धारा 3 से 11 भाग 2 वादों, अपीलों और आवेदनों की परिसीमा

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

भाग 2

वादों, अपीलों और आवेदनों की परिसीमा

3. परिसीमा द्वारा वर्जन -

(1) धारा 4 से 24 तक (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं आती हैं), अन्तर्विष्ट उपबंधों के अध्यधीन यह है कि विहित काल के पश्चात् हर संस्थित बाद की गई अपील और किया गया आवेदन खारिज कर दिया जाएगा यद्यपि प्रतिरक्षा के तौर पर परिसीमा की बात उठाई न गई हो ।

(2) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए यह है कि

(क) वाद की संस्थिति.-

(i) मामूली दशा में तब होती है, जब वादपत्र उचित आफिसर के समक्ष उपस्थित किया जाता है ;

(ii) अकिंचन की दशा में तब होती है, जब अकिंचन के तौर पर बाद लाने की इजाजत के लिए उसके द्वारा आवदेन किया जाता है तथा

(iii) उस कम्पनी के विरुद्ध दावे की दशा में जिसका न्यायालय द्वारा परिसमापन किया जा रहा हो तब होती है जब दावेदार के दावे का परिदान शासकीय समापक को पहली बार कारित किया जाता है :

(ख) मुजरा या प्रतिदावे के तौर का दावा एक पृथक् वाद माना जाएगा, और यह समझा जाएगा कि ऐसा दावा-

(i) मुजरे की दशा में, उसी तारीख को जिसको वह बाद संस्थित किया गया हो जिसमें मुजरे का

अभिवचन किया गया है:

(ii) प्रतिदावे की दशा में उस तारीख को जिसको न्यायालय में प्रतिदावा किया गया हो, संस्थित किया गया समझा जाएगा:

(ग) उच्च न्यायालय में प्रस्ताव की सूचना द्वारा आवेदन तब होता है, जब आवेदन उस न्यायालय के लिए उचित आफिसर के समक्ष उपस्थित किया जाता है ।

4. विहित काल का अवसान जब न्यायालय बन्द हो–

जहां कि किसी वाद, अपील या आवेदन के लिए विहित काल का अवसान किसी ऐसे दिन होता हो जिस दिन न्यायालय बंद हो, वहां उस दिन बाद संस्थित किया जा सकेगा, अपील की जा सकेगी या आवेदन किया जा सकेगा जिस दिन न्यायालय फिर खुले ।

स्पष्टीकरण –

न्यायालय इस धारा के अर्थ के भीतर उस दिन बन्द समझा जाएगा जिस दिन वह अपने काम के नियमित काल के किसी भी भाग में बन्द रहे।

5. विहित काल का कतिपय दशाओं में विस्तारण –

कोई भी अपील या कोई भी आवेदन, जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के आदेश 21 के उपबंधों में से किसी के अधीन के आवेदन से भिन्न हो, विहित काल के पश्चात् ग्रहण किया जा सकेगा यदि अपीलार्थी या आवेदक न्यायालय का यह समाधान कर दे कि उसके पास ऐसे काल के भीतर अपील या आवेदन न करने के लिए पर्याप्त हेतुक था।

स्पष्टीकरण –

यह तथ्य कि अपीलार्थी या आवेदक विहित काल का अभिनिश्चय या संगणना करने में उच्च न्यायालय के किसी आदेश, पद्धति या निर्णय के कारण भुलावे में पड़ गया था, इस धारा के अर्थ के भीतर पर्याप्त हेतुक हो सकेगा ।

6. विधिक निर्योग्यता -

(1) जहां कि कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे वाद संस्थित करने का या किसी डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन करने का हक हो, उस समय, जब से विहित काल की गणना की जानी है, अप्राप्तव्य या पागल या जड़ हो, वहां उस निर्योग्यता का अन्त होने के पश्चात् वह उतने ही काल के भीतर बाद संस्थित या आवेदन कर सकेगा जितना उसे अन्यथा अनुसूची के तीसरे स्तम्भ में तदर्थ विनिर्दिष्ट समय से अनुज्ञात होता ।

(2) जहां कि ऐसा व्यक्ति उस समय, जब से विहित काल की गणना की जानी है, ऐसी दो निर्योग्यताओं से ग्रस्त हो अथवा जहां कि वह अपनी निर्योग्यता का अन्त होने के पूर्व किसी दूसरी निर्योग्यता से ग्रस्त हो जाए वहां वह दोनों निर्योग्यताओं का अन्त होने के पश्चात् उतने ही काल के भीतर वाद संस्थित या आवेदन कर सकेगा जितना अन्यथा ऐसे विनिर्दिष्ट समय से अनुज्ञात होता ।

(3) जहां कि निर्योग्यता उस व्यक्ति की मृत्यु तक बनी रहे वहां उसका विधिक प्रतिनिधि उसकी मृत्यु के पश्चात् उतने ही काल के भीतर वाद संस्थित या आवेदन कर सकेगा जितना उसे अन्यथा ऐसे विनिर्दिष्ट समय से अनुज्ञात होता ।

(4) जहां कि उपधारा (3) में निर्दिष्ट विधिक प्रतिनिधि जिस व्यक्ति का वह प्रतिनिधित्व करता है, उसकी मृत्यु की तारीख को ऐसी किसी नियोग्यता से ग्रस्त हो वहां उपधाराओं (1) और (2) में अन्तर्विष्ट नियम लागू होंगे ।

(5) जहां कि निर्योग्यता के अधीन कोई व्यक्ति निर्योग्यता का अन्त हो जाने के पश्चात् किन्तु उस काल के भीतर जो उसके लिए इस धारा के अधीन अनुज्ञात है, मर जाए वहां उसका विधिक प्रतिनिधि उसकी मृत्यु के पश्चात् उसी काल के भीतर वाद संस्थित या आवेदन कर सकेगा जितना उस व्यक्ति को अन्यथा उपलब्ध होता यदि उसकी मृत्यु न हुई होती ।

स्पष्टीकरण – इस धारा के प्रयोजनों के लिए “अप्राप्तवय" के अन्तर्गत गर्भस्थ अपत्य आता है ।

7. कई व्यक्तियों में से एक की निर्योग्यता –

जहां कि वाद संस्थित करने या डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन करने के लिए संयुक्ततः हकदार व्यक्तियों में से कोई एक ऐसी किसी निर्योग्यता के अधीन हो और उस व्यक्ति की सहमति के बिना उन्मोचन दिया जा सकता हो, वहां उन सबके विरुद्ध समय का चलना आरम्भ हो जाएगा, किन्तु जहां कि ऐसा उन्मोचन न दिया जा सकता हो वहां उनमें से किसी के भी विरुद्ध तब तक समय का चलना आरम्भ न होगा जब तक उनमें से कोई एक अन्यों की सहमति के बिना ऐसा उन्मोचन देने के लिए समर्थ न हो जाए या उस निर्योग्यता का अन्त हो जाए।

स्पष्टीकरण 1 – यह धारा हर प्रकार के दायित्व से, जिसके अन्तर्गत स्थावर सम्पत्ति संबंधी दायित्व आता है, उन्मोचन को लागू होती है।

स्पष्टीकरण 2 – मिताक्षरा विधि द्वारा शासित हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब का कर्ता कुटुम्ब के अन्य सदस्यों की सहमति के बिना इस धारा के प्रयोजनों के लिए उन्मोचन देने के लिए समर्थ केवल तब समझा जाएगा जबकि वह अविभक्त कुटुम्ब की सम्पत्ति का प्रबंध करता हो ।

8. विशेष अपवाद - 

धारा 6 या धारा 7 की कोई भी बात शुफा अधिकारों को प्रवर्तित कराने के वादों को लागू नहीं होती और न किसी वाद अथवा आवेदन के परिसीमा काल को निर्योग्यता के अन्त से या उससे ग्रस्त व्यक्ति की मृत्यु से तीन वर्ष से अधिक विस्तारित करने वाली समझी जाएगी।

9. समय का निरन्तर चलते रहना-

जहां कि एक बार समय का चलना प्रारंभ हो जाए वहां वाद संस्थित करने या आवेदन करने की किसी भी पाश्चिक निर्योग्यता या अयोग्यता वे वह नहीं रुकता:

परन्तु जहां कि किसी लेनदार की संपदा का प्रशासन-पत्र उसके ऋणी को अनुदत्त कर दिया गया हो वहां ऐसे ऋण को वसूल करने के बाद के परिसीमा काल का चलते रहना तब तक निलम्बित रहेगा जब तक वह प्रशासन चलता रहे ।

10. न्यासियों तथा उनके प्रतिनिधियों के विरुद्ध वाद –

इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते भी, किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जिसमें सम्पत्ति किसी विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए न्यास निहित हुई हो अथवा उसके विधिक प्रतिनिधियों या समनुदेशितियों के विरुद्ध (जो मूल्यवान प्रतिफलार्थ समनुदेशिती न हों) उसके या उनके हस्तगत ऐसी सम्पत्ति या उसके आगमों का पीछा करने के प्रयोजन से या उस सम्पत्ति या उसके आगमों के लेखा के लिए कोई वाद कितना भी समय बीत जाने के कारण वर्जित न होगा ।

स्पष्टीकरण – इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी हिन्दू, मुसलमान या बौद्ध धार्मिक या खैराती विन्यास में समाविष्ट कोई भी सम्पत्ति एक विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए न्यास निहित समझी जाएगी और सम्पत्ति का प्रबंधक उसका न्यासी समझा जाएगा।

11. जिन राज्यक्षेत्रों पर इस अधिनियम का विस्तार है उनके बाहर की गई संविदाओं के आधार पर वाद -

(1) जम्मू-कश्मीर राज्य या विदेश में की गई संविदाओं के आधार पर उन राज्यक्षेत्रों में, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, संस्थित किए गए वाद इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट परिसीमा विषयक नियमों के अध्यधीन होंगे ।

(2) जम्मू-कश्मीर राज्य या किसी विदेश में प्रवृत्त परिसीमा विषयक कोई भी नियम उस राज्य या विदेश में की गई किसी संविदा पर अवधारित वाद में, जो उक्त राज्यक्षेत्रों में संस्थित किया गया हो, तब के सिवाय प्रतिरक्षा न होगा, जबकि

(क) उस नियम ने उस संविदा को निर्वापित कर दिया हो और

(ख) पक्षकार ऐसे नियम द्वारा विहित काल के दौरान उस राज्य या विदेश के अधिवासी थे ।

 

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