ख दोनों ही अपना बताते हैं। क साम्यिक हित के आधार पर दावा करता है, जबकि ख, साम्यिक हित एवं विधिक हित दोनों के आधार पर दावा करता है- | यहाँ ख मकान प्राप्त करेगा, क्योंकि साम्य के समान स्तर की होने पर विधि अभिभावी होगी। |
| एक मकान को क एवं ख दोनों ही अपना बताते हैं। क साम्यिक हित के आधार पर दावा करता है, जबकि ख, साम्यिक हित एवं विधिक हित दोनों के आधार पर दावा करता है। यहाँ ख मकान प्राप्त करेगा, क्योंकि साम्य के समान स्तर की होने पर विधि अभिभावी होगी, ख को प्राथमिकता क्यों दी गई? | क्योंकि उसके पास साम्यिक एवं विधिक दोनों हित हैं। |
| जहाँ साम्य समान हो, वहाँ विधि अभिभावी होगी, सिद्धान्त मुख्यतः किन मामलों में लागू होता है? | सद्भावनापूर्वक, बिना सूचना एवं प्रतिफल देकर क्रय के मामलों में। |
| यदि क्रेता को पूर्व साम्यिक हित की जानकारी न हो तो क्या होगा? | जहाँ मूल्यवान प्रतिफल देकर, किसी सम्पत्ति का क्रेता, जिसे उसी विषय-वस्तु में निहित, पूर्व साम्यिक हित की जानकारी न हो, सम्पत्ति को खरीद लेता है, तो वह अपने साम्यिक हित के अलावा विधिक हित भी प्राप्त कर लेता है, फलस्वरूप वह विधि एवं साम्य दोनों की दृष्टि से उस सम्पत्ति का स्वामी हो जाता है। |
| वह व्यक्ति, जो विधिक सम्पत्ति को कब्जे में लेकर धारण किया हुआ है, उस व्यक्ति पर प्राथमिकता रखता है, जो केवल साम्यिक सम्पत्ति को धारण हुये है, ऐसा इसलिए है क्योंकि- | "साम्या विधि का अनुसरण करती है।" |
| जहाँ साम्य समान हो, वहाँ विधि अभिभावी होगी, सिद्धान्त का भारतीय विधि में कहाँ प्रयोग होता है? | निर्वाचन, क्रमबन्धन एवं प्रतिसादन (मुजरा) के सिद्धान्त में। |
| जहाँ साम्य समान हो, वहाँ विधि अभिभावी होगी, आधारसूत्र का सार क्या है? | समान साम्य की स्थिति में विधिक अधिकार को प्राथमिकता मिलती है। |
साम्य उसी को किया गया मानता है, जो किया जाना चाहिए (Equity considers that to be done which ought to be done) | |
| साम्य के आधारसूत्रों में "साम्य उसी को किया गया मानता है, जो किया जाना चाहिए" का विषय क्या है? | दायित्व के कल्पित पालन का सिद्धान्त। |
| साम्य उसी को किया गया मानता है, जो किया जाना चाहिए, आधारसूत्र का अर्थ क्या है? | इस आधार सूत्र का अर्थ है-साम्य उस व्यक्ति द्वारा जिस पर कुछ करने का दायित्व अभ्यारोपित किया गया हो, उसका उसके द्वारा सम्पादन कर दिया जाना समझता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि साम्य के अन्तर्गत किसी कार्य के, वे ही परिणाम समझे जाते हैं, जो दायित्व के वास्तविक रूप से पालन किये जाने होते हैं। |
| साम्य के अनुसार कार्य के परिणाम कैसे माने जाते हैं? | जैसे कि दायित्व का वास्तविक पालन हो चुका हो। |
| यदि भूमि विक्रय की संविदा हो तो साम्य क्या मानता है? | मानो संविदा का निष्पादन हो चुका है। |
| साम्य उसी को किया गया मानता है, जो किया जाना चाहिए, सिद्धान्त का मुख्य प्रभाव क्या है? | संविदा के परिणामों को वास्तविक निष्पादन के समान मानना। |
| साम्य उसी को किया गया मानता है, जो किया जाना चाहिए, आधारसूत्र का वैकल्पिक रूप क्या है? | जो किया जाना चाहिए, वही किया गया समझा जाता है। |
| दूसरे रूप में इस सिद्धान्त का क्या अर्थ है? | जो करना उचित है, उसे किया हुआ माना जाता है। |
| शुद्ध अन्तःकरण के आधार पर इस सिद्धान्त का क्या स्वरूप है? | जो उचित हो, उसे किया हुआ माना जाता है। |
| यह आधारसूत्र मुख्यतः किन मामलों में लागू होता है? | संविदा से सम्बन्धित मामलों में। |
| यदि किसी ने प्रतिफल लेकर वचन दिया है तो साम्य क्या मानता है? | उसने अपने दायित्व का पालन कर लिया है। |
| साम्य संविदा के दायित्व को कैसे देखता है? | उसे पूर्ण किया हुआ मानता है। |
| क्या साम्य कार्य की वास्तविक सम्भावना पर विचार करता है? | नहीं, वह इस पर विचार नहीं करता। |
| साम्य उसी को किया गया मानता है, जो किया जाना चाहिए, आधारसूत्र का भारतीय विधि में प्रयोग कहाँ है? | सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 की धारा 40 एवं 53(क) में। |
| साम्य उसी को किया गया मानता है, जो किया जाना चाहिए, सिद्धान्त का प्रयोग भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 की किस धारा में है? | धारा 91 में। |
| क्या यह सिद्धान्त विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 में भी मान्य है? | हाँ, इसमें भी प्रावधानित है। |
| साम्य उसी को किया गया मानता है, जो किया जाना चाहिए, आधारसूत्र का सार क्या है? | साम्य दायित्व के पालन को वास्तविक मानकर परिणाम निर्धारित करता है। |
| साम्य विधि की अन्य सूक्तियां | |
| समानता ही साम्या है (Equality is equity): | जहां कोई अन्य आधार न हो, वहां संपत्ति या देनदारियों को बराबर बांटा जाना चाहिए। |
| साम्या मानती है कि वह कार्य पूर्ण हो गया है जो किया जाना चाहिए था (Equity looks on that as done which ought to be done)- | यदि कोई अनुबंध करने का वादा किया गया था, तो इक्विटी उसे पूरा हुआ मान लेगी।
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| साम्या व्यक्तिगत रूप से कार्य करती है (Equity acts in personam)- | इक्विटी व्यक्ति के विवेक (conscience) पर कार्य करती है, न कि केवल संपत्ति पर।
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| साम्या किसी न्यासी (Trustee) के अभाव में न्यास (Trust) को विफल नहीं होने देगी (Equity will not suffer a trust to fail for want of a trustee)- | यदि ट्रस्टी नहीं है, तो कोर्ट नया नियुक्त कर देगा, ट्रस्ट खत्म नहीं होगा। |
| साम्या कपटपूर्ण आचरण को लाभ उठाने की अनुमति नहीं देती (Equity will not allow a fraud to be practiced)- | धोखे से प्राप्त किसी भी लाभ को इक्विटी मान्यता नहीं देगी। |
