धारा 28 से 32 भाग 5 प्रकीर्ण

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

भाग 5

प्रकीर्ण

28. कुछ अधिनियमों का संशोधन –

निरसन तथा संशोधन अधिनियम, 1974 (1974 का 56) की धारा 2 तथा पहली अनुसूची द्वारा निरसित।

29. व्यावृत्तियां -

(1) इस अधिनियम की कोई भी बात भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 का 9) की धारा 25 पर प्रभाव नहीं डालेगी।

(2) जहां कि कोई विशेष या स्थानीय विधि किसी वाद, अपील या आवेदन के लिए कोई ऐसा परिसीमा काल विहित करती है जो अनुसूची द्वारा विहित परिसीमा काल से भिन्न है वहां धारा 3 के उपबन्ध ऐसे लागू होंगे मानो वह परिसीमा काल अनुसूची द्वारा विहित परिसीमा काल हो; तथा किसी वाद, अपील या आवेदन के निमित्त किसी विशेष या स्थानीय विधि द्वारा विहित परिसीमा काल का अवधारण करने के प्रयोजन के लिए, धारा 4 से धारा 24 तक के (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं भी आती हैं) उपबन्ध केवल वहीं तक और उसी विस्तार तक लागू होंगे जहां तक और जिस विस्तार तक वे उस विशेष या स्थानीय विधि द्वारा अभिव्यक्त तौर पर अपवर्जित न हों।

(3) विवाह और विवाह विच्छेद विषयक किसी तत्समय प्रवृत्त विधि में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय इस अधिनियम की कोई भी बात ऐसी किसी विधि के अधीन के किसी बाद या अन्य कार्यवाही को लागू नहीं होगी।

(4) धाराएं 25 और 26 तथा धारा 2 में की "सुखाचार" की परिभाषा, उन राज्यक्षेत्रों में उद्भूत मामलों को लागू नहीं होगी जिन पर भारतीय सुखाचार अधिनियम, 1882 (1882 का 5) का तत्समय विस्तार हो ।

30. उन वादों आदि के लिए उपबन्ध जिनके लिए विहित कालावधि इण्डियन लिमिटेशन ऐक्ट, 1908 द्वारा विहित कालावधि से कम है—

इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी—

(क) कोई भी वाद, जिसके लिए परिसीमा काल इण्डियन लिमिटेशन ऐक्ट, 1908 (1908 का 9) द्वारा विहित परिसीमा काल से कम है, इस अधिनियम के प्रारम्भ होने के अव्यवहित पश्चात्वत 1[सात वर्ष] की कालावधि और ऐसे वाद के लिए इण्डियन लिमिटेशन ऐक्ट, 1908 द्वारा विहित परिसीमा काल, इन दोनों में से जिसका भी अवसान पहले हो जाए उसके भीतर संस्थित किया जा सकेगा: (1. 1969 के अधिनियम सं. 10 की धारा 2 (क) द्वारा "पाँच वर्ष" के स्थान पर (1-1-1964 से) प्रतिस्थापित।

2[परन्तु यदि ऐसे किसी वाद की बाबत सात वर्ष की उक्त कालावधि का अवसान, उसके लिए इण्डियन लिमिटेशन ऐक्ट, 1908 1908 का 9) के अधीन विहित परिसीमा काल के पहले हो जाए, और ऐसे बाद की बाबत इण्डियन लिमिटेशन ऐक्ट, 1908 के अधीन उतने परिसीमा काल के सहित, जिसका अवसान इस अधिनियम के प्रारम्भ के पहले हो गया हो, सात वर्ष की उक्त कालावधि ऐसे बाद के लिए इस अधिनियम के अधीन विहित कालावधि से कम हो तो वह वाद इस अधिनियम के अधीन उसके लिए विहित परिसीमा काल के भीतर संस्थित किया जा सकेगा;] (1969 के अधिनियम सं. 10 की धारा 2 (ख) द्वारा (26-3-1969 से) अन्तःस्थापित ।)

(ख) कोई भी अपील या आवेदन, जिसके लिए परिसीमा काल इण्डियन लिमिटेशन ऐक्ट, 1908 (1908 का 9) द्वारा विहित परिसीमा काल से कम है, इस अधिनियम के प्रारम्भ होने के अव्यवहित पश्चात्वर्ती नब्बे दिन की कालावधि और ऐसी अपील या आवेदन के लिए इण्डियन लिमिटेशन ऐक्ट, 1908 द्वारा विहित परिसीमा काल में से, जिसका भी अवसान पहले हो जाए, उसके भीतर किया जा सकेगा।

31. वर्जित या लम्बित वादों आदि के बारे में उपबन्ध –

इस अधिनियम की कोई भी बात —–

(क) ऐसे किसी भी वाद, अपील या आवेदन का संस्थित या किया जाना शक्य नहीं करेगी जिसके लिए इण्डियन लिमिटेशन ऐक्ट, 1908 (1908 का 9) द्वारा विहित परिसीमा काल का अवसान इस अधिनियम के प्रारम्भ होने के पहले हो गया हो; अथवा

(ख) ऐसे प्रारम्भ के पूर्व संस्थित या किए गए और ऐसे प्रारम्भ के समय लम्बित किसी भी बाद, अपील या आवेदन पर प्रभाव न डालेगी।

32. [ निरसित] -

निरसन और संशोधन अधिनियम, 1974 (1974 का 56) की धारा 2 और पहली अनुसूची द्वारा निरसित ।

 

 

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