धारा 124 से 139 अध्याय 9 भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 9

साक्षियों के विषय में

124. कौन साक्ष्य दे सकेगा-

सभी व्यक्ति साक्ष्य देने के लिए सक्षम होंगे, जब तक कि न्यायालय का यह विचार न हो कि अल्पवयस्क, अत्यधिक वृद्धावस्था, शरीर के या मन के रोग या इसी प्रकार के किसी अन्य कारण से वे उनसे किए गए प्रश्नों को समझने से या उन प्रश्नों के युक्तिसंगत उत्तर देने से निवारित हैं।

स्पष्टीकरण-

कोई विकृत चित्त व्यक्ति साक्ष्य देने के लिए अक्षम नहीं है, जब तक वह अपनी चित्त-विकृति के कारण उससे किए गए प्रश्नों को समझने से या उनके युक्तिसंगत उत्तर देने से निवारित न हो।

125. साक्षी का मौखिक रूप से संसूचित करने में असमर्थ होना-

ऐसा कोई साक्षी, जो बोलने में असमर्थ है, ऐसी किसी अन्य रीति में, जिसमें वह उसे बोधगम्य बना सकता है जैसे कि लिखकर या संकेत चिह्नों द्वारा अपना साक्ष्य दे सकेगा; किंतु ऐसा लेखन और संकेत चिह्न खुले न्यायालय में लिखे और किए जाने चाहिए तथा इस प्रकार दिया गया साक्ष्य मौखिक साक्ष्य माना जाएगा:

परंतु यदि साक्षी मौखिक रूप से संसूचित करने में असमर्थ है तो न्यायालय कथन अभिलिखित करने में किसी द्विभाषिए या विशेष शिक्षक की सहायता लेगा, और ऐसे कथन की वीडियो फिल्म तैयार की जाएगी।

126. कतिपय मामलों में पति और पत्नी की साक्षी के रूप में सक्षमता-

1. सभी सिविल कार्यवाहियों में वाद के पक्षकार और वाद के किसी पक्षकार का पति या पत्नी सक्षम साक्षी होंगे।

2. किसी व्यक्ति के विरुद्ध दांडिक कार्यवाहियों में, ऐसे व्यक्ति का क्रमशः पति या पत्नी सक्षम साक्षी होगा।

127.न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट-

कोई भी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट, न्यायालय में ऐसे न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट के नाते अपने स्वयं के आचरण के बारे में, या ऐसी किसी बात के बारे में, जिसका ज्ञान उसे ऐसे न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट के नाते न्यायालय में हुआ, किन्हीं प्रश्नों का उत्तर देने के लिए ऐसे किसी भी न्यायालय के विशेष आदेश के सिवाय, जिसके वह अधीनस्थ है, विवश नहीं किया जाएगा, किन्तु अन्य वातों के बारे में, जो उसकी उपस्थिति में उस समय घटित हुई थीं, जब वह ऐसे कार्य कर रहा था उसकी परीक्षा की जा सकेगी।

दृष्टांत

क. सेशन न्यायालय के समक्ष अपने विचारण में क कहता है कि मजिस्ट्रेट ख द्वारा अभिसाक्ष्य अनुचित रूप से लिया गया था। इसके बारे में प्रश्नों का उत्तर देने के लिए क को किसी वरिष्ठ न्यायालय के विशेष आदेश के सिवाय, विवश नहीं किया जा सकता।

ख. मजिस्ट्रेट ख के समक्ष मिथ्या साक्ष्य देने का क सेशन न्यायालय के समक्ष अभियुक्त है। वरिष्ठ न्यायालय के विशेष आदेश के सिवाय, ख से यह नहीं पूछा जा सकता कि क ने क्या कहा था।

ग. क सेशन न्यायालय के समक्ष इसलिए अभियुक्त है कि उसने सेशन न्यायाधीश ख के समक्ष विचारित होते समय किसी पुलिस अधिकारी की हत्या करने का प्रयत्न किया। ख की यह परीक्षा की जा सकेगी कि क्या घटित हुआ था।

128. विवाहित स्थिति के दौरान की गई संसूचनाएं-

कोई भी व्यक्ति, जो विवाहित है या जो विवाहित रह चुका है, किसी संसूचना को, जो किसी व्यक्ति द्वारा, जिससे वह विवाहित है या रह चुका है, विवाहित स्थिति के दौरान में उसे दी गई थी, प्रकट करने के लिए विवश नहीं किया जाएगा, और न ही उसे ऐसी किसी संसूचना को प्रकट करने की अनुमति दी जाएगी, जब तक वह व्यक्ति, जिसने वह संसूचना दी है या उसका हितप्रतिनिधि सम्मत न हो, सिवाय उन वादों में, जो विवाहित व्यक्तियों के वीच हों, या उन कार्यवाहियों में, जिनमें एक विवाहित व्यक्ति दूसरे के विरुद्ध किए गए किसी अपराध के लिए अमियोजित है।

129. राज्य के कार्यकलापों के बारे में साक्ष्य-

कोई भी व्यक्ति राज्य के किन्हीं भी कार्यकलापों से सम्बन्धित अप्रकाशित शासकीय अभिलेखों से इत्यन्न कोई भी साक्ष्य देने के लिए अनुज्ञात नहीं किया जाएगा, सिवाय संबद्ध विभाग के प्रमुख अधिकारी ही अनुमति के, जो ऐसी अनुमति देगा या उसे विधारित करेगा, जैसा करना वह ठीक समझे।

130. शासकीय संसूचनाएं-

कोई भी लोक अधिकारी उसे शासकीय विश्वास में दी हुई संसूचनाओं को प्रकट करने के लिए विवश नहीं किया जाएगा, जब कि वह समझता है कि उस प्रकटन से लोक हित की हानि होगी।

131. अपराधों के करने के बारे में सूचना-

कोई भी मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी यह कहने के लिए विवश नहीं किया जाएगा कि किसी अपराध के किए जाने के बारे में उसे कोई सूचना कब मिली और किसी भी राजस्व अधिकारी को यह कहने के लिए विवश नहीं किया जाएगा कि उसे लोक राजस्व के विरुद्ध किसी अपराध के किए जाने के बारे में कोई सूचना कब मिली।

स्पष्टीकरण-

इस धारा में "राजस्व अधिकारी" से लोक राजस्व की किसी शाखा के कारवार में या उसके बारे में नियोजित अधिकारी अभिप्रेत है।

132.वृतिक संसूचनाएं -

1. कोई भी अधिवक्ता अपने मुवक्किल की अभिव्यक्त सम्मति के सिवाय, ऐसी किसी संसूचना को प्रकट करने के लिए, जो उसके ऐसे अधिवक्ता की हैसियत में सेवा के अनुक्रम में और उसके प्रयोजन के लिए उसके मुवक्किल द्वारा, या उसकी ओर से उसे दी गई है या किसी दस्तावेज की, जिससे वह अपनी वृत्तिक सेवा के अनुक्रम में और उसके प्रयोजन के लिए परिचित हो गया है, अन्तर्वस्तु या दशा कथित करने को या किसी सलाह को, जो ऐसी सेवा के अनुक्रम में और उसके प्रयोजन के लिए उसने अपने मुवक्किल को दी है, प्रकट करने के लिए किसी भी समय अनुज्ञात नहीं किया जाएगाः

परन्तु इस धारा की कोई भी बात निम्नलिखित बात को प्रकटीकरण से संरक्षण न देगी-

क. किसी भी अवैध प्रयोजन को अग्रसर करने में दी गई कोई भी ऐसी संसूचना;

ख. ऐसा कोई भी तथ्य जो किसी अधिवक्ता ने अपनी ऐसी हैसियत में सेवा के अनुक्रम में अवलोकन किया हो, और जिससे दर्शित हो कि उसकी सेवा के प्रारम्भ के पश्चात् कोई अपराध या कपट किया गया है।

2. यह तत्त्वहीन है कि उपधारा (1) के परंतुक में निर्दिष्ट ऐसे अधिवक्ता का ध्यान ऐसे तथ्य के प्रति उसके मुवक्किल के द्वारा या उसकी ओर से आकर्षित किया गया था या नहीं।

स्पष्टीकरण-

इस धारा में कथित बाध्यता वृत्तिक सेवा के समाप्त हो जाने के पश्चात भी बनी रहती है।

दृष्टांत

क. मुवक्किल क, अधिवक्ता ख से कहता है, "मैंने कूटरचना की है और में चाहता हूं कि आप मेरी प्रतिरक्षा करें"। यह संसूचना प्रकटन से संरक्षित है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति की प्रतिरक्षा करना आपराधिक प्रयोजन नहीं है, जिसका दोषी होना ज्ञात हो।

ख. मुवक्किल क, अधिवक्ता ख से कहता है, "मैं सम्पत्ति पर कब्जा कूटरचित विलेख के उपयोग द्वारा अभिप्राप्त करना चाहता हूं और इस आधार पर वाद लाने की में आपसे प्रार्थना करता हूं"। यह संसूचना आपराधिक प्रयोजन के अग्रसर करने में की गई होने से प्रकटन से संरक्षित नहीं है।

ग. क पर गबन का आरोप लगाए जाने पर वह अपनी प्रतिरक्षा करने के लिए अधिवक्ता ख को रखता है। कार्यवाहियों के अनुक्रम में ख देखता है कि क की लेखावही में यह प्रविष्टि की गई है कि क द्वारा उतनी रकम देनी है, जितनी के बारे में अभिकथित है कि उसका गबन किया गया है, जो प्रविष्टि उसकी वृत्तिक सेवा के आरम्भ के समय उस वही में नहीं थी। यह ख द्वारा अपनी सेवा के अनुक्रम में अवलोकित ऐसा तथ्य होने के कारण, जिससे दर्शित होता है कि कपट उस कार्यवाही के प्रारम्भ होने के पश्चात् किया गया है, प्रकटन से संरक्षित नहीं है।

3. इस धारा के उपबंध अधिवक्ताओं के निर्वचनकर्ताओं और लिपिकों या कर्मचारियों को लागू होंगे।

133. श्वेच्छ्या साक्ष्य देने से विशेषाधिकार का अभित्यक्त नहीं होना-

यदि किसी वाद का कोई पक्षकार स्वप्रेरणा से ही या अन्यथा उसमें साक्ष्य देता है तो यह नहीं समझा जाएगा कि उसने ऐसे प्रकटन के लिए, जैसा धारा 132 में वर्णित है, सम्मति दे दी है, और यदि किसी वाद या कार्यवाही का कोई पक्षकार ऐसे किसी अधिवक्ता को साक्षी के रूप में बुलाता है, तो यह कि उसने ऐसे प्रकटन के लिए अपनी सम्मति दे दी है, केवल तभी समझा जाएगा, जब वह ऐसे अधिवक्ता से उन बातों के बारे में प्रश्न करे, जिनके प्रकटन के लिए वह ऐसे प्रश्नों के अभाव में स्वतंत्र नहीं होता।

134.विधि सलाहकारों से गोपनीय संसूचना-

कोई भी व्यक्ति किसी गोपनीय संसूचना को, जो उसके और उसके विधि सलाहकार के बीच हुई है, न्यायालय को प्रकट करने के लिए विवश नहीं किया जाएगा, जब तक कि वह अपने को साक्षी के तौर पर प्रस्तुत न कर दे; ऐसे पेश करने की दशा में किन्हीं भी ऐसी संसूचनाओं को जो उसने दी हैं, जिन्हें उस किसी साध्य को स्पष्ट करने के लिए जानना, न्यायालय को आवश्यक प्रतीत हो, प्रकट करने के लिए विवश किया जा सकेगा किन्तु किन्हीं भी अन्य संसूचनाओं को नहीं।

135. जो साक्षी पक्षकार नहीं है उसके हक विलेखों का प्रस्तुत किया जाना-

कोई भी साक्षी, जो वाद का पक्षकार नहीं है, किसी सम्पत्ति सम्बन्धी अपने हक विलेखों को, या किसी ऐसी दस्तावेज को, जिसके बल पर वह गिरवीदार या वन्धकदार के रूप में कोई सम्पत्ति धारण करता है, या किसी दस्तावेज को, जिसका प्रस्तुतीकरण उसे अपराध में फंसाने की प्रवृत्ति रखता है, प्रस्तुत करने के लिए विवश नहीं किया जाएगा, जब तक कि उसने ऐसे विलेखों के प्रस्तुतीकरण की वांछा रखने वाले व्यक्ति के साथ, या ऐसे किसी व्यक्ति के साथ जिससे व्युत्पन्न अधिकार से वह व्यक्ति दावा करता है, उन्हें प्रस्तुत करने का लिखित करार न कर लिया हो।

136. ऐसे दस्तावेजों या इलैक्ट्रॉनिक अभिलेखों का प्रस्तुत किया जाना, जिन्हें कोई दूसरा व्यक्ति, जिसका उन पर कब्जा है, प्रस्तुत करने से इंकार कर सकता था-

कोई भी व्यक्ति, अपने कब्जे में ऐसे दस्तावेजों या अपने नियंत्रण वाले इलैक्ट्रॉनिक अभिलेखों को प्रस्तुत करने के लिए जिनको प्रस्तुत करने के लिए कोई अन्य व्यक्ति, यदि वे उसके कब्जे या नियंत्रण में होते, प्रस्तुत करने से इंकार करने का हकदार होता, विवश नहीं किया जाएगा, जब तक कि ऐसा अन्तिम वर्णित व्यक्ति उन्हें पेश करने के लिए सहमति नहीं देता।

137. इस आधार पर कि उत्तर उसे अपराध में फंसाएगा, साक्षी उत्तर देने से क्षम्य नहीं होगा-

कोई साक्षी किसी वाद या किसी सिविल या दाण्डिक कार्यवाही में विवाद्यक विषय से सुसंगत किसी विषय के बारे में किए गए किसी प्रश्न का उत्तर देने से इस आधार पर क्षम्य नहीं होगा कि ऐसे प्रश्न का उत्तर ऐसे साक्षी को अपराध में फंसाएगा या उसकी प्रवृत्ति प्रत्यक्षतः या अप्रतयक्षतः अपराध में फंसाने की होगी या वह ऐसे साक्षी को किसी प्रकार की शास्ति या जब्ती के लिए अनावृत करेगा या इसकी प्रवृत्ति प्रत्यक्षतः या अप्रतयक्षतः अनावृत करने की होगीः

परन्तु ऐसा कोई भी उत्तर, जिसे देने के लिए कोई साक्षी विवश किया जाएगा, वह गिरफ्तारी या अभियोजन के अध्यधीन नहीं होगा और न ऐसे उत्तर द्वारा मिथ्या साक्ष्य देने के लिए अभियोजन के सिवाय वह उसके विरुद्ध किसी दाण्डिक कार्यवाही में साबित किया जाएगा।

138. सह अपराधी-

सह-अपराधी, किसी अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध सक्षम साक्षी होगा, और कोई दोषसिद्धि इसलिए अवैध नहीं है यदि वह किसी सह-अपराधी के सम्पुष्ट परिसाक्ष्य के आधार पर की गई है।

139.साक्षियों की संख्या-

किसी मामले में किसी तथ्य को साबित करने के लिए साक्षियों की कोई विशिष्ट संख्या अपेक्षित नहीं होगी।

 

 

 

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